लेखक परिचय

विनायक शर्मा

विनायक शर्मा

संपादक, साप्ताहिक " अमर ज्वाला " परिचय : लेखन का शौक बचपन से ही था. बचपन से ही बहुत से समाचार पत्रों और पाक्षिक और मासिक पत्रिकाओं में लेख व कवितायेँ आदि प्रकाशित होते रहते थे. दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षा के दौरान युववाणी और दूरदर्शन आदि के विभिन्न कार्यक्रमों और परिचर्चाओं में भाग लेने व बहुत कुछ सीखने का सुअवसर प्राप्त हुआ. विगत पांच वर्षों से पत्रकारिता और लेखन कार्यों के अतिरिक्त राष्ट्रीय स्तर के अनेक सामाजिक संगठनों में पदभार संभाल रहे हैं. वर्तमान में मंडी, हिमाचल प्रदेश से प्रकाशित होने वाले एक साप्ताहिक समाचार पत्र में संपादक का कार्यभार. ३० नवम्बर २०११ को हुए हिमाचल में रेणुका और नालागढ़ के उपचुनाव के नतीजों का स्पष्ट पूर्वानुमान १ दिसंबर को अपने सम्पादकीय में करने वाले हिमाचल के अकेले पत्रकार.

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प्रथम भाग

हिमाचल में

कैसे बनेगी तीसरे राजनीतिक विकल्प की सम्भावना

देव भूमि हिमाचल प्रदेश की विधानसभा का कार्यकाल यूँ तो १३ जनवरी २०१३ को समाप्त होने जा रहा है व इसके साथ ही नई विधानसभा के लिए चुनाव भी निश्चित ही हैं. सूत्रों की मानें तो यह चुनाव इस वर्ष अक्टूबर या नवम्बर माह में संपन्न करवाए जा सकते हैं. प्रदेश के दोनों बड़े दलों, भाजपा व कांग्रेस में चल रही अंतर्कलह व आन्तरिक सर-फुट्टवल के मध्य तीसरे राजनीतिक विपल्प के रूप में तीसरे मोर्चे या गठबंधन के उदय की प्रबल सम्भावना राजनीतिक हलकों में व्यक्त की जा रही हैं.

