लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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-प्रमोद भार्गव-

Planning-Commission-पंडित नेहरू की समाजवादी नीतियों को गति देने का गवाह रहा योजना आयोग नियति का शिकार होकर इतिहास बनने जा रहा है। 64 साल पुराने इस संस्थागत ढांचे के अलावा भी कई ऐसी संस्थाएं हैं, जो समय के साथ बदलाव न लाने के कारण अपनी उपयोगिता खो चुकी हैं। बुनियादी शिक्षा,गरीबी उन्मूलन,रोजगार और आदिवासी तथा विकलांगों के विकास से जुड़ी संस्थाओं के पुनर्गठन के लिए भी समीक्षा जरूरी है। ऐसी ही स्थिति अनेक निगम, मंडल, परिषदों व अकादमियों की है। लेकिन यहां सवाल उठता है कि अप्रासंगिक हो चुकी संस्थाओं का बदला हुआ स्वरूप कैसा हो ? हमारे यहां विडंबना है कि संस्थाओं के नाम तो बदल दिए जाते हैं, लेकिन उनकी कार्यप्रणाली परंपरागत ही रहती है,क्योंकि संस्थाओं के कर्मचारी और अधिकारी वही रहते हैं,लिहाजा उनकी मानसिकता किसी बुनियादी बदलाव को स्वीकार नहीं करती। इसीलिए हम देखते हैं,केंद्र व राज्यों में सरकारें बदलने के बाद भी यथास्थिति नहीं टूटती ? लालफीताशाही और भ्रष्टाचार अपनी जगह कायम रहते हैं। गोया यदि योजना आयोग का केवल नाम बदला गया तो फिर उसके कोई कारगर नतीजे निकलने वाले नहीं हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से योजना आयोग के समाप्त कर एक नए संस्थान की स्थापना का ऐलान किया है। हालांकि इसके संकेत केंद्रीय सत्ता में बदलाव के साथ ही मिलने लगे थे। आयोग अपनी प्रासंगिकता इसलिए खोता चला गया क्योंकि इसकी स्थापना 1950 में हुई थी,तब केंद्र सरकारें सार्वजानिक क्षेत्र के उपक्रमों को बढ़ावा दे रही थीं। सहकारिता की भूमिका भी सुनिश्चित की जा रही थी। नेहरू सोवियत संघ की नीतियों से प्रभावित थे,इसलिए समाजवादी गणराज्य की बुनियाद रखने में एक ऐसी संस्था की जरूरत थी, जो विकास संबंधी पंचवर्षीय योजनाओं की परिकल्पना करके,बजट का निर्धारण करे। इंदिरा गांधी ने समाजवादी मूल्यों को और मजबूती देते हुए निजी बैंको का राष्ट्रीयकरण किया। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद ही गरीबों और शिक्षित बेरोजगारों को ब्याज मुक्त कर्ज बैंकों से मिलने का सिलसिला शुरू हुआ। जाहिर है, गरीबी उन्मूलन,बुनियादी विकास और कल्याणकारी योजनाओं के लक्ष्य के निर्धारण व उसे हासिल करने में एक समय योजना आयोग की अहम भूमिका रही है।

आयोग की प्रासंगिकता खोने की शुरूआत हुई 1990 से, जब देश में विश्व-ग्राम की अवधारणा के चलते नव उदारवाद ,मसलन अर्थव्यवस्था में उदारीकरण की शुरूआत हुई। इसके बाद से आयोग प्रभावशून्य होता चला गया। लिहाजा पहली आठ योजनाओं में विपुल धनराशि के निवेश के याथ सार्वजानिक क्षेत्र की वृद्धि पर था,वह 1997 में नौंवी योजना के साथ घटता गया। नतीजतन औद्योगिक घरानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को प्रोत्साहित किया जाने लगा। आयोग के वर्तमान उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने तो गरीबी रेखा का ऐसा मजाक उड़ाया, जैसे गरीब देश के नागरिक न होते हुए कोई लाचार शरणार्थी हों और केवल कल्याणकारी योजनाओं की दया पर पल रहे हों ?

