लेखक परिचय

अखिलेश आर्येन्दु

अखिलेश आर्येन्दु

वरिष्‍ठ पत्रकार, टिप्पणीकार, समाजकर्मी, धर्माचार्य, अनुसंधानक। 11 सौ रचनाएं 200 पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। 25 वर्षों से साहित्य की विविध विधाओं में लेखन, अद्यनत-प्रवक्ता-हिंदी।

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अखिलेश आर्येन्दु

हम यदि होली के विभिन्न संदर्भों की बात करें तो पाते हैं कि न जाने कितने संदर्भ, घटनाएं, प्रसंग, परंपराएं और सांस्कृतिक-तत्त्व किसी न किसी रूप में इस प्रेम और सदभावना के महापर्व से जुडे़ हुए हैं। लेकिन सबसे बड़ा प्रतीक इस पर्व का प्रेम का वह छलकता अमृत-कलश है जिसमें हमारा अंतर-जगत् ऐसे डूब जाता है कि हमें बाहर की अपनी सुधबुध का ही कोई पता नहीं रह जाता है। रंग, अबीर और पिचकारी को यू ंतो शरीर, मन और आत्मा की उपमा करने वाले भी इसे एक ओर जहां आध्यात्मिक-पर्व के रूप में देखते हैं वहीं पर सहिष्णुता, शुभता, सदभावना, प्रेम, सत्य और भाईचारे के कारण इसे मूल्यों और धर्म का एक सबसे अनोखा पर्व मानने वालों की भी कमी नहीं है। इसी तरह एकता, मैत्री, समर्पण, श्रद्धा और रंगों की परंपरा के साथ महान् सांस्कृतिक और सामाजिक पर्व के रूप में देखने वाले इसे सारी मानव जाति का मैत्री और एकता के महान् सूूत्र में बाधने वाले प्रिय पर्व को लाखों वर्षों से मनाते आ रहे हैं। एक उमंग, जीवन की तरंग और एक ही धारा-प्रेम की जिसमें स्नान करने के बाद वर्षों-वर्षों की कलुषित भावनाएं और संकीर्णताएं ऐसे गायब हो जाती हैं। जिस स्वरूप को हम इसमें अंतरमन से देखते हैं तब यह एक शुद्ध नवप्रभात का नवल विहान जैसा लगता है। और उस समय अंतर तन में बसी हुई कलुषित भावनाएं और विचार वैसे ही गायब हो जाते हैं, जैसे भगवान भास्कर के उदय होने पर आकाश के नक्षत्र और चन्द्रमा के अस्तित्व का  कुछ पता नहीं होता है।

जिन विशेषताओं के कारण हम अपनी संस्कृति को उत्सवों और पर्वों से जोड़ते हैं उनमें प्रेम, सौहार्द, भाई चारे और मैत्री जैसे तमाम मूल्यों को भी इसमें सम्मिलित करते हैं। जिस तरह से प्रेम, सौहार्द, भाई चारे और मैत्री की भावनाएं हमारे अंदर के कलेश को पूरी तरह धो डालते हैं और उसकी जगह वासंती छबीले रंग की उत्पत्ति होती है और हमारा ही नहीं हर किसी का मन, चित्त और दिल इसके रंग में सराबोर हो जाता है।   छोटे-बड़े, धनी-निर्धन, ऊंच-नीच और दूसरी तमाम गंदी भावनाएं वैसी ही खत्म ऐसे हो जाती हैं, जैसी अग्नि में होलिका जलकर खत्म हो गई थी। लेकिन आज के बाजार में होली जैसा पावन भाईचारे और संवेदनाओं को प्रेम का रंग देने वाला अद्भुत त्योहार और उत्सव भी बाजार के रंग में ऐसा रगता जारहा है कि इसकी मौलिकता,सात्विकता और मूल्य सभी खतरे में पड़ते दिखाई पड़ने लगे हैं।