हिमाचल में १९७७ तक कांग्रेस के एकछत्र शासन के कई मोर्चों पर विफल रहने के फलस्वरूप ही पहले जनतापार्टी और बाद में भाजपा को प्रदेश की जनता ने कांग्रेस के विपल्प के रूप में सत्ता के सिंहासन पर बैठाया था. प्रदेश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए सर्वप्रथम यह प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में प्रदेश की जनता भाजपा और कांग्रेस से निजात पाना चाहती है ? यदि हाँ, तो क्या प्रदेश में इस दोनों दलों के अतिरिक्त ऐसा कोई तीसरा बड़ा दल या सशक्त और विश्वसनीय गठबंधन है जो जनाकांक्षाओं पर खरा उतरे सके ? भाजपा व कांग्रेस के असफल होने की स्थिति में तीसरे राजनीतिक विकल्प के अस्तित्व में आने की सम्भावना पर चर्चा करने से पूर्व जरा देश के पहले और दूसरे मोर्चे के ईतिहास पर भी नजर दौड़ते चलें. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही केंद्र व प्रदेशों पर शासन करनेवाली कांग्रेस की गलत नीतियों और विफलताओं के चलते जनता में बढते विरोद्ध के कारण ७० के दशक तक आते-आते अमेरिका और ब्रिटेन की भांति भारत में भी दो-दलीय राजनीतिक व्यवस्था की सम्भावना तलाशते हुए, कांग्रेस के विकल्प के रूप में प्रदेशों के साथ-साथ केंद्र में भी दूसरे विकल्प की सम्भावना तलाशी जाने लगी थी जो न केवल कांग्रेस को टक्कर दे सके बल्कि एक सशक्त विकल्प के रूप में शासन-सत्ता संभाल कर विकास और उन्नति की बयार का लाभ समान रूप से सभी देशवासियों तक पहुंचा सके. परन्तु राष्ट्रीय स्तर पर किसी सशक्त दल के नहीं होने के कारण ही समान विचारधारा वाले दलों का गठबंधन या दलों का विलय कर एक नए दल के बनाये जाने की सम्भावना तलाश की जाने लगी. यूँ तो ६० के दशक में उत्तरप्रदेश में संयुक्त विधायक दल के नाम से कई दलों का गठबंधन बना कर दूसरे राजनीतिक विकल्प का प्रयोग तो अवश्य किया गया, परन्तु संविद की सरकार अधिक दिनों तक चल नहीं पाई थी. ७० के दशक में कांग्रेस के प्रति बढते विरोद्ध के उस दौर में ही जेपी आन्दोलन, इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित करनेवाला इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय और देश में आपातकाल की घोषणा आदि के चलते देश की राजनीतिक घटनाक्रम ने कुछ इस कदर पल्टा खाया जिसने देश के राजनीतिक परिदृश्य का वर्तमान व भविष्य ही बदल कर रख दिया. आपातकाल के दौरान ही जेलों में जनतापार्टी नाम के राजनीतिक दल को जन्म देने का विचार पैदा हुआ और १९७७ में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के सपनों को साकार करने के लिए भारतीय जनसंघ, कांग्रेस ( ओ ), सोशलिस्ट पार्टी व लोकदल आदि चार बड़े दलों का विलय कर जनतापार्टी का गठन हुआ. जनतापार्टी ने १९७७ को संपन्न हुए लोकसभा के चुनावों में अप्रत्याशित रूप से २९५ सीटों पर विजय प्राप्त कर २४ मार्च १९७७ को मोरारजीभाई देसाई के प्रधानमंत्रित्व में पहली बार केंद्र में गैरकांग्रेसी सरकार ने लोकतान्त्रिक परिवर्तन के तहत सत्ता का अधिग्रहण किया. विचारधारा व नेताओं के अहम् के टकराव व पूर्व जनसंघ के सदस्यों पर दोहरी सदस्यता के नाम पर जुलाई १९७९ में जनतापार्टी के विघटन के साथ ही केंद्र में मोरारजीभाई देसाई के प्रधानमंत्रित्व में बनी जनता पार्टी की सरकार भी २८ जुलाई १९७९ को धराशाही हो गई. समाजवादियों द्वारा उठाये गए दोहरी सदस्यता के प्रश्न पर जनतापार्टी से निकाले गए पूर्व भारतीय जनसंघ के सदस्यों ने भारतीय जनता पार्टी के नाम से एक नया दल बना देश के समक्ष स्वयं को कांग्रेस के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया. दूसरी ओर हिमाचल में शांता कुमार के मुख्यमंत्रित्व वाली अंतरद्वन्द्ध में उलझी विभिन्न विचारधाराओं के ५३ विधायकों वाली जनतापार्टी की सरकार का भी १४ फरवरी १९८० को पतन हो गया. इस सब उथल-पुथल के मध्य देश व अन्य राज्यों की तरह हिमाचल में भी भारतीय जनता पार्टी के रूप में कांग्रेस के स्थापित एकाधिकार में सेंध लगाते हुए राष्ट्रीय स्तर का एक सशक्त दल विकल्प के रूप में जनता के समक्ष खड़ा हो गया. देश की राजनीति में चल रहे संक्रमण काल व गठबंधन के दौर में भाजपा ने जिस तेजी से विकल्प के रूप में कांग्रेस का स्थान अधिग्रहण करने का काम किया उसी तेजी से उसने कांग्रेस को खोखला कर रहीं सत्ता की तमाम बिमारियों व बुराइयों को भी विरासत के रूप में अपनाने व अपने आचरण में समाहित करने में तनिक भी गुरेज नहीं किया. इन्हीं सब कारणों के परिणामस्वरूप ही आज भाजपा को कांग्रेस से अधिक अंतर्द्वंद्ध और अंतर्कलह से भी झूझना पड़ रहा है. हिमाचल की भारतीय जनता पार्टी के लिए यह विडम्बना ही कहा जायेगा कि विपक्षियों के साथ-साथ स्वदलियों द्वारा वंशवाद-परिवारवाद व भ्रष्टाचार के साथ ही चरम सीमा की गुटबाजी और अनुशासनहीनता आदि सत्ता की तमाम बुराइयों व बीमारियों के आरोप लगाये जा रहे हैं जिसके कारण ही जनता ने कांग्रेस से निजात पाने के लिए एक सशक्त विकल्प के रूप में भाजपा को सत्ता तक पहुँचाया था.

