लेखक परिचय

शंकर शरण

शंकर शरण

मूलत: जमालपुर, बिहार के रहनेवाले। डॉक्टरेट तक की शिक्षा। राष्‍ट्रीय समाचार पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर अग्रलेख प्रकाशित होते रहते हैं। 'मार्क्सवाद और भारतीय इतिहास लेखन' जैसी गंभीर पुस्‍तक लिखकर बौद्धिक जगत में हलचल मचाने वाले शंकर जी की लगभग दर्जन भर पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

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शंकर शरण

सच्चर समिति, रंगनाथ मिश्र आयोग, आदि से लेकर सोनिया जी के सनकी सलाहकार तक सभी प्रभावशाली लोग भारत में मुसलमानों के प्रति ‘भेद-भाव’ को ही उनके पिछड़ने की वजह मान कर चलते हैं। तदनुरूप आंकड़े ढूँढते और तर्क गढ़ते है। पर जरा पूरी दुनिया पर निगाह डालें। पूरी दुनिया में लगभग 60 इस्लामी देश हैं, जहाँ शासन मुसलमानों के हाथ है। अनेक इस्लामी देश काफी समृद्ध हैं। सऊदी अरब, ईरान, अमीरात, ईराक, कुवैत, बहरीन जैसे देश इनमें आते हैं। ‘पेट्रो डॉलर’ मुहावरा उन की ताकत का प्रमाण है। विश्व की मुस्लिम आबादी करीब पौने दो अरब होने जा रही है। यह ईसाइयों के बाद दूसरी सबसे बड़ी है। इतनी संख्या, संसाधन, ताकत के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय इस्लामी एकता की विशिष्ट भावना – उम्मत – भी है, जो ईसाई या बौद्ध देशों में नहीं।

अतः यदि भारत में मुसलमान भेद-भाव से पिछड़े, तो इस्लाम शासित देश क्यों निकम्मे है? ज्ञान-विज्ञान, तकनीक, कला, संगीत या साहित्य में उनकी कोई गिनती क्यों नहीं? राजनीतिक-सामाजिक विकास की दृष्टि से वे क्यों इतने फिसड्डी हैं? दुनिया में मात्र सवा करोड़ यहूदी भी पूरे मुस्लिम विश्व के मुकाबले हर क्षेत्र में आगे हैं। छोटे से बौद्ध देश जापान या ताइवान से तो तुलना ही असंभव है! आखिर इस्लामी देशों की यह दुर्दशा क्यों? वहाँ तो मुसलमानों से कोई भेद-भाव करने वाला नहीं। स्थिति बल्कि उल्टी है। उन देशों में तो ‘काफिरों’ अर्थात् गैर-मुस्लिम लोगों को तो कानूनी तौर से नीचा दर्जा देकर रखा जाता है। अतः यहाँ मुस्लिमों के प्रति भेद-भाव का तर्क कोरा राजनीतिक प्रपंच है। एक घातक प्रपंच।

यह अकाट्य सच है कि ज्ञान-विज्ञान में मुसलमानों का योगदान सदियों से बंद है। जो तारीख में मुस्लिम महापुरुषों की लिस्ट बनाना चाहते हैं, उन्हें नाम नहीं मिलते। सारे नाम 14वीं सदी आते-आते खत्म हो जाते हैं। ध्यान दें, तमाम पिछड़ेपन के बावजूद हाल में दुनिया के मुसलमानों में भारतीय मुसलमान ही कई क्षेत्रों में आगे दिखे हैं। आज भी वे बेहतर हैं। कलाकार, वैज्ञानिक, उद्योगपति, समाजसेवी, साहित्यकार, लगभग हर क्षेत्र में यदि कोई मुसलमान सचमुच प्रतिभावान है, तो उसे भारत में सर्वोच्च स्थान तक पहुँचने में कोई रुकावट नहीं। मुहम्मद रफी से लेकर इस्मत चुगताई, अजीम प्रेम जी और अब्दुल कलाम तक ऐसी प्रतिभाएं किसी मुस्लिम देश में नहीं देखी जा सकतीं। इसलिए, सच्चर किस्म के लोग इसकी अनदेखी करते हैं कि उपलब्धियों में यहाँ के मुसलमान अपनी अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी से प्रायः ऊँचे ही ठहरते हैं। इस्लामी वर्चस्व की जिद से बने पाकिस्तान के आर्थिक-सांस्कृतिक आँकड़े भी भारतीय मुसलमानों से नीचे ही चले गए। सोचें तो इसी बात में दुनिया में मुस्लिम पिछड़ेपन के कारण और निदान का सूत्र भी मिल जाएगा।

