लेखक परिचय

परमजीत कौर कलेर

परमजीत कौर कलेर

मैं प्रोडूयसर के तौर पर 4 रीयल न्यूज में काम कर रही हूं । फीचर लिखती हूं । प्रसार भारती दिल्ली के वूमेन सैक्शन के लिए भी लिखती हूं ।आकाशवाणी पटियाला में रिकार्ड हुए प्रोग्राम वेहड़ा शगना दा, तीआं तीज दीआं विभिन्न विषयों पर फीचर लिख सकती हूं। लिखने का है शौक पंजाब के मैगजीन समुदरों पार , चढ़दीकला पटियाला, पटियाला भास्कर, माईल स्टोन मैगजीन में प्रकाशित हुए हैं फीचर

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holi1 परमजीत कौर कलेर

अगर हमारी जिन्दगी में रंग न होते तो हमारी जिन्दगी नीरस होती…रंग बिरंगे रंग ही हमारी जिन्दगी में नयापन , ताजगी , रवानगी भरते हैं …सोचिए अगर रंग न होते तो हमारी जिन्दगी कैसी होती। लाल ,पीले, हरे ,गुलाबी , नीले रंग बिरंगे रंग ही है जो हमें हंसना खेलना सिखाते हैं रंगों से  खेलता इंसान बड़ा ही खूबसूरत और प्यारा लगता है…आप सोच रहें होंगे कि हम रंगों की बातें ही क्यों किए जा रहें हैं तो बात ही कुछ ऐसी है …जी हां आज  है रंगों का त्यौहार होली ।

भारत जो विभिन्न संस्कृतियों का देश है…जिसमें बसते हैं अलग-अलग धर्मों के लोग …जिनके होते हैं अलग अलग त्यौहार और उनको मनाने का तरीका भी होता है अलग…हर मौसम अपने साथ त्यौहारों की सौगात लेकर आता है…बसंत ऋतु के दैरान भी कई त्यौहार आते हैं…सारे देश को जो रंग देते हैं अपने ही रंग में…रंगों का त्यौहार भी लेकर आता है अपने साथ खुशियों की सौगात …इस में न होती है कोई जात-पात और न ही कोई छोटा-बड़ा न ही कोई अमीर-गरीब ….लाल, पीले हरे और गुलाबी रंगों से रंगा हर कोई होता है अपना….ये त्यौहार ही ऐसा है जिसमें भुला दिए जाते हैं सभी गिले शिकवे ….आपसी बैर विरोध को खत्म करके सभी एक दूसरे पर रंग उड़ेलते हैं, पिचकारियां मारते नज़र आते हैं…प्यार, स्नेह और मुहब्बत के इस पर्व को देशभर में बड़े हर्षोल्लास और धूमधाम से मनाया जाता है…रंगों के इस पर्व पर बच्चे, बुजुर्ग और जवान सभी गलतान नज़र आते हैं…रंगों का ये पर्व फाल्गुण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है…होली का रंग मानो सभी में दोस्ती, मेल-मिलाप और आपसी भाईचारा पैदा करता है…सारे ही होली के रंग में रंगे एक जैसे लगते हैं…इसे ही तो कहते हैं आपसी भाईचारे का त्यौहार।

