लेखक परिचय

डॉ नीलम महेन्द्रा

डॉ नीलम महेन्द्रा

समाज में घटित होने वाली घटनाएँ मुझे लिखने के लिए प्रेरित करती हैं।भारतीय समाज में उसकी संस्कृति के प्रति खोते आकर्षण को पुनः स्थापित करने में अपना योगदान देना चाहती हूँ।

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dowryदुनिया के मानचित्र पर एक देश भारत जिसका एक गौरवशाली इतिहास रहा है और विकास के रथ पर सवार एक स्वर्णिम भविष्य की आस है । 18/6/16 को हमारी तीन बेटियों अवनी चतुर्वेदी, भावना कन्थ और मोहना सिंह ने भारतीय वायुसेना में फाइटर प्लेन उड़ाने वाली पहली महिला पायलट बनकर इतिहास रचा। इतिहास तो हमारी बेटियों ने पहले भी बहुत रचे हैं –चाहे वो आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों से लोहा लेकर अमर होने वाली रानी लक्ष्मीबाई हो या फिर अपनी जान पर खेल कर प्लेन में सवार सभी यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकालने वाली एयर होस्टेस नीरजा भनोट हो। आधुनिक युग की कल्पना चावला हो या भारत की पहली महिला आई पी एस किरण बेदी हो, दो बच्चों की माँ वर्ल्ड बाक्सिंग चैंपियन मैरी काँम हो या कोर्पोरेट जगत की सफल हस्ती इंद्रा नूयी अथवा चन्दा कोचर हो सभी ने विश्व में भारत का नाम ऊँचा ही किया है।
ये हँसती खेलती, मेहनत से आगे बढ़ती, पूरे परिवार का सुख दुख अपने आँचल में समेटती अपने अपने क्षेत्र में शीर्ष पर पहुंचतीं हमारी बेटीयाँ। तस्वीर का यह पहलू कितना सुखद है और आप सब भी इसे देखकर गर्व महसूस करते होंगे लेकिन हम सभी जानते हैं कि यह हमारे भारत की अधूरी तस्वीर है अगर हम तस्वीर को पूरा करने की कोशिश करेंगे तो यह बदरंग हो जाएगी। उन बेटियों के आँसुओं से इसके रंग बिखर जाँएगे जिन्हें इनकी तरह खिलने का मौका नहीं दिया गया और असमय ही कुचल दिया गया –चाहे जन्म लेने से पहले माँ की कोख में या शादी के बाद दहेज की आग में। तो क्या तस्वीर के बिगड़ जाने के डर से इसे अधूरा ही रहने दें और कबूतर की तरह आँखें मूँद कर बैठे रहें या फिर कूचा उठाकर कुछ इस प्रकार से तस्वीर पूरी करें कि वहाँ केवल हँसती मुस्कुराती आँखें हों न कि सवाल पूछती आँखें।
अब तक तो आप समझ ही गए होंगे कि बात हमारी उन बेटियों की हो रही है जिन्हें दहेज की आग ने जिंदा जला दिया। हर रोज अखबार में ससुराल वालों की प्रताड़ना के आगे हार मानती बेटियों की कहानियाँ होती हैं। क्या आप जानते हैं कि वर्ष 2014 में 20,000 से ज्यादा शादी शुदा महिलाओं ने आत्महत्या की है? एक रिसर्च में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि विदेशों में शादी शुदा लोगों में आत्महत्या का प्रतिशत कम पाया जाता है वहाँ शादी महिलाओं को भावनात्मक सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा प्रदान करती है जबकि भारत में शादी शुदा महिलाएँ आत्महत्या अधिक करती हैं क्योंकि यहाँ शादी दहेज रूपी दानव से संघर्ष की शुरुआत होती है और अधिकतर मामलों में इस दानव की ही विजय होती है।
2014 की ही बात करें तो इस वर्ष 5650 किसानों ने आत्महत्या की थी जो कि दहेज हत्या /आत्महत्या के अनुपात में चार गुना कम होने के बावजूद अखबारों की सुर्खियाँ बनी लेकिन हमारी बेटियों की चीखें किसी अखबार /अधिकारी /नेता को सुनाई नहीं दीं ! क्या हमारा समाज इसे स्वीकार कर चुका है या फिर हम हर घटना को वोट बैंक और राजनीति के तराजू में तौलने के आदी हो चुके हैं। चूँकि हमारी बेटियाँ वोट बैंक नहीं हैं तो यह मुद्दा भी नहीं है। उन्हें जीवन भर सहना चुप रहना और एडजस्ट करना सिखाया जाता है इस हद तक कि वे एक दिन चुपचाप मौत से भी एडजस्ट कर लेती हैं और हम देखते रह जाते हैं।
