लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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— डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

अंग्रेज़ों के चले जाने के बाद और भारतीय रियासतों का देश की नई सांविधानिक व्यवस्था में अधिमिलन हो जाने के बाद महाराजा हरि सिंह इतना तो समझ ही चुके थे कि इतिहास का रथ जिस दिशा में जा रहा है , उसे वापिस नहीं पलटा जा सकता । वैसे तो उन्होंने 1934 से ही रियासत में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली प्रारम्भ कर दी थी । राज्य में लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई विधान सभा (प्रजा सभा) काम कर रही थी । लेकिन बदली परिस्थितियों में महाराजा को भी जनता का ही प्रतिनिधि होना होगा । महाराजा हरि सिंह ने भविष्य में लिखा पढ़ने के पश्चात् राज्य के आम लोगों में जाने का निर्णय कर लिया । नये निज़ाम में लोक की इच्छा ही सर्वोपरि होगी । उधर सरदार पटेल भी राज्य में भविष्य की इबारत को बख़ूबी पढ़ पा रहे थे । उन्होंने भी महाराजा हरि सिंह को यही सलाह दी । जन जन में प्रवास करो । भविष्य में आम जन ही निर्णय करेगा कि उसका शासक कौन हो ।
महाराजा हरि सिंह ने राज्य का प्रवास प्रारम्भ किया । जून जुलाई की तपती दोपहरियों में जनता से मिलने के लिये निकल पड़े । वे अपने विचार , अपने भविष्य के सपने , राज्य के विकास की बातें जम्मू कश्मीर की जनता से ही साँझे करेंगें । राजशाही का युग तो ख़त्म हो ही चुका था या फिर वह कुछ दिनों का ही मेहमान था । लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित हो रही थी । अब तक तो महाराजा गुलाब सिंह के वंशज होने के नाते सत्ता में थे , लेकिन यदि कल राज्य में चुनाव भी होते हैं तो जनता का निर्णय क्या होगा , वे इसे भी परख लेना चाहते थे । सरदार पटेल ने भी उन्हें यही सलाह दी थी । उधर महाराजा हरि सिंह ने जनता में जाना शुरु किया , उधर शेख़ मोहम्मद अबदुल्ला के होश उड़ने लगे । शेख़ समझ गये थे कि यदि महाराजा लोकतंत्र के अखाड़े में भी ताल ठोंक रहे हैं , तो परिणाम कुछ भी हो सकता है । अभी तक शेख़ स्वयं को रियासत की जनता का एक मात्र प्रतिनिधि कह रहा था और दिल्ली में भी इसी दंत कथा पर विश्वास किया जा रहा था । लेकिन इसका प्रमाण उसने कोईँ प्रस्तुत नहीं किया था । दिसम्बर१९४६-जनवरी १९४७ में राज्य की विधान सभा के लिये जो चुनाव हुये थे , उसका शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला की नैशनल कान्फ्रेंस और उनके साथियों ने बहिष्कार किया था । लोकतंत्र में , बहिष्कार आम तौर पर लोकप्रियता का नहीं बल्कि लोकतंत्र से भागने का प्रमाण माना जाता है । लोकतंत्र में बहिष्कार के हथियार का प्रयोग वही पक्ष करता है , जिसे मतपेटी की बजाय अन्य साधनों पर ज़्यादा विश्वास होता है । शेख़ भी यह अच्छी तरह जानते थे कि उनकी जन लोकप्रियता की यह दंत कथा तब तक ही चल सकती थी , जब तक इसको चुनौती देने वाला कोई न हो । लेकिन अब महाराजा हरि सिंह राजशाही का अपना चोला उतार कर लोकतंत्र का पटका पहन कर इस मैदान में भी उतर आये थे । शेख़ अब्दुल्ला के लिये यह ख़तरे की घंटी थी । महाराजा के रियासत प्रवास से उसका लोकप्रियता का मुल्लमा उतर जाता और जल्दी ही यह भी निर्णय हो जाता कि राज्य की जनता किसके साथ है – शेख़ के साथ या हरि सिंह के साथ ? शेख़ इसी निर्णय से बचना चाहता था । क्योंकि यह शेख़ उसकी पूरी योजना के लिये ख़तरे की घंटी थी । उन्होंने राज्य के राजप्रमुख को ही राज्य से निष्कासित कर देने का षड्यंत्र रचना शुरु कर दिया । यह महाराजा हरि सिंह के लिये अपमान की पराकाष्ठा थी । लेकिन शेख़ अब्दुल्ला इस के लिये वजिद थे और नेहरु इस गेम में उसके साथी थे । पर इसमें एक और बाधा थी । उस बाधा को दूर किये बिना महाराजा हरि सिंह को रियासत से निष्कासित करना संभव नहीं था । जब तक महाराजा की गैरहाजिरी में उनका कोई रीजैंट यानि प्रतिनिधि न मिल जाये तब तक उनको रियासत से बाहर नहीं निकाला जा सकता था । यह रीजैंट या प्रतिनिधि उनका बेटा ही हो सकता था । महाराजा हरि सिंह का केवल एक ही बेटा था जिसका नाम कर्ण सिंह था/है , और उसके पिता उसे टाइगर कहा करते थे । और अब अगली कथा उसी टाइगर के शब्दों में-” मेरे पिता को सरदार पटेल का निमंत्रण मिला , जिसमें उन्होंने पिताजी , माँ और मुझे , हम तीनों को बातचीत के लिये दिल्ली आने का सुझाव दिया था । अत: अप्रेल (१९४९) में हम सब एक चार्टड विमान डी.सी-३ में नई दिल्ली के लिये रवाना हो गये । जहाज़ में चढ़ते समय मुझे यह अहसास भी नहीं था कि अब सिर्फ़ मेरे पिताजी की अस्थियाँ ही उनके प्रिय शहर जम्मू लौटेंगीं ।”(आत्मकथा १२३) अस्थियों की कथा बाद में , सबसे पहले तो दिल्ली कथा और वह भी टाइगर के ही शब्दों में -” दिल्ली पहुँचकर पहले तो हम पुरानी दिल्ली के मेडंस होटल में ठहरे । — फिर इम्पीरियल होटल में चले गये ।