लेखक परिचय

प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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आशुतोष शर्मा

1947 के विभाजन के दौरान मुजफ्फराबाद (पाक अधिकृत कश्मीर) के एक गांव में करीब डेढ़ साल का बच्चा एक मुर्दा शरीर से लिपटा रो रहा था। तभी वहां से गुजर रही एक मुस्लिम महिला की नजर उस पर पड़ी। वह नर्मदिल औरत उस बच्चे को अपने घर ले आयी और बेटे की तरह उसकी परवरिश करने लगी। यहां तक कि इस्लामी रस्म रिवाज के अनुसार बच्चे का नामकरण किया गया और उसका नाम मोहम्मद सुलेमान रखा गया। वक्त अभी कुछ गुजरा ही था और वह बच्चा अभी दुनिया को समझने की कोशिश ही कर रहा था कि 1952 में अचानक उसकी जिंदगी में एक नया मोड़ आया। अंतर्राष्‍ट्रीय संस्था रेड क्रास ने बच्चे को उसके वास्तविक माता पिता से मिलवाने के उद्देश्‍य से उस मुस्लिम परिवार से बच्चा वापस लेकर उसे सीमा पार भारत भेज दिया। शांत स्वभाव का यह बच्चा जब भारत के शरणार्थी शिविर पहुंचा तो एक अजनबी ने उसका नाम संत राम रख दिया। कुछ दिनों बाद संत राम से वह संत सिंह बन गया। इसी दौरान शिविर में रह रहे एक सिख परिवार को यह महसूस हुआ कि यह बच्चा उसके रिश्‍तेदार का बेटा है जो बंटवारे की भेंट चढ़ चुके हैं। इस तरह उस बच्चे को भारत में अपना परिवार मिल गया। तभी अचानक एक दिन उसी सिख परिवार को मालूम हुआ कि यह बच्चा वह नहीं जिसे उनकी तलाश थी बल्कि कोई और यतीम है तो उसके प्रति उनका स्वभाव बदल गया। इस तरह वह बच्चा एक बार फिर से दुनिया में तन्हां अनाथ की जिदंगी गुजारने पर मजबूर हो गया। अभी वह लड़खड़ाते कदमों से जिदगी के तानेबाने को सीख ही रहा था कि अचानक एक दिन फिर से अपने खानदान का वारिस बताते हुए एक अन्य परिवार ने उसपर अपना दावा ठोंक दिया। उनका दावा था कि मोहम्मद सुलेमान उर्फ संत राम उर्फ संत सिंह बटवारे में मारे गए उनके भाई की आखिरी निशानी है जो पाक अधिकृत कश्मीर में रहा करते थे। इस परिवार ने उस बच्चे पर इतनी खुशियां लुटानी शुरू कर दी कि उसने भी इन्हें अपना वास्तविक माता पिता स्वीकार कर लिया।

जी हां! यह दास्तां सआदत हसन मंटो की बटवारे पर लिखी कोई कहानी नहीं है बल्कि वास्तविकता से जुड़ी एक ऐसे इंसान के जीवन की सच्ची घटना है जो आज भी जिंदा है। यह वास्तविक घटना जम्मू के बख्शी नगर के रहने वाले संत सिंह से जुड़ी है जो बचपन से जवानी तक कई धार्मिक पहचानों और नामों से जाने गए। इस सेवानिवृत बैंक अधिकारी संत सिंह की जिदगी किसी फिक्षन से अधिक दिलचस्प और अजीबोगरीब है। इन्होंने अपनी जिदगी का अधिकतर समय तन्हाई और रिश्‍तों के होने न होने की कश्‍मकश में ही गुजारा है। बावजूद इसके इंसानियत पर से इनका विश्‍वास एक क्षण के लिए भी कभी कम नहीं हुआ। 1947 के विभाजन के दौरान साम्प्रदायिक दंगे ने पाक अधिकृत कश्मीर स्थित मुजफ्फराबाद के कुमी कोट को पूरी तरह से अपनी चपेट में ले लिया था। जमीन के साथ साथ इंसानी दिलों का भी बंटवारा हो चुका था। लाखों लोग इस दंगे की भेंट चढ़ चुके थे। किसी के पास यह सोचने की फुर्सत ही नहीं थी मरने वालों के अनाथ हो चुके बच्चों का क्या होगा? बंटवारे के इसी भागदौड़ में एक अनजान मुस्लिम युवक और उसकी बहन की नजर डेढ़ साल के एक बच्चे पर पड़ी जो झेलम नदी के किनारे दंगे की भेंट चढ़ चुकी एक औरत से चिपटा रो रहा था। उस महिला ने बच्चे को उठा लिया और अपने गांव गली सेरी ले आई। उस नेकदिल औरत ने पांच साल तक बच्चे को अपने सगे बेटे की तरह पाला। इस दौरान उसका इस्लामी नामकरण और सुन्नत भी करवाया गया।

