लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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nuclear energyशैलेन्द्र चौहान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति ओलांद की मुलाकात में भारत में 6 परमाणु सयंत्र शुरू करने के लिए समझौता हुआ है। भारत ने परमाणु ऊर्जा को लेकर फ्रांस के साथ अहम करार किए है। इस करार के तहत महाराष्ट्र के जैतापुर में फ्रांस के सहयोग से एनपीसीआईएल 6 न्यूक्लियर प्लांट लगाएगी जिसका इस्तेमाल बिजली बनाने में होगा। जैतापुर परमाणु ऊर्जा परियोजना भारत के महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले में प्रस्तावित एक परमाणु ऊर्जा परियोजना है। 9900 मेगावाट क्षमता का यह संयंत्र न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड द्वारा निर्मित किया जाएगा। दूसरी तरफ  इस परियोजना का विरोध करने वाली एक मात्र राजनीतिक दल शिवसेना ने जल्द ही नए सिरे से विरोध प्रदर्शन करने की घोषणा की है। शिवसेना को उस क्षेत्र के मछुआरों के विस्थापन की चिंता है। कोंकण बचाओ समिति और रायगढ़ जिला जागरूक मंच सहित कई एनजीओ जैतापुर परियोजना के खिलाफ पहले से ही आवाज उठा रहे हैं। उन्होंने गांव वालों को एकजुट करने की मुहिम भी चला रखी है। मुख्य तौर पर वे सुरक्षा संबंधी मुद्दे उठा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कुडानकुलम परमाणु संयंत्र चालू होने के बाद इससे निकलने वाले कचरे के निस्तारण के बारे में सरकार से जानकारी मांगी थी। शीर्ष अदालत ने कुडानकुलम की सुरक्षा के साथ ही स्वास्थ्य एवं पर्यावरण को भी महत्वपूर्ण बताया है। केंद्र और संयंत्र संचालक भारतीय परमाणु ऊर्जा निगम [एनपीसीएल] से पूछा है कि वे कैसे परमाणु कचरे को संयंत्र से बाहर ले जाएंगे और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना इसका सुरक्षित जगह पर लंबे समय तक भंडारण करेंगे। इस काम से लोगों की सेहत पर क्या असर पड़ेगा। इन सभी शंकाओं के तकनीकी जवाब संभव हैं लेकिन मुख्य बात यह है कि क्या परमाणु उर्जा एक निरापद और सस्ता उत्पाद है ?

परमाणु ऊर्जा के समर्थकों का तर्क है कि परमाणु ऊर्जा एक संपोषणीय ऊर्जा स्रोत है जो विदेशी तेल पर निर्भरता को कम करते हुए कार्बन उत्सर्जन को कम करता है और ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ाता है. समर्थकों का दावा है कि परमाणु ऊर्जा, जीवाश्म ईंधन के प्रमुख व्यवहार्य विकल्प के विपरीत, वास्तव में कोई पारंपरिक वायु प्रदूषण नहीं फैलाती है, जैसे ग्रीन हाउस गैस और कला धुंआ. समर्थकों का यह भी मानना है कि परमाणु ऊर्जा ही अधिकांश पश्चिमी देशों के लिए ऊर्जा में निर्भरता प्राप्त करने का एकमात्र व्यवहार्य रास्ता है. समर्थकों का दावा है कि कचरे के भंडारण का जोखिम छोटा है और जिसे नए रिएक्टरों में नवीनतम प्रौद्योगिकी के उपयोग द्वारा आगे कम किया जा सकता है, और पश्चिमी विश्व में अन्य प्रकार के प्रमुख ऊर्जा संयंत्रों की तुलना में, परिचालन सुरक्षा इतिहास उत्कृष्ट रहा है.

विरोधियों का मानना है कि परमाणु ऊर्जा लोगों और पर्यावरण के लिए खतरा उत्पन्न करती है.. इन खतरों में शामिल है रेडियोधर्मी परमाणु अपशिष्ट के प्रसंस्करण, परिवहन और भंडारण की समस्या, परमाणु हथियार प्रसार और आतंकवाद और साथ ही साथ यूरेनियम खनन से होने वाले स्वास्थ्य खतरे और पर्यावरण नुकसान. उनका यह भी तर्क है कि रिएक्टर खुद अत्यधिक जटिल मशीनें हैं जहां बहुत सी बातें गलत हो सकती हैं या कर सकती हैं, और विगत समय में कई गंभीर परमाणु दुर्घटनाएं हो चुकी हैं. जिनमें एक, अमरीका  एक रूस तथा हाल ही में एक जापान में हुई है. आलोचक इस बात पर विश्वास नहीं करते हैं कि ऊर्जा के स्रोत के रूप में परमाणु विखंडन के उपयोग के जोखिम को नई प्रौद्योगिकी के विकास के माध्यम से समायोजित किया जा सकता है. उनका यह भी तर्क है कि जब परमाणु ईंधन श्रृंखला के सभी ऊर्जा-गहन चरणों पर ध्यान दिया जाता है, यूरेनियम खनन से लेकर परमाणु कार्यमुक्ति तक, परमाणु ऊर्जा, एक निम्न-कार्बन विद्युत् स्रोत नहीं है.