जाने-माने ‘मुस्लिम इंडियन’ सैयद शहाबुद्दीन लिखते हैं, “इस्लामी दुनिया राजनीतिक रूप से अस्थिर, सैन्य रूप से बे-रीढ़, आर्थिक रूप से ठहरी, तकनीकी रूप से बाबा आदम जमाने की, सामाजिक रूप से अंधविश्वासी और पतनशील है। विद्वता के क्षेत्र में मुसलमान शायद ही कहीं दिखते हैं और विज्ञान में तो वे कहीं नहीं हैं। … दूसरी ओर मुस्लिम मानस इस्लामी अतीत की समृद्धि और ताकत के गीत गाता रहता है”।

तब दूसरों से, करते किस मुँह से हो गुरबत की शिकायत गालिब। (तुम को बेमेहरि-ए-याराने-वतन याद नहीं) ? क्या स्पष्ट नहीं कि गड़बड़ी कहाँ है? सारी समस्या इस्लामी रहनुमाओं की तंग-नजरी या बुद्धि के साथ बेवफाई है। मजहब के लिए वे सारी दुनिया के मुसलमानों को डुबाने में संकोच नही करते। सन् 1979 से ईरान के अयातुल्ला खुमैनी और सऊदी अरब के बहावियों ने यही नई प्रतियोगिता शुरू की है। जीवन की हर चीज पर इस्लाम को थोपने की जिद से सारी गड़बड़ी हो रही है। मगर लगभर सभी मुस्लिम प्रवक्ता सारा दोष सदैव अमेरिका को, भारत को, कुफ्र को, सेक्यूलरिज्म को, यानी हर चीज को देते हैं। इस्लाम को कभी नहीं देते।

इस तंग-नजरी को कई मुस्लिम विद्वान भी समझते हैं। कि इस्लाम ही उनकी बाधा है, कुछ और नहीं। बहुलवादी समाज, लोकतंत्र और सहअस्तित्व को इस्लाम खारिज करता है। कम्युनिज्म की तरह उसे भी दुनिया पर एकाधिकार चाहिए। जिसकी अनूठी अभिव्यक्ति आधुनिक युग में अल्लामा इकबाल की ‘शिकवा’ और ‘जबावे-शिकवा’ में हुई थी। जिनका कौल थाः मुस्लिम हैं हम, वतन है सारा जहाँ हमारा! इस जड़ मानसिकता पर हमारे विद्वान कूटनीतिज्ञ एम. आर. ए. बेग ने बिलकुल सही लिखा था, “इस्लाम अपने तमाम सरंजाम के साथ केवल इसी रूप में कल्पित किया गया था कि यह दूसरे सभी धर्मों का नाश कर देगा। इस रूप में इस्लाम की कभी परिकल्पना ही नहीं की गई थी जो इस के अनुयायियों को भारत या किसी भी ऐसे देश में लोकप्रिय बना सके जहाँ मुसलमान अल्पसंख्यक हों। इसी से इस बात की व्याख्या भी होती है कि क्यों किसी ऐसे देश में सेक्यूलर संविधान नहीं हो सकता जहाँ मुसलमान बहुमत में हैं और क्यों अपने मजहब का पालन करने वाला मुसलमान मानवतावादी नहीं हो सकता।” (द मुस्लिम डायलेमा इन इंडिया, 1974) सच पूछिए तो इसी बात से मुसलमानों के हर पिछड़ेपन और बदहाली की व्याख्या भी हो सकती है।-

कुछ दूसरी तरह से मौलाना वहीदुद्दीन खान भी कहते हैं कि मुसलमानों की समस्याओं की जड़ उनकी अपनी नासमझी है। मुस्लिम पत्रकारिता रंज मुद्रा में मुसलमानों के लिए दूसरों द्वारा खड़ी की गई मुश्किलें और षड्यंत्र ढूँढती रहती है। इसलिए वहीदुद्दीन के विचार से “मुस्लिम अखबारों के शीर्षक बदलकर उन्हें ‘शिकायत दैनिक’ या ‘शिकायत मासिक’ कहने में कोई ज्यादती नहीं।“ राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व-अध्यक्ष जस्टिस शमीम के अनुसार “इस देश में किसी के लिए अवसरों की कमी नहीं है। लेकिन मुसलमानों में नेतृत्व का अभाव है।“

