लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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पिछले दिनों किसी काम से रमेश के घर गया था। वह मेरा पुराना मित्र है। गया तो शाम को था; पर बातचीत और भोजन में दस बज गये। आठ बजे से जो भयानक वर्षा शुरू हुई, तो वह थमने का नाम ही नहीं ले रही थी। अतः रमेश के आग्रह पर मैं वहीं रुक गया।

उसके घर में दो कमरे हैं। एक में रमेश और मैं सोये, तो दूसरे में बाकी सब। रमेश तो थोड़ी देर में ही गहरी नींद में सो गया, जबकि मैं करवटें ही बदलता रहा। बड़ी मुश्किल से दो बजे नींद आयी। सुबह वापस लौटा, तो थकान के कारण दिन में लम्बी नींद लेनी पड़ी। मैं सोचने लगा कि जिस बिस्तर पर रमेश खर्राटे भर रहा था, वहां मैं क्यों नहीं सो सका.., और अपने घर आते ही नींद क्यों आ गयी ? तब मुझे किसी बुजुर्ग का कहा याद आया कि नींद तो अपने घर में अपने बिस्तर पर ही आती है।ghar

यों तो रमेश के यहां घर भी था और बिस्तर भी; पर वह उसका था, मेरा नहीं। असल में घर का अर्थ केवल दीवार और कमरे ही नहीं होते। उसे भवन या मकान तो कह सकते हैं; पर घर नहीं। घर तो एक सम्पूर्ण इकाई है, जिसमें माता-पिता, भाई-बहिन, पत्नी और बच्चों के साथ ही पास-पड़ोसी तक आ जाते हैं। गांव में हो, तो घर की परिधि में गाय और कुत्ते से लेकर तुलसी और नीम भी शामिल हो जाते हैं। देहरादून का मेरा एक मित्र कई साल से बरेली में है। वहां उसने मकान भी बना लिया है; पर यदि कोई पूछे, तो वह कहता है कि यहां तो उसका मकान है; घर तो देहरादून में ही है।

अर्थात घर वही है, जहां व्यक्ति की जड़ें हों। आजकल बच्चों की शिक्षा काम-धंधे के लिए लोग बड़ी संख्या में शहरों में आ रहे हैं। सरकार भी शहरीकरण पर अनावश्यक जोर दे रही है; पर ऐसे लोग किसी काॅलोनी या बहुमंजिला अपार्टमेंट में रहने के बाद कई साल तक स्थानीय माहौल से समरस नहीं हो पाते। बुजुर्गों को तो इसमें बहुत असुविधा होती है। क्योंकि घर के साथ पुरखों की यादें भी जुड़ी रहती हैं, जो नये स्थान पर जाने से छूट जाती हैं।

दिल्ली में मेरा एक मित्र सुरेश भी है। पहले वह किराये पर रहता था। गांव में मां के निधन के बाद उसने पिताजी से आग्रह किया कि वे गांव की जमीन बेचकर दिल्ली में एक मकान खरीद लें। पहले तो पिताजी तैयार नहीं हुए; पर वे भी अकेले कब तक रहते ? अतः मान गये; पर पुराने घर की यादों से वे स्वयं को अलग नहीं कर सके और दो साल में ही चल बसे। उनके साथियों का कहना है कि यदि वे गांव में रहते, तो चार-छह साल और चल जाते; पर घर बेचने से उनका मन टूट गया।

मानव हो या पशु-पक्षी, घर के साथ खुशियां भी जुड़ी हैं। शाम को घर लौटते हुए चिडि़यों का कलरव सुनें या गोधूलि वेला में जंगल से लौटती गायों की पुकार। बच्चा स्कूल से लौटते हुए घर पास आते ही खुशी से दौड़ने लगता है। छात्रावास में पढ़ते समय परीक्षा समाप्त होने के साथ ही घर जाने की खुशी भी होती थी। यद्यपि शुरू में ‘होम सिकनेस’ से पीडि़त कई छात्र हर सप्ताह घर भाग जाते हैं।

सरकारी सेवा में कार्यरत मेरे ताऊ जी पथरी के मरीज थे; पर गांव आकर वे बहुत आराम महसूस करते थे। कई बार तो उनकी छोटी पथरियां मूत्र मार्ग से निकल भी जाती थीं। यह गांव के शुद्ध पानी और हवा का असर था या घर में सबके बीच रहने की खुशी, वही जानें। कई लोग चार-छह दिन  को बाहर जाने पर बीमार हो जाते हैं। हो सकता है इसका संबंध तन की बजाय मन से अधिक हो; पर कुछ तो है ही।