अगर आंकड़ों की बात करें तो हर तीन मिनट में स्त्रियों के विरुद्ध एक अपराध होता है इसमें घरेलू हिंसा 55% है। 2001 से 2005 के बीच कन्या भ्रूण हत्या के 6 लाख 92 हजार मामले प्रकाश में आए। देश में होने वाली आत्महत्याओं का 66% विवाहितों द्वारा की गई।विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व भर में होने वाली आत्महत्याओं का 10% अकेले भारत में होती हैं। स्त्रियों की समाज में दशा का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि विश्व के किए जाने वाले कुल श्रम (घण्टों में) का 67% स्त्रियों के हिस्से में जाता है जबकि आमदनी में उनका हिस्सा केवल 10% है। स्त्रियों को पुरुषों से औसतन 20-40% कम वेतन दिया जाता है। कितनी विडम्बना है कि एक तरफ हमारी संस्कृति हमें सिखाती है “यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:” और दूसरी तरफ यथार्थ के धरातल पर स्त्रियों की यह दयनीय दशा। टेकनोलोजी के रथ पर सवार होकर डिजिटल इंडिया का लक्ष्य हासिल करने का सपना देश की आधी आबादी की इस दशा के साथ क्या हम हासिल कर पाएंगे? दहेज की आग में झुलसती हमारी बेटियों की चीखें विकास के सुरों को बेसुरा नहीं करेंगी?
हम कहते हैं कि स्त्री घर की नींव होती है वह चाहे तो घर को स्वर्ग बना दे । हम सबको धरती पर ही स्वर्ग देने वाली इस स्त्री को स्वर्ग देने की जिम्मेदारी किसकी है?
हम लोग लड़कियों को शिक्षित करते हैं उन्हें शादी के बाद ससुराल में एडजस्ट करना सिखाते हैं लेकिन आज समय की मांग है कि ससुराल वालों को भी शिक्षित किया जाए कि वे बहु को अपने परिवार के सदस्य के रूप में स्वीकार करें न कि अपने स्वार्थ पूर्ति का साधन।
हालांकि सरकार ने दहेज प्रथा रोकने के लिए कड़े कानून बनाए हैं — क्रिमिनल एमेन्डमेन्ट एक्ट की धारा 498 के तहत एक विवाहित स्त्री पर उसके पति /रिश्तेदार द्वारा किया गया अत्याचार/ क्रूरता
दण्डनीय अपराध है और शादी के सात साल के भीतर स्त्री की मृत्यु किसी भी परिस्थिति में ससुराल वालों को कटघड़े में खड़ा करती है। बावजूद इसके आज तक हमारा समाज ऐसे विरोधाभासों से भरी परिस्थिति का सामना कर रहा है जहाँ एक तरफ कानून की धज्जियां उड़ाते हुए महिलाओं को दहेज रूपी दानव की बली चढ़ाया जा रहा है और दूसरी तरफ कुछ मामले ऐसे भी हैं जहां दहेज ऐक्ट का दुरुपयोग इस हद तक हो रहा है कि इसे कहा जाने लगा है” लीगल टेरेरिज्म ” ।
जहाँ मुस्लिम और ईसाई समाज में विवाह एक समझौता होता है वहीं हिन्दू धर्म में विवाह एक संस्कार है किन्तु दुर्भाग्य की बात है कि आज इस संस्कार का दुरुपयोग महिलाओं के शोषण के लिए हो रहा है।
अगर हम दहेज शब्द के मूल को समझें तो इसका संस्कृत में समानांतर शब्द है –“दायज “अर्थात् उपहार या दान । दहेज वस्तुतः कन्या पक्ष की ओर से स्वेच्छा एवं संतोष से अपनी पुत्री के विवाह के समय उसे दिए जाने वाले उपहार या भेंट को कहते हैं। लेकिन समय के साथ इसका कुत्सित रूप उभर कर आने लगा है।टी ओ आई की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार एक 28 साल की महिला सरिता(परिवर्तित नाम) को चेन्नई के के एम सी अस्पताल में 90% जली हुई स्थिति में भर्ती कराया गया उसका दोष एक नहीं था कई थे जिसकी उसे सज़ा दी गई थी –सर्वप्रथम तो वह लड़की थी,वह भी साधारण सी दिखने वाली , कालेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद माँ की इच्छानुसार उनके ढूंढे वर से शादी कर ली।