लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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gandhijiराकेश कुमार आर्य

सफल वक्ता वही होता है जो श्रोताओं को अपनी बात से सहमत और संतुष्ट तो कर ही ले साथ ही उसकी भाषण कला ऐसी हो जिससे लोग वही कुछ करने के लिए प्रेरित और आंदोलित भी हो उठें जिसे वह वक्ता उनसे कराना चाहता है। भाषण के अंत में यदि नेता कहे कि-”अमुक स्थान के लिए प्रस्थान करो और उसमें आग लगा दो”-और हम देखें कि लोग सचमुच सभा स्थल से उठे और अपने नायक द्वारा बताये गये स्थान पर जाकर वहां आग लगा दें। …और ना केवल आग लगा दें, अपितु वहां तब तक बैठे रहें जब तक कि वह स्थान जलकर राख नही हो जाए।

अपने श्रोताओं में ऐसी ही मचलन उत्पन्न करने की अद्भुत क्षमता वाले अनुपम वक्ता थे-वीर सावरकर। उनके विषय में उनके एक सहपाठी कवि साधुदास ने ‘स्वातंत्रय वीर सावरकर’ नामक अपने एक लेख में लिखा था-”उस वर्षारम्भ के दिन ही अपने भाषण के प्रारंभ से ही सावरकरजी ने श्रोताओं के मन आकृष्ट कर लिये। स्वत्व भूलकर इस पाश्चात्य सभ्यता की चंगुल में कैसे फंस रहे हैं यह वे विशद कर रहे थे

, तब श्रोताओं को मानो बिजली के झटके लग रहे थे। भाषण सुनने को जो लोग उपस्थित थे-उन समस्त छात्रों के हृदय में भावोद्रेक हुआ था। कायर मनों को धीरज बंधाने वाला तथा साहसी मनों को स्फूत्र्ति प्रदान करने वाला वह नाद ब्रह्म आखिरकर वातावरण में विलीन हुआ, किंतु श्रोताओं की समाधि भंग न हुई। सभापति प्रा. भानु सावरकरजी के भाषण को प्रचाण्डता सह न सके। वे बोले-छात्रों, यह सावरकर शुद्घ राक्षस है। उसके राक्षसी विचारों पर आप लोग तनिक भी ध्यान मत दो। किंतु इस अध्यक्षीय अनुरोध का श्रोताओं पर कोई प्रभाव नही हुआ।”
जिनकी देशभक्ति असंदिग्ध और परम तप युक्त होती है, उनकी वाणी से बिना लाग-लपेट के निकलने वाले शब्द अक्सर दूसरों को कष्टकर अनुभव हुआ करते हैं। इसलिए ऐसे लोगों को या परम देशभक्तों को ‘राक्षस’ की उपाधि अक्सर मिल ही जाया करती है। सावरकर राजनीति की इसी पवित्रता और शुद्घता के पक्षधर थे कि इसमें चोर को चोर और शाह को शाह कहने वाले साधक लोगों का प्रवेश हो। राजनीति यदि दब्बू हो गयी या चोर को चोर कहने से बचने लगी तो राजनीति दिशाविहीन और कत्र्तव्यविमुख हो जाएगी।

आर्य समाज के प्रमुख स्तंभ और हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे स्वामी श्रद्घानंदजी महाराज की जब एक धर्मान्ध मुस्लिम ने हत्या कर दी थी तो गांधीजी जहां उस धर्मान्ध मुस्लिम हत्यारे का महिमामंडन कर रहे थे तब वीर सावरकर राजनीति की शुद्घता के झण्डे गाड़ते हुए स्वामीजी की हत्या (23 दिसंबर 1926) के अगले दिन रत्नागिरि के विटठल मंदिर में आयोजित शोकसभा में अपने हृ़दय की वेदना को इस प्रकार व्यक्त कर रहे थे-