राजीव गांधी की हत्या के बाद से ही केंद्र में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने पर भाजपा ने कांग्रेस विरोद्धी कुछ दलों के साथ एक साँझा कार्यक्रम के आधार पर चुनाव पूर्व समझौता कर एनडीए का गठन किया और केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व में सरकार चलाई. २००४ के आम चुनावों के बाद कांग्रेस के नेतृत्व में भी इसी प्रकार से यूपीए का गठन किया गया जो केंद्र में लगातार अपनी दूसरी सरकार का कार्यकाल पूरा कर रही है. एनडीए और यूपीए की तर्ज पर केंद्र में तीसरे विकल्प की चर्चा यदा-कदा चल पड़ती है. कांग्रेस और भाजपा की कार्यप्रणाली में कोई विशेष अंतर न पाकर या यूँ कहा जाये कि इन दोनों दलों से निराश होकर ही देश के साथ-साथ हिमाचल में भी तीसरे राजनीतिक विकल्प की सम्भावना को प्रबुद्ध चिंतकों की चर्चाओं में स्थान मिलना स्वाभाविक ही है.

हिमाचल प्रदेश में तीसरे राजनीतिक विकल्प की सम्भावना की चर्चा करने से पूर्व प्रदेश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में यह आवश्यकता किस प्रकार से मूर्तरूप ले सकती है इस सम्भावना पर निष्पक्ष रूप से चर्चा करना आवश्यक है. निष्पक्ष व इमानदारी से यदि आंकलन किया जाये तो वर्तमान में ऐसी कोई सम्भावना दूर-दूर तक नजर नहीं आती जिसके चलते कोई भी दल या गठबंधन तीसरा विकल्प बन कर उभर सके. हाँ, इतना तो स्पष्ट है कि यदि भाजपा और कांग्रेस जैसे बड़े और राष्ट्रीयदल अपनी कार्यप्रणाली को सुधारते हुए जनआकांक्षाओं और अपेक्षाओं पर सही नहीं उतरेंगे तो कांग्रेस के विकल्प के रूप में भाजपा को मान्यता देनेवाली जनता-जनार्धन अन्तोगत्वा भविष्य में बिना किसी संशय के इन दोनों दलों को दरकिनार करते हुए किसी तीसरे सक्षम दल, मोर्चे या गठबंधन के हाथ सत्ता की चाबी देने में तनिक भी गुरेज नहीं करेगी. कुछ प्रदेशों में राष्ट्रीयदलों को नकारते हुए क्षेत्रीय या प्रादेशिक दलों या उनके गठबंधन का बढता जनाधार और सत्ता पर काबिज होना इस बात का प्रमाण है और उत्तरप्रदेश इसका ज्वलंत उदाहरण.

 

क्रमशः

(शेष अगले अंक में )

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भाग २

पिछले अंक से आगे

हिमाचल में

कैसे बनेगी तीसरे राजनीतिक विकल्प की सम्भावना

आज हिमाचल में तीसरे राजनीतिक विकल्प की तलाश अवश्य ही प्रबुद्ध मतदाताओं को चिंतन पर मजबूर करती होगी कि क्या भाजपा और कांग्रेस पार्टी जनआकांक्षाओं की कसौटी पर पूर्ण रूप से विफल हो गए है ? या फिर इस सम्भावना की तलाश के पीछे कहीं इन बड़े दलों के बागियों व शिमला महापौर के पद पर विजय पताका फहरानेवाली मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी का अति आत्मविश्वासी होना तो नहीं है ? तीसरे विकल्प की आवश्यकता के लिए उठ रही आवाज को समझने के लिए इसकी सम्भावना और इसको मूर्तरूप देने के लिए कुछ आवश्यक तत्वों पर भी चिंतन करना आवश्यक है.

हिमाचल प्रदेश में तीसरे विकल्प के उद्गम की सम्भावना व्यक्त करने वालों को प्रदेश के निकट भविष्य में होने वाले विधानसभा के चुनावों में तीसरे मोर्चे के नाम से खड़े हो रहे दलों की पृष्ठभूमि, प्रदेश की जनता और राजनीति में इन दलों और इनके नेताओं का प्रभाव, पिछले चुनावों में इन दलों द्वारा प्राप्त किये गए मतों की संख्या और प्रतिशत के साथ-साथ आनेवाले चुनावों में प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में गठबंधन के रूप में उनके पक्ष में प्राप्त होने वाले संभावित मतों के पूर्वानुमान पर एक नजर दौड़ानी होगी. शिमला के महापौर और उप-महापौर के पद के लिए माकपा के उम्मीदवारों की हाल में हुई अप्रत्याशित विजय के बाद से ही हिमाचल में तीसरे मोर्चे या गठबंधन के उदय की सम्भावना व्यक्त की जा रही है. परन्तु हमें यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि शिमला के स्थानीय निकाय के चुनावों में कांग्रेस की अंतर्कलह और भीतरघात व महापौर व उपमहापौर पद पर प्रत्याशियों के गलत चयन के कारण ही २५ पार्षदों के चुनावों में जहाँ भाजपा, कांग्रेस व माकपा ने क्रमशः १८८४८, १७६२४ और १०२९७ मत प्राप्त किये थे वहीँ महापौर व उप-महापौर के चुनाव में माकपा ने २१९०३ व २११९५ मत प्राप्त कर अपनी जीत सुनिश्चित की थी. भाजपा और कांग्रेस के महापौर व उप-महापौर पद के प्रत्याशियों को इस दौड़ में दूसरे व तीसरे नंबर पर ही संतोष करना पड़ा था. २५ पार्षदों के चुनाव में कुल १८८४८ मत हासिल करनेवाली भाजपा को महापौर व उप-महापौर पद के लिए क्रमशः १४०३५ व १६४१८ मत ही प्राप्त हुए जबकि कांग्रेस को जहाँ २५ पार्षदों के चुनाव में कुल १७६२४ मत मिले वहीँ महापौर व उप-महापौर के चुनावों में क्रमशः १३२७८ व १३२०५ मतों पर ही संतोष करना पड़ा था. कांग्रेस को केवल १० वार्डों में समेटते हुए भाजपा ने जहाँ एक ओर १२ वार्डों में पहली बार अपनी विजय पताका फहराने में सफलता प्राप्त की थी वहीँ महापौर व उप-महापौर पद के प्रत्याशियों के चयन में अपने पुराने व कर्मठ कार्यकर्ताओं की अनदेखी करते हुए नए व्यक्तियों को इन पदों के लिए प्रत्याशी बनाने पर कार्यकर्ताओं के असंतोष के कारण ही उसको इन पदों पर पराजय का मुहँ देखना पड़ा था. चूँकि भाजपा व वामदलों का केडर वोट किसी भी सूरत में एक दूसरे के पक्ष को नहीं जाता है इस लिए कोई अन्य विकल्प नहीं होने के कारण भाजपा का रुष्ट वोट कांग्रेस के पक्ष में डाला गया. कमोवेश कुछ ऐसी ही परिस्थिति से कांग्रेस पार्टी भी झूझ रही थी सो कांग्रेस पार्टी में वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे मुख्यमंत्री पद के दावेदारों ने पराजय का ठीकरा एक दूसरे के सर फोड़ने के लिए कांग्रेस के प्रत्याशी को हराने के लिए अपने समर्थकों के मत बड़ी संख्या में माकपा के पक्ष में स्थानांतरित करवा दिए ऐसी प्रबल सम्भावना दिखाई देती है. अन्यथा इसके अतिरिक्त और कोई कारण हो ही नहीं सकता जिसके चलते मात्र तीन वार्डों में विजय प्राप्त करनेवाली माकपा की महापौर व उप-महापौर पद पर अप्रत्याशित विजय सुनिश्चित हुई थी. २५ वार्डों वाले शिमला के स्थानीय निकाय के चुनावों में मात्र ३ वार्डों पर जीत हासिल करनेवाली माकपा की महापौर व उप-महापौर पद पर, भाजपा और कांग्रेस की अंतर्कलह व भीतरघात के चलते, हुई विजय को किस दृष्टि से तीसरे मोर्चे के आगास का नाम दिया जा रहा है यह समझ से परे है.

