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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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clip_image002न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। यह कहावत प्रदेश के लाखों वंशकारों की आजीविका पर आये संकट का हाल बंया करती है। बांस पर निर्भर रहने वाले इन बांस कारीगरों के लिये बांस वनों में न कोई जगह है और न ही राज्य सरकार की कार्ययोजना में। राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत गठित होने वाली ज्यादातर जिला स्तरीय समितियां कागजों में है और उनका क्रियान्वयन न के बराबर दिखाई पड़ता है। राज्य विकास के नाम पर जहां प्रदेश सरकार बड़ी कंपनियों को आसानी से संसाधन मुहैया करा रही है वहीं बांस से जुड़े वंशकारों की आजीविका के मामले में कोई ठोस पहल नहीं की गई है। लिहाजा बांस से अन्योन्याश्रित होने के कारण वंशकार कहलाने वाले प्रदेश के अनुसूचित जाति के लोगों की हालत दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है।

उमरिया..

वन विभाग द्वारा प्रतिदिन बिक्री किये जाने वाले बांस व्यापार के आंकड़ों पर नजर डाली जाये तो पता चलता है कि यहां से प्रतिदिन सैकड़ों टन बांस फैक्ट्रियों के लिये निर्यात किया जाता है। वहीं दूसरी तरफ परम्परागत रूप से बांस के बर्तन व अन्य सामग्री बनाकर जीवन-यापन करने वाले बसोर (वंशकार) परिवारों को बांस नहीं मिलने के कारण उनके सामने रोजी रोटी का संकट बढ़ता जा रहा है। सोचनीय पहलू यह है कि गृह उद्योग व बांसशिल्प कला को लेकर सरकारी व गैर सरकारी प्रयास तो किये जा रहे हैं लेकिन इसके लिए बांस के रूप में कच्चे माल की उपलब्धता को लेकर कोई जमीनी योजना दिखाई नहीं पड़ती। यह लंबे समय से जटिल बने हुए वन कानूनों और वनाधिकारियों की अदूरदर्शिता का ही नतीजा है कि बांस वनों पर निर्भर रहने वाला वर्ग विशेष जहां पहले स्वयं बांस की कटाई-छंटाई कर उसका सुधार और संरक्षण करते हुए अपनी रोजी रोटी चलाता था वहीं अब प्रदेश में बांस के बिगड़े वनों के सुधार के नाम पर करोड़ों रूपये खर्च किये जा रहे हैं। ज्ञात हो कि म.प्र. के सीधी, उमरिया, बैतूल, व छिंदवाड़ा जैसे जिलों में बांस के वन लगातार बिगड़ते जा रहे हैं जिसके कारण भूमि क्षरण परियोजना तथा बिगड़े बांस वनों के सुधार के कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। प्रदेश में वन विकास एवं प्रबंधन में स्थानीय लोगों के भागीदारी की बात तो की जा रही है लेकिन संयुक्त वन प्रबंधन समितियों में ही देखा जाये तो बसोर समुदाय का प्रतिनिधित्व न के बराबर है। एैसे में वन एवं वनोत्पादों से संबंधित धंधों से जुड़े समुदायों के सवालों को सुलझाये बिना इसका औचित्य एकतरफा जान पड़ता है।

गौरतलब है कि अनुसूचित जाति के अंतर्गत आने वाले वंशकारों की आजीविका पूर्णत: बांस पर निर्भर रही है। इसलिए उनके पास कृषि भूमि न के बराबर है और अब कच्चे माल की बढ़ रही दरों और उसके अनुपलब्धता को देखते हुए वंशकारों के सामने पारंपरिक धंधा बंदकर रोजगार की तलाश में पलायन की स्थिति बन रही है। आजीविका संकट से जूझने वालों में उमरिया नगर के खलेसर में रह रहे बसोर समुदाय के परिवार भी हैं जो पुश्तों से बांस के बर्तन बना और बेचकर अपनी आजीविका चलाते रहे हैं। इनमें से एक मुन्ना बसोर का कहना है कि शायद अब हमें कोई और धंधा करना होगा। अपने इलाज के लिए आर्थिक सहायता की गुहार लगाता मुन्ना बताता है कि अधिकांशत: बांस से बनने वाले सामग्रियों में देशी जंगली और हरे बांस की जरूरत होती है जो कि बड़ी मुश्किल से 30 से 40 रूपये प्रति नग की दर से मिलती है। मुन्ना की तरह ही यहां रहने वाले दूसरे वंशकारों को भी बांस के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में भटकना पड़ता है। बांस खोजने, उसे लाने, उसकी छिलाई, बिनाई और रंगाई करने से लेकर हाट-बाजार में प्लास्टिक व लोहे की बढ़ती मांग के बावजूद बेच पाने में वंशकारों को काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है। इतना सब करने के बावजूद यदि बांस से होने वाली कमाई देखी जाये तो वह महज 30 रूपये रोजी से अधिक नहीं होती है।

हरे बांस होने के कारण कटाई के बावजूद बांस की पहुंच वन विकास निगम के डिपो तक नहीं होती है जिससे वंशकारों के लिए कच्चा माल नहीं मिल पाता है। वहीं परिवहन और लोडिंग अनलोडिंग में होने वाले खर्चों को देखते हुए हरे बांस के भण्डारण की व्यवस्था बांस वनों के नजदीक ही कर दी जाती है और वहां से उसे सूख जाने के बाद ही बिक्री के लिये जाया जाता है। सच तो यह है कि सूखे बांस का व्यापार वन विकास निगम और सरकार के लिए मुनाफे का सौदा है लेकिन हरे बांस की बढ़ती अनुपलब्धता और वंशकारों की आजीविका पर लगातार बढ़ता संकट क्या सरकार की चिंता में है?

-रामकुमार विद्यार्थी

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