”पिछले दिन अब्दुल रशीद नामक एक धर्मान्ध मुस्लिम ने स्वामीजी के घर जाकर विश्वासघात से उनकी हत्या की। स्वामी श्रद्घानंदजी हिंदू समाज के आधार स्तंभ थे। उन्होंने सैकड़ों (वास्तव में 5000 के लगभग) मलकाना राजपूतों को शुद्घ करके पुन: हिंदू धर्म में लाया था। वे हिंदू महासभा के अध्यक्ष भी थे। यदि कोई ऐसे घमण्ड में हो कि एक श्रद्घानंद के जाने से सारा हिंदुत्व नष्ट हो जाएगा तो मेरी (ऐसा सोचने वाले को) उसे चुनौती है-जिस भारतमाता ने एक श्रद्घानंद निर्माण किया उसके रक्त की एक बूंद से लाखों श्रद्घानंद निर्माण करने का उसमें अनोखा सामथ्र्य है, जहां औरंगजेब की लाखों तलवारें तथा तोपें हिंदू धर्म को विचलित न कर सकीं, वहां एक श्रद्घानंद की हत्या से वह नष्ट नही होगा, बल्कि और अधिक पनपेगा।”

वास्तव में स्वामी श्रद्घानंद की हत्या भारत की सनातन संस्कृति के उस परम साधक की हत्या थी जो इस देश में ‘हिंदू राजनीति’ के प्रबल पक्षधर थे। स्वामी जी की राजनीति का मुख्य आधार था-इस देश की मूल संस्कृति और मूल वैदिक विचारधारा को सुरक्षा प्रदान करना। वह जानते थे कि वैदिक संस्कारों की रक्षा से ही मानव का मानव से वास्तविक प्रेमपूर्ण संबंध स्थापित किया जा सकता है, दूसरे इन्हीं संस्कारों से इस देश की एकता और अखण्डता को बचाये-बनाये रखा जा सकता है। इसलिए स्वामी जी ‘हिन्दू संगठन’ पर बल देते थे, जिससे देशघाती शक्तियों को भय सताता था कि यदि इस देश का हिंदू संगठित हो गया तो तुम्हारा क्या होगा? वीर सावरकर स्वामी श्रद्घानंद जी की हत्या का कारण जानते थे कि ऐसा करके षडय़ंत्रकारी इस देश की मूल वैदिक विचारधारा के प्रचार-प्रसार के देशभक्ति पूर्ण कार्य की परंपरा को ही अवरूद्घ कर देना चाहते थे। वीर सावरकर नही चाहते थे कि स्वामी जी की हत्या से उपजे शून्य को अधिक देर तक बनाये रखा जाए, क्योंकि उस शून्य का जितनी देर तक अवस्थापन रहता उतनी ही देर तक स्वामी जी की हत्या के षडय़ंत्रकारियों को इस सुखद भ्रांति में जीने का अवसर मिल जाता कि वे भारत को अपनी जड़ों से मिलाने वाले एक महाभियान को रोकने में सफल हो गये थे। जबकि भारत तो वह भारत रहा है-जिसमें एक धर्मयोद्घा युद्घ क्षेत्र से हटता है तो उसके हटने से पूर्व हजार धर्मयोद्घा उसके उत्तराधिकारी बनकर क्षेत्र में आ उपस्थित होते हैं। यही कारण था कि वीर सावरकर जी ने स्वयं को उक्त भाषण के माध्यम से स्वामी जी की चिता की राख को शांत होने से पूर्व ही उनका उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। ऐसा करके उन्होंने उन विषम परिस्थितियों में बहुत बड़ा संकट मोल ले लिया था। उस समय ऐसा बोलना हर किसी के वश की बात नही थी। उनके बोलने को सदा की भांति गांधीजी ने अच्छे से नही लिया था। उनके भीतर आग लग गयी थी। वह नही चाहते थे कि स्वामी श्रद्घानंद की ‘हिंदू संगठन’ की परंपरा और आगे बढ़े। स्वामी जी की हत्या से गांधीजी को लगा था कि अब उनकी तूती भारतीय राजनीति में बोलेगी पर यह क्या हुआ कि सावरकरजी ने स्वामी श्रद्घानंद जी का ताज अपने सिर पर रखकर गांधीजी समेत उन सभी लोगों को यह संकेत दे दिया कि स्वामी श्रद्घानंद जी का बलिदान व्यर्थ नही गया है और हमने उनकी हत्या से हजार गुणा ऊर्जा लेकर उनके कार्यों को आगे बढ़ाने का निर्णय ले लिया है।