सत्ता व संगठन में अनदेखी के कारण भाजपा को त्याग कर हिमाचल लोकहित पार्टी बनानेवाले भाजपा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष व पूर्व सांसद महेश्वर सिंह अब वामदलों व भाजपा के रुष्ट कार्यकर्ताओं के सहारे प्रदेश के आगामी विधानसभा के चुनावी अखाड़े में तीसरे विकल्प के रूप में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करवाने को आतुर नजर आ रहे हैं. अपने लक्ष्य में वह कितने सफल हो पाएंगे यह तो भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है, परन्तु यदि निष्पक्ष आंकलन किया जाये तो यह स्पष्ट है कि इस बनाये जा रहे साँझा मोर्चे के लिए अभी शिमला दूर है.

राजनितिक विश्लेषकों की नजर में महेश्वरसिंह का अपने गृह जिले कुल्लू में अवश्य ही एक बड़ा जनाधार है परन्तु भाजपा के बड़े नेता के रूप में उनको वह स्थान कभी प्राप्त नहीं हुआ जो स्थान शांता कुमार, प्रो० धूमल या डा० राजन सुशांत का है. शांता कुमार की पिछले दिनों नाराजगी के चलते शायद महेश्वरसिंह को यह आशा रही होगी कि यदा-कदा रोष-बाण दागनेवाले शांताकुमार भी सत्ता व संगठन में अनदेखी से दुखी होकर भाजपा से नाता तोड़ते हुए हिलोपा में शामिल हो जायेंगे, परन्तु ऐसा हुआ नहीं. दूसरी ओर भले ही कांगड़ा-चंबा के निलंबित भाजपा सांसद राजन सुशांत के बागी और धूमल विरोधी तेवरों को देखते हुए उनके हिलोपा में शामिल होने की सम्भावना से कांगड़ा-चंबा जिलों में भाजपा के कमजोर होने व हिलोपा को मजबूती मिलने की आशा लगती हो, परन्तु पहली बार सांसद बने राजन सुशांत भाजपा से स्वयं त्यागपत्र देकर अपना राजनीतिक भविष्य इतनी जल्दी धूमिल करना कतई नहीं चाहेंगे. इसलिए वह जल्दबाजी में कोई भी आत्मघाती कदम उठाने से अवश्य ही परहेज करेंगे. वैसे भी पार्टी से स्वयं अलग होकर राजन सुशांत का जिला कांगड़ा-चंबा के १७ विधानसभा क्षेत्रों के साथ-साथ प्रदेश के अन्य भागों में कितना प्रभाव रहता है यह भी परखने का विषय है. प्रभाव से मेरा तात्पर्य जीतने की सम्भावना व भाजपा को हरवाने की क्षमता दोनों से है.