होली ऋतु परिवर्तन, वातावरण परिवर्तन, उल्लास-पर्व और नये वर्ष के पुनीत आगमन का ऐसा उन्मुक्त संस्कार-उत्सव है जिसमें सब कुछ नूतन बदलाव का नवल विहान दिखाई पडता है। यज्ञ-हवन से सुगंधित दिशाएं, चारों तरफ मादकता और नवीनता का उद्वेग -जिसमें नर-नारी, बाल-बृद्ध और नये तरुण-तरुणियों का हास-परिहास का एक नया ही रूप देखने को मिलता है। अवध और भोजपुर के लोकजीवन में यह जहां फगुआ बनकर लोगों में मस्ती भर देता है वहीं पर नई फसल में पककर तैयार हुये जौ ,गेहूं और अन्य फसलों की बालियां प्रकृति के जीवन की गदराई छटा में झूमती हुई होलिका दहन के साथ नये स्वाद और सुगंध को जीवन में अमित सुरभि बिखरते हुए  मन और तन को मदकता और मस्ती से सराबोर कर देते हैं। अमराई की सुगंधि में भ्रमरों के साथ चिड़ियों और कोयल की मधुर कूक कानों में घुलकर ऋतुराज वसंत और होली की पूर्णता (पूर्णिमा के साथ पूर्ण होता हुआ) का जहां एहसास दिलाते हैं वहीं पर वैदिक परंपरा में फाल्गुन पूर्णमा के दिन यह वर्ष की पूर्णता का एक नया रंग भी बिखेरता दिखाई पडता है। और नव संस्येष्ठी के प्रारंभ का हममें नवीनता का बोध कराता जीवनधर्मी यज्ञ के लिए प्रेरित करता है। वसंत के यौवन का यह उल्लास-उत्सव जहां किसानों का नई फसल का उल्लास पर्व और उत्सव के रूप में इसकी प्रतिश्ठा है वहीं पर यह मैत्री, सदभावना और आपसी जीवनधर्मिता को प्रेम के रस

में रंगकर दृढ़ता और परिपक्वता प्रदान करने वाला ऐसा त्येाहार भी है तो हमें तृष्णा से तृप्तता की ओर ले जाता है। नफरत से प्यार की तरंग का नया विहान उदय होता है। जीवनोत्सव का ऐसा परम पावन त्योहार भारतीय मनीषा का सबसे मौलिक और अनोखा रंग है जिसे हम न जाने कितने रंगों में मचलते हुए देखते हैं।  इसलिए बदरंगी छटा -जिसमें कीचड़, पेंट और अन्य बिदू्रपताओं के कृत्यों की इसमें कहीं जगह नहीं है।

 

होली के जितने भी रंग हैं सबके अपने खास मायने, भाव-दृष्टि, रंग और संदर्भ हैं। इन संदर्भों से जुड़ी होती है हमारी अंतस की वह चेतना जो होली को एक त्योहार के रूप में नहीं बल्कि उत्सव और जीवनदर्शन के रूप में ग्रहण कर स्वयं को प्रेम की विह्वलता के शुभ संकल्प से सराबोर कर जाती है। इस तरह देखें तो होली हमारी अंतस-चेतना का एक ऐसा निश्छल और स्वच्छ जीवन-पर्व है जो हमें स्वयं में डूबने और प्रेम तथा सच को सबके सम्मुख स्वीकार करने के लिए प्रेरित करता है। जो ऊर्जा, शक्ति, सत्साहस, नेह और पवित्रता इस पर्व से हम प्राप्त करते हैं, उसे यदि वर्षभर बढ़ाते जाएं तो हमारा सारा जीवन भी वैसा ही उमंग और तरंग के रंग में डूबा उत्सव बन जाएगा जैसे होली का उत्सव। और मैं तो कविता के रूप मेंयही कहूंगा-खोल दो बंधन निलय का/ देख लो पर्दा उठाकर/ अपने हृदय के उस विजन में/ जो चाहता है प्रेम के सच्चे रंग में रंगना।

