लेखक परिचय

बी एन गोयल

बी एन गोयल

लगभग 40 वर्ष भारत सरकार के विभिन्न पदों पर रक्षा मंत्रालय, सूचना प्रसारण मंत्रालय तथा विदेश मंत्रालय में कार्य कर चुके हैं। सन् 2001 में आकाशवाणी महानिदेशालय के कार्यक्रम निदेशक पद से सेवा निवृत्त हुए। भारत में और विदेश में विस्तृत यात्राएं की हैं। भारतीय दूतावास में शिक्षा और सांस्कृतिक सचिव के पद पर कार्य कर चुके हैं। शैक्षणिक तौर पर विभिन्न विश्व विद्यालयों से पांच विभिन्न विषयों में स्नातकोत्तर किए। प्राइवेट प्रकाशनों के अतिरिक्त भारत सरकार के प्रकाशन संस्थान, नेशनल बुक ट्रस्ट के लिए पुस्तकें लिखीं। पढ़ने की बहुत अधिक रूचि है और हर विषय पर पढ़ते हैं। अपने निजी पुस्तकालय में विभिन्न विषयों की पुस्तकें मिलेंगी। कला और संस्कृति पर स्वतंत्र लेख लिखने के साथ राजनीतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक विषयों पर नियमित रूप से भारत और कनाडा के समाचार पत्रों में विश्लेषणात्मक टिप्पणियां लिखते रहे हैं।

Posted On by &filed under मीडिया, विविधा.


बी  एन  गोयल

 

अभी हाल ही में ओम थानवी जनसत्ता के संपादक के पद से सेवा मुक्त हुए हैं। पाठकों ने कुछ प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की हैं। उमेश चतुर्वेदी जी ने एक लेख में थानवी जी के माध्यम से जनसत्ता की अच्छी व्याख्या की है। पढ़ते हुए मुझे अपना समय याद आ गया जब 1961 में (मैंने BA किया था) मैं इंडियन एक्सप्रेस का पाठक बना था।  हमारे घर में R K Karanjia द्वारा सम्पादित Blitz आता था और मुझे वीर अर्जुन में महाशय कृष्ण का पृष्ठ अच्छा लगता था| प्रभाष जोशी जी ने इंडियन एक्सप्रेस के चंडीगढ़ संस्करण की शुरुआत की थी और वहीं से जनसत्ता का भार सम्हाला। प्रभाष जी ने जनसत्ता को एक सब से अलग और निराला रूप दिया और हिन्दी का एक नया पाठक वर्ग तैयार किया। मुझे उन की कलम में महाशय कृष्ण की प्रखरता देखने को मिली। परिणाम स्वरूप जनसत्ता जिस ने भी देखा और पढ़ा वह इसी का हो गया।  उसे फिर और कोई अख़बार अच्छा ही नहीं लगा।

 

यहाँ RNG अर्थात स्व. राम नाथ गोयनका जी की चर्चा करना आवश्यक है। वे एक्सप्रेस अख़बार समूह के स्वामी ही नहीं वरन इस के शक्तिपुंज  थे। उन्हें पत्रकारिता का पुरोधा कहना ठीक होगा। उन ने फ्रैंक मोरेस को एक्सप्रेस के सीधे मुख्य संपादक के पद पर लिया और मोरेस जीवन भर एक स्वतंत्र, निडर और निर्भीक संपादक बन कर रहे। मुख्य संपादक होते हुए भी इन ने 1962 और 1965 के युद्ध को युद्ध संवाददाता के सक्रिय रूप में कवर किया था। साठ के दशक में मोरेस और प्रसिद्ध वेदान्ती राजनेता डॉ0 कर्ण सिंह के बीच भारतीय संस्कृति विषय पर पत्रों का आदान प्रदान हुआ था जो इंडियन एक्सप्रेस में मुख पृष्ठ पर ज्यों का त्यों छपा था। फ्रैंक मोरेस अपने सिद्धांतों पर अटल रहे और उन ने भारतीय पत्रकारिता को नए आयाम दिए।

 

journalismश्री गोयनका स्वयं एक स्वतन्त्रता सेनानी थे। ब्रिटिश युग में मद्रास विधान सभा के सदस्य रहे और स्वतन्त्रता के समय भारत की संविधान सभा के माननीय सदस्य थे। वे प्रेस स्वतंत्रता के सच्चे हिमायती थे। उस जमाने के लोगों को याद होगा कि आपातकाल में एक्सप्रेस के मुख्य संपादक वी के नरसिम्हन  थे जो इमर्जेंसी के शिकार बने थे|  लेकिन जब राम नाथ गोयनका जैसा  संरक्षक हो तो फिर किस बात का डर। गोयनका जी ने वी के को बाहर के कक्ष से हटा कर अंदर के कक्ष में बिठा दिया। उन के नाम की तख्ती हटा दी। वे अख़बार का सम्पादन करते रहे लेकिन उन के नाम की प्रेस लाइन नहीं दी। सरकारी आदेश के सख्त नियमों के बाद भी वे अपने तरीके से काम करते रहे।

 

RNG ने आपात काल के दौरान ही अपनी ऊपर की गयी जासूसी के विरोध में प्रधान मंत्री इन्दिरा गांधी को Surveillance शीर्षक से सीधे एक खुला पत्र इंडियन एक्सप्रेस के माध्यम से लिखा। यह केवल राम नाथ गोयनका ही कर सकते थे। शायद गोयनका जी के अपने जीवन काल में अपने ही अख़बार में उन के नाम से छपने वाली यह एक मात्र सामग्री थी। हाँ, जो उन से मिले हैं वे यह भी जानते होंगे कि उन के सख्त व्यक्तित्व के अंदर उन्मुक्त हंसी मज़ाक का झरना भी उछलता था।