यह अभाव जिस कारण है, उसे सच्चर और रंगनाथ जैसे मतलबी लोग जान-बूझ कर छिपाते हैं। चाहे नेतृत्व का अभाव हो या मुस्लिमों का दुनिया भर में पिछड़ना या उनमें तरह-तरह के उग्रवादियों, आतंकवादियों की वृद्धि – इन सभी समस्याओं के मूल में एक ही कारण है। उनका मजहबी नेतृत्व और उसकी किताबी जिद। उनकी रूढ़ियाँ और इस्लाम की जड़ धारणाएं, जिसे छोड़ना तो दूर, उस पर कोई विचार-विमर्श भी उन्हें नागवार है। इस ठोस सत्य को सेक्यूलर-वामपंथी बुद्धिजीवी सांप्रदायिक दुष्प्रचार बताते हैं। पर जुमे की आम तकरीरों पर या आम मदरसों में जो शिक्षा दी जाती है, उन पर गौर करें। प्रकृति, समाज, संगीत आदि के बारे में जैसी बातें बच्चों को रटाई जाती हैं – उसके बाद उनमें वैज्ञानिक, विचारक या संगीतज्ञ बनने की आकांक्षा ही क्यों होगी? यदि हिंदुओं की देखा-देखी हो भी तो बाधाएं कितनी आएंगी!

जिस विचार-प्रणाली में जीवन का हर कार्य मजहबी मसला हो, जिसके समाधान सदियों से तय हों, जिन पर कोई प्रश्न उठाना ही दंडनीय हो, वह तो सोचने-विचारने व आगे बढ़ने में पैर की बेड़ी ही है। उस से जुड़े तालिबे-इल्म बदलती, बहुरूप दुनिया में किस योगदान के लायक होंगे? सच यह है कि जिस हद तक भारतीय मुसलमान – हिन्दू परंपरा और संसर्ग के कारण – उदार बने रहे, उस हद तक वे अपने अंतर्राष्ट्रीय बिरादरों से आगे बढ़े। उदाहरणार्थ, पाकिस्तानी संगीत हिन्दू परंपरा की देन है। अन्यथा कोई मेहदी हसन या नुसरत फतेह अली खान ईरान या सऊदी अरब में क्यों नहीं बनता? केवल इसीलिए, कि वह बन ही नहीं सकता! इस्लाम में संगीत हराम है। यह खुमैनी ने ही नहीं कहा था, देवबंद के मोहतमिम भी यही बताते हैं।

अतः निष्कर्ष साफ है। मुसलमान जितना ही उलेमा की जकड़ ठुकरा कर सामान्य मानवीय दृष्टि से जीवन को देखेंगे, उतना ही वे अन्य समुदायों के साथ बढ़ने के काबिल होंगे। इस के उलट जितना ही वे इस्लामी उसूलों को हर चीज पर लागू करने की जिद ठानेंगे, उतना ही वे पिछड़ते जाएंगे। यदि जीवन के हर क्षेत्र में इस्लाम को लागू करें, जैसा अफगानिस्तान में तालिबान ने किया, तब सभी स्टूडियो, संगीत, थियेटर और साजों, साजिंदों को मिटाना ही होगा! तब मेहदी हसन को भारत से ही शोहरत मिलेगी। तब अदनान सामी को भारत में ही बसेरा बनाना ही होगा। इधर जाकर सऊदी अरब में पहली फिल्म बनी, क्योंकि इस्लाम के अनुसार तस्वीर उतारना कुफ्र है। इसीलिए सऊदी अरब में फिल्में बनाना ही गुनाह था! कृपया सच्चर साहब से पूछें – क्या ऑस्कर पुरस्कारों में किसी अरबी फिल्म का नाम कभी न आना ‘भेद-भाव’ कहा जाए?

वस्तुतः मुस्लिम पिछड़ेपन में उन के मार्गदर्शक उलेमा की केंद्रीय भूमिका है। आज भारत में चार लाख से अधिक मस्जिदें हैं। अधिकांश के साथ मदरसे हैं। फिर एक हजार दर्सगाह और तबलीगी मरकजों की संख्या भी हजारों में है। दारुल-उलूम के अनुसार नौ हजार स्कूलों की स्थापना केवल देवबंद ने ही की है। ये सभी मजहबी-शैक्षिक संस्थाएं एक-दूसरी से घनिष्ठ रूप से जुड़ी हैं। इसमें कार्यकर्त्ताओं के प्रशिक्षण, फतवों की किताबों आदि जरूरियात के हुक्म दर्सगाहों से जारी होते हैं। अतः उलेमा, उनकी संस्थाओं और आश्रितों का दायरा बहुत बड़ा है। लेकिन यह पूरा दायरा बंद और अतीतोन्मुख है। उसका ध्यान अरब भूमि के एक खास अतीत की तरफ लगा रहता है। इस नजरिए, माहौल और तालीम के कारण इससे निकले तालिबान प्रायः आधुनिक पेशों के लायक नहीं होते। वे सिर्फ इस्लामी प्रचारक बन सकते हैं और ‘इल्म के मरकजों’ में जाकर अपने जैसे और प्रचारक तैयार कर सकते हैं। इस घातक प्रक्रिया का दोषी कौन है? गालिब के शब्दों में, “… अच्छा अगर न हो, तो मसीहा का क्या इलाज”!

किंतु मुसलमानों को आधुनिक शिक्षा-दीक्षा की ओर मोड़ना तो दूर, संदेहास्पद मदरसों को नियंत्रित करने के प्रयास पर भी सेक्यूलरपंथियों को आपत्ति है। मार्क्सवादियों को तो दैवी शाप है कि वे हर उस चीज का समर्थन करेंगे जो देश-विरोधी होगी, और हर उस बात का विरोध जो देश-हित में होगी। इसलिए उन्होंने केरल और पश्चिम बंग में आतंकवाद को प्रश्रय देने वाले मदरसों तक को छुट्टा छोड़े रखा। अपने ही मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को डाँटा-फटकारा जब वे आतंकी मदरसों के फैलाव से त्रस्त हो रहे थे। अब यदि परम-ज्ञानी वामपंथियों का यह रुख है, तब उलेमा अपनी सदियों पुरानी बुनियादी तालीम को सुधारने का हर प्रयास विफल कर देते हैं, तो हैरानी क्या!

उलेमा के लिए जीवन का हर सवाल मजहबी सवाल है। अभी वे पोलियो के टीके को इस्लाम-विरोधी मान रहे हैं, और हवाई अड्डों पर स्कैनर मशीनों से यात्रियों के शरीर की जाँच को भी। जिस किसी बात पर फतवे देना उनका अधिकार है। इमराना, गुडिया, अमीना, जरीना जैसी हजारों स्त्रियों की दुर्गति उनके ही चित्र-विचित्र फतवे करते हैं। यह फतवे मध्ययुगीन इस्लाम पर आधारित और व्यापक होते हैं। उन फतवों का आम मुसलमान चाहे-अनचाहे पालन करता है। कुत्ते की लार नापाक होती है या पूरा जिस्म? खड़े होकर पेशाब किया जा सकता है या नहीं? कोई अपनी पत्नी की सौतेली माँ से शादी करके दोनों को एक घर में रख सकता है या नहीं? …ऐसे हजारों सवाल मुसलमानों के लिए मजहबी सवाल हैं। जिन का जबाव देने में उलेमा पूरा जोश लगा देते हैं। यही मुस्लिमों के नेता हैं। इस मानसिकता के साथ कितनी प्रगति होगी?