नई फसल, फल, मेवों और रसों की नूतन ऊर्जा से हम भरकर होली के इसके पुरातन और वैज्ञानिक तथा शुद्ध आध्यात्मिक व सामाजिक तथा सांस्कृतिक चेतना और महानता को समझकर यदि इस पर्व को सही मायने में उल्लास और सुख के पावन पर्व की तरह मनाये तो इसके गिरते स्वरूप को हम रांेक लेंगे। विकृति किसी भी पर्व के लिए स्वीकार नहीं है। न तो आहार-विहार के साथ, न व्यवहार-विष्वास के साथ और न तो जीवनधर्म और सृजन के साथ ही। हम होली को या अवधी-भोजपुरी के फगुआ को इसके फागुनी और होलिकत्व के गहनतम और अति सरलतम स्वरूप को यदि अपने जीवन-साहित्य के नवसृजन के साथ जोड़कर इसे मानव समाज के एक मैत्री,एकता और सदभावना के साथ जीवन की विविधता और उमंग के उत्सव के रूप देंखे तो होली का स्वरूप हमें अपने सात्विक जीवन के परिमार्जन और पारिवारिक और सामाजिक जीवन के नव विहान-पर्व के साथ सांस्कृतिक चेतना के गहनतम विश्वास और प्रेम की उमंग का नया संदर्भ ही दिखाई पड़ेगा। जहां न तो कहीं बदले की भावना का कोई स्थान होगा, न तो शराब और भांग तथा जुआ-सट्टे का कोई जगह होगी और न हीं किसी को परेशान करके उसे दुख पहुंचाने की कोई बात ही होगी। रंग-अबीर-गुलाल हो या प्रकृतिक सेमल और अन्य रंगों की प्राकृतिक उमंग ही, सभी हमारे लिए स्वीकार बनते दिख पडे़ंगे।

प्रकृति भी अपने नये अंकुरों, रंगों और उमंगों में चारों तरफ हँसमी-बिहँसती हमसे यही तो कहती है, होली के इस रंग को अपने स्वभाव, व्यवहार और विचारों से ऐसा बना दो कि कोई इसे अपने निहित स्वार्थ में बदरंग न कर सके। होली खेलें रघुबीरा अवध में होली खलें रघुबीरा। ब्रज में कृष्ण और गोपिकाएं भी प्रकृति के प्रेम और वासंती भाव में ऐसे भावविभोर हो गए कि उन्हें पता ही नहीं कि प्रेम, सदभावना और मैत्री के अलावा कुछ और भी रंग हो सकता है कि नहीं। जिन सांस्कृतिक, सामाजिक, आध्यात्मिक, राजनीतिक और धार्मिक परंपराओं और प्रवृतियों को मानव की सहजता में होली-फगुआ के इस उल्लासमय रूप को परंपरा और जीवनधर्मिता का पर्व बनाया गया, हम उसे सहजता से निभाने और आगे बढ़ाने का प्रेममय दृढ़ता प्रदान कर पाएं तो होली अपने सही स्वरूप में हमारे जीवन का एक महानतम पर्व बनकर हमें जीवन को प्रेममय बनाने की दृढता और स्थिरता देकर पूर्णता की ओर ले जाती दिखाई पडे़गी। हम इसे बाजारू-रूप रंग में न रंगकर मानवीय और आत्मिक-जीवन के सही रंग में देखने का प्रयास करें तो होली का सही स्वरूप हमारे जीवन-रंग में ढलता दिखाई पड़ेगा। होली राश्ट्रीय, सांस्कृतिक, मानवीय, सामाजिक और जीवनी-शक्ति का सबसे प्राकृतिक संदर्भ है जिसे हम अपनाकर इसके मूल्यपरक स्वरूप को अपनाकर और प्रचाारित-प्रसारित करने की जगह बना सकते हैं।

प्रकृति, प्राणी, वनस्पति और ऋतु चारों का जैसा सामंजस्य इस समय दिखता है उसी ने मानव को नवसंस्येष्ठी के रूप में उल्लास और प्रेम के उत्सव के रूप में, स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया होगा। यह उल्लास और प्रेम का उत्सव हमें इस विचार के लिए प्रेरित करता है कि नफरत, द्वेष, क्रोध, बदले की भावना, किसी प्रकार की विद्रूपता और अवांछनीय स्वभाव या व्यवहार की हमारे जीवन में कोई जगह नहीं है। सनातन काल से इस दिन घरों में यज्ञ-हवन और उल्लास का उत्सव मनाने का यही भाव रहा है जहां सभी मानसिक विद्रूपताएं, बिगलित धारणाएं और मान्यताएं तथा स्वभाव-व्यवहार हवनकुंड या होलिका में जलकर ऐसे नष्ट हो जाते हैं, जैसे होलिका में खरपरवार जल कर नष्ट हो जाते हैं और धरती मां पूरी तरह साफ-सुथरी बन जाती हैं। जीवन के जितने भी रंग हैं सभी रंगों में वासंती और प्रेम का रंग सबसे गहरा, स्थिर और शुभ माने गए हैं।

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