लेखक परिचय

पंकज चतुर्वेदी

पंकज चतुर्वेदी

लेखक एन.डी. सेंटर फार सोशल डेवलपमेंट एंड रिसर्च के अध्यक्ष हैं।

Posted On by &filed under समाज.


पंकज चतुर्वेदी

दिल्ली हाई-कोर्ट के प्रवेश द्वार पर सात सितम्बर को हुए धमाके की गूंज जनता को तो सुनायी पड़ गयी पर जिम्मेदार शायद इस से अनजान है |इस धमाके के तार जिम्मेदारों की सभा पर हुए हमले के ,जिम्मेदार अफजल गूरू से जुड जाने के कारण ममला फिर दिल्ली से कश्मीर पहुँच गया है | मैंने अफजल को ,गुरू नहीं गूरू लिखा है और यही उसके नाम का सही उच्चारण है |मोहम्मद अफजल आतंवादियों के अतिरिक्त किसी का गुरू नहीं हो सकता यह बात और है की उस समय अफजल के साथ अभियुक्त बनाए गए एक कालेज प्रोफसर को बाद में कोर्ट से मुक्ति मिल गयी और मोहम्मद अफजल फांसी के इंतजार में है|

कथित रूप से अफजल की फांसी की फंस मिटने के लिए किये गए इन धमाकों में निश्चित ही पाकिस्तान का हाथ और दिमाग हो सकता है | लेकिन सिर्फ यह कहने भर से हम अपना दामन नहीं छुड़ा सकते ,क्या देश की पुलिस सिर्फ दमन करने के लिए है ?क्या देश भक्ति और जनसेवा महज एक नारा मात्र है|ख़ुफ़िया तंत्र के पास जानकारी होने के बाद भी विस्फोट होना हमारी नाकामी का पर्याय है | ख़ुफ़िया जानकरी मिलने के बाद भी हम विस्फोटों को रोक नहीं पा रहें ऐसा क्यों ?

अब देश कई जनता आश्वासनों के बोर हो चुकी है उसे कुछ मजबूत और ठोस कार्रवाई नजर आना चाहिए | अब अन्ना आंदोलन के बाद तो कोई भी समझदार राजनेता जनता जनार्दन को आश्वासन के झूले में झुलाने की कोशिश नहीं करेगा | अब लोग यह सुनकर थक चुके है की पाकिस्तान का हाथ है ,सीमा पार के लोग इसके लिए जिम्मेदार है | यह सब जब पता है तो फिर इस सतत बीमारी का इलाज क्यों नहीं हो रहा है| क्या अब हम यह स्वीकार कर लें की आतंक-तंत्र सरकार के तंत्र से ज्यादा सक्षम है| देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए चयनित बड़े पढ़े लिखे योग अफसरों पर चंद सरफिरे आतंकवादी भारी पड़ रहें है |

मुम्बई ताज होटल ,दिल्ली हाई कोर्ट पार्किंग (जिसमें जान –माल का नुकसान नहीं हुआ था |),मुंबई का झावेरी बाजार और अब फिर दिल्ली हाई कोर्ट और इसके पहले के भी मामले | एक कसाब और अफजल के अलावा हमारे पास कुछ छाया चित्र और स्केच भर ही है ,बाकी कर्ता-धर्ता लापता है और हमारा धन और समय भी बर्बाद हो रहा है, जो इन आरोपियों को ढूढने और पकड़ने के लिए खर्च हुआ है और अभी भी हो रहा हैं |