 

प्रभाष जोशी मालवी संस्कृति की सौंधी सुगंध में पले बढ़े थे। उन्हों  ने हिन्दी पत्रकारिता को एक नई शब्दावली (जैसे सुपड़ा साफ होना) दी। बेबाक और बेखौफ होकर लिखना कोई उन से सीखे। क्रिकेट उन के रग रग में थी। लेकिन साहित्य? किसी ने एक बार कह दिया था – ‘जोशी जी पत्रकार हैं साहित्य से उन का क्या वास्ता’ – इस के उत्तर में उन का ‘कागद कोरे’ पठनीय था। उन के समय में दायी और बाई दोनों प्रकार की विचारधारा के व्यक्तियों का जनसत्ता में समान रूप से स्वागत भी था और लताड़ भी थी। प्रभाष जी ने पेड़  न्यूज़ की इस नवीनतम अवधारणा का जम कर विरोध किया। इस विरोध में खुल कर सामने आने वाले प्रभाष जोशी सबसे पहले संपादक थे। अब इसे अपरोक्ष रूप से प्रेस जगत ने शायद स्वीकार कर लिया है। तभी तो कुछ माननीय व्यक्तियों के खिलाफ खुली चर्चा चलने लगी हैं।

 

हमारे देश में पत्रकारिता की सामाजिक और राष्ट्रीय हित की लंबी परंपरा रही है।  पत्रकारिता का एक सामाजिक और राष्ट्रीय उद्देश्य था।  देश की स्वतन्त्रता की लड़ाई में पत्रकारों का योगदान चिर – स्मरणीय रहेगा। बाल गंगाधर तिलक, सदाशिव पराड़कर, गणेश शंकर विद्यार्थी आदि ऐसे नाम हैं जिन का यह देश सदैव ऋणी रहेगा। हिंदी के प्रसिद्ध पत्रकार सी वाई चिंतामणि के बारे में कहा जाता है कि वे अपना अखबार ‘लीडर’ अपने हाथ से लिखते थे और शाम को इलाहाबाद के चौराहे पर खड़े होकर खुद ही  बेचते थे। नेशनल हेराल्ड के संपादक चलपति राव अखबार के स्वामी पंडित  नेहरू का कोई दखल सहन नहीं करते थे। महात्मा गांधी स्वयं ‘यंग इंडिया’ और ‘हरिजन’ नाम के अखबार निकालते थे। उन के सब से छोटे बेटे देवदास गांधी दिल्ली के अंग्रेजी के विख्यात अखबार हिंदुस्तान टाइम्स के स्वतंत्र भारत में पहले संपादक थे। 1957 में उनके देहांत के बाद अखबार की बागडोर पोथान जोसफ ने सम्हाली और उन्होंने अपने ही ढंग से काम किया और नाम कमाया।

 

स्वतन्त्रता पूर्व के Free Press Journal के संपादक और मालिक सदानंद और संयुक्त पंजाब के महाशय कृष्ण का नाम स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए सदा स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद के साथ महाशय जी का पत्र व्यवहार वीर अर्जुन में ज्यों का त्यों छपा था। प्रत्येक पत्र एक लेख के समान था।  स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद के समर्पित हिन्दी भाषा के पत्रकार नामों में लाला जगत नारायण (पंजाब केसरी), खुशहाल चंद (मिलाप – बाद में आनंद स्वामी के नाम से सन्यासी बने), नरेंद्र और वीरेंद्र (वीर अर्जुन) का नाम प्रमुख है। लाला जगत नारायण और उन के भाई पंजाब आतंकवाद के शिकार हुए।

मध्य प्रदेश- इंदौर के नयी दुनिया के संस्थापक राहुल बारापुते स्वयं में हिन्दी पत्रकारिता की एक संस्था माने जाते हैं। इन के साथ रहकर ही स्व0 राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी ने अपना पत्रकार का जीवन प्रारम्भ किया। ये सब लोग अपनी कलम रूपी तलवार की धार को सदैव पैनी रखते थे।  स्व०  प्रभाष जोशी ने भी अपना ध्वज उसी निर्भीकता से फहराया और अंत समय तक अपना कालम ‘कागद कोरे’ लिखते रहे।

 

1961 से लेकर अब तक सरकारी सेवा में रहते हुए पिछले 50 वर्षों में मैंने पूरे देश में और विदेश में अनेक ट्रान्सफर झेले। अब सेवा मुक्त होकर कनाडा में हूँ लेकिन इंडियन एक्सप्रेस / जनसत्ता मेरे साथ चले और चल रहे हैं ।

 

कुछ लोगों को शिकायत है की ओम थानवी के दौरान जनसत्ता में उतना पैनापन नहीं रहा। यहाँ यह जान लेना चाहिए कि गत तीन दशक में देश, समाज और परिस्थिति में परिवर्तन आया है। उस का प्रभाव पत्रकार सहित सब तरफ पड़ा है। विशेषकर गत दो दशक में मीडिया में बहुत तेजी से परिवर्तन आया है। कभी कभी लगता है की  हम शायद अब रास्ते से भटक रहे हैं।  फिर भी मेरा विश्वास है कि जनसत्ता की धार में कमी नहीं होगी। समय के साथ यह और पैनी होगी क्योंकि इस पत्र का एक अपना संस्कार है, एक अलग  व्यक्तित्व है।

 

थानवी जी सेवा मुक्त हो गए – उन के भावी जीवन के प्रति शुभ कामनाएँ।

 

 

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz