लेखक परिचय

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

डॉ. शुभ्रता मिश्रा वर्तमान में गोवा में हिन्दी के क्षेत्र में सक्रिय लेखन कार्य कर रही हैं। डॉ. मिश्रा के हिन्दी में वैज्ञानिक लेख विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं । उनकी अनेक हिन्दी कविताएँ विभिन्न कविता-संग्रहों में संकलित हैं। डॉ. मिश्रा की अँग्रेजी भाषा में वनस्पतिशास्त्र व पर्यावरणविज्ञान से संबंधित 15 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । उनकी पुस्तक "भारतीय अंटार्कटिक संभारतंत्र" को राजभाषा विभाग के "राजीव गाँधी ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार-2012" से सम्मानित किया गया है । उनकी एक और पुस्तक "धारा 370 मुक्त कश्मीर यथार्थ से स्वप्न की ओर" देश के प्रतिष्ठित वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है । मध्यप्रदेश हिन्दी प्रचार प्रसार परिषद् और जे एम डी पब्लिकेशन (दिल्ली) द्वारा संयुक्तरुप से डॉ. शुभ्रता मिश्रा के साहित्यिक योगदान के लिए उनको नारी गौरव सम्मान प्रदान किया गया है।

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भारतीय शिक्षा के इतिहास पर यदि दृष्टपात करें तो हम पाते हैं कि भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था समकालीन विश्व की शिक्षा व्यवस्था से कहीं अधिक समुन्नत व उत्कृष्ट थी, हांलाकि कालान्तर में भारतीय शिक्षा व्यवस्था में ह्रास होता चला गया। उचित शिक्षा पद्धति व प्रणाली की किसी भी समाज के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है। भारत पर लगातार विदेशियों के आधिपत्यों के कारण संक्रमण काल में भारतीय शिक्षा व्यवस्था ने अनेक चुनौतियों व समस्याओं का सामना किया है। भारत में वैदिक युग से लेकर अब तक शिक्षा को एक ऐसे प्रकाश स्रोत के रुप में माना गया है, जो जीवन के विभिन्न मार्गों को आलोकित करती है। भारत की प्राचीन शिक्षा आध्यात्मिकता पर आधारित थी और भारत ‘विश्वगुरु’ कहलाता था। यह वह समय था जब मनुष्य शिक्षा अपनी भाषा में ग्रहण करता था और इस बात पर बल दिया जाता था, कि शिक्षा से व्यक्ति को जीवन के यथार्थ दर्शन हो सकें।

पाठ्यक्रम के विस्तार के साथ साथ भारतीय शिक्षा पद्धति में वेदों ओर वेदांगों के अतिरिक्त शनैःशनैः साहित्य, दर्शन, ज्योतिष, व्याकरण और चिकित्साशास्त्र इत्यादि विषयों का अध्यापन भी शामिल होने लगा था। काशी, तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, वलभी, ओदंतपुरी, जगद्दल, नदिया, मिथिला, प्रयाग, अयोध्या आदि शिक्षा के महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करते थे। इसी तरह दक्षिण भारत में एन्नारियम, सलौत्गि, तिरुमुक्कुदल, मलकपुरम्‌ तिरुवोरियूर के प्रसिद्ध विद्यालय उत्कृष्ट श्रेणी में आते थे। कालांतर में भारत में मुस्लिम शासकों द्वारा राज्य किए जाने पर इस्लामी शिक्षा का प्रसार होने लगा था। सरकारी कामकाज हिंदू अरबी और फारसी भाषाओं में होता था। उस समय मकतब प्रारंभिक शिक्षा के और मदरसे उच्च शिक्षा के केंद्र होते थे। मकतबों की शिक्षा धार्मिक होती थी। मकतबों में शिक्षा प्राप्त कर विद्यार्थी मदरसों में प्रविष्ट होते थे, जहां मुख्यरुप से धार्मिक शिक्षा ही दी जाती थी, परन्तु साथ में इतिहास, साहित्य, व्याकरण, तर्कशास्त्र, गणित, कानून इत्यादि विषय भी पढ़ाए जाते थे। परन्तु यह सब अपनी मातृभाषा में होता था। उन दिनों दिल्ली, आगरा, बीदर, जौनपुर, मालवा मुस्लिम शिक्षा के केंद्र हुआ करते थे।

इसके बाद ऐसा माना जाता है कि भारत में आधुनिक शिक्षा की नींव यूरोपीय ईसाई धर्मप्रचारकों तथा व्यापारियों ने डाली। मद्रास से प्रारंभ करके बंगाल तक इस तरह की शिक्षा का विस्तार होना शुरु हुआ। बहुत से स्कूल खोले जाने लगे और यहां ईसाई धर्म की शिक्षा के साथ साथ इतिहास, भूगोल, व्याकरण, गणित, साहित्य आदि विषय भी पढ़ाए जाने लगे। यहां से भारत में शिक्षा व्यवस्था में अँग्रेजी ने घुसपैठ करनी शुरु कर दी थी, जिसका खामियाजा आज भी भारत के बच्चे भर रहे हैं। भारत में अँग्रेजों के शासन से भारतीय शिक्षा में अँग्रेजी की अनिवार्यता ने पूरी शिक्षाव्यवस्था में जंग लगाना तभी से शुरु कर दिया था। लार्ड मेकाले के तर्क वितर्क और राजा राममोहन राय के समर्थन से प्रभावित होकर ही सन् 1835 में लार्ड बेंटिक ने साहित्य, इतिहास और विज्ञान आदि विषयों की पढ़ाई अंग्रेजी भाषा में ही करने का निश्चितरुप से अनिवार्य कर दिया। ब्रिटिश काल में महत्वपूर्ण शिक्षा दस्तावेजों में मैकाले का घोषणा पत्र 1835, वुड का घोषणा पत्र 1854, हण्टर आयोग 1882 इत्यादि सम्मिलित थे, जिसमें शिक्षा का उद्देश्य अंग्रेजों के राज्य के शासन सम्बन्धी हितों को ध्यान में रखकर तैयार किए गए थे। ईसाई मिशनरियों ने ही सर्वप्रथम मैकाले की शिक्षा-नीति को अपने स्कूलों व कॉलेजों में लागू किया था।

इसके बाद से तो भारतीय सभ्यता व संस्कृति में अभूतपूर्व परिवर्तन होते चले गए, क्योंकि प्राच्य शिक्षा भले ही समानांतर चलती रही हो, परंतु अंग्रेजी और पश्चिमी विषयों के अध्ययन और अध्यापन पर जोर देने तथा साथ ही पाश्चात्य रीति से शिक्षित भारतीयों की आर्थिक स्थिति के सुधार से प्रेरित होकर अधिकांश भारतीय जनता का झुकाव अँग्रेजी शिक्षा की ओर होना स्वाभाविक था। वही झुकाव आज तक हट नहीं पाया है। भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के विस्तार के साथ साथ सरकार को अधिक से अधिक कर्मचारियों, चिकित्सकों, इंजिनियरों और कानूनवेत्ताओं की आवश्यकता होने लगी। अतः उसी समय से भारत में मेडिकल, इजिनियरिंग और लॉ कालेजों को स्थापित किया गया, जो आज भी अपनी अंग्रेजी परम्पराओं को बनाए हुए हैं। उसी समय से शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी हो गया और हिन्दी के साथ साथ अनेक भारतीय मातृभाषाएं उपेक्षित होती चली गईं। ये वो दौर था जब भारत में शिक्षा संस्थाओं और शिक्षितों की संख्या तो बढ़ रही थी, परंतु शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा था। भले ही 1902 में लार्ड कर्जन ने विश्वविद्यालय और उच्च शिक्षा की उन्नति के लिए भारतीय विश्वविद्यालय आयोग गठित किया हो और कालांतर में भारत में अनेक विश्वविद्यालय स्थापित होते चले गए, लेकिन शिक्षा का माध्यम तो अँग्रेजी ही था।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात्‌ भारत में शिक्षा में प्रगति व सुधार हुए। कई तरह के आयोगों जैसे राधाकृष्ण आयोग (1948-49), माध्यमिक शिक्षा आयोग (मुदालियर आयोग) 1953, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (1953), कोठारी शिक्षा आयोग (1964), राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1968) एवं नवीन शिक्षा नीति (1986) आदि के द्वारा भारतीय शिक्षा व्यवस्था को समय-समय पर गंभीर मार्गदर्शन मिले। 1948-49 में विश्वविद्यालयों के सुधार के लिए भारतीय विश्वविद्यालय आयोग की नियुक्ति हुई। गुरुकुल परम्पराओं से लेकर आज की हॉस्टल परम्पराओं तक भारतीय शिक्षा ने बहुत से परिवर्तनों को देखा, समझा, परखा और सहा है। स्वतंत्रता के पश्चात भारत सरकार ने सार्वजनिक शिक्षा के विस्तार के‍ लिए अनेक प्रयास किए। यह और बात है कि इन प्रयासों की अनेक खामियाँ भी सामने आई हैं जिन्हें दूर करने का प्रयास आज तक चला आ रहा है। भारतीय शिक्षा व्यवस्था में गांधीजी के शिक्षा संबंधी आधारभूत सिद्धांतों को शामिल किया गया। लेकिन इन सिद्धांतों में एक बात जो गांधी ने कही थी कि शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होना चाहिए, उस पर आज तक अमल न हो सका है। मैकाले के जमाने से आज तक भी भारत के बच्चे इंजीनियरिंग, मेडिकल और कानून जैसे अनेक विषयों की उच्च शिक्षा अंग्रेजी में लेने के लिए बाध्य हैं।