—————– २९ अप्रेल को हमने सरदार पटेल के साथ खाना खाया । ———– डिनर के बाद मेरे माता पिता और सरदार दूसरे कमरे में चले गये और क़यामत वहीं बरपा हुई । सरदार ने मेरे पिता को बहुत ही शालीनता से , लेकिन दो टूक लहजे में बता दिया कि शेख़ अब्दुल्ला उनके राज त्याग के बारे में बहुत ज़ोर दे रहे हैं । पर भारत सरकार यह महसूस करती है कि यदि वे और महारानी कुछ महीनों के लिये रियासत से अनुपस्थित रहें तो यही काफ़ी होगा । उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र में सक्रियता से उठाई माँग से उत्पन्न जटिलताओं को देखते हुये राष्ट्र हित में यह आवश्यक है । उन्होंने मेरे लिये भी कहा कि क्योंकि अब मैं अमेरिका से लौट आया हूँ , अत: पिता अपनी अनुपस्थिति में अपनी ज़िम्मेदारियों और कर्तव्यों को निभाने के लिये मुझे अपना रीजैंट नियुक्त कर दें ।”(आत्मकथा १२४) लेकिन कर्ण सिंह को इस पूरी घटना का पता होटल में लौट आने पर ही चला । और आगे की कथा एक बार फिर कर्ण सिंह से ही ।”इस घटना से मेरे पिता तो हतप्रभ रह गए । ————- जब वे मीटिंग से बाहर आये तो उनका चेहरा जर्द था,माँ रुआँसा हो रही थी और अपने आँसुओं को भरसक रोक रही थीं । ———— हम लोग होटल लौट आये , रास्ते भर सभी चुप रहे । कमरे में पहुँचकर पिताजी अपने सलाहकारों, बख़्शी टेकचन्द,मेहरचन्द महाजन तथा अपने स्टाफ़ के अन्य अधिकारियों के साथ तुरन्त मंत्रणा में व्यस्त हो गये । माँ अपने कमरे में पलंग पर गिर कर फफक फफक कर रोने लगीं । मैं भी उनके पीछे पीछे कमरे में पहुँच गया । जब वे ज़रा शांत हुईं तो उन्होंने मुझे बताया कि उसे और पिताजी को रियासत से निकाला जा रहा है । उसने मुझे यह भी बताया कि भारत सरकार चाहती है कि पिता मुझे रीजैंट नियुक्त कर दें ।”(आत्मकथा १२४-१२५)
बहुत बाद में हरि सिंह ने राष्ट्रपति डा० राजेन्द्र प्रसाद को दिये गये एक ज्ञापन में इस षड्यन्त्र का उल्लेख भी किया । उन्हीं के शब्दों में–” Sheikh Abdullah and the men of his party took all power to themselves, ignored my existence and where they felt necessary, they got the consent of the Government of India to do what they liked in the State disregarding me and my wishes. This gradually led to a deterioration and to the outside world, the State and Sheikh Abdullah became convertible terms. The people of Kashmir were utterly ignored and everything that Sheikh Abdullah desired to do was done in the name of the State with the express or tacit consent of the Government of India. At this juncture on a suggestion from Sardar Patel, I and my wife began a tour of the State. This did not suit the books of Sheikh Abdullah. He approached the Government of India with the result that I was asked to stay out of the State for a few months. ”
ज़ाहिर है कि सरदार पटेल के इस प्रस्ताव से महाराजा हरि सिंह को धक्का लगता । हरि सिंह खुद्दार और स्वाभिमानी व्यक्ति थे । “हार या असफलता से उन्हें सख़्त नफ़रत थी ।” (आत्मकथा ४६) सबसे बड़ी बात तो यह थी की रियासत छोड़ने का यह दो टूक आदेश उन्हें सरदार पटेल से मिल रहा था , जिन पर उन्हें गहरा विश्वास था । इससे भी बड़ी बात यह थी कि यह सज़ा उन्हें बिना किसी कारण के दी जा रही थी । अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर करने के बाद उन्होंने वही किया था जिसकी सलाह सरदार पटेल ने उन्हें दी थी । लेकिन शेख़ अब्दुल्ला अब तक भारत सरकार को लगभग ब्लैकमेल करने की स्थिति में आ गया था और दिल्ली उसके आगे झुकने लगी थी । सबसे दुख की बात तो यह कि पंडित नेहरु पूरी स्थिति पर गुण दोष के आधार पर विचार नहीं कर रहे थे , बल्कि उनके निर्णय के पीछे कहीं न कहीं हरि सिंह के प्रति व्यक्तिगत विद्वेष भावना भी काम कर रही थी । इतना तो स्पष्ट था कि सरदार पटेल महाराजा हरि सिंह को केवल पंडित जवाहर लाल नेहरु का संदेश ही पहुँचा रहे थे । यह संदेश अकेले पंडित नेहरु का भी नहीं था । यह नेहरु और शेख़ अब्दुल्ला का संयुक्त संदेश था । भविष्य को धूमिल करने वाली यह पटकथा इन दोनों की मंत्रणा से उपजी थी । लेकिन नेहरु महाराजा से सीधे बातचीत करने का साहस शायद नहीं बटोर पा रहे थे । उनको लग रहा होगा कि महाराजा उनके इस असंवैधानिक प्रस्ताव को मानने से इंकार कर देंगे । इसलिये उन्होंने सरदार पटेल को संदेशवाहक के रुप में चुना । संघीय संविधान में अनुच्छेद ३७० को पारित करवाने में भी पटेल पहले नेहरु के दूत की इसी प्रकार की भूमिका निभा चुके थे । पटेल इतना तो जानते ही थे कि जम्मू कश्मीर का का मामला रियासती मंत्रालय से सम्बंधित होने के बावजूद प्रधानमंत्री नेहरु ने अपने पास रखा हुआ है और वे इसमें किसी तीसरे की दख़लंदाज़ी किसी भी क़ीमत पर सहन नहीं कर पाते । नेहरु-शेख़ अब्दुल्ला की इस योजना और सरदार पटेल के इस दो टूक आदेश के बावजूद शेख़ के षड्यंत्रों को परास्त करने का एक रास्ता अभी भी बचा हुआ था । प्रदेश के राज प्रमुख सांविधानिक मुखिया को , चाहे अस्थायी रुप से , चाहे किसी अन्य कारण से राज्य से बाहर नहीं भेजा जा सकता जब तक वह अपना रीजैंट या प्रतिनिधि नियुक्त न कर दे । यह रीजैंट महाराजा हरि सिंह का बेटा ही हो सकता था , क्योंकि प्रदेश में अभी राजशाही समाप्त नहीं हुई थी और न ही प्रादेशिक संविधान/विधान सभा के चुनाव हुये थे । रियासत में अभी राजकाज ‘जम्मू कश्मीर संविधान अधिनियम 1939’ के तहत ही चलाया जा रहा था ,जिसके अनुसार सांविधानिक शक्तियाँ महाराजा हरि सिंह के पास ही थीं । इसलिये अभी भी महाराजा हरि सिंह के पास शेख़ अब्दुल्ला के इस पूरे षड्यंत्र को समाप्त करने का एक रास्ता बचा था । वह था उनका अपना बेटा कर्ण सिंह । जीवन में आये इस सबसे बड़े संकट में महाराजा हरि सिंह की पूरी टेक अब अपने बेटे कर्ण सिंह पर ही टिकी हुई थी । यदि कर्ण सिंह रीजैंट बनने से इन्कार देता है तो शेख़ अब्दुल्ला और नेहरु की जोड़ी चाह कर भी महाराजा हरि सिंह को जम्मू कश्मीर से निष्कासित नहीं कर पायेगी । शेख़ अब्दुल्ला और नेहरु भी जानते थे कि तुरप का पत्ता इस समय कर्ण सिंह ही है । कर्ण सिंह यदि अपने पिता महाराजा हरि सिंह के साथ खड़ा हो जाता है तो जीत महाराजा की होगी और कर्ण सिंह यदि शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला के साथ चला जाता है तो जीत नेहरु और शेख़ अब्दुल्ला की जोड़ी की होगी । इस समय कर्ण सिंह की उम्र अठारह साल की थी । रियासतों का भारत की सांविधानिक व्यवस्था में अधिमलन हो गया था । कर्ण सिंह इतना तो समझ ही गये थे कि हवा किस ओर बह रही है और भारत के आकाश पर नेहरु का सूर्योदय हो चुका है । यह नहीं कि महाराजा हरि सिंह इस नये सूर्योदय को देख नहीं रहे थे , चाहे कर्ण सिंह अपनी आत्मकथा में लाख लिखते रहें कि उनके पिता नये परिवर्तनों को समझ नहीं पा रहे थे । उन्होंने तो १९३४ से ही रियासत में सांविधानिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया शुरु कर दि थी । जम्मू कश्मीर का १९३९ का संविधान अधिनियम उच्च कोटि में रखा जा सकता है ।
यह ठीक है कि नेहरु के शेख़ प्रेम के चलते हरि सिंह १५ अगस्त १९४७ से पहले रियासत को संघीय सांविधानिक व्यवस्था में शामिल करने के लिये तुरन्त पग नहीं उठा सके थे , लेकिन उसके बाद तो उन्होंने नेहरु की शेख़ को सत्ता सौंप देने की असांविधानिक शर्त स्वीकार कर इस दिशा में भी शुरुआत कर दी थी । देश भर की बाक़ी रियासतों में से भी राजशाही समाप्त हो रही थी और बड़ी रियासतों के शासकों को नई सांविधानिक व्यवस्था के अन्तर्गत अपनी रियासतों का , जिन्हें नई सांविधानिक व्यवस्था में बी श्रेणी के राज्य कहा गया था , राजप्रमुख नियुक्त करने का प्रावधान था । महाराजा हरि सिंह भी इसी व्यवस्था के तहत जम्मू कश्मीर राज्य के राजप्रमुख बने रह सकते थे । लेकिन शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला का उद्देश्य तो महाराजा हरि सिंह को शून्य कर कश्मीर में अपनी भावी योजनाओं को बिना किसी बाधा के लागू करना था । उन्होंने पहले तो उन मेहरचन्द महाजन को , जिनकी योग्यता की धाक सारे देश में थी , रियासत के प्रधानमंत्री पद से हटाया था और अब वे उन महाराजा हरि सिंह को , जिन्होंने नेहरु के आग्रह पर बिना कोई चुनाव करवाये शेख़ को रियासत का प्रधानमंत्री बना दिया था , जलावतन करना चाहते थे ।

महाराजा हरि सिंह यह भी समझ रहे थे कि देश की राजनीति में नेहरु-शेख़ की जो नई जोड़ी उभर रही है , जम्मू कश्मीर को लेकर इनकी हरकतें भविष्य में देश के लिये संकट खड़ा करेंगीं । इसलिये वे राष्ट्रहित में इस जोड़ी का जितना संभव हो सकता था मुक़ाबला कर रहे थे । अपने तरीक़े से मुक़ाबला सरदार पटेल भी कर रहे थे । लेकिन यह जोड़ी सरदार पटेल के भी पैर नहीं लगने दे रही थी । सरदार पटेल, कश्मीर की ज़मीन पर पैर ज़माने की एक कोशिश १९४७ के अन्त में ही कर चुके थे । उन्होंने जम्मू कश्मीर के मामले में जवाहर लाल की हवाई योजनाओं पर किसी सीमा तक अंकुश लगाने की अप्रत्यक्ष कोशिश की थी । लेकिन उस पर नेहरु ने जो चिट्ठी पटेल को लिखी , वह इतनी अपमान जनक थी कि पटेल ने आवेश में आकर मंत्रिमंडल से अपना त्यागपत्र तक लिख लिया था । यद्यपि गृह मंत्रालय और रियासती मंत्रालय पटेल के पास थे लेकिन जम्मू कश्मीर के मामले में नेहरु रियासती मंत्रालय को भी नज़दीक़ नहीं फड़कने दे रहे थे । उन्होंने जम्मू कश्मीर का काम ,बिना विभाग का मंत्री बनाकर रखे हुये एक पूर्व आई.सी.एस अधिकारी गोपालस्वामी आयंगर को दे रखा था । आयंगर महाशय, नेहरु के पास पटेल की शिकायत करते रहते होंगे । इस विषय को लेकर नेहरु ने २३ दिसम्बर १९४७ को एक बहुत ही आपत्तिजनक ,अपमानजनक भाषा में पटेल को पत्र लिखा । पत्र चाहे लम्बा है लेकिन स्थिति को समझने के लिये इसे उद्धृत किया जा रहा है । नेहरु ने लिखा,” रियासती मंत्रालय ने अपने काम काज के लिये जो तौर तरीक़ा चुना है , मैं उसकी प्रशंसा नहीं कर करता । यह मंत्रालय या कोई भी अन्य मंत्रालय सत्ता के अन्दर समानान्तर सत्ता नहीं हो सकता । वह अन्य किसी मंत्रालय की कार्य प्रणाली के प्रति ईर्ष्यालु नहीं हो सकता । यदि ऐसा होता तो सरकार का ताना बाना समान उद्देश्य की पूर्ति के लिये गठित न किया गया होता और न ही प्रधानमंत्री के पास कोई काम होता । मैं सैद्धान्तिक रुप से अभी इस विषय पर कुछ नहीं कहना चाहता । बाद में इस पर चर्चा की जा सकती है । वर्तमान मामला कश्मीर के बारे में है । कश्मीर की बात होती है तो उससे अन्य अनेक अन्तर्राष्ट्रीय मामले तथा सैनिक मामले इत्यादि जुड़ जीते हैं जो रियासती मंत्रालय की क्षमता से परे हैं । यही कारण है कि कश्मीर पर मंत्रिमंडल द्वारा समय समय पर विचार किया जाता है । अन्य अनेक मंत्रियों द्वारा अलग अलग या सामूहिक