हाल के दशकों में यहाँ उलेमा का प्रभाव बढ़ा है। तीन दशक से चल रही खुमैनी और बहावियों की कट्टरवाद की शिया-सुन्नी प्रतिद्वंदिता ने इसमें बड़ा योगदान किया है। उनसे प्रेरित मस्जिदों, मदरसों, मकतबों और उर्दू प्रेस का वैचारिक तंत्र; सऊदी अरब, ईरान या अन्य ‘इस्लामी’ स्त्रोतों से प्राप्त संरक्षण और धन; वोट-बैंक की राजनीति तथा प्रशासन के घुटनाटेक रवैये आदि विविध कारणों से उलेमा की शक्ति और ढिठाई बढ़ी। अब वे अपनी अलग न्याय व्यवस्था, यानी शरीयत कोर्ट, अलग बैंक ‘इस्लामिक बैंकिंग’, सेना में अपने लिए अलग नियम कि ‘किसी मुस्लिम देश के विरुद्ध लड़ने’ में भाग न लेने की छूट, आदि उद्धत माँगें भी करने लगे हैं। यानी धीरे-धीरे भारतीय संविधान से पूर्ण स्वतंत्र हो जाने की माँग!

वोट के लोभ और दबाव में लगभग हर राजनीतिक दल मुस्लिमों की भारतीय संविधान से दूरी बढ़ाता जा रहा है। बाल ठाकरे को छोड़कर शायद अब कोई नेता नहीं, जो इस घातक प्रकिया में मौन-मुखर सहयोग नहीं कर रहा हो। ‘अल्पसंख्यक’ एक कोड-वर्ड हो गया है, जिसके नाम पर मुसलमानों का अलग स्कूल ही नहीं, अलग कानून, अलग मंत्रालय, अलग आयोग, अलग विश्वविद्यालय और अलग बैंक तक बनाने की तैयारियाँ चल रही हैं। वस्तुतः मुसलमानों को देश के अंदर एक देश या राज्य के अंदर एक राज्य सा स्वतंत्र अस्तित्व दिया जा रहा है। राष्ट्रीय संविधान का ऐसा भीतरघात दुनिया के किसी देश में नहीं हुआ है!

इस बीच हिंदू वामपंथी-सेक्यूलरवादी बौद्दिक जमात इस्लामी कट्टरपंथियों की बातें मानना ही सेक्यूलरिज्म समझती है। ये लोग विभिन्न मुद्दों पर वही कहेंगे जो उलेमा कह रहे हैं और उनका विरोध करने वाले को हिन्दू सांप्रदायिक कहने लगेंगे। सारे बड़े अखबारों से लेकर टी.वी. टैनलों पर यही दृश्य है। कश्मीरी आतंकवादी भी वहाँ इज्जत पाते हैं। तब उलेमा की जकड़ टूटे तो कैसे? मुस्लिम चिंतन स्वतंत्र हो तो कैसे?

यदि मुस्लिमों को सचमुच आगे बढ़ना है तो मुसलमान दूसरों पर दोष मढ़ना बंद करें। समय के साथ न बदल पाने के कारण ही वे पिछड़े। इस्लामी सिद्धांतों पर आलोचनात्मक निगाह डालना जरूरी है। उलेमा जिन कायदों को जबरन लागू करते रहते हैं – जैसे स्त्रियों, काफिरों या जिहाद संबंधी – वे सब उनके मूल मजहबी ग्रंथों में ही हैं। उस की लीपा-पोती करना या कुछ टुकड़ों के सहारे उदार अर्थ निकालने से काम चलने वाला नहीं।

यह संयोग नहीं कि जब यूरोप में ईसाई जनता चर्च के शिकंजे से निकली तभी उन की चौतरफा प्रगति शुरू हुई। यूरोप के रेनेशाँ और रिफॉर्मेशन का पूरा संदेश यही है। इस्लामी समाज यह जरूरी काम आज तक नहीं कर सका। उन के पिछड़ेपन का मूल कारण यहाँ है। हमारे सारे सेक्यूलरपंथी, सच्चरपंथी, दिग्विजय सिंह पंथी और सोनिया जी की सलाहकार परिषद् के कीमियागर इसे समझें और बार-बार पाकिस्तान बनाने का सर्व-घाती मार्ग छोड़ें।