पिछले सप्ताह जब यह खबर सामने आई कि आने वाले दिनों में एमबीबीएस की पढ़ाई हिन्दी में होना सम्भव हो सकेगा, तो हर हिन्दीभाषी की खुशी का ठिकाना न रहा। क्योंकि डाक्टरी की पढ़ाई अँग्रेजी में करने के कारण बहुत से ग्रामीण से लेकर शहरी बच्चे स्वयं को असहाय सा पाते थे, क्योंकि ऐसा नहीं है कि वे होनहार नहीं हैं, परन्तु गैरभाषा में बात को समझ पाना मजबूरी नहीं होनी चाहिए। जहां कोई काम मजबूरी में करना होता है, तब मौलिकता का ह्रास होना सुनिश्चित है। वही हमारे देश में आज तक होता आया है। पर देर आए दुरुस्त आए कि तर्ज पर यदि  भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) द्वारा हिन्दी में चिकित्सा की पढ़ाई को लेकर आए एक प्रस्ताव पर गम्भीरता से सोचा जा रहा है, तो इससे सुखद पहलू और कुछ हो ही नहीं सकता।

भारतीय चिकित्सा परिषद का कहना है कि यदि एमबीबीएस की किताबें हिन्दी में उपलब्ध हैं तो डॉक्टरी की पढ़ाई हिन्दी में की जा सकती है। वर्तमान में भारत में करीब साढ़े चार सौ मेडिकल कालेज हैं, जिनमें से करीब डेढ़ सौ कालेज हिन्दीभाषी राज्यों में हैं। इन हिन्दीभाषी राज्यों में मेडिकल की पढ़ाई करने वाले बच्चों को सबसे बड़ी समस्या अंग्रेजी भाषा में पढ़ने को लेकर आती है। अधिकांश बच्चे ग्रामीण पृष्ठभूमि के होते हैं, जो अपनी मेहनत से हिन्दी माध्यम में भी होने वाली एमबीबीएस परीक्षा पास तो कर लेते हैं लेकिन बाद में उन्हें अंग्रेजी की वजह पढ़ाई में मुश्किल होती है। लेकिन यदि अब हिन्दी में मेडिकल की पढ़ाई का प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है तो हर हिन्दीभाषी भारतीय अपने डॉक्टर बनने के सपने को साकार कर पाएगा।

इसके पहले भी अटल बिहारी बाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय, भोपाल इंजीनियरिंग के कोर्स हिन्दी में शुरू करने की घोषणा कर चुका है और वहां इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल तथा सिविल के कोर्स हिन्दी में शुरू भी कर दिए गए हैं। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) के चैयरमैन अनिल डी. सहस्रबुद्धे ने कहा था कि हिन्दी या क्षेत्रीय भाषाओं में इंजीनियरिंग की पढ़ाई हो सकती है। उनका कहना था कि कालेज को सिर्फ एआईसीटीई के मानक पूरे करने अनिवार्य हैं। वे हिन्दी या क्षेत्रीय भाषाओं में इंजीनियरिंग करा सकते हैं। इसे प्रोत्साहित करने के लिए एआईसीटीई प्राध्यापकों को हिन्दी एवं क्षेत्रीय भाषाओं में इंजीनियरिंग की पुस्तकें लिखने के लिए आर्थिक मदद भी कर रही हैं।

जिस तरह अब देश में इंजीनियरिंग की पढ़ाई हिन्दी में होना शुरु हो गई है, तो वह दिन भी दूर नहीं लगता जब डॉक्टरी की पढ़ाई भी हिन्दी में होने लगेगी। इसके लिए भी अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय, भोपाल ने भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) से हिन्दी में एमबीबीएस कोर्स शुरू करने की अनुमति मांगी है। यदि विश्वविद्यालय एमबीबीएस में पढ़ाई जाने वाली किताबों और मेडिकल जर्नलों के हिन्दी में पर्याप्तरुप से उपलब्ध होने की पुष्टि करता है, तो फिर हिन्दी माध्यम से मेडिकल की पढ़ाई कराए जाने के मार्ग में कोई समस्या नहीं रह जाएगी। निश्चित रुप से निकट भविष्य में आने वाला वह दिन भारतीय चिकित्सा शिक्षा के आधुनिक इतिहास का सबसे स्वर्णिम दिन होगा।

 

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1 Comment on "भारतीय शिक्षाव्यवस्था का इतिहास करवट लेगा : निकट भविष्य में डॉक्टरी की पढ़ाई हिन्दी में कर पाएंगे भारतीय बच्चे"

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Himwant
Guest
डॉक्टरी एवं इंजीनियरिंग की उच्च शिक्षा भारतीय भाषा में हो यह बहुत ख़ुशी की बात है. शुरुआत हिंदी से हुई है यह भी ख़ुशी की बात है. इससे 2 बड़े फायदे होंगे :- 1) गाँव में पैदा होने वाले बच्चे तीक्ष्ण बुद्धि के होने के बावजूद सिर्फ इसलिए पिछड़ जाते थे क्योंकि वे अंग्रेजी में प्रवीण नही होते. अब उच्च शिक्षा अभिजात वर्ग के कैद से निकल आम लोगो को सुलभ होगी. 2) अंग्रेजी में उच्च शिक्षा के कारण भारतीय मष्तिष्क देश के बाहर बड़े सहज रूप से बह जा रहे थे, इस पर रोक लगेगी. यह जरूरी है कि… Read more »
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