सुरक्षा और अर्थशास्त्र के तर्कों का, बहस के दोनों पक्षों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है.  2005, परमाणु ऊर्जा ने विश्व की ऊर्जा का 6.3% और विश्व की कुल बिजली का 15% प्रदान किया और जिसमें फ्रांस, अमेरिका और जापान का परमाणु जनित बिजली में, एक साथ 56.5% का योगदान रहा. 2007 में, IAEA ने खबर दी कि विश्व में कुल 439 परमाणु ऊर्जा रिएक्टर काम कर रहे हैं, जो 31 देशों में संचालित हैं.

संयुक्त राज्य अमेरिका सबसे अधिक परमाणु ऊर्जा का उत्पादन करता है, जिसके तहत वह विद्युत् की अपनी खपत का 19% परमाणु ऊर्जा से प्राप्त करता है, जबकि फ्रांस परमाणु रिएक्टरों से अपनी खपत की विद्युत ऊर्जा के सबसे उच्च प्रतिशत का उत्पादन करता है – यथा 2006 80%. यूरोपीय संघ में समग्र रूप, परमाणु ऊर्जा बिजली का 30% प्रदान करती है. यूरोपीय संघ के देशों के बीच परमाणु ऊर्जा नीति भिन्न है, और कुछ देशों, जैसे ऑस्ट्रिया, एस्टोनिया और आयरलैंड, में कोई सक्रिय परमाणु ऊर्जा केंद्र नहीं है. इसकी तुलना में, फ्रांस में इनके ढेरों संयंत्र हैं, जिसमें से 16 बहु-इकाई केंद्र, वर्तमान में उपयोग में हैं. परमाणु ऊर्जा उत्पादन के लिए ढेरों नए डिज़ाइन सक्रिय अनुसंधान के अधीन हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से चतुर्थ पीढ़ी रिएक्टर कहा जाता है, और भविष्य में व्यावहारिक ऊर्जा उत्पादन के लिए इनका इस्तेमाल किया जा सकता है. इनमें से कई नए डिज़ाइन, विखंडन रिएक्टरों को विशेष रूप से स्वच्छ, सुरक्षित और/या एक परमाणु हथियारों के प्रसार के खतरे को कम करने का प्रयास करते हैं.

परमाणु बिजली उद्योग ने यह भ्रम फैलाने का प्रयास किया है कि चेरनोबिल व फुकुशिमा अपवाद हैं तथा परमाणु संयंत्रों में गंभीर दुर्घटना की संभावना बहुत कम है। यह भ्रामक प्रचार है. मेल्टडाऊन के साथ अन्य गंभीर दुर्घटनाओं को जोड़कर देखा जाए तो ऐसी काफी दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। इन दुर्घटनाओं का आकलन किसी देश या दुनिया के स्तर पर रिएक्टर वर्ष के आधार पर किया जाता है। रिएक्टर वर्ष का अर्थ है कि जितने परमाणु वर्ष हैं उसे उनकी कार्य अवधि के वर्षों से गुणा कर दिया जाए। जाने माने वैज्ञानिक एम.वी. रमना ने हाल में अनुमान प्रस्तुत किया कि 1400 रियक्टर वर्ष में एक गंभीर दुर्घटना की संभावना है। इसका अर्थ यह हुआ कि 437 रिएक्टरों वाले हमारे विश्व में लगभग तीन वर्षों में एक गंभीर दुर्घटना की संभावना है। छोटी दुर्घटनाएं तो कहीं अधिक होती हैं और ये भी कई लोगों के लिए काफी दर्दनाक हो सकती हैं।

हाल में फुकुशिमा में हुई दुर्घटना के समय देखा गया कि एक देश में होने वाली ऐसी दुर्घटना से नजदीक के अन्य देशों में भी दहशत फैल सकती है। उच्च कोटि की तकनीक उपलब्ध होने पर भी इन दुर्घटनाओं को रोक पाने या नियंत्रित कर पाने की कोई गारंटी नहीं है। इनके दुष्परिणाम बहुत दीर्घकालीन होते हैं व कुछ परिणाम जैसे बच्चों के जन्म के समय उपस्थित होने वाली विकृतियां तो बहुत दर्दनाक होती हैं।

इसके अतिरिक्त यूरेनियम के खनन से लेकर परमाणु ऊर्जा के उत्पादन की प्रक्रिया से जनित अवशेष पदार्थों को ठिकाने लगाने की लगभग सभी प्रक्रियाएं तरह-तरह के जोखिमों से भरी हुई हैं। खतरनाक अवशेष पदार्थों के बारे में संतोषजनक समाधान तो अभी किसी के पास नहीं है।

विभिन्न खतरों के बारे में परमाणु बिजली उद्योग का कहना है कि तरह-तरह की नई तकनीकों और सुधारों से सुरक्षा व्यवस्था को बेहतर किया जा रहा है। पर परमाणु संयंत्रों से जुड़ी दुर्घटनाओं की संभावना कुछ ऐसी है कि इन सुधारों से भी संतोषजनक समाधान अभी नहीं मिल रहा है। फिर यह बताना भी जरूरी है कि जैसे-जैसे सुरक्षा उपायों का खर्च बढ़ता है वैसे-वैसे परमाणु बिजली अधिक महंगी होती जाती है। जहां एक समय परमाणु ऊर्जा को अपेक्षाकृत सस्ते विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया था वहीं आज यह एक  महंगा स्रोत बन चुका है। जैतापुर में लगने वाले रिएक्टर की पूंजी लागत (capital cost) 5000 डालर प्रति किलोवाट आंकी जा रही है जबकि कोयले आधारित तापघर की लागत 1000 डालर प्रति किलोवाट होती है।

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