लेखक परिचय

फ़िरदौस ख़ान

फ़िरदौस ख़ान

फ़िरदौस ख़ान युवा पत्रकार, शायरा और कहानीकार हैं. आपने दूरदर्शन केन्द्र और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों दैनिक भास्कर, अमर उजाला और हरिभूमि में कई वर्षों तक सेवाएं दीं हैं. अनेक साप्ताहिक समाचार-पत्रों का सम्पादन भी किया है. ऑल इंडिया रेडियो, दूरदर्शन केन्द्र से समय-समय पर कार्यक्रमों का प्रसारण होता रहता है. आपने ऑल इंडिया रेडियो और न्यूज़ चैनल के लिए एंकरिंग भी की है. देश-विदेश के विभिन्न समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं के लिए लेखन भी जारी है. आपकी 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' नामक एक किताब प्रकाशित हो चुकी है, जिसे काफ़ी सराहा गया है. इसके अलावा डिस्कवरी चैनल सहित अन्य टेलीविज़न चैनलों के लिए स्क्रिप्ट लेखन भी कर रही हैं. उत्कृष्ट पत्रकारिता, कुशल संपादन और लेखन के लिए आपको कई पुरस्कारों ने नवाज़ा जा चुका है. इसके अलावा कवि सम्मेलनों और मुशायरों में भी शिरकत करती रही हैं. कई बरसों तक हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की तालीम भी ली है. आप कई भाषों में लिखती हैं. उर्दू, पंजाबी, अंग्रेज़ी और रशियन अदब (साहित्य) में ख़ास दिलचस्पी रखती हैं. फ़िलहाल एक न्यूज़ और फ़ीचर्स एजेंसी में महत्वपूर्ण पद पर कार्यरत हैं.

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हरियाणा में ऑनर किलिंग मामले में दोषियों को कड़ी सज़ा दिए जाने से खाप पंचायतों की तानाशाही पर कुछ अंकुश लगेगा, ऐसी उम्मीद की जा सकती है. इस फ़ैसले ने जहां समाज को यह संदेश दिया है कि क़ानून से ऊपर कुछ भी नहीं है, वहीं सामाजिक कुरीतियों के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे लोगों का मनोबल भी बढ़ाया है.

क़ाबिले-गौर है कि करनाल के सत्न न्यायालय ने मनोज-बबली हत्याकांड के पांच दोषियों को फांसी और एक को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई है. कोर्ट ने 25 मार्च को इस मामले में तथाकथित खाप नेता गंगा राज और बबली के पांच परिजनों को क़त्ल का कसूरवार ठहराया था. कैथल ज़िले के करोडन गांव के मनोज ने क़रीब तीन साल पहले 18 मई 2007 को बबली के घरवालों के विरोध के बावजूद उससे शादी की थी. दोनों के समान गोत्न का होने के कारण खाप पंचायत ने इस विवाह का विरोध किया और मनोज के परिवार के सामाजिक बहिष्कार का फैसला सुना दिया. शादी के बाद मनोज और बबली करनाल में जाकर रहने लगे, लेकिन अब भी उनकी मुसीबतें अब भी कम नहीं उन्हें शादी तोड़ने के लिए कहा जाने लगा. जब उन्होंने इनकार कर दिया तो उन्हें धमकियां मिलने लगीं और 15 जून 2007 को उनकी बेरहमी से ह्त्या कर दी गई थी. इनके शव बाद में 23 जून को बरवाला ब्रांच नहर से बरामद हुए थे. लगभग तीन साल तक चले इस मामले में लगभग 50 सुनवाइयां हुईं तथा इस दौरान 40 से ज्यादा गवाहों के बयान दर्ज किए गए थे.