पर कभी-कभी घर काटने को भी दौड़ने लगता है। पति-पत्नी के में सम्बन्ध ठीक न हों, तो ऐसा ही होता है। मेरे एक मित्र को अचानक व्यापार में बड़ा घाटा हो गया। घर जाने पर बच्चे उनकी ओर बड़ी आशा से देखते थे कि पिताजी हमारे लिए क्या लाये हैं ? अतः वे बच्चों के सो जाने के बाद काफी देर से घर आते थे। लोग किसी के घर को देखकर कहते हैं कि ये शर्मा जी या वर्मा जी का घर है। अर्थात बाहर से तो घर पुरुष के नाम से जाना जाता है; पर अंदर की साम्राज्ञी तो मां ही होती है।

घर का नाम भी उसके मालिक की पंसद का परिचय देेता है। साहित्यप्रेमी लोग कामायनी, विष्णुप्रिया, सुरभि जैसे नाम रखते हैं, तो धर्मप्रेमी लोग रामधाम, श्रीकृष्ण कृपा या शंकर विला। कुछ लोग घर को अपने माता-पिता या पुरखों का नाम देते हैं; पर कुछ को अपने नाम से ही सर्वाधिक मोह होता है। आशीर्वाद, मातृछाया, पितृऋण.. जैसे नाम भी खूब मिलते हैं।

कई घरों का नक्शा ऐसा होता है कि कौन कब आया और कब गया, यह पता ही नहीं लगता। अतः सब लोग आपस में कटे-कटे से रहते हैं। वस्तुतः घर तो ऐसा होना चाहिए, जिसमें सब लोग स्वाभाविक रूप से बार-बार मिलते रहें। दुमंजिला घरों में प्रायः बुजुर्ग ऊपर रहना पसंद करते हैं, जिससे दिन भर आने-जाने वालों की चकचक से वे बच सकें; पर यदि वे अचानक बीमार हो जाएं, तो परेशानी हो जाती है। इसलिए वे चाहते हैं कि किसी एक पौत्र-पौत्री का कमरा ऊपर भी हो।

दूरदर्शन के धारावाहिकों में कहानी कई साल तक घर के अंदर ही घूमती रहती है। महिलाएं इन्हें बड़ी रुचि से देखती हैं; पर फिल्में बाहरी दुनिया को ही अधिक दिखाती हैं। घर के बारे में बने फिल्मी गीतों में सबसे मधुर गीत है, ‘‘इक बंगला बने न्यारा, रहे कुनबा जिसमें सारा..।’’

पर आज कहां हैं ऐसे घर, जिसमें पूरा कुनबा एक साथ रह सके। इसका एक दूसरा पक्ष ये भी है कि पूरा कुनबा अब एक साथ रहना ही कहां चाहता है ? दो सगे भाई भी हों, तो दोनों के अलग काम और अलग पंसद। पैसे वालों के लिए तो सब सुलभ है; पर निर्धन या मध्यम वर्ग के लिए आज की शहरी जिंदगी में घर बनाना एक सपने से कम नहीं है।

कुछ लोगों के लिए घर छोड़ना दुख का कारण बनता है; पर अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ अपनी कविता ‘एक बूंद’ में इसे चुनौती के रूप में स्वीकार करने की बात कहते हैं।

ज्यांे निकलकर बादलों की गोद से, थी अभी इक बूंद कुछ आगे बढ़ी।
सोचने फिर-फिर यही जी में लगी, आह क्यों घर छोड़कर मैं यूं कढ़ी।
दैव मेरे भाग्य में है क्या बदा, मैं बचूंगी या मिलूंगी धूल में।
जल मरूंगी गिर अंगारे पर किसी, चू पडूंगी या कमल के फूल में।
बह गयी उस काल इक ऐसी हवा, वह समुन्दर ओर आयी अनमनी।
एक सुंदर सीप का था मुंह खुला, वह उसी में जा पड़ी मोती बनी।
लोग यूं ही हैं झिझकते सोचते, जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर।
किन्तु घर को छोड़ना अक्सर उन्हें, बूंद लौ कुछ और ही देता है कर।।

काश, गांव में हो या शहर में; पर सबके पास एक ऐसा घर जरूर हो, जहां वे शारीरिक और मानसिक ही नहीं, आत्मिक चैन भी पा सकें।

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