अब बड़ा प्रश्न यह उठता है की महेश्वर सिंह की हिलोपा व वाम दलों को मिला कर बनाये जा रहे हिमाचल लोक मोर्चा आनेवाले प्रदेश विधानसभा के चुनावों में अपनी शानदार उपस्थिति दर्ज करवाने व बननेवाली नयी सरकार के निर्माण में अपना कितना अहम सहयोग दे सकता है ? प्रश्न का उत्तर तलाशने के लिए यदि प्रदेश की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में वाम दलों व महेश्वरसिंह की हिलोपा के नेतृत्व में बनाये जा रहे हिमाचल लोक मोर्चा को मिलनेवाले कुल मतों का अनुमान लगाया जाये तो कोई आशातीत सफलता मिलती दिखलाई नहीं देती. इसके पीछे मुख्य कारण यह दिखाई देता है कि प्रदेश के चुनावी दंगल में हिमाचल लोकहित पार्टी पहली बार उतरने जा रही है और यह चुनाव उसके लिए एक अंधेरी सुरंग से अधिक कुछ नहीं है. वैसे भी कांग्रेस व भाजपा बहुल समर्थकों वाले हिमाचल प्रदेश में गृह जिले कुल्लू से बाहर इस तथाकथित तीसरे मोर्चे के पक्ष में कोई विशेष कामयाबी मिलती दिखाई भी नहीं देती.

क्रमशः

(शेष अगले अंक में )

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अंतिम भाग

हिमाचल में

कैसे बनेगी तीसरे राजनीतिक विकल्प की सम्भावना

अब दूसरी ओर नवनिर्मित हिमाचल लोकमोर्चा के घटक वामदलों के पिछले कुछ वर्षों के रिपोर्टकार्ड पर यदि नजर डालें तो वामदलों को १९९० व १९९३ में अवश्य ही विधानसभा की एक-एक सीट पर कामयाबी मिली थी, परन्तु यह भी सत्य है कि प्रदेश के विधानसभा के चुनावों में किसी भी परिस्थिति में वह कभी भी कुल मतदान का २ या 3 प्रतिशत से अधिक मत हासिल नहीं कर पाए. यदि लोकसभा के चुनावों की बात करें तो प्रदेश के चारों निर्वाचन क्षेत्रों में जहाँ २००४ के चुनावों में वामदलों का कोई भी प्रत्याशी मैदान में नहीं था वहीँ २००९ के चुनावों में केवल मंडी लोकसभा चुनाव क्षेत्र से माकपा ने अपना प्रत्याशी चुनाव में उतारा था जो ११,१२,५२४ मतदाताओं वाले मंडी चुनावक्षेत्र में मात्र २०,६६४ मत ही प्राप्त कर सका था. भाजपा व कांग्रेस समर्थकों के मध्य बंटे हिमाचल प्रदेश में नवनिर्मित तथाकथित तीसरे विकल्प को जहाँ अपनी निर्णायक भूमिका व दमदार उपस्थिति दर्ज करवाने के लिए कुल मतदान का कम से कम २० से ३० प्रतिशत मत हासिल करना अनिवार्य होगा वहीँ भाजपा के मिशन रिपीट को डिफीट में बदलने के लिए कम से कम ८ से १२ प्रतिशत मत प्राप्त करने आवश्यक होंगे. यहाँ यह ध्यान देने का विषय है कि तीसरे विकल्प के रूप में उभरने को आतुर हिमाचल लोक मोर्चा द्वारा कम से कम ८ से १२ प्रतिशत मत लेने की स्थित में भी एक ओर जहाँ भाजपा को भारी क्षति होगी वहीँ परोक्ष रूप से इसका लाभ कांग्रेस को ही मिलेगा, वह भी उस परिस्थिति में जब कांग्रेस में भीतरघात के चलते मतों का स्थानान्तरण न हो जैसा कि शिमला महापौर व उप-महापौर के चुनावों में हुआ था. प्रदेश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए अभी तक तो यही लगता है कि यह तथाकथित तीसरा विकल्प बहुत जोर लगाकर भी २ से ४ विधानसभा क्षेत्रों से अधिक पर अपनी विजय सुनिश्चित नहीं कर पायेगा. लेकिन वहीँ दूसरी ओर भाजपा के प्रत्याशियों के लिए मुसीबत का सबब तो बन ही सकता है. “ना खेलेंगे और ना ही खेलने देंगे” वाली कहावत को प्रदेश की वर्तमान राजनीति में नकारा नहीं जा सकता.