प्राचीनकाल से ही भारत में सामाजिक, राजनीतिक व अन्य मामलों में पंचायत की अहम भूमिका रही है. पहले हर छोटे बड़े फैसले पंचायत के ज़रिये ही निपटाए जाते थे. गांवों में आज भी पंचायतों का बोलबाला है. पंचायतों दो प्रकार की होती हैं. एक लोकतांत्रिक प्रणाली द्वारा चुनी गई पंचायतें और दूसरी खाप पंचायतें. दरअसल, खाप या सर्वखाप एक सामाजिक प्रशासन की पद्धति है जो भारत के उत्तर पश्चिमी प्रदेशों यथा उत्तर भारत विशेषकर हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में प्रचलित हैं. ये पंचायतें पिछले काफी वक़्त से अपने के फैसलों को लेकर सुर्ख़ियों में रही हैं. बानगी देखिये :

20 मार्च 1994 को झज्जर जिले के नया गांव में मनोज व आशा को मौत की सजा मिली. परिजनों ने खाप पंचायतों की हरी झंडी मिलने के बाद दोनों प्रेमियों को मौत की नींद सुला दिया.

वर्ष 1999 में भिवानी के देशराज व निर्मला को पंचायत के ठेकेदारों को ठेंगा दिखाकर प्रेम-प्रसंग जारी रखने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी. दोनों की पत्थर मारकर हत्या कर दी गई.

वर्ष 2000 में झज्जर जिले के जोणधी गांव में हुई पंचायत ने आशीष व दर्शना को भाई-बहन का रिश्ता कायम करने का फरमान सुनाया, जबकि उनका एक अब्च्चा भी था.

वर्ष 2003 में जींद जिले के रामगढ़ गांव में दलित युवती मीनाक्षी ने सिख समुदाय के लड़के से प्रेम विवाह कर लिया. चूंकि कदम लड़की ने बढ़ाया था, लिहाजा उसे पंचायती लोगों ने मौत की सजा सुना दी. साहसी प्रेमी जोड़े ने कोर्ट की शरण लेकर विवाह तो कर लिया, लेकिन उन्हें दूसरे राज्य में जाकर गुमनामी की जिंदगी गुजारनी पड़ी.

वर्ष 2005 के दौरान झज्जर जिले के आसंडा गांव में रामपाल व सोनिया को भी पति-पत्नी से भाई-बहन बनने का फरमान सुना दिया. राठी व दहिया गोत्र के बीच अटका यह मामला भी लंबा खिंचा. आखिर रामपाल को अदालत की शरण लेनी पड़ी। करीब पौने तीन साल की अदालती लड़ाई के बाद रामपाल की जीत हुई, लेकिन खाप पंचायतों का खौफ उन्हें आज भी है.

करनाल जिले के बल्ला गांव में भी 9 मई 2008 को एक प्रेमी जोड़े को पंचायत के ठेकेदारों की शह पर मौत के घात उतार दिया गया. जस्सा व सुनीता भी एक ही गोत्र से थे. दोनों ने पंचायत की परवाह न करते हुए शादी कर ली, मगर कुछ समय बाद ही दोनों की बेरहमी से हत्या कर दी गई.

अप्रैल 2009 के दौरान कैथल जिले के करोड़ गांव में विवाह रचाने वाले मनोज व बबली को मौत की नींद सुला दिया गया. दोनों एक ही गोत्र के थे. उन्हें बुरा अंजाम भुगतने की धमकी दी गई थी, लेकिन इसकी परवाह न करते हुए उन्होंने विवाह कर लिया था. बाद में दोनों को बस से उतारकर मार दिया गया.

हिसार जिले के मतलौडा गांव में मेहर और सुमन की प्रेम न करने की चेतावनी दी गई. कई दिनों तक लुका-छिपी चलती रही, लेकिन आखिर में उन्हें भी मौत की नींद सुला दिया गया.

नारनौल जिले के गांव बेगपुर में गोत्र विवाद के चलते युवक के परिवार का हुक्का-पानी बंद कर दिया गया. बाद में पंचायत ने फैसला सुनाया कि नवदंपत्ति को सदैव के लिए गांव छोड़ना होगा. आखिर विजय अपनी पत्नी रानी को लेकर हमेशा के लिए गांव से चला गया.

जुलाई 2009 के दौरान जींद जिले के गांव सिंहवाल में अपनी पत्नी को लेने पहुंचे वेदपाल की कोर्ट के वारंट अफसर व पुलिस की मौजूदगी में पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। मट्टौर निवासी वेदपाल पर पंचायत ने आरोप लगाया था कि उसने गोत्र के खिलाफ जाकर सोनिया से शादी की है.