सावरकर जी आततायी का घोर विरोध करने में आनंदित होते थे। उनका मानना था कि आततायी शासक वर्ग का इतना प्रबल विरोध होना चाहिए कि उसका आततायी स्वरूप प्रबल विरोध की तपिश पाकर वैसे ही पिघलने लगे जैसे सूर्य की गरमी पाकर बरफ पिघलने लगती है। सावरकर जी विरोध को आतंक से अधिक प्रबल करके रखने के पक्षधर थे। उनकी यह मान्यता तर्कसंगत और वैज्ञानिक थी। कुश्ती के समय दोनों पहलवान एक दूसरे से हाथ मिलाते समय ही एक दूसरे के बल का अनुमान लगा लेते हैं। दुर्बल पहलवान हाथ मिलाते समय ही और आंख से आंख मिलाते ही प्रबल पक्ष के सामने मनोवैज्ञानिक रूप से अपनी पराजय स्वीकार कर लेता है। इसलिए वीर सावरकर अपने पक्ष को विपक्षी पहलवान के सामने हर स्थिति-परिस्थिति में हावी-प्रभावी रखना चाहते थे। वह अहिंसा की जंग लगी तलवार के कुपरिणामों पर गहन चिंतन करते थे। उनका इतिहास बोध उन्हें बताता था कि यह प्रवृत्ति तो आत्मघाती है। इसलिए वह गांधीजी की अहिंसा को राष्ट्रघाती मानते थे। वह कहते थे कि शत्रु जिस शक्ति के साथ मैदान में खड़ा है उससे सवायी शक्ति अर्जित कर उससे सामना किया जाना ही समझदारी होगी।

सन 1931 में जन्माष्टमी के अवसर पर ‘श्रीकृष्ण चरित्र’ पर बोलते हुए सावरकरजी ने कहा था-”श्रीकृष्ण ने अक्रूर के साथ मथुरा जाकर देखा तो कृष्ण की आंखें कंस के वैभव से चकाचौंध हो गयीं। निर्धन जनता का रक्त चूस-चूसकर कंस किस प्रकार पुष्ट हुआ है यह कृष्ण ने प्रत्यक्ष देखा।” बोलते-बोलते वृत्तांत लिख लेने वाले गुप्तचर की ओर मुडक़र वे बोले-”मैं क्या कह रहा हूं, वह ठीक लिख लेना जी! मैं यह वर्णन इंग्लैंड का नही कर रहा हूं मैं तो कृष्ण ने कंस की नगरी में जाकर जो देखा वही कह रहा हूं।” (लोग समझ गये थे कि सावकरजी क्या कहना चाहते हैं? और उन्होंने अंग्रेजों के गुप्तचर का किस प्रकार मूर्ख बना दिया है) तब सभा में हंसी के कहकहे मच गये।”

सावरकर जी की इस वक्तृत्व शैली का ऐसा ही एक उदाहरण और है, जब उन्होंने अपने विरोधियों को करारा उत्तर देकर चातुर्यपूर्ण ढंग से निरूत्तर कर दिया था। बात 1939 की 24 सितंबर की है। उस दिन उन्हें धारवाड़ के अन्नपूर्णा नाटकगृह में ‘हिन्दू संघटन’ विषय पर भाषण करना था। लोगों ने उनके लिए बहुत ही अच्छी तैयारी की हुई थी। नियत समय पर सावरकरजी का भाषण प्रारंभ हो गया। परंतु तभी नाटकगृह के एक कोने से आवाज आयी कि ”भाषण मराठी में ही क्यों, कन्नड़ में क्यों नही?” वास्तव में सभागार में कुछ कन्नड़भाषी लोग सावरकर जी का विरोध करने के लिए घुस आये थे। ‘हिंदू संघटन’ पर भाषण हो और उसका इस प्रकार तीखा विरोध हो यह देखकर सावरकर जी जैसे राष्ट्रवादी चिंतक को बात जंची नही। जो व्यक्ति कदम कदम पर ‘हिंदू संघटन’ की बात करता हो उसके लिए भाषा की यह लड़ाई कष्टकर थी। समय के अनुसार सावरकर जी ने गंभीर और शांत मुद्रा में परंतु ओजस्विता के साथ बोलना निरंतर जारी रखा। वह कहने लगे-