हर त्यौहार के पीछे कोई न कोई ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व होता है …रंगों के पर्व के पीछे भी कोई एक कथा नहीं जुड़ी इसके पीछे भी कई कहानियां जुड़ी हैं …जिसका हमारी आस्था और श्रद्धा से गहरा ताल्लुक  होता है। रंगों का ये त्यौहार भक्ति भावना से भी जुड़ा हुआ है…भक्त प्रह्लाद की भी प्रभु के प्रति अटूट आस्था थी… वो विष्णु भगवान का भक्त था… जबकि प्रह्लाद का पिता हिरण्यकश्यप खुद को भगवान समझता था…और यही नहीं उसने ईश्वर का नाम जपने पर पाबंदी लगा दी…मगर प्रह्लाद सिर्फ ईश्वर का भक्त था …उसने अपने पुत्र को कई यातनाएं दीं…जुल्म की इंतहा तो तब हो गई जब हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को मौत के आगोश में पहुंचाने की योजना बनाई…हिरण्यकश्यप की बहन होलिका  को आग में न जलने का वर मिला हुआ था कि वो कभी आग में भस्म नहीं हो सकती…हिरण्यकश्यप के आदेश पर होलिका प्रह्लाद को अग्नि में लेकर बैठ गई…मगर इस आग में होलिका तो जलकर राख हो गई…मगर प्रह्लाद का बाल भी बांका नहीं हुआ…भगवान विष्णु के प्रति भक्त प्रह्लाद की अटूट श्रद्धा थी…इस तरह से होली का पर्व बुराई पर अच्छाई के जीत का प्रतीक भी है…इस त्यौहार का प्रह्लाद की भगवान के प्रति श्रद्धा से भी गहरा ताल्लुक है….इस तरह होली का ये त्यौहार भगवान के प्रति आस्था और उस पर श्रद्धा रखने का भी त्यौहार है, तभी से इस त्योहार को बड़ी ही श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। प्रह्लाद जिसका मतलब है, आनन्द…जबकि होलिका बैर, जुल्म, अत्याचार का प्रतीक है, जो आग में हो जाती है राख। ये कहानी हमें ये संदेश भी देती हैं कि मनुष्य पर कैसी भी परिस्थतियां आए उसे परम परमेश्वर पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिए…और सही गलत का फर्क कायम रखना चाहिए…होली का ताल्लुक श्रीकृष्ण से भी है…कहा जाता है कि कंस के निर्देश पर राक्षसी पूतना ने कृष्ण को मारने की साजिश रची थी…श्रीकृष्ण को पूतना ने विषपूर्ण दूध पिलाना शुरू किया …पूतना का दूध पीने से श्रीकृष्ण को तो कुछ नहीं हुआ …मगर दूध पीते – पीते श्रीकृष्ण  ने पूतना को मार डाला…यही नहीं पूतना का शरीर भी लुप्त हो गया…जिसका लोगों ने पूतला बनाकर दहन किया और खुशियां मनाई …तब से लेकर आज तक मथुरा में होली मनाई जाती है…

होली का ये पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है…तभी तो सभी बुराईयों को जलाकर आनंद के प्रतीक इस त्यौहार को बड़े ही हर्षोल्लास के साथ देशभर में मनाया जाता है..प्रेम के इस पर्व में पूरा देश ही रंगा नज़र आता है…बुराई पर अच्छाई की जीत के त्यौहार को देश भर में अपने अपने अंदाज में मनाया जाता है।

देशभर में रंगों के त्यौहार होली की धूम है…हो भी क्यों न…आपसी भाईचारे का पर्व होली है तो हर कोई इसके रंग में रंगना चाहेगा ही…लोग रंग गुलाल एक दूसरे पर उड़ाकर खुशियों का आदान-रदान करते हैं….रंग-गुलाल से सराबोर लोगों की टोली हर ओर होली खेलने में मशगूल होती है…देश का हर कोना इस त्यौहार के रंग में रंगा नज़र आता है…वैसे तो होली देशभर में मनाई जाती है…लेकिन देश के अलग-अलग हिस्सों में मनाए जाने वाले इस उत्सव को अलग अलग राज्यों में अपने अपने  अंदाज से मनाया जाता है…अगर बात करे दक्षिण भारत की तो यहां रंगों की होली नहीं मनाई जाती…फिर भी सभी लोग मिल जुलकर होली मनाते हैं…यहां लोग शाम को इकट्ठे होते हैं गुलाल से होली खेलते हैं और बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं…आंध्र प्रदेश के बंजारा जनजातियों की होली देखने लायक होती है…जिसमें होता है अनोखे तरह का नृत्य… होली को अलग – अलग राज्यों में विभिन्न नामों से भी जाना जाता है…तामिलनाडु में होली को कमाविलास, काम दहन के नाम से भी जाना जाता है…ऐसी मान्यता है कि कामदेव के बांण के कारण ही शिव को पार्वती से प्रेम हुआ था और भगवान शिव का विवाह हुआ था…इसलिए यहां होली को प्रेम के उत्सव के रूप में मनाई जाती है …उत्तर प्रदेश के वृन्दावन और मथुरा की होली का अपना विशेष महत्व है…मथुरा में बरसाने की होली प्रसिद्ध है बरसाना श्री राधा जी का गांव है …यहां की लट्ठमार होली दुनियाभर में मशहूर है…ऐसी परम्परा है कि नन्दगांव के पुरुष बरसाने गांव में घुसने और राधा जी के मंदिर में झंडा फहराने की कोशिश करते हैं मगर महिलाएं उन्हें ऐसा करने से रोकती हैं… यहीं नहीं  वो उन्हें डंडों से पीटती भी हैं…अगर उनमें से कोई आदमी पकड़ा जाए तो उससे औरतों की तरह श्रृंगार तो करवाया ही जाता है साथ ही सबके सामने उसे नाच कर भी दिखाना पड़ता है…इसके अगले दिन बरसाने के लोग नंद गांव में जाकर महिलाओं पर रंग डालने की कोशिश करते हैं…यहां होली उत्सव तकरीबन सात दिन चलता है…बात मथुरा की हो फिर हम वृंदावन को कैसे भूल सकते हैं…बांके बिहारी मंदिर की होली और गुलाल कंद की होली को कौन भूल सकता है जो कर देती है सारे वातावरण को खुशनुमा…मान्यता है कि होली के दिन रंगों से खेलने की परम्परा को श्री राधा और श्रीकृष्ण जी ने शुरू की थी।

होली तो हर जगह मनाई जाती है लेकिन होली मनाने का ढंग हर जगह अलग-अलग होता है…बंगाल में होली को डोल यात्रा या डोल पूर्णिमा कहते हैं इस दिन राधा और कृष्ण जी की प्रतिमाओं को डोली में बिठाया जाता है और इस डोली को पूरे शहर में घुमाया जाता है….इस डोली के आगे सभी औरतें नाचती हैं…उड़ीसा में होली के मौके भगवान जगन्नाथ जी की डोली निकाली जाती है…पिंक सिटी यानि कि राजस्थान में तीन तरह की होली मनाई जाती है…माली होली,गैर होली और डोलची होली…माली होली में माली समाज के लोग आदमी औरतों पर पानी से बौछार करते हैं…वही औरतें उनकी लाठियों से पिटाई करती हैं…हरियाणा में भी रंगों की होली खेली जाती है कुछ स्थानों में तो लट्ठमार होली भी खेली जाती है जिसे दुल्हंदी भी कहते हैं…पंजाब में भी होली के रंगों का अपना खास महत्व है…आनन्दपुर में होली के औसर पर भारी मेला लगता है जिसे होल्ला मोहल्ला कहा जाता है …यहां होली को दिलेरी, बहादुरी  के त्यौहार के रूप में मनाया जाता है… दसवें गुरू गोबिन्द सिंह जी ने होली को नाम दिया था होल्ला मोहल्ला…गुरू गोबिन्द सिंह जी निर्बल और शोषित वर्ग को सबल बनाने का प्रण लिया था …कहा जाता है कि होली वाले दिन गुरू गोबिन्द सिंह जी ने मुगलों से सामना करने के लिए अपने लाडलों को युद्ध कला का प्रशिक्षण दिया था…वो नकली टोलिया बनाकर एक दूसरे पर हमला करते थे… और जीतने वाली टोली को गुरू गोबिन्द सिंह जी ईनाम से नवाजते थे…यही से होली का नाम होल्ला मोहल्ला पड़ा।  सन् 1652 में मुगल शासक औरंगजेब ने दूसरे धर्मों के लोगों पर घोड़ा रखने और अस्त्र शस्त्र पर रोक लगा रखी थी इसके फलस्वरूप गुरू साहिब ने अपनी लाड़ली फौज बनाई और उन्हें युद्ध कला में निपुण बनाया।