पिताजी का देहांत तो बचपन में ही हो गया था सोचती थी कि बचपन की कमियाँ सपनों के राजकुमार का साथ पाकर भूल जाऊंगी और बुढ़ापे में माँ का सहारा बनूँगी । लेकिन सपने तो सपने ही होते हैं हकीकत से कोसों दूर ! शादी के बाद से ही लगातार सास ससुर व पति दहेज की मांग करने लगे तानों से शुरू होने वाली बात हाथापाई तक पहुँच गई, बात बात पर पति व सास से मार खाना दिन चर्या का हिस्सा बन चुका था। यह सब माँ को बताती भी कैसे? कहाँ तो वह माँ का सहारा बनने का सोच रही थी और कहाँ उसका सपनों का राजकुमार उसे फिर से माँ पर बोझ बना रहा था। विधवा माँ ने कैसे उसे पढ़ाया और उसकी शादी की वह सब जानती थी उसकी शादी के कारण माँ पर चढ़े कर्ज़
के बोझ से वह अनजान नहीं थी भले ही माँ ने उसे नहीं जताया पर वह सब जानती थी। उसने पति को अपनी परेशानी बताने की बहुत कोशिश की लेकिन वो कुछ समझना ही नहीं चाहता था।जैसे तैसे दिन निकल रहे थे लेकिन हद तब हो गई जब उसने एक बेटी को जन्म दिया अपने घर में बेटी का पैदा होना वह बरदाश्त नहीं कर पाया और एक दिन जब वह सो रही थी तो उसके पति ने उसके बिस्तर पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी पुलिस ने मौके से मिट्टी के तेल में भीगा अधजला गद्दा बरामद कर लिया है।जब तक सरिता की माँ कुछ समझ पाती उसकी बेटी इस दुनिया से जा चुकी थी। हमारे देश में एसी कितनी ही सरिता हैं जिनकी बली थमने का नाम नहीं ले रही और कितनी ही सरिताएँ इन यातनाओं के आगे हार मानकर स्वयं अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेती हैं लेकिन इनकी आत्महत्या पलायन नहीं प्रतिशोध होता है –जी हाँ चौंकिए मत , यह व्यक्तिगत सामाजिक आर्थिक कारणों से आहत होकर उठाया गया कदम होता है जब वह खुलकर प्रतिशोध नहीं ले पाती तो ऐसे ले लेती है। दरअसल दुशमन से लड़ना आसान होता है लेकिन अपनों से मुश्किल संस्कार एवं सामाजिक परिवेश परिवार से टक्कर लेने नहीं देते लेकिन दूसरी तरफ अपने प्रति दुर्व्यवहार सहना भी मुश्किल होता है लाचारी में प्रतिशोध का यही उपाय सूझता है कि मर जाऊंगी तो इन्हें कानून से सजा भी मिलेगी और समाज में बदनामी भी होगी। लेकिन विडम्बना तो देखिए ऐसी अनेकों सरिताओं के पति न सिर्फ कानून से बचने में सफल हो जाते हैं अपितु दूसरा विवाह भी कर लेते हैं।
तो यह काम कानून से तो होगा नहीं समाज में जागरूकता पैदा करनी होगी “दुल्हन ही दहेज” है इस वाक्य को सही मायने में समाज में स्वीकृति मिलनी चाहिए। हमारे युवा समाज को बदलने की क्षमता रखते हैं अगर आज का युवा प्रण कर ले कि न वो दहेज देगा न लेगा तो आज नहीं तो कल समाज से यह कुरीति समाप्त हो सकती है। इसके लिए आवश्यक है कि युवा पढ़ा लिखा हो मेहनती हो,उसे स्वयं पर भरोसा हो अपनी जीवन संगिनी को हमसफ़र बनाए न कि सफर को आसान बनाने के लिए प्रयोग में लाया जाने वाला साधन।
किसान धरती में बीज बोता है , मौसम साथ दे और परिस्थितियाँ अनुकूल हो तो खेत फसलों से लहलहा जाते हैं और किसानों के चेहरे खिल उठते हैं उसी प्रकार हमारी बेटियाँ सुनीता विलियम बनकर आकाश की ऊंचाईयों को छूने का माद्दा रखती हैं उन्हें अनुकूल परिस्थितियां देकर उड़ने तो दो !
डाँ नीलम महेंद्र

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