किसी तरह यह बात क्षेत्र के अधिकारियों तक पहुंची कि वह बच्चा विभाजन के दौरान अपने वास्तविक माता पिता से बिछड़ा हुआ है तो उन्होंने बच्चे को हिंदू या सिख समझते हुए उसे भारत भेज दिया गया। रेड क्रास के ट्रांजिट कैंप में उसका नाम मोहम्मद सुलेमान से बदलकर संत राम कर दिया गया। इसी दौरान एक सिख सुचित सिंह ने दावा किया कि वह बच्चा इसके मृतक भाई धरम सिंह का बेटा है। जम्मू स्थित कच्ची छावनी आने के बाद बच्चे का नाम संत सिंह रख दिया गया। सरकारी रिकार्डों में आज भी इस बच्चे का नाम संत सिंह पिता धरम सिंह दर्ज है। इसके बाद संत सिंह को जम्मू के बाल आश्रम दाखिल करा दिया गया। जहां उसके जैसे 200 से अधिक बच्चे रह रहे थे। गर्मियों के मौसम में उसे लड़कों के लिए बनाए गए कश्मीचर के निशात बाल आश्रम भेज दिया जाता था। बाद में जब कुछ उम्र हो गई तो उन्हें उधमपुर के ब्यॉज चिल्ड्रैन होम में रखा गया जहां से उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की और फिर श्रीनगर के एस.पी काॅलेज से स्नातक की पढ़ाई की। स्कूल में शिक्षा प्राप्त करने के दौरान वह सुचित सिंह के घर आना जाना करते रहते थे जहां उनके साथ परिवार के अन्य सदस्यों जैसा व्यवहार किया जाता था। इसी दौरान सुचित सिंह के परिवार वालों को पता चला कि उसका चचेरा भाई जिसको यह लोग संत सिंह समझ रहे थे वह वास्तव में पाकिस्तान में मारा जा चुका है। धीरे धीरे उनका व्यवहार संत सिंह के लिए पूरी तरह से बदल गया। एक दिन सुचित सिंह की बहन ने संत सिंह को ताना मारा कि वह उनके परिवार का हिस्सा नहीं है। संत सिंह को यह बात दिल में चुभ गई और उन्होंने वह घर हमेशा के लिए त्याग दिया।

एक बार फिर संत सिंह दुनिया में अकेला हो गया। अभी वह अपने आप को संभालने का प्रयास ही कर रहे थे कि 1968 में एक दिन सुचित सिंह के जीजा नरम सिंह श्रीनगर स्थित उनके कॉलेज हॉस्टल में मिलने आए। नरम सिंह के पास संत सिंह के लिए नई पहेलियां थीं जिसमें संत सिंह उलझना नहीं चाहते थे। परंतु नरम सिंह ने दावा किया कि वह उनके चाचा निहाल सिंह का बेटा है। अपने दावे के पक्ष में उन्होंने साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए कहा कि उनके बेटे की आंखों के नीचे ठीक वैसा ही तिल है जैसा कि संत सिंह के नीचे है। इसके अतिरिक्त उन्होंने संत सिंह को और कई सबूत भी दिखलाए। संत सिंह जो पहले ही अपनी वास्तविक पहचान को लेकर उलझन में जी रहा था नरम सिंह को स्पश्ट शब्दों में कह दिया कि उसकी पहचान केवल अनाथ से अधिक और कुछ नहीं है और वह अपनी इसी पहचान से संतुष्‍ट है। संत सिंह बताते हैं कि इस दौरान कई दोस्तों ने उनकी मानसिक रूप से मदद की। इस दौरान नरम सिंह लगातार उनके संपर्क में रहा और उन्हें पाक अधिकृत कश्मी र में उनके वास्तविक गांव के बारे में विस्तार से बताता रहा। संत सिंह कहते हैं कि नरम सिंह जिस गांव और जगह की बात करते थे उसकी हल्की झलक हमेशा मेरे मन मस्तिष्‍क में घुमती रहती थी। यही कारण है कि धीरे धीरे उन्हें नरम सिंह की बातों पर विश्‍वास होने लगा और आखिरकार उन्होंने उनके चाचा निहाल सिंह से मिलने का फैसला किया।

संत सिंह कहते हैं कि मैं कश्मीर से जम्मू गया और फिर वहां से राजस्थान के एक गांव गया जहां वह लोग मौजूद थे। मुझे देखते ही उनकी आंखों से आंसूओं का सैलाब उमड़ पड़ा। मेरे जिंदा होने की खुशी में उन्होंने पूरे गांव में मिठाईयां बांटी और जश्‍न मनाया। उनके जज्बात और अपनापन को देखकर मुझे यह विश्‍वास हो गया कि निहाल सिंह और उनकी पत्नी मानकौर ही मेरे जन्मदाता हैं। उन्होंने बताया कि मेरे सर के पिछले हिस्से में चोट से हुए जख्म़ के निशान होंगे जो मुझे बचपन में लगे थे और वह वास्तव में मौजूद थे। उन्होंने बचपन से जुड़ी मेरी कई बातें बताई जो मेरे मन मस्तिष्‍क में कहीं न कहीं सहेजे हुए थे। जैसे मेरा गांव नदी के किनारे था जिसे रस्सियों के सहारे पार किया जाता था इत्यादि। उनके अनुसार हम पाक अधिकृत कश्मीर स्थित मुजफ्फराबाद के कुमी कोट में रहा करते थे और मेरा असली नाम राजेंद्र सिंह था। उन्होंने बताया कि बंटवारे के समय जब हम पाकिस्तान से भारत की तरफ आ रहे थे तो मैं उस वक्त अपनी बड़ी बहन की गोद में था जो इंसानी सैलाब के कारण बिछड़ गई। संत सिंह के अनुसार निहाल सिंह और उनके परिवार ने न सिर्फ मुझे अपनाया बल्कि अपनी संपत्ति का भी दूसरे बेटों के साथ बराबर का हिस्सेदार बनाया। 1970 में संत सिंह ने एक ऐसी लड़की से शादी की जो उन्हीं की तरह किस्मत की मारी थी और बटवारे में अपने परिवार से बिछड़ चुकी थी। उनके फैसले पर पिता निहाल सिंह और घर के सभी सदस्यों ने भरपूर साथ दिया। संत सिंह 2007 में जम्मू स्टेट बैंक से डिप्टी मैनेजर के पद से रिटायर्ड हुए। एक क्रिकेटर की हैसियत से इनका कैरियर भी शानदार था और इन्होंने विभिन्न रणजी मैंचों में जम्मू कश्मीर टीम का नेतृत्व भी किया है। 2003-07 तक संत सिंह रणजी मैचों के लिए राज्य क्रिकेट के चीफ सेलैक्टर भी नियुक्त हुए।

2005 में संत सिंह ने पाक अधिकृत कश्मीर में अपनी उस मां की जिसने उन्हें सड़क से उठाकर अपनी औलाद की तरह पाला था, खोज शुरू की तो जीवन ने जैसे एक नए सफर की शुरूआत की। एक वर्ष पूर्व कश्मीर और पाक अधिकृत कश्मीर में आए विनाशकारी भूकंप के बाद दोनों ओर से कई परिवारों को एक दूसरे से मिलने के लिए परमिट प्रदान किया गया। इसी दौरान संत सिंह को समाचारपत्रों से पता चला कि जम्मू के कोई जे.एल.टंडन साहब से पाक अधिकृत कश्मीएर के उसी हिस्से से मिलने उनके रिष्तेदार आए हैं जहां उनकी जान बचाने वाले माता पिता रहा करते थे। संत सिंह कहते हैं कि पता चलते ही मैं फौरन उनके घर पहुंचा और उन्हें अपनी दास्तां बताते हुए उनकी खोज करने में मदद मांगी। संत सिंह के अनुसार उन्हें बस इतना याद है कि उनकी जान बचाने वाले पिता का नाम अली मुहम्मद या वली मुहम्मद था जबकि मां का नाम उन्हें केवल बेगम याद था। उनकी बड़ी बेटी का नाम नूरजहां था। टंडन साहब के रिश्‍तेदार के लौटते समय संत सिंह ने उन्हें अपना फोन नम्बर भी दिया ताकि पता लगने पर बिछड़े माता पिता से बात हो सके। अपने धर्मपिता और उनके परिवार वालों से मिलने की संत सिंह की कोशिश रंग लाई। कुछ दिनों बाद पाक अधिकृत कश्मीर से उन्हें नूरजहां का फोन आया। अपनी मुहंबोली बहन से बात करने के बाद संत सिंह ने क्रास एलओसी के लिए परमिट का आवेदन दिया जो बहुत जल्द मंजूर हो गई।

एक अक्टूबर 2009 को संत सिंह पाक अधिकृत कश्मीर पहुंचे। अपने आंसूओं को रोकते हुए संत सिंह कहते हैं कि वहां पहुंचने के बाद मुझे मालूम हुआ कि 1947 के नफरत की आग के बीच मुझे जिदगी देने वाले मेरे माता पिता चंद बरस पहले इस दूनिया को अलविदा कह चुके हैं। घरवालों ने बताया कि वह अक्सर मुझे याद किया करते थे और कहते थे कि मैं उन्हें हिंदुस्तान जाकर भूल गया हूं। संत सिंह कहते हैं कि इस दौरान मुझे मेरी धर्म मां के भाई मुहम्मद मिस्कीन से जरूर मुलाकात हुई जिन्होंने लाषों के बीच से मुझे नई जि़दगी देने में मदद की थी। मुहम्मद मिस्कीन ने बताया कि उनकी बहन ने मुझे सात महीने तक अपना दूध पिलाया था और जब पुलिस मुझे उनसे जबरदस्ती छीनकर ट्रांजिट कैंप ले जा रही थी तो उनका रो रो कर बुरा हाल था।

60 साल के एक लंबे अरसे के बाद संत सिंह आखिरकार उस परिवार के बीच मौजूद थे जिन्होंने उन्हें नई जिंदगी प्रदान की थी। वह कहते हैं कि वापस हिंदुस्तान लौटते समय न सिर्फ मिस्कीन साहब और मेरी मुहंबोली बहन नूरजहां बल्कि वहां उपस्थित हर एक सदस्य की आंखों में आंसू थे। उनकी आंखों में भी जिनसे मैं पहली बार मिला था। उन्होंने हिंदुस्तान में मेरे परिवार के सभी सदस्यों के लिए उपहार दिया। संत सिंह गर्व से कहते हैं कि भले ही सरहदें बंट गईं, देश विभाजित हो गया, मजहब जुदा हो गए फिर भी वह सभी आजतक मेरे परिवार का हिस्सा हैं। अब भी उन सभी से मुझे और मेरे परिवार वालों की फोन पर बात होती रहती है। अपनी जिंदगी और तर्जुबे पर नजर डालते हुए संत सिंह कहते हैं कि ‘धर्म समाज का एक अभिन्न अंग जरूर है लेकिन इसका इस्तेमाल इंसानियत के खिलाफ नहीं किया जाना चाहिए।‘ जब भी कहीं साम्प्रदायिक दंगे की बात सुनते हैं तो वह एक अनजाने खौफ से घिर जाते हैं। मौत से पहले एक बार फिर पाक अधिकृत कश्मीफर अपने परिवारवालों से मिलने की इच्छा रखने वाले संत सिंह दोनों मुल्कों के हुकुमरानों से यही उम्मीद करते हैं कि वह बुजुर्गों को परमिट देने में पहल करे। बहरहाल संत सिंह की जिंदगी एक पैगाम जरूर देती है कि धर्म बदला जा सकता है, सरहदें तय की जा सकती हैं लेकिन इंसानी रिश्‍तों को न बदला जा सकता है, न खत्म किया जा सकता है और न ही उसका बटवारा किया जा सकता है। यह बात हिंद-पाक की जनता बखूबी समझती है चाहे यह बात दोनों मुल्कों के रहनुमाओं को समझ मे आए या न आए। (चरखा फीचर्स)

नोटः संत सिंह से जम्मू के इस नंबर 09419113023 पर संपर्क किया जा सकता है। 

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1 Comment on "उसकी पहचान इंसानियत है, मजहब नहीं"

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आर. सिंह
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संत सिंह ठीक कहते हैं कि ‘धर्म समाज का एक अभिन्न अंग जरूर है लेकिन इसका इस्तेमाल इंसानियत के खिलाफ नहीं किया जाना चाहिए।‘ पर इस को समझने वाले कितने इंसान हैं? आगे आपने यह भी लिखा है कि ‘बहरहाल संत सिंह की जिंदगी एक पैगाम जरूर देती है कि धर्म बदला जा सकता है, सरहदें तय की जा सकती हैं लेकिन इंसानी रिश्‍तों को न बदला जा सकता है, न खत्म किया जा सकता है और न ही उसका बटवारा किया जा सकता है। यह बात हिंद-पाक की जनता बखूबी समझती है चाहे यह बात दोनों मुल्कों के रहनुमाओं… Read more »
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