आयोग के बदले रूवरूप में यह ख्याल रखने की जरूरत है कि इसका परिवर्तित संस्थागत ढांचा महज औद्योगिक जगत के हित-साधन का उपक्रम बनकर न रह जाए ? क्योंकि इसे खत्म करने की घोशणा के बाद ही पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी का बयान आया है कि आयोग का पुनर्गठन वित्त आयोग के रूप में किया जाए। उद्योग संगठन सीआईआई में भी इस फैसले का स्वागत में कहा है कि हमें नए विकास और कार्यान्वयन संस्थान की सरंचना के सिलसिले में सररकार के साथ विचार-विमर्श करने में खुशी होगी। इसी क्रम में वित्त मंत्री अरूण जेटली का बयान आया है कि निर्देश और नियंत्रण के सिद्धांत पर चलने वाले योजना आयोग के स्थान पर ‘राष्ट्रीय विकास सुधार आयोग‘बनाया जाएगा। जो राज्यों को संसाधनों के उपयोग के बारे में निर्णय लेने की अधिक स्वायत्ता देगा। वित्त मंत्री ने इसे और स्पष्ट करते हुए कहा है कि ‘राज्यों को क्या करना है और क्या नहीं, यह केंद्र को राज्य क्यों बताएं ? हरेक राज्य को इजाजत होनी चाहिए कि वह राष्ट्रीय संसाधनों के उपयोग के बारे में खुद फैसले लें और योजनाएं बनाएं‘। मसलन राज्य केंद्र से आवंटित धन अपनी मर्जी से उपयोग करने के लिए स्वंतत्र होंगे।

फिलहाल आयोग राज्यों को मदबार धन देता है। साथ ही सुनिश्चित मद में धन खर्च करने की बाध्यता रहती है। संसाधन का यह मदबार बंटवारा आयोग संविधान के अनुच्छेद 282 के तहत करता है। आयोग की समाप्ति के बाद क्या इस धन का बटंवारा एनडीआरसी करेगा या राज्य स्वयं करेंगे ? राज्यों को संसाधन के बटंवारे का अधिकार दे दिया गया तो मुश्किल यह होगी कि राज्य के मुख्यमंत्री केवल अपनी मन-पसंद योजनाओं में समूचे धन को झोंक सकते हैं ? इस आचरण से केंद्र द्वारा नियंत्रित योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं। वैसे भी राज्यों में क्षेत्रीय व जातिगत आकांक्षाओं के चलते कल्याणकारी चुनौतियां ध्रुवीकृत हो रही हैं। ऐसे में ध्रुवीकरण का खतरा और संकीर्ण होता चला जाएगा। अभी तक राज्य की योजनाएं स्वीकृत करने और धन खर्च के उपाय आयोग सुझाता था। एक बार तमिलनाडू की मुख्यमंत्री जे जयललिता ने नाराजी जताते हुए कहा भी था कि हम आयोग के पास दिल्ली इसलिए आते हैं,जिससे वह हमें बता सके कि हम अपना धन कैसे खर्च करें ? जाहिर है, राज्यों को संसाधनों के लिए खुली छूट देना उचित नहीं होगा ?

दरअसल, आयोग का मकसद संसाधनों का उचित दोहन, उत्पादन में वृद्धि और सामुदायिक सेवा में सभी को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराकर लोगों का जीवन स्तर सुधारना था। मनरेगा और खाघ सुरक्षा जैसी योजनाएं इसीलिए शुरू की गईं। आयोग देश के संसाधनों का राज्यवार मूल्यांकन भी करता था। किसी राज्य में संसाधनों की कमी के हालात बनने पर उसमें बढ़ोतरी के उपाय करता था। इसलिए संसाधनों के बंटवारे में संतुलित व समावेशी हालात कमोवेश बने हुए थे। तय है, संसाधनों पर नियंत्रण के लिए एक केंद्रीय संस्था की उपयोगिता तो है। लेकिन पुनर्गठन के बहाने ज्यों की त्यों उपरोक्त कार्य एनडीआरसी को सौंप दिए गए तो फिर महज नाम बदलने से योजना आयोग का मजबूत विकल्प खड़ा होने वाला नहीं है ? लिहाजा आयोग की आवधारणओं का आधुनीकिकरण तो हो, लेकिन उसका समावेशी लक्ष्य अपनी जगह बदस्तूर बना रहना चाहिए।

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