झज्जर जिले के सिवाना गांव में भी अगस्त 2009 में गांव के ही युवक-युवती का प्रेम-प्रसंग पंचायत को बुरा लगा. एक दिन दोनों के शव पेड़ पर लटकते मिले.

रोहतक जिले के खेड़ी गांव में शादी के साल बाद सतीश व कविता को भाई-बहन बनने का फरमान सुना दिया गया. पति-पत्नी को अलग कर दिया गया और युवक के पिता आजाद सिंह के मुंह में जूता ठूंसा गया था. इनका एक बच्चा भी है. इस मुद्दे पर हाईकोर्ट ने स्वयं संज्ञान लेते हुए सरकार को नोटिस जारी किया था. अदालत ने 11 फरवरी को उन पंचायतियों के नाम मांगे हैं, जिन्होंने यह फतवा जारी किया था. इस संबंध में कविता ने एसपी अनिल राव को शिकायत भी दर्ज करा दी थी. पुलिस ने विभिन्न धाराओं के तहत मामला भी दर्ज कर लिया है. हालांकि पुलिस ने अभी तक आरोपियों के नाम उजागर नहीं किए हैं. हालांकि पांच फरवरी को बेरवाल-बैनीवाल खाप की सांझा पंचायत के बाद सतीश-कविता का रिश्ता बहाल कर दिया था. जूता मुंह में दिए जाने की भी निंदा की गई थी. इस पंचायत ने भी कविता के गांव खेड़ी में प्रवेश पर रोक लगाई है. इस पंचायत ने कविता द्वारा पुलिस को की गई शिकायत वापस लेने के भी कहा था. दोनों पक्षों ने बेरवाल-बैनीवाल खाप पंचायत के फैसले को स्वीकार करने की घोषणा कर दी थी. इसके बावजूद हाईकोर्ट के दखल के कारण इस मुद्दे पर अभी असंमजस की स्थिति बनी हुई है. इस माले में पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस मुकुल मुदगल व जस्टिस जसबीर सिंह की खंडपीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा था-‘खाप पंचायतों को इस तरह का कोई अधिकार नहीं है कि वे किसी दंपती को भाई-बहन बना दें और जो उसके आदेश का पालन न करे, उसे मौत के घाट उतार दें। यह एक सामाजिक बुराई है। इन खाप पंचायतों को समानांतर न्याय पालिका चलाने की अनुमति नहीं दी जा सकती.‘

वैसे खाप पंचायतों द्वारा दिए गए निर्णयों के खिलाफ हाईकोर्ट की खंडपीठ का रूख सदा ही कड़ा रहा है. इस मामले में पहले भी हाईकोर्ट हरियाणा सरकार से यह पूछ चुका है कि वह कानून के खिलाफ काम करने वाली व तुगलकी फरमान जारी करने वाली खाप पंचायतों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं कर रही. हाईकोर्ट ने कहा था कि इन पंचायतों द्वारा इस तरह के आदेश जारी करना गैर कानूनी है. इस तरह के आदेश कंगारू ला की तरह हैं और उनको रोकना जरूरी है. यह अफगानिस्तान नही है, यह भारत है। यहां पर तालिबान कोर्ट को मान्यता नहीं दी जा सकती. चीफ जस्टिस ने यह बात उस वकील को कही थी जिसने कोर्ट में एक जवाब फाइल कर खाप पंचायतों के कदम व उनकी कार्रवाई को सही ठहराया था.

काबिले गौर है की इस तरह के मुद्दे हमेशा से ही सरकार के लिए भी परेशानी का सबब बने हैं, क्योंकि वोट बैंक के चलते सियासी दल इन मामलों से दूर ही रहते हैं. राज्य में करीब 22 फीसदी जाट वोट बैंक है. यही वजह कि राज्य सरकार किसी की भी हो खाप पंचायतों के आगे घुटने टेकती है. यही वजह है कि मौत तक के फरमान जारी हुए और उन पर अमल हुआ. पुलिस को गवाह तक ढूंढना मुश्किल होता है. ऊपर से सियासी दबाव अलग काम करता है. इसलिए खाप पंचायतों की तानाशाही के सामने प्रशासन भी बेबस नज़र आता है.