रुप से भी विचार किया जीता है । इसी कारण मैंने प्रधानमंत्री के रुप में इस विषय में विशेष रुचि ली ताकि विभिन्न मंत्रालयों में समन्वय स्थापित किया जा सके । गोपालस्वामी आयंगर को कश्मीर मामले में सहायता के लिये मैंने ही कहा है और हमारे निवेदन पर वे दो बार वहाँ जा भी चुके हैं । उन्हें पूर्वी पंजाब तथा वहाँ के सैनिक सम्पदा संगठन से भी निपटना होता है । इन दोनों कारणों से तथा कश्मीर पर उनके व्यक्तिगत अनुभव व ज्ञान के कारण उन्हें पूरी छूट देनी होगी । ———– मैं नहीं समझता कि रियासती मंत्रालय इसमें कहाँ आता है ? बस इतना ही कि विभिन्न क्षेत्रों में हो रही प्रगति से उसे अवगत करवाया जाता रहे । किसी भी मामले में रियासती मंत्रालय को हस्तक्षेप क्यों करना चाहिये , यह मेरी समझ से परे हैं । उसे इसमें रोड़े नहीं अटकाने चाहिये । यह सब मेरे कहने से हो रहा है और मैं अपने काम को छोड़ना नहीं चाहता ।”(कश्मीर एवं हैदराबाद ६०) नेहरु सरदार पटेल को आगाह कर रहे हैं कि उनके मंत्रालय को कश्मीर के मामले में पड़ना नहीं चाहिये क्योंकि वहाँ जो किया जा रहा है उनके कहने से ही किया जा रहा है । इस पत्र की अपमानजनक भाषा और तीव्र स्वर से सरदार पटेल जैसा शान्त व्यक्ति भी उत्तेजित हो गया और उन्होंने तुरन्त मंत्रिमंडल से अपना त्यागपत्र लिख दिया । पटेल ने लिखा-” आपका आज का पत्र मुझे अभी अभी सायं सात बजे मिला और मैं तुरन्त आपको यह बताने के लिये पत्र लिख रहा हूँ कि मुझे आपके पत्र से बहुत दुख पहुँचा । ——– आपके पत्र से स्पष्ट हो गया है कि मुझे किसी भी प्रकार से सरकार का सदस्य नहीं रहना चाहिये । इसलिये मैं अपना त्यागपत्र भेज रहा हूँ ।”(कश्मीर और हैदराबाद ६१) पटेल ने यह पत्र नेहरु को नहीं भेजा क्योंकि उन्हें मना लिया गया था , लेकिन इतना स्पष्ट हो गया था कि नेहरु कश्मीर मसले पर शेख़ अब्दुल्ला के बिना किसी की भी सुनने वाले नहीं हैं ।
जिस ज़मीन पर सरदार पटेल के पैर नहीं टिक पा रहे थे , उस पर महाराजा हरि सिंह भला कैसे टिक सकते थे ? लेकिन इतना जरुर मानना पड़ेगा कि महाराजा हरि सिंह लड़ कर हारने में विश्वास रखते थे , बिना लड़े हार स्वीकार करना उनके स्वभाव में नहीं था और यह लड़ाई तो राष्ट्रीय हितों की लड़ाई थी । लेकिन वे सरदार पटेल के इस दो टूक आदेश के बाद रणभूमि के उस मुक़ाम पर पहुँच गये थे , जहाँ उन्हें अपने इकलौता बेटे की सहायता की सर्वाधिक आवश्यकता थी । और आगे की कथा एक बार फिर कर्ण सिंह से ही ।”घटनाक्रम के इसी नाज़ुक मोड़ पर जवाहर लाल नेहरु ने मुझे अपने निवास पर बातचीत के लिये कई बार नाश्ते पर बुलाया । तीन मूर्ति भवन के डाईनिंग रुम की सीढ़ियाँ चढ़ते वक़्त जो उत्तेजना मैं महसूस कर रहा था , उसे मैं आज भी नहीं भूला हूँ । मेज़ पर सिर्फ़ दो व्यक्तियों के लिये इंतज़ाम था । इंदिरा गान्धी और उनके पुत्र पहले ही नाश्ता कर चुके थे । नेहरु जी चुस्ती से चलते हुये अन्दर आये और हैलो टाइगर कह कर दोस्ताना ढंग से हाथ मिलाया । नाश्ता लगभग एक घंटे तक चला और इस दौरान नेहरु जी ने मुझसे कुछ सामान्य बातें पूछीं और फिर काफ़ी देर तक स्वगत वार्तालाप करते रहे । अपने शुद्ध उच्चारण में उन्होंने,एक नये भारत का निर्माण किया जा हा है, प्राचीन सामंतीं व्यवस्था तेज़ी से ख़त्म होती जा रही है और एक नौजवान की हैसियत से मुझे तत्परता से स्वयं को नई परिस्थितियों के अनुरूप ढाल लेना चाहिये । इसके बाद वे कश्मीर समस्या , शेख़ अब्दुल्ला की भूमिका तथा राष्ट्रीय हित के लिये राज्य में सौहार्द पूर्ण वातावरण स्थापित करने के महत्व की चर्चा करने लगे । संक्षेप में उन्होंने कहा कि मेरे पिता स्पष्ट रुप से नई व्यवस्था को न तो स्वीकार करना चाहते हैं और न ही अस्वीकार कर पा रहे हैं । यह भी बताया कि वे ख़ुद तथा शेख़ अब्दुल्ला -दोनों ही मुझे रीजैंट नियुक्त करना चाहते हैं , ताकि वर्तमान गतिरोध ख़त्म किया जा सके । मैंने देखा कि नये भारत की बात करते समय उनकी आँखों में सौम्य चमक आ गई थी और आबाज में सकारात्मक खनखनाहट। अपने स्कूली जीवन में मैं इस व्यक्ति का प्रशंसक रहा था ———- और उनके पास होना व उनकी बातें सुनना अपने आप में एक अनूठा अनुभव था । जब उन्होंने विश्वभर में सक्रिय व्यापक ऐतिहासिक शक्तियों का ज़िक्र किया , तो मुझे ऐसा लगा मानों उनकी पुस्तक ‘भारत की खोज’ मेरे सामने साकार हो उठी हो । अपने पिता के दरबारी दायरे तथा घर के रहस्यमय और षड्यंत्रजनित तनाव वाले वातावरण की तुलना में यह कितना भिन्न था । स्कूली जीवन में मैं एक कुशल शासक होने , अपनी जनता के लिये कुछ उल्लेखनीय करने की कल्पना किया करता था । लेकिन अब मुझे अहसास हो गया कि शासन करने के दिन हमेशा के लिये लद चुके हैं । लेकिन अब उससे भी कहीं सार्थक व्यापक राष्ट्रीय हित में कुछ करने का अवसर है और वह भी एक ऐसे व्यक्ति के निजी आग्रह पर जो हमारे समय के महानतम नेताओं में से एक है । “(आत्मकथा१२५)
संकट की उस घड़ी में कर्ण सिंह ने अपने पिता के साथ खड़ा होने की बजाय ‘अपने समय के महानतम नेताओं में से एक’ नेहरु और शेख़ के साथ चले जाने का फ़ैसला किया । उन्होंने रीजैंट बनने के नेहरु और शेख़ अब्दुल्ला के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया । महाराजा हरि सिंह के अपने टाइगर ने उन्हें ज़िन्दगी का सबसे गहरा घाव दिया , जो उनके जीवन के अन्तिम क्षणों तक रिसता रहा । यह शायद महाराजा हरि सिंह के जीवन की सबसे बड़ी हार थी जो उसे किसी और से नहीं बल्कि अपने ही सुपुत्र से मिली थी ।
कर्ण सिंह जिस समय त्रिमूर्ति निवास में नाश्ता करते हुये नेहरु से अपने पिता का निन्दा पुराण सुन रहे थे उस समय नेहरु की उम्र साठ साल की थी और उनके पिता हरि सिंह की उम्र 54 साल की थी । कर्ण सिंह स्वयं मानते हैं कि उनके पिता उदारवादी व प्रगतिशील विचारधारा के थे । वे सत्ता के लिये , किसी भी सीमा तक झुकने के लिये ,भी तैयार नहीं थे । गोलमेज़ सम्मेलन में जब उन्होंने ब्रिटिश सत्ता के गढ़ लंदन में जाकर गंभीर स्वर में कहा था कि हम सबने भारत की धरती पर जन्म लिया है और देश की सम्मानजनक स्थिति के लिये हम सब देशवासियों के साथ हैं, तो यक़ीनन उनके चेहरे पर भी वह सौम्य चमक आई होगी जो कर्ण सिंह अब नेहरु के चेहरे पर देख रहे थे । उस समय हरि सिंह की उम्र ३७ वर्ष की थी । तब उनके चेहरे की वह सौम्य चमक देखने के लिये कर्ण सिंह वहाँ नहीं थे । लेकिन ब्रिटिश साम्राज्य ने हरि सिंह के चेहरे की वह चमक देख ली थी और तभी से उनको अपनी लाल सूची में दर्ज कर लिया था । अब कर्ण सिंह साठ साल के नेहरु को युवा पीढ़ी की आशा बता रहे थे और ५४ साल के अपने पिता को बीते युग की निशानी मान रहे थे । यह ठीक है कि महाराजा हरि सिंह को जम्मू कश्मीर की सत्ता वंशज परम्परा के कारण ही प्राप्त हुई थी , लेकिन उन्होंने परम्परा से प्राप्त राजशाही को लोकशाही में बदलने के लिये , उन दिनों जितना संभव था , उतना प्रयास किया । लेकिन अब जब कर्ण सिंह की माँ महारानी तारा देवी फफक फफक कर रो रही है और हरि सिंह का ,नेहरु-शेख़ के इस व्यवहार से चेहरा जर्द था , तो वे नेहरु के घर में बैठ कर नाश्ता उड़ाते हुये ‘कहीं व्याप्त राष्ट्रीय हितों के नाम पर’ अपने लिये सत्ता के कुछ अवसर तलाश रहे थे । वे,ये अवसर जन संघर्षों के रास्ते से पर चलकर नहीं बल्कि उसी पुरानी सामन्तीं परम्परा के रास्ते पर चलकर तलाश रहे थे जिस परम्परा के लिये वे अपने पिता की निन्दा कर व सुन रहे थे । यह अवसर उन्हें केवल और केवल एक गुण के कारण मिल रहा था कि वे महाराजा हरि सिंह के सुपुत्र हैं और उन्होंने महाराजा गुलाब के ख़ानदान में जन्म लिया है । सामंतीं परम्परा की निन्दा करते हुये , सामंतीं परम्परा का सुफल चखने की यह अद्भुत गाथा है , जो लोकतंत्र के ध्वजवाहक पंडित जवाहर लाल के घर में नाश्ते की मेज़ पर बैठ कर लिखी गई । लेकिन इस गाथा ने जम्मू कश्मीर को ऐसा घाव दे दिया जो अब तक रिसता है । ताज्जुब है अब जब राज्य में लोकशाही स्थापित होने जा रही थी तो कर्ण सिंह ने रियासत में जाकर लोकतंत्र के माध्यम से अपना स्थान अर्जित करने का प्रयास क्यों नहीं किया ?
ख़ैर शेख़ अब्दुल्ला और पंडित जवाहर लाल नेहरु ने मिल कर महाराजा हरि सिंह के घर में ही सेंध लगा ली थी । उस सेंध के बाद महाराजा हरि सिंह के लिये सारे रास्ते बंद हो गये थे । कर्ण सिंह के ही शब्दों में ,”मुझ पर रैजीडैंटशिप के प्रस्ताव को ठुकराने के लिये थोड़ा दबाव जरुर डाला जा रहा था । लेकिन मैंने यथासंभव पूरी विनम्रता से उस दबाव को मानने से इंकार कर दिया ।”(आत्मकथा१२६) जिसे वे थोड़ा दबाव बता रहे हैं वह कितना था इसका एक उदाहरण भी कर्ण सिंह स्वयं ही देते हैं । ” मेरे पिता ने एक दिन दोपहर का भोजन करते हुये ,बहुत ही खिन्न मन से (मुझे) कहा कि भले ही मैं रीजैंट के रुप में श्रीनगर जा रहा हूँ लेकिन शेख़ अब्दुल्ला मुझे कुछ ही महीनों में अपमानजनक तरीक़े से निकाल बाहर करेंगे ।”(आत्मकथा १३५) इससे ज्यादा स्पष्ट शायद कहा भी नहीं जा सकता था । इससे सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि हरि सिंह ने अपने बेटे पर इस पद को अस्वीकार करने के लिये कितना दबाव डाला होगा । हरि सिंह जानते थे कि राजप्रमुख का सांविधानिक पद तो ख़ाली रह नहीं सकता । उस पर राजवंश के किसी वैधानिक उत्तराधिकारी को ही बिठाया जा सकता है । इसके लिये अठारह साल के कर्ण सिंह से बेहतर मुखौटा शेख़ अब्दुल्ला के लिये और कौन हो सकता था ? कर्ण सिंह शेख़ के हाथ की कठपुतली बन सकता है । फिर कर्ण सिंह कभी चूँ चूँ भी करेगा तो उसे डराने के लिये उसके पिता का इतिहास तो होगा ही । जिस शेख़ अब्दुल्ला ने महाराजा हरि सिंह जैसे व्यक्ति को रियासत से बाहर का रास्ता दिखा दिया , उससे टकराने पर कर्ण सिंह का क्या हश्र हो सकता था , शायद यह कर्ण सिंह को विस्तार से समझाने की जरुरत नहीं होगी । लेकिन कर्ण सिंह कुछ भी समझने को तैयार नहीं थे । उन्हीं के शब्दों में,” पिता जी पूरी स्थिति से बिल्कुल ही संतुष्ट नहीं थे और उन्होंने अपना असंतोष , अपनी नाराज़गी खुल कर व्यक्त की थी । हालाँकि उन्होंने अनहोनी के आगे सिर झुका दिया था , लेकिन मैंने महसूस किया इस पूरी प्रक्रिया में हमारे सम्बंधों में खटाई आ गई थी । उधर माँ भी लगभग टूटने के कगार पर थी । इससे समूची स्थिति में भावनात्मक अस्थिरता का नया आयाम जुड़ गया था । मेरे लिये जवाहर लाल नेहरु के समर्थन और अपनी अन्दरूनी शक्ति पर निर्भर रहने के सिवाय और कोई चारा नहीं था ।”(आत्मकथा १३४) ताज्जुब है शेख़ अब्दुल्ला भी नेहरु के समर्थन पर ही कर्ण सिंह के पिताजी को निर्वासित कर रहे थे और कर्ण सिंह भी नेहरु के समर्थन के बलबूते ही अपने पिता के दबाव और आग्रह को ठुकरा रहे थे । इस हालात में”——– प्रारम्भिक सदमे के बाद (हरि सिंह) कुछ समय के लिये रियासत से बाहर रहने के लिये तैयार हो गये थे । हालांकि उन्होंने शायद यह भी महसूस कर लिया था कि कि उनके लिये लौटना अब कभी आसान नहीं होगा ।”(आत्मकथा१२६)