यह पूर्वानुमान वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए तथ्यों व अनुभव पर आधारित है. प्रदेश के हाल में ही संपन्न हुए दो उपचुनावों के नतीजों पर प्रकाशित मेरा स्पष्ट पूर्वानुमान “हो सकती है सीटों की अदला-बदली” भी अक्षरशः सही साबित हुआ था. इसी प्रकार पड़ोसी राज्य पंजाब सहित पांच राज्यों के अभी हाल ही में संपन्न हुए चुनावों पर भी मेरा पूर्वानुमान अक्षरशः सही साबित हुआ था. पंजाब के विषय में मैंने लिखा था कि “मनप्रीतसिंह बादल और वामदलों को मिला कर बनाया गया तथाकथित तीसरा मोर्चा पंजाब के चुनावों में बेअसर साबित होगा. मनप्रीत और कांग्रेस मिलकर भी शिरोमणी अकालीदल-भाजपा गठबंधन को पुनः सत्ता में आने से रोक सकेगी, ऐसी लेशमात्र भी सम्भावना नहीं है और अकाली-भाजपा गठबंधन ही पंजाब में पुनः सरकार बनाने में सफल होगा.” मेरा पूर्वानुमान सही निकला और आज पंजाब में अकाली-भाजपा गठबंधन की सरकार चल रही है. हिमाचल में चुनावी रणभेरी बजने में अभी कुछ समय शेष है और यह तर्क दिया जा सकता है कि चुनावों तक परिणामों पर प्रभाव डालनेवाले सियासी घटनाक्रम में बहुत से बदलाव आ सकते हैं. इस तर्क पर मैं भी पूर्णरूप से सहमत हूँ. अभी तक के घटनाक्रम से तो यही निष्कर्ष निकलता है कि लगभग पंजाब जैसी परिस्थिति का निर्माण हिमाचल में भी हो रहा है.

हिमाचल में तीसरे विकल्प की सम्भावना पर सुश्री मायावती की बहुजन समाज पार्टी की चर्चा भी न करना न्यायसंगत नहीं होगा क्यूंकि पिछले चुनावों में प्रदेश के कई नामचीन नेताओं ने बसपा के हाथी पर सवार हो विधानसभा में प्रवेश करने का विफल प्रयास किया था. उत्तरप्रदेश में दबंगई से शासन करनेवाली बसपा की हिमाचल की राजनीति में कुम्भकर्णी नींद केवल चुनावों के समय ही खुलती है. हिमाचल में कमजोर संगठन होने के कारण ही चुनावों में वह अपना कोई विशेष प्रभाव दिखाने में असफल रहती है. हिमाचल प्रदेश विधानसभा के २००३ व २००७ के चुनावों में बसपा के क्रमशः २३ और ६७ सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसके प्रत्याशियों ने २००३ में कुल मतदान का २.०२ प्रतिशत और २००७ में ७.३७ प्रतिशत मत प्राप्त करते हुए केवल २००७ में ही मात्र कांगड़ा चुनाव क्षेत्र में सफलता मिली थी. जातिय समीकरण की सम्भावना की दृष्टि से बहुजन समाज पार्टी महेश्वरसिंह के लोक मोर्चे में सम्मिलित होकर इसे और शक्ति प्रदान करतेहुए सशक्त तीसरे विकल्प का स्वरूप देने में अवश्य ही अपना अहम् किरदार निभा सकती है, परन्तु चुनावों में समय कम रहने के कारण अब यह भी संभव नहीं लगता.