ना जाने कश्मीर कितनी बलि लेगा और कब इस समस्या से निजात मिलेगी और देश भर में नियमित अंतराल से चल रही विस्फोटों की इस श्रृंखला पर विराम लगेगा | उम्मीद जगी थी की अक्टूबर २०१० में भारत सरकार द्वारा नियुक्त तीन गैर राजनितिक वार्ताकार इस समस्या का कोई हल निकालेंगे लेकिन अभी तक इनकी प्रक्रिया जारी है और सरकार तक इस तिकड़ी की अनुशंसाएं भी नहीं पहुँची है | यह बात और है की इन तीनों में मतभेद की जानकारी जरुर आम हो गयी है |इन मतभेदों के चलते देश के गृहमंत्री को भी सफाई देनी पड़ी है की सब ठीक है वार्ताकारों की तिकडी अपने काम पर लगी है और जल्दी ही अपनी रिपोर्ट सरकार को दे देगी| लेकिन इसके साथ यह भी खुलासा हो की इन वार्ताकारों ने किस दिशा में और किन बिंदुओं पर केंद्रित हो कर वार्ता की है | यह सब जानने का हमारा आधिकार है क्योकि विस्फोटों में जान हमारी ही जाती है |

कश्मीर की समस्या का हल मुश्किल जरूर है पर असंभव नहीं |एक दो बार ऐसा लगा भी की अब यह समस्या मिट जायेगी पहली बार तब जब आस्ट्रलियाई पत्रकार ओवेन डिक्सन ने संयुक्तराष्ट्र के पांच सदस्यी दल नेता के रूप में कोशिश करी थी और दूसरी बार ताशकंद समझौते के समय| यथार्थ में कुछ बात नहीं बन पाई और शेख अब्दुल्ला से हम उमर अब्दुल्ला तक आ गए लेकिन यह पता नहीं की कश्मीर की आग कैसे बुझे |

घाटी में अफजल पाकिस्तानियों का नया औजार है जिस से वह कश्मीरी युवाओं को बरगला रहें है | अफजाल का मुखोटा बना रहें इसीलिए इस हालिया विस्फोट को अफजल की फांसी से जोड़ दिया गया है जिससे की अफजल के जीते जी और उसकी फांसी के बाद भी अफजल रूप औजार से काम लिया जा सकें |

कई बार लगता है कि सरकार पर भी बहुत वजन है वो क्या –क्या करें लेकिन फिर भी यह सरकार का ही जिम्मा है क्योंकी सरकार और अफसर दोनों ही मिलकर हमारे संसाधनों का अतिरिक्त लाभ यह कह कर ले रहें कई वो हमारी रक्षा करेंगे और हमरी सुख –सुविधाओं का ध्यान रखेंगे | तो फिर उठये इस वजन को ताकि आम आदमी को राहत मिले |

कश्मीर के सब लोग आतंक का भाग नहीं है बल्कि अधिकांश आतंक से त्रस्त है|लेकिन उन्हें हिम्मत और हौंसला देने वाला कोई नहीं है | सरकारी मशीनरी में व्याप्त भ्रष्टाचार से सब दुखी और परेशान है | गरीबी और अवसरों का अभाव जन आक्रोश का एक बड़ा कारण है | विकास का बुनियादी ढांचा ही क्षतिग्रस्त हो गया है जो तमाम कोशिशों के बाद भी पटरी पर नहीं आ सका है | इस सब के बीच कश्मीरी पंडितों के विस्थापन का दर्द भी दरकिनार नहीं किया जा सकता, यद्यपि केंद्र सरकार ने उन्हें देश के कई हिस्सों में उचित पुनर्वास भी दिया है लेकिन मातृभूमि का विछोह एक बड़ा गम है | इस सब का उपाय यह है कि कश्मीर से जुड़े सभी राजनितिक दलों का मन मस्तिष्क एक रूप किया जायें , जिसे जनता के काम और नाम पर आम सहमति बन सकें |वही आतंक के लोग मीडिया के उपयोग से अपना सन्देश दे देते है इस पर भी कोई नई नीति बनाई जाये ताकि अभिवयक्ति की स्वतंत्र के नाम पर आतंकवादियों का सन्देश ही खबर ना रह जायें| दुर्घटना की खबर तो हो पर आतंकियों के समूह और उनके नेताओं का प्रचार –प्रसार बंद हो जाये तो आधी समस्या हल हो जायेगी |

 

 

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz