लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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-सिद्धार्थ शंकर गौतम-   rahul
एक ओर जहां देश में विकासोन्मुखी राजनीति को तवज्जो देने की चर्चाएं चल रही हैं, वहीं दूसरी ओर राजनीतिज्ञ गढ़े मुर्दे उखाड़ने से भी पीछे नहीं हट रहे| कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने टाइम्स नाउ को दिए इंटरव्यू में 1984 के सिख विरोधी दंगों को भावनाओं का ज्वर बताकर इनकी गम्भीरता को खत्म करने का प्रयास करने के साथ ही 2002 के गोधरा दंगों के लिए भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को कटघरे में खड़ा कर दिया है| धन्य हैं हमारे देश की राजनीतिक पार्टियां तथा उनके कर्णधार नेता जो बार-बार देश को उन ज़ख्मों की याद दिलाते रहते हैं जो धार्मिक उन्माद का एक ऐसा काला सच थे जिन्हें लोग भूलना चाहते हैं| हिन्दू-सिख तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता को वैमनस्यता के शिखर तक ले जाने वाले दोनों कृत्य निश्चित रूप से लोगों के दिलो-दिमाग पर अमिट छाप की भांति अंकित हैं किन्तु इतिहास को सीने से छिपाए रखने का क्या फायदा? हालांकि तारीफ़ करना होगी कांग्रेस उपाध्यक्ष की जिन्होंने 1984 के दंगों में पार्टी के कुछ नेताओं की आंशिक संलिप्तता को स्वीकार किया| यह बात और है कि उनकी स्वीकारोक्ति अब पार्टी पर भारी पड़ती नज़र आ रही है| आम आदमी पार्टी से लेकर भाजपा और अकाली दल ने कांग्रेस के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया है| दरअसल 1984 के दंगे जहां कांग्रेस के लिए नासूर बन चुके हैं, वहीं मोदी को तमाम क्लीन चिटों के बाद भी 2002 के दंगों के लिए दोषी करार दिया जाता है| मोदी जिस तरह से 2002 के सवालों को ताल जाते हैं, उसी तरह से कांग्रेस नेतृत्व भी 1984 को कुरेदना नहीं चाहता| दोनों को इनके सियासी नफा-नुकसान का अंदाजा है| राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव के पहले बर्र के ऐसे छत्ते में हाथ दिया है जो कहीं न कहीं मोदी पर भी भारी पड़ सकता है| कांग्रेस के नीति-नियंता चीख-चीखकर यह कह सकते हैं कि उनके नेता ने 1984 के तमाम पूर्वाग्रहों को बहादुरी से स्वीकारा है जबकि मोदी 2002 पर माफ़ी मांगना तो दूर, चिंता भी ज़ाहिर नहीं करते| देखा जाए तो 1984 और 2002 के दंगों के बीच काफी असमानताएं हैं और इन्हें एक तराजू पर तोलना विशुद्ध रूप से सियासी कदम है किन्तु गाहे-बगाहे दोनों की तुलना हो ही जाती है और इस बार यदि तुलना राहुल गांधी ने की है तो निश्चित है कि इसकी गूंज लोकसभा चुनाव तक सुनाई देगी| हालांकि 1984 के जिस सिख विरोधी उन्माद को दंगे का नाम दिया जाता रहा है, दरअसल वह दंगा नहीं सामूहिक नरसंहार था| चूंकि एक ही दिन में 3,000 से अधिक सिखों को निर्दयतापूर्वक मार देना, भावनाओं का अतिरेक था। लिहाजा उसे दंगा नहीं बल्कि सामूहिक नरसंहार ही कहना उचित होगा| किन्तु देश के कर्णधारों ने इतिहास अपने हिसाब से हांका है। अतः वे जो कहलाना/बताना चाहें जनता को मानना पड़ता है| इस हिसाब से हो सकता है आने वाले निकट भविष्य में 1992 के अयोध्या दंगों का जिन्न भी बाहर निकल आए? ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष ने जनसामान्य के मूलभूत मुद्दों की अनदेखी के कारण उपजे विवाद से बचाने हेतु पुनः जनता की भावनाओं का दोहन करने का निश्चय किया है| वैसे भी कांग्रेस का यह चरित्र रहा है कि वह भावनाओं की अतिरेकता पर सवार होकर जनता को बरगलाती है| यदि राहुल इतने ही साफगोई हैं तो कांग्रेस शासनकाल में हुए तमाम घोटालों की जांच क्यों नहीं करवाते? भ्रष्टाचार, आम आदमी, गरीबी, अशिक्षा इत्यादि जनसरोकारी मुद्दों पर राहुल खामोशी क्यों ओढ़ लेते हैं ?
दरअसल, 1984 के सिख विरोधी दंगे हों या अयोध्या मामला, 2002 में गुजरात में हुए दंगे हों या हाल ही में हुए मुज़फ्फरनगर के दंगे; राजनीतिक दलों ने रहस्यमयी बन चुके इन मुद्दों को हवा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है| सत्ता शीर्ष पर काबिज़ होने की अतिरेक लालसा में राजनीतिक दलों के स्वयं-भू नेताओं का शगल रहा है कि कैसे भी इन मुद्दों को लेकर जनभावनाएं भड़काए जाएं, ताकि स्वयं के कार्य सिद्ध हो सकें| देखा जाए तो भारतीय राजनीति में कुछ मामले ऐसे रहें हैं जिनसे राजनीतिक रोटियां सिकती रही हैं और आगे भी सिकती रहेंगी| हालांकि जनता अब जागरूक हुई हैं और इन मामलों को विशुद्ध रूप से राजनीतिक दलों का सत्ता शीर्ष पर पहुंचे का हथकंडा मात्र मानती है| अब ऐसे मामलों के उभरने से ऐसा कुछ नहीं होता जो कानून व्यवस्था को चुनौती दे किन्तु दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है| अतः ऐसे मुद्दों को उठाने से पूर्व राजनीतिक दलों को अव्वल तो स्वयं के गिरेवां में झांककर देख लेना चाहिए; दूसरे देश की वर्तमान स्थिति की ओर भी दृष्टिपात करना चाहिए| इतिहास को जितना कुरेदा जाएगा वह उतनी ही तकलीफ देगा इसलिए अब बरगलाने की राजनीति बंद होनी चाहिए तथा देश में व्याप्त चुनौतियों से कैसे पार पाया जाए इस पर गंभीर मंथन होना चाहिए| आखिर दंगों के नाम पर राजनीतिज्ञ कब तक राजनीति करते रहेंगे और जनता कब तक इन्हें मौके देती रहेगी? हालांकि 2002 के दंगों को लेकर दिए राहुल के बयान से संप्रग की कुछेक सहयोगी पार्टियां इत्तेफ़ाक़ नहीं रखतीं और इस फेहरिस्त में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी सबसे आगे है जो गठबंधन राजनीति के दौर में मायने रखता है| कुल मिलाकर दंगों को लेकर राजनीति चरम पर है जिसके परिणाम भविष्य के गर्त में छुपे हैं|

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