हरियाणा में इन पंचायतों का इतना खौफ है कि पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में परिजनों से जान का खतरा बताने वाले प्रेमी जोड़ों की याचिकाओं की तादाद दिनोदिन बढ़ रही है. पिछले साल 3739 याचिकाएं हाईकोर्ट में आईं और इस साल अभी 28 याचिकाएं आ चुकी हैं, जिनमें अपने परिजनों से ही जान का खतरा बताते हुए सुरक्षा की गुहार लगाई गई है. इया मामले में अदालत ने आगामी 4 मार्च को प्रदेश के महाधिवक्ता को तलब किया है.

खाप पंचायतों के फैसले से आहत हुए सतीश और कविता का कहना है कि शादी के तीन साल बाद उन्हें भाई-बहन बनने के लिए कहा जा रहा है. मेरे ससुर के मुंह में जूता डाला जाता है, बेटे रौनक के ‘दादा’ को ‘नाना’ बनने के लिए कहा जाता है. खाप पंचायतों के फरमानों का खामियाजा भुगतने वाले झज्जर के आसंडा निवासी रामपाल व सोनिया का कहना है कि वक्त के साथ पंचायतों को बदलना होगा. पंचायत ने हम दोनों को शादी के बाद भाई-बहन बनने का फरमान जारी कर दिया था. खाप पंचायतों के प्रतिनिधि परंपराओं के नाम पर खुद के अहं को ऊपर रखते हैं.

उधर, खाप पंचायतों के प्रतिनिधि के भी खुद को सही बताते हुए अनेक तर्क देते हैं. उनका कहना है कि हिन्दू मेरिज एक्ट में संशोधन होना चाहिए और एक गोत्र तथा एक गांव में शादी को कानून अनुमति नहीं मिलनी चाहिए. सर्व खाप महम चौबीसी के प्रधान रणधीर सिंह कहते हैं हिन्दू मेरिज एक्ट में खासकर उत्तर हरियाणा की परंपराओं का कोई उल्लेख नहीं है. उन्हें प्रेम करने वालों से ऐतराज नहीं है, लेकिन जहां भाई-बहन का रिश्ता माना जाता है वहां पति-पत्नी का संबंध जोड़ना उचित नहीं है. इसलिए इससे बचा जाना चाहिए. अलग-अलग गांवों के युवा शादी करते हैं तो उन्हें दिक्कत नहीं है. उन्होंने कहा कि सतीश और कविता के मामले में खाप पंचायत ने नरमी दिखाई है.

गौरतलब है कि गैर सरकारी संगठन लायर फार ह्यूमन राइट इंटरनेशनल ने हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल कर खाप पंचायतों द्वारा गैर कानूनी व तानाशाही आदेश जारी करने के खिलाफ कार्रवाई करने व इन खाप पंचायतों पर रोक लगाने की मांग की है. साथ ही याचिका में कहा गया है कि सिंगवाल नरवाना में खाप पंचायत द्वारा मारे गए युवक वेदपाल के मामले की जांच के लिए वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी की अगुवाई में एक एसआईटी बनाई जाए जो हाईकोर्ट की निगरानी में काम करे. इस मामले की सुनवाई के लिए एक स्पेशल कोर्ट भी बनाई जाए जो इस मामले में शामिल लोगों को जल्दी सजा दे सके.

बहरहाल, खाप पंचायतों की तानाशाही फ़रमानों से परेशान प्रेमी जोड़ों को आस बंधी है कि वो ख़ुशी-ख़ुशी अपनी जिंदगी बसर कर सकते हैं. जो प्रेमी युगल गोत्र विवाद के चलते अपनी जान गंवा चुके हैं, उनके लिए इंसाफ़ के लिए भटक रहे परिजनों को भी इस फ़ैसले से राहत ज़रूर महसूस हुई होगी.

-फ़िरदौस ख़ान

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