”मित्रो, क्षमा कीजिए। आज तक मेरा जीवन कारागृह में बीता यह आप सभी भलीभांति जानते हैं। मैं जब अंदमान में था तब वहां अन्य भी बहुत से बंदीजन थे। उनमें के पंजाबियों से मैंने पंजाबी सीखी, बंगालियों से बंगाली सीखी, और मद्रासियों से तमिल भाषा सीखी। किंतु मेरे दुर्भाग्य से वहां कोई कन्नड़ नही था। यदि होता तो मैं कन्नड़ भी सीख लेता।” इस उत्स्फूत्र्ति वाले किंतु मर्माघाती उत्तर ने विरोधियों को बड़ा कड़ा संदेश दे दिया था।

सावरकर जी हों या स्वामी श्रद्घानंद जी हों वे दोनों ही हिंदू संगठन की बात करते थे। इसके लिए उनकी मान्यता थी कि हिंदू को संगठित और एक करना इस देश की एकता और अखण्डता को मजबूत करना है। इसमें यदि मुस्लिम समाज सहयोगी होता तो उन्हें उससे कोई आपत्ति नही थी परंतु मुस्लिम समाज के सम्मिलित न होने पर उन्हें अपना कार्य रोकना नही था कार्य को दोनों ही परिस्थितियों में पूर्ण करना था। हरिजनों के विषय में उनकी सोच थी कि ये समाज के आवश्यक अंग हैं, इसलिए इनका ‘रोटी’ पर अर्थात अपने सर्वांगीण विकास के अवसरों पर भी मौलिक और स्वाभाविक अधिकार है। जो इन्हें मिलना ही चाहिए। जबकि गांधी जी हरिजन के लिए आरक्षण जैसी घातक बीमारी के माध्यम से समाज के उच्च वर्ग से कुछ दया का प्रदर्शन करते हुए उन्हें कुछ दिलाना चाहते थे। गांधी जी की इस दया और सावरकर जी व श्रद्घानंद जी की स्वाभाविक अधिकार की भावना में भारी अंतर था। इस भारी अंतर ने गांधी जी के हरिजन को दलित से ऊपर नही उठने दिया, जबकि उसे अभी तक ऊपर उठ जाना चाहिए था।

दृष्टिकोण का यह अंतर बाद में नीतियों के अंतर में परिवर्तित हो गया, जिससे समाज की वर्तमान की कई विसंगतियों का निर्माण हुआ। आज के समाज का जातीय संघर्ष का परिवेश और विद्वेष भावना इसी नीतिगत अंतर का परिणाम है। दलितों को समान अधिकार मिलने चाहिए, पर किसी प्रकार की दया भावना के साथ नही अपितु उनके मौलिक अधिकार के रूप में उन्हें मिलने चाहिए। इसके लिए आवश्यक था कि हरिजनों को उनकी बस्तियों से निकालकर उच्च वर्गों के साथ लाकर बैठाया जाता और उनके मंदिर प्रवेश को खुलवाया जाता। सावरकर जी और श्रद्घानंद जी इसी व्यवहारिक दृष्टिकोण के समर्थक थे। जबकि गांधी जी हरिजनों के साथ प्रवास करके समस्या का समाधान करना चाहते थे। प्रवास का यह उपक्रम दिखने में अच्छा लगता है, परंतु वास्तव में यह उपक्रम सावरकर जी और श्रद्घानंद जी के उस उपक्रम से कम साहस भरा है, जिसमें हरिजनों को घर से निकालकर मंदिर प्रवेश कराने और उन्हें पुजारी बनाने तक का व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया गया।

 

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