होली के दिन चारों और होती है खुशियां …रंगों से सराबोर लोग अपनी खुशी का इज़हार करते हैं…लोग बेहद खुश नज़र आते हैं और वे अपने आपको प्रकृति के नजदीक पाते हैं…इंसान तो इंसान सारी प्रकृति भी मानो होली मनाती नज़र आती है …चारों ओर खिले रंग-बिरंगे फूल भी सबको अपनी ओर आकर्षित करते हैं…कुदरत भी बड़ी अजीब है जिसने हमें नायाब से नायाब तोहफे दिए हैं….रंगों को देखकर दिल  चहक और महक उठता है…और हमारी आंखों को ये रंग बेहद भाते हैं…रंग बिरंगे फूलों को देखकर हमारी आंखे भी कई रंगीन सपने संजोती हैं…सारा आलम रंगों की रंगीनी  से मदहोश नज़र आता है…इन प्यारे और खूबसूरत नजारों को देखकर हमारी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता…फूलों, पत्तियों से बने ये लाल पीले हरे गुलाबी रंग न जाने कितने रंग हैं…प्रकृति के फूलों से बने ये रंग बिरंगे रंग जो किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते…इस तरह होली का प्रकृति से भी गहरा नाता है…होली के लिए कुछ लोग रासायनिक रंगों, कालिख पेंट का प्रयोग करते हैं…ऐसा हरगिज नहीं करना चाहिए… इससे त्वचा तो खराब होती ही है…आंखों को भी नुकसान पहुंचता है…वहीं इन रंगों के रंग भी जल्दी नहीं छूटते…इससे पानी की बर्बादी बहुत ज्यादा होती है…पहले क्या होता था कि लोग प्रकृति के बेहद करीब थे…और इन कुदरती रंगों से खेलते थे.जिसमें होते थे टेसू के फूल .. और न जाने कितनी ही किस्मों के फूल…इसलिए फूलों से बने रंगों से होली खेलनी चाहिए जिसका कोई नुकसान नहीं होता…यही नही होली प्रेम का पर्व है जिसे मनाने के लिए आप हल्दी, बेसन, चुकंदर और टेसू के फूलों का इस्तेमाल कर सकते हैं…कई लोग होली खेलते समय एक दूसरे पर कीचड़ तक फेंकते हैं जो कि बहुत ही बुरी बात है इससे लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचती हैं…वहीं कई बार यही लापरवाही झगड़े की वजह बन जाती है…होली को सलीके से मनाना चाहिए…बड़ों को होली के रंग लगाते हुए उनका आशीर्वाद लेना चाहिए। रंगों का पर्व हो कुछ मीठा न हो ये भी कैसे हो सकता है…इस दिन मीठे और स्वादिष्ट व्यंजन बनाए जाते हैं…उत्तर भारत में जहां लोग गुझिया का आनन्द लेते हैं वहीं पश्चिम में पूरनपोली होली के मौके पर बनाई जाती है….होली प्यार ,मुहब्बत और आपसी भाईचारे का पर्व है…इसलिए होली को मिल जुलकर मनाए …होली के रंग बिरंगे रंगों की रंगीनी आपको जीवन में रंगीनी लेकर आए …होली आपके जीवन में अपार खुशियां लेकर आएं और आप इस तरह हसते खेलते हुए हर त्यौहार मनाते रहें।

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