हिमाचल लोक मोर्चा के लिए प्रदेश में तीसरे राजनीतिक विकल्प का स्थान प्राप्त करने के लिए अब मात्र एक ही संभावना बचती है जिसे प्रदेश के राजनीतिक धुरंधर स्वीकारने में अवश्य ही असहजता का अनुभव करेंगे. महेश्वरसिंह की भांति ही यदि कांग्रेसपार्टी का कोई ताकतवर असंतुष्ट नेता या गुट, संगठन में लगातार हो रही अनदेखी के कारण कांग्रेस को तिलांजली देकर अपने समर्थकों के साथ अपनी अलग पार्टी बना हिलोपा से गठबंधन कर लेता है तो ऐसी परिस्थिति में भाजपा व कांग्रेस की बिछाई सारी चुनावी बिसात ही पलट जायेगी और इस स्थिति में बनने वाले गठबंधन को सत्ता में आने से कोई भी ताकत नहीं रोक सकेगी. दिखने में यह कठिन तो अवश्य ही लगता है परन्तु राजनीति में सब कुछ संभव है. मराठा नेता शरदपवार, उडीसा के बीजू पटनायक और बंगाल की ममताबनर्जी आदि कांग्रेस त्यागने के पश्चात् अपना दल बना अपने निजी जनाधार के बलबूते पर ही अपने-अपने प्रदेशों में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करवाने में सफल रहे हैं. विश्वसनीय सूत्रों की मानें तो अंतर्कलह से जूझती कांग्रेस में ऐसी ही कुछ सुगबुगाहट चल भी रही है जिससे इस आशंका को बल मिलता है. ऐसी परिस्थिति में जहाँ एक ओर भाजपा व कांग्रेस की चुनावी रणनीति को एक बड़ा झटका लगेगा वहीँ मतों में होनेवाले बड़े पैमाने के बिखराव के चलते संभव है कि चुनाव के नतीजे अप्रत्याशित व चौकानेवाले हों. इस बदली हुई परिस्थिति में हो सकता है कि इस तीसरे मोर्चे को स्पष्ट बहुमत न मिल सके, परन्तु यह तो निश्चित है कि ऐसी परिस्थिति पैदा करने में यह मोर्चा अवश्य ही सक्षम होगा जिसके चलते कांग्रेस या भाजपा को मजबूरी में इस तीसरे मोर्चे की सरकार को समर्थन देना पड़े.

कांग्रेस में विघटन न होने की दशा में, प्रदेश के अभी तक के राजनीतिक परिदृश्य का निष्पक्ष आंकलन तो यही कहता है कि भाजपा के पूर्वअध्यक्ष महेश्वरसिंह की हिमाचल लोकहित पार्टी के नेतृत्व में बना हिमाचल लोक मोर्चा अपनी सम्मानजनक उपस्थिति केवल उसी परिस्थिति में दर्ज करवा सकता है यदि कांग्रेस की जारी अंतर्कलह के चलते भीतरघात होने की दशा में कांग्रेस का रुष्ट वोट हिमाचल लोकमोर्चे को मिले न कि भाजपा को स्थानांतरित हो. देखने में आ रहा है कि कांग्रेस की वर्तमान अंतर्कलह जहाँ एक ओर कार्यकर्ताओं का मनोबल गिराने का कार्य कर रही है वहीँ प्रदेश के आम मतदातों के मन में भी कांग्रेस के प्रति उदासीनता की भावना पैदा कर रही है. यदि यही सब चलता रहा तो ऐसे में असमंजस में पड़े प्रदेश के प्रबुद्ध मतदाताओं के सामने भी दूसरे या तीसरे मोर्चे की अपेक्षा पहले मोर्चे यानि सत्तारूढ़ भाजपा के पक्ष में ही मजबूरी में मतदान करने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं रहेगा. इसे यूँ भी समझा जा सकता है कि कमजोर तथाकथित तीसरे मोर्चे और कांग्रेस की अंतर्कलह व भीतरघात की सम्भावना के चलते भाजपा की विजय की सम्भावना अधिक बनती है.

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