विरोध के बावजूद कर्ण सिंह द्वारा रीजैंट बनने का प्रस्ताव स्वीकार कर लेने के बाद महाराजा हरि सिंह के लिये लगभग सभी विकल्प समाप्त हो गये थे । ६ मई १९४९ को सरदार पटेल को उन्होंने एक पत्र लिखा , जिसमें उन्होंने अपना ह्रदय उँड़ेल कर रख दिया । उन्होंने लिखा,” मुझे (आपके इस प्रस्ताव से) बहुत आघात पहुँचा मैंने कभी यह सोचा भी न था कि आप मेरे सामने यह प्रस्ताव रख सकते हैं । आपके प्रति मेरी शुरु से ही अटूट आस्था और विश्वास रहा है । वर्तमान और भविष्य में व्यक्तिगत रुप में मुझे और मेरी रियासत को प्रभावित करने वाले प्रश्नों पर हमेशा मैं आपकी सलाह मानता रहा हूँ । अब मैंने ख़ुद को जैसे तैसे इस प्रस्ताव के लिये तैयार कर लिया है । बहरहाल अगर मैं इस प्रस्ताव पर अपनी हताशा प्रकट न करता तो एक मनुष्य के नाते बहुत अस्वभाविक बात होती । जिस तरह मुझे अपनी प्रतिष्ठा , सम्मान और पद का बलिदान देने के लिये कहा जा रहा है , उससे मुझे आश्चर्य और घोर निराशा हुई है । यह तो तब है जब मैं प्रधानमंत्री (नेहरु) अथवा आपकी ओर से , रियासत में अपनी सांविधानिक स्थिति के बारे में मिलने वाली सलाह को , कभी कभी अपने विवेक और आत्मा के विरुद्ध होते हुये भी मानता रहा हूँ । कभी कभी तो ऐसा भी हुआ है कि कुछ महीने पहले हममें एक व्यवस्था पर सहमति बनी , पर बाद में उसे नकारते हुये एक बिल्कुल अलग सलाह दी गई । मैं आपसे , अपनी उस भावना को छिपाना भी ठीक नहीं समझता , जहाँ शेख़ अब्दुल्ला को लिखित और वायदा की गई बातों का , पक्षपातपूर्ण तरीक़े से अपनी सुविधानुसार उल्लंघन करने की इजाज़त दी जाती रही है । ———— इस प्रकार के भेदभावपूर्ण व्यवहार से निश्चय ही मुझे काफ़ी ठेस पहुँची है । ——— लेकिन एक बार फिर आपके फ़ैसले पर तथा तथा हमारे प्रति आपकी शुभेच्छा पर पूरी तरह विश्वास रखते हुये —— मैं आपकी इच्छानुसार रियासत से तीन या चार महीने के लिये अनुपस्थित रहने के लिये तैयार हूँ ।” (आत्मकथा १२७-१२८) लेकिन शायद महाराजा हरि सिंह को भी लगता था कि अब जम्मू कश्मीर वापिस जाना संभव नहीं होगा । क्या वे विद्रोह कर सकते थे ? लेकिन किसके प्रति विद्रोह करते ? क्या उस भारत के प्रति जिसकी स्वतंत्रता की बात उन्होंने १९३२ में लंदन में उस वक़्त कहीं थी जब सभी रियासतों के शासक ‘लाँग लिव दी किंग’ के गीत गाने में व्यस्त थे ? उन्होंने चुपचाप यह गरलपान किया और अब कहाँ जायें , इस पर सोचना शुरु कर दिया ।
उधर महाराजा हरि सिंह को उत्तर देने से पहले पटेल ने ११ मई १९४७ को इस योजना के जनक नेहरु को सूचित किया,”(मैंने महाराजा को बताया कि) उनके लिये उचित होगा कि वे कुछ समय के लिये रियासत से दूर रहें और युवराज को शासक नियुक्त कर दें । वे दोनों, (महारानी भी वहीं थीं) इस सुझाव से सकते में आ गये थे और मैं समझ गया कि इससे उन्हें बहुत आघात पहुँचा है । वार्तालाप के अन्त में वे २९ अप्रेल को तो व्याकुल हो गये थे । फिर भी मैंने उनसे इस बात पर सोचने के लिये कहा । मैंने शंकर से भी उनसे बातचीत करने के लिये कहा । शंकर ने महाराजा और अलग से महारानी से भी दो-तीन बार लम्बी बातचीत की । लगता है उन्होंने सुझाव को स्वीकार कर लिया है ।”(कश्मीर व हैदराबाद १२८) पटेल को नेहरु का उत्तर १८ मई को मिला । लेकिन लगता था नेहरु महाराजा हरि सिंह को भारत से ही बाहर निकाल देने के इच्छुक थे । उन्होंने पटेल को लिखा,”मैं मान लेता हूँ कि महाराजा और महारानी कुछ महीनों के लिये रियासत से बाहर रहेंगे , जैसा कि उन्होंने स्वीकार किया है । बम्बई का घर उनके लिये उपयुक्त रहेगा । अच्छा होता यदि वे दो तीन महीनों के लिये देश से ही बाहर चले जाते । किन्तु इसका निर्णय उन्हें स्वयं ही करना है । मैं नहीं समझता कि महाराजा की अनुपस्थिति के लिये कोई समय सीमा निश्चित की जानी चाहिये । यह मामला अनिश्चित ही रखा जाना चाहिये । ——- वर्तमान में मैं सोचता हूँ कि सबके भले के लिये महाराजा और महारानी दोनों बाहर ही रहें । मुझे आशा है कि आप, महाराजा , महारानी और युवराज को समझा सकेंगे कि शेख़ अब्दुल्ला से क्या समझौता हुआ है ।”(कश्मीर व हैदराबाद ११९) नेहरु का पत्र मिल जाने के बाद पटेल ने ६ मई को महाराजा हरि सिंह द्वारा लिखे पत्र का उत्तर २३ मई को दिया । पटेल ने लिखा था -” —-मुझे विश्वास है कि जब आप इतने ज़्यादा परिवर्तनों को देख चुके हैं , उनके अभ्यस्त हो चुके हैं , तो यह क़दम भी आप देश के प्रति कर्तव्य भावना से उठाएँगे । फ़िलहाल समझदारी इसी में है कि नियति चक्र की प्रबलता के आगे सहजता और शान्ति से सिर झुका दिया जाये ।”(आत्मकथा१३१) देश से ही बाहर चले जाने का नेहरु का परामर्श महाराजा तक पहुँचाने का साहस शायद पटेल भी नहीं जुटा पाये ।

