लेखक परिचय

विनोद बंसल

विनोद बंसल

लेखक इंद्रप्रस्‍थ विश्‍व हिंदू परिषद् के प्रांत मीडिया प्रमुख हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतर्जाल पर समसामयिक विषयों पर नियमित लेखन।

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विनोद बंसल

हमारे ऋषियों मनीषियों ने माता व मातृभूमि को स्वर्ग के समान संज्ञा देते हुए सर्वोच्च माना है। ’’जननी जन्म भूमिश्च, स्वर्गादपि गरीयसी‘‘ इस वाक्य के आधार पर अनगिनत लोग बिना किसी कष्ट या अवरोधों की परवाह किये, मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्योक्षावर कर गये। मातृभूमि का अर्थ उस भू भाग से लगाया जाता है जहां हम व हमारे पूर्वज पैदा हुए। व्यक्ति का जन्म के बाद नाम बदल सकता है, काम बदल सकता है, उसकी प्रकृति बदल सकती है, उसकी प्रतिष्ठा व कद बदल सकता है किन्तु मूल पहचान-जन्मभूमि नहीं बदल सकती है। हम चाहे विश्व के किसी भी कोने में चले जायें, कितने ही प्रतिष्ठित पद पर पहंुच जायें किन्तु जन्म स्थल से पक्की पहचान हमारी और कोई हो ही नहीं सकती। घर परिवार में जब कोई शुभ कार्य होता है तो सबसे पहले पंडित जी हमें हमारा नाम, गोत्र, व हमारे पूर्वजों के नाम के साथ जन्म स्थान का स्मरण कराते हुए संकल्प कराते हैं। पूर्वजों के जन्म स्थान के दर्शन की भी परम्परा है।

अपनी और अपने पूर्वजों की जन्म भूमि की रक्षा प्रत्येक व्यक्ति का पुनीत कर्तव्य माना जाता है। इतिहास में ऐसे लोगों के असंख्य उदाहरण भरे पड़ें हैं। जिन्होनंे जन्मभूमि की रक्षा व उसकी स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। जब व्यक्ति अपनी जन्मभूमि के लिए इतना सब कुछ करने को तैयार रहता है तो कल्पना करिये कि क्या अपने आराध्य की जन्मभूमि हेतु वह हाथ पर हाथ धरे बैठा रह सकता है। कौन नहीं जानता कि करोड़ों हिन्दुओं के आराध्य व अखिल ब्रम्हांड के नायक मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्रीराम का जन्म अयोध्या में हुआ था। अयोध्या की गली-गली व कोना कोना रामलला की क्रीड़ा स्थली के रूप मंे आज भी स्पष्ट रूप से दिखायी देता है। इतना ही नही अयोध्या का इतिहास भारतीय संस्कृति की गौरवगाथा है। अयोध्या सूर्यवंशी प्रतापी राजाआंे की राजधानी रही है। इसी वंश में महाराजा सगर, भगीरथ तथा सत्यवादी हरिश्चन्द जैसे महापुरूषों के बाद प्रभु श्रीराम का जन्म हुआ। पांच जैन तीथकरों की जन्म भूमि अयोध्या है। गौतम बुद्ध की तपस्थली दन्तधावन कुण्ड भी अयोध्या की ही धरोहर है। गुरू नानक देव जी महाराज ने भी अयोध्या आकर भगवान श्रीराम का पुण्य स्मरण कर दर्शन किये। यहां ब्रहमकुण्ड गुरूद्वारा भी है। शास्त्रों में वर्णित पावन सप्तपुरियों में से एक पुरी के रूप में अयोध्या विख्यात है। विश्व प्रसिद्ध स्विट्स वर्ग एटलस में वैदिक कालीन, पुराण व महाभारत कालीन तथा आठवीं से बारहवीं, सोलवी सत्रहवीं शताब्दी के भारत के सांस्कृतिक मानचित्रों में अयोध्या को धार्मिक नगरी के रूप में दर्शाया गया है जो इसकी प्राचीनता और ऐतिहासिक महत्व को दर्शाते हैं।

जग विदित है कि इस पुण्य पावन देव भूमि पर बने भव्य मंदिर को जब विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारी बाबर ने अपने क्रूर प्रहारों से ध्वस्त कर दिया तभी से यहां के समाज को अनेकों लड़ाईयां लड़नी पड़ी। इस जन्मभूमि के लिए सन् 1528 से 1530 तक 4 युद्ध बाबर के साथ, 1530 से 1556 तक 10 युद्ध हुमांयू से, 1556 से 1606 के बीच 20 युद्ध अकबर से, 1658 से 1707 ई मे 30 लड़ाईयां औरंगजेब से, 1770 से 1814 तक 5 युद्ध अवध के नवाब सआदत अली से, 1814 से 1836 के बीच 3 युद्ध नसिरूद्दी हैदर के साथ, 1847 से 1857 तक दो बार वाजिदअली शाह के साथ, तथा एक-एक लड़ाई 1912 व 1934 मंे अंग्रेजों के काल मंे हिन्दू समाज ने लड़ी। इन लड़ाईयों में भाटी नरेश महताब सिंह, हंसवर के राजगुरू देवीदीन पाण्डेय, वहां के राजा रण विजय सिंह व रानी जय राजकुमारी, स्वामी महेशानन्द जी, स्वामी बलरामाचार्य जी, बाबा वैष्णव दास, गुरू गोविन्द सिंह जी, कुंवर गोपाल सिंह जी, ठाकुर जगदम्बा सिंह, ठाकुर गजराज सिंह, अमेठी के राजा गुरदत्त सिंह, पिपरा के राजकुमार सिंह, मकरही के राजा, बाबा उद्धव दास तथा श्रीराम चरण दास, गोण्डा नरेश देवी वख्स सिंह आदि के साथ बडी संख्या में साधू समाज व हिन्दू जनता ने इन लड़ाईयों में अग्रणी भूिमका निभाई।

श्री राम जन्मभूमि मुक्ति के लिए उपरोक्त कुल 76 लड़ाईयांे के अलावा 1934 से लेकर आज तक अनगिनत लोगों ने संधर्ष किया व इन सभी में लाखों लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी। किन्तु, न कभी राम जन्मभूमि की पूजा छोड़ी, न परिक्रमा और न ही उस पर अपना कभी दावा छोड़ा। अपने संघर्ष में चाहे समाज को भले ही पूर्ण सफलता न मिली हो किन्तु, कभी हिम्मत नहीं हारी तथा न ही आक्रमणकारियों को चैन से कभी बैठने दिया। बार-बार लड़ाईयां लड़कर जन्म भूमि पर अपना कब्जा जताते रहे। 6 दिसम्बर 1992 की घटना इस सतत् संघर्ष की एक निर्णायक परिणति थी जब गुलामी व आतंक का प्रतीक तीन गुम्बदांे वाला जर-जर ढांचा धूल-धूसरित होकर श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर निर्णय का मार्ग तो प्रसस्त कर गया किन्तु जन्मभूमि पर विराजमान राम लला को खुले आसमान के नीचे टाट के टैण्ट में से निकाल भव्य मंदिर में देखने के लिए पता नहीं कितनी लड़ाईयां और लड़नी पडे़ंगी ?

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