जम्मू कश्मीर में एक नयी लड़ाई शुरु हो चुकी थी । भारत का यह पश्चिमोत्तर भाग कई शताब्दियों से विदेशी आक्रमणों की समर स्थली रहा है । लेकिन इस बार लड़ाई ने नया रुप धारण कर लिया था । महाराजा हरि सिंह और सरदार पटेल वितस्ता और चिनाव की घाटियों में भारत की लड़ाई लड़ रहे थे । कुछ सौ साल पहले इस्लाम में दीक्षित हुई रघुकुल की संतान शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला रियासत को आज़ाद रख पाने की रहस्यमयी लड़ाई लड़ रहा था । लेकिन उसकी सबसे बड़ी ख़ूबी यह थी कि उसने इस लड़ाई में महाराजा हरि सिंह द्वारा हस्ताक्षरित अधिमिलन पत्र को ही हथियार बना रखा था । उसका कहना था कि रियासत का संघीय संविधान से अधिमिलन केवल तीन विषयों को लेकर हुआ है । जबकि विषय निर्धारित करने में महाराजा हरि सिंह की कोई भूमिका नहीं थी । उसका निर्धारण सरदार पटेल के रियासती मंत्रालय ने सभी रियासतों के लिये एक समान रुप से किया था । पंडित जवाहर लाल नेहरु इसी बात से अभिभूत थे कि मुसलमान शेख़ अब्दुल्ला पाकिस्तान का समर्थन न कर हिन्दुस्तान से सम्बंध बनाने की बात कर रहा है । इस लिये जम्मू कश्मीर भारत के साथ अच्छे सम्बंध रखता हुआ कमोवेश स्वतंत्र भी रह ले तो कोई ग़म नहीं । पाकिस्तान द्वारा जम्मू कश्मीर पर हमले के छह दिन बाद ही २८ अक्तूबर १९४७ को उन्होंने अपनी बहन को लिखा,” मुझे बुरा नहीं लगेगा यदि कश्मीर किसी रुप में आज़ाद भी रह जाता है । लेकिन वह अपने शोषण के लिये पाकिस्तान का हिस्सा बने इससे क्रूर आघात और क्या हो सकता है ?”(Indian Summer 292) दरअसल नेहरु को आगे करके शेख़ अब्दुल्ला भी इसी प्रयास में लगे हुये थे । शेख़ यह तो वर्दाश्त कर सकते थे कि सुरक्षा,संचार और विदेशी मामले भारत ले ले , लेकिन जम्मू कश्मीर भारत का हिस्सा ही बन जाये , यह उन्हें किसी भी हालत में स्वीकार नहीं था । ताज्जुब है कश्मीर के बारे में नेहरु और शेख़ के विचार कितने मिलते थे ।
संकट की इस घड़ी में भी नेहरु जम्मू कश्मीर के मामले को भारत की सामरिक सुरक्षा की पृष्ठभूमि में न देख कर , हिन्दु-मुसलमान की प्रिज्म में , घोर साम्प्रदायिक दृष्टि से ही देख पा रहे थे । इसलिये वे रणभूमि में शेख़ अब्दुल्ला के सारथी बन कर ही स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे थे । वे सचमुच शेख़ अब्दुल्ला के भीतरी मानस को समझ पाने में अक्षम सिद्ध हो रहे थे क्योंकि वे हवाई क़िलों में ज़्यादा रहते थे । पटेल ज़मीन के आदमी थे । वे शेख़ अब्दुल्ला की मंशा और मानसिकता दोनों को बख़ूबी समझ रहे थे । जब उन्होंने कर्ण सिंह को रीजैंट बनाने का प्रस्ताव रखा तो उसके बाद उनकी युवराज से कुछ अवसरों पर बातचीत भी हुई । कर्ण सिंह ने ख़ुलासा किया , “उनसे बात करके ऐसा लगता था कि कि यह एक ऐसा आदमी है जिसके लिये कोई भी समस्या इतनी जटिल नहीं है कि उसे सुलझाया न जा सके । सिर्फ़ कश्मीर का मसला ही एक ऐसी समस्या थी , जो नेहरु जी स्वयं देख रहे थे । ज़ाहिर है सरदार नेहरु की इस दख़लंदाज़ी से ख़ुश नहीं थे । हालाँकि उन्होंने मेरे सामने कभी भी नेहरु जी की आलोचना नहीं की थी, लेकिन उनसे बातचीत से यह साफ़ ज़ाहिर था कि उन्हें नेहरु जी और शेख़ के सम्बंध पसंद नहीं थे । वे शेख़ को न केवल स्वयं नापसंद करते थे , बल्कि स्पष्टत उन पर विश्वास भी नहीं करते थे । “(आत्मकथा १३३) लेकिन पटेल शायद महाराजा तक नेहरु-शेख़ अब्दुल्ला का यह प्रस्ताव पहुँचाते हुये स्वयं भी कहीं न कहीं आहत हुये थे । इस प्रसंग पर टिप्पणी करते हुये प्राण नाथ चोपड़ा लिखते हैं,” —— (शेख़ अब्दुल्ला) इस बात पर अडे रहे कि महाराजा हरि सिंह को भी राज्य छोड़ने के लिये कहा जाये ताकि वह स्वतंत्र रुप से कार्य कर सके । किन्तु सरदार पटेल किसी भी तरह शेख़ अब्दुल्ला की बातों पर विश्वास नहीं कर सके । उनको लगता था जिस महाराजा के दिये अधिकार पत्र से शेख़ राज्य के प्रधानमंत्री हैं , उन महाराजा हरि सिंह को पदच्युत करना नैतिक दृष्टि से ठीक नहीं होगा । सरदार इस बात से अप्रसन्न थे कि शेख़ एक माँग पूरी हो जाने पर दूसरी माँग कर देते हैं । वे एक प्रकार से भारत सरकार को अपनी माँगे पूरी करने के लिये डराते धमकाते हैं । फिर भी नेहरु द्वारा बार बार आग्रह करने पर सरदार पटेल को महाराजा को रियासत छोड़ने जैसी अशोभनीय बात कहनी पडी । किन्तु यह निर्णय उनके लिये इतना कड़वा था कि उन्होंने आगे सम्पर्क का काम अपने निजी सचिव वी. शंकर पर छोड़ दिया ।”(कश्मीर और हैदराबाद ३०)
लगता है जम्मू कश्मीर से महाराजा को बाहर करने की योजना नेहरु और शेख़ ने मिल कर काफ़ी अरसा पहले ही , केवल बना ही नहीं ली थी , बल्कि उसकी बारीकियों पर भी विचार कर लिया था । यही कारण रहा होगा कि नेहरु ने १८ मई को लिखें अपने पत्र में स्पष्ट कर दिया कि यदि रियासत से बाहर महाराजा देश में ही रहना चाहते हैं तो उनको मुम्बई रहना चाहिये । लेकिन शायद नेहरु को रहने का स्थान भी तय करने की जरुरत नहीं पडी । अरसा पहले जम्मू कश्मीर सरकार ने मुम्बई में एक भवन ख़रीदा था , जो कश्मीर भवन के नाम से जाना जाता था । हरि सिंह ने उसी भवन में जाकर रहने का निर्णय किया । सब कुछ तय हो चुका था । अब दिल्ली से वापिस जाने का रास्ता बन्द हो चुका था । महाराजा हरि सिंह ने मुम्बई जाने के लिये बीस जून का दिन तय कर दिया । उसी दिन कर्ण सिंह को सदर-ए-रियासत का पद संभालने के लिये श्रीनगर की ओर प्रस्थान करना था । लेकिन कर्ण सिंह के श्रीनगर में जाकर सत्ता संभालने के रास्तें में अभी एक और बाधा बची हुई थी । उसका वर्णन कर्ण सिंह के ही शब्दों में,”माँ कट्टर हिन्दू थीं । उसका आग्रह था कि जाने से पहले मेरा यज्ञोपवीत संस्कार हो जाना चाहिये । यह समारोह मेहरचन्द महाजन के निवास स्थान पर हुआ । इसके लिये जम्मू से पंडित बुलाये गये तथा मेरे साथ दो और राजपूत लड़कों का भी यज्ञोपवीत संस्कार किया गया । उस अवसर पर हमने धोती पहनी । परम्परा के अनुसार तो मेरा मुंडन भी होना चाहिये था लेकिन पंडितों के पूरे दबाव के बाबजूद , अपने प्रबल विरोध के बल पर ही मैं अपना सिर मुँड़ाने से बच सका । परन्तु मुंडन के प्रतीक स्वरुप मेरे बालों की एक लट काट ली गई और इस तरह श्रीनगर जाकर रेजीडैंसी संभालने से पहले बौद्ध भिक्षु जैसा दिखने से मैं बच गया ।”(आत्मकथा १३५) वैसे भी हो सकता था परम्परा के अनुसार मुंडन करवा लेने से परम्परा विरोधी नेहरु नाराज़ हो जाते ! कर्ण सिंह सँभल सँभल कर पग रख रहे थे।
बीस जून १९४९ का दिन जम्मू कश्मीर के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है । इम्पीरियल होटल में महाराजा हरि सिंह मुम्बई जाने के लिये तैयार हो रहे थे । उनका सामान बाँधा जा रहा था । इसी दिन उनके अठारह वर्षीय सुपुत्र कर्ण सिंह को सिंहासनारुढ होने के लिये श्रीनगर जाना था । क्या वे अपने सुपुत्र को श्रीनगर के लिये विदा करके मुम्बई प्रस्थान करेंगे ? शायद महाराजा को लगा कि अब इसकी भी किसी को जरुरत नहीं है । लेकिन अभी भी कर्ण सिंह को काग़ज़ के एक टुकड़े की जरुरत थी , जिसके बिना उसका श्रीनगर जाना रुक सकता था । महाराजा हरि सिंह ने लिखा—-
“स्वास्थ्य कारणों से मैंने अल्पकालिक अवधि के लिये रियासत से बाहर जाने का निर्णय किया है । इस अवधि में रियासत की सरकार से सम्बंधित अपने सभी अधिकारों और कर्तव्यों की ज़िम्मेदारी मैं युवराज कर्ण सिंह जी बहादुर को सौंपता हूँ । अत:मैं निर्देश देता हूँ और घोषणा करता हूँ कि मेरी अनुपस्थिति के दौरान रियासत तथा उसकी सरकार से जुड़े मेरे सभी अधिकारों और कर्तव्यों को युवराज को सौंपा जाये । ये अधिकार और कर्तव्य , चाहे विधायक हों या कार्यकारी , सभी युवराज में निहित रहेंगे । विशेष रुप से क़ानून बनाने , घोषणापत्र , आदेश जारी करने , अपराधियों की सज़ाएँ माफ़ करने के विशेषाधिकार भी युवराज के पास ही रहेंगे ।

हरि सिंह
महाराजाधिकार

अपना राजपाट कर्ण सिंह को सौंप कर , महाराजा हरि सिंह उसकी रवानगी से पहले ही , अपने स्टाफ़ और नौकरों -चाकरों के साथ सुबह ही मुम्बई के लिये रवाना हो गये । अब वे अपनी यात्रा जहाज़ से करने वाले नहीं थे बल्कि उन्हें अपनी लम्बी यात्रा दिल्ली से मुम्बई जाने वाली रेलगाड़ी से ही करनी थी । रेलगाड़ी में जाने वाले को जहाज़ में जाने वाले से पहले ही निकलना चाहिये क्योंकि रेलगाड़ी की गति जहाज़ की गति से बहुत कम होती है । जाने से पहले उन्होंने अपनी पत्नी तारा देवी की ओर देखा । शायद उनको आशा होगी कि वह उनके साथ जायेगी । लेकिन तारा देवी ने उनके साथ मुम्बई जाने की बजाय कसौली जाना श्रेयस्कर समझा क्योंकि ,” वह मुम्बई की गर्मी नहीं सहन कर सकती थीं ।”(आत्मकथा १३३) लेकिन कहा जाता है कि तारा देवी की शर्त थी कि उनका भाई नचिंत चन्द भी मुम्बई में उनके साथ रहेगा , लेकिन महाराजा को यह शर्त मंज़ूर नहीं थी ।
तारा देवी अपने भाई के साथ कार में हिमाचल प्रदेश स्थित कसौली के लिये रवाना हो गईं । महाराजा हरि सिंह मुम्बई चले गये और जीवन भर वापिस नहीं आये । माँ और बाप दोनों के चले जाने के बाद कर्ण सिंह जहाज़ में बैठ कर ‘अपनी’ रियासत जम्मू कश्मीर की ओर चले ।
महाराजा हरि सिंह के निष्कासन के इस पूरे प्रसंग का शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला ने इस प्रकार उल्लेख किया है । “यद्यपि महाराजा ने दबाव में आकर लोकतांत्रिक सरकार का गठन कर दिया था लेकिन अन्दर ही अन्दर वह ग़ुस्से से झाग उगल रहा था । जैसे ही उसे अवसर मिला , उसने हमारे प्रशासन में हस्तक्षेप करना शुरु कर दिया । उसने हमारे मंत्रिमंडल में कर्नल बलदेव सिंह पठानिया को बजीर-ए-हुज़ूर नियुक्त कर दिया , जिसे हमारे और उसके बीच सम्पर्क रखना था । लेकिन पठानिया कोई रचनात्मक भूमिका नहीं निभा पाया । परिणामस्वरूप हमारे और महाराजा के सम्बंध दिन प्रतिदिन तनावपूर्ण होते गये । तब मैंने केन्द्र को बता दिया कि हालात सुधारने का एक ही तरीक़ा है कि महाराजा को निष्कासित कर दिया जाये । यद्यपि महाराजा को पटेल का समर्थन हासिल था , लेकिन केन्द्र हमारी अवहेलना करने की स्थिति में नहीं था । इसलिये हरि सिंह को मुम्बई जाना पड़ा । लेकिन आयंगर ने पटेल को ख़ुश करने का एक तरीक़ा ढूँढ लिया । उसने कर्ण सिंह को , राज्य का सांविधानिक मुखिया नियुक्त करवा दिया । हमने जवाहर लाल के आग्रह पर इस नियुक्ति को स्वीकार कर लिया । इस पर भी जब हरि सिंह राज्य छोड़ रहा था तो उसने पटेल को लिखा कि ‘मैं तीन या चार महीने के लिये बाहर जा रहा हूँ । इसे मेरे निष्कासन की भूमिका न समझ लिया जाये ।’लेकिन उसकी इस रवानगी से उसके शासन का अन्त हो गया ।”(आतिश-ए-चिनार ३५९)

 

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