क्योंकि, यह भी समझा ही जाना चाहिए कि मुसलमानों का सब कुछ अलग करते जाते हुए अंततः अलग देश बना देने से भी मुसलमानों का कोई हित नहीं होता। पाकिस्तान इस का दयनीय उदाहरण है। वह आज चीन और अमेरिका की कूटनीतिक-आर्थिक-सैन्य भीख पर जी रहा है। उसके भौगोलिक महत्व को छोड़ दें, तो पाकिस्तान से कोई देश संबंध रखने का इच्छुक नहीं। इस दुर्गति का रहस्य कहाँ है? राजनीतिक लफ्फाजियों को छोड़ दें, तो पाकिस्तान के मुस्लिमों से भारतीय मुसलमान अधिक सहज, अधिक सम्मानित जिंदगी जी रहे हैं। मगर उसी हद तक जिस हद तक वे भारत के साथ, हिन्दुओं के साथ, कुफ्र के साथ घुले-मिले हैं! जिस हद तक वे दूर हैं, उस हद तक वे पिछड़े हैं। जैसा गालिब ने संकेत किया थाः काफिर हूँ, गर न मिलती हो राहत अजाब में।

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14 Comments on "करते किस मुँह से हो गुरबत की शिकायत गालिब…"

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vimlesh
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अनुकरणीय है तजाकिस्तान का नया नियम अमन पसंद मुसलमानों के लिए तजाकिस्तान का नया नियम अनुकरणीय है . मुस्लिम बहुल तजाकिस्तान की सरकार ने धार्मिक उन्माद को नियंत्रित करने के उद्देश्य से अट्ठारह साल से कम उम्र के युवकों को मस्जिदों में जाकर नमाज़ अदा करने पर आज से प्रतिबन्ध लगा दिया गया है. इस बात से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि तजाक सरकार को विवश हो कर यह क़ानून बनाना पड़ा है. जब सामान्य समझाइश से काम नहीं चलता, क़ानून तभी बनाया जाता है. सरकार की सोच यह रही कि अट्ठारह वर्ष से कम उम्र के युवक धर्म… Read more »
ramprakash agrwal
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लेख बहुत अच्चा है लकिन इसे मुसलमानों को पढ़ने की व्यवस्था करनी चाहिय वरना कोई फायदा नहीं हिंदी उर्दू अखबारों व हिंदी उर्दू न्यूज चेनल्स को भेजना चाहिए

डॉ. मधुसूदन
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शंकर शरण जी, आपके इस लेख को, वास्तव में सभी सुधारवादी मुसलमान पढे, तो वे अपनी सन्तानों का भला करने की दिशा में पहल कर सकते हैं। और भारत का मुसलमान अन्य कई मुस्लिम देशों के मुसलमानों से कई गुना, ऐसा काम करने के लिए कानूनसे, और भारत के संविधान के अनुसार, आज़ाद है। मुसलमानों को, वोट बॅन्क वाली पार्टियों से बचना चाहिए। जो पार्टियां आपका भला नहीं चाहती, जो वोट पाकर भूल जाती है, और वास्तविक सुधार नहीं चाहती। इस लेखको उन्होंने(मुस्लिम विद्वानों ने) सकारात्मक नज़रिये से पढने की सख़्त ज़रुरत है। सीखने के नज़रिए से पढिए। इस बीज… Read more »
Satyarthi
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सदा की तरह इस बार भी शंकर शरण जी ने निहायत साफगोई से काम लेते हुए एक गंभीर विषय पर अपने विचार रखे.तर्क तथा तथ्य के आधार पर लेखक के विचारों से असहमत होने की कोई गुंजायश नहीं है . मुसलमानों के पिछड़ेपन का रोना रोनेवाले अक्सर इसका कारण हिन्दू समाज या भारतीय शासन द्वारा भेदभाव बताते हैं वे यह भूल जाते हैं की बंटवारे के समय जो भी मुसलमान सरकारी नौकरियों पर थे या जो,व्यापार,या उद्योग जगत में थे या किसी प्रकार की प्रतिभा और सामर्थ्य के स्वामी थे वे सब के सब पाकिस्तान चले गए. पाकिस्तान बन ने… Read more »
आर. सिंह
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काश!इस लेख को कोई मुसलमान गंभीरता से ले और एक निगाह डाले अपने पिछड़ेपन के कारणों की ओर.लेखक श्री शम्भू शरण जी ने बहुत विवेचनात्मक तरीके से मुसलमानों के पिछड़ेपन के कारणों की और ध्यान दिलाया है.सच्च पूछिए तो इसमे हमारी सरकार का भी दोष कम नहीं है.उन्होंने उन्हीं मुसलमानों को आगे रखा जो मुसलमानों के पिछड़ेपन के कारण हैं.आज भी मुसलामानों का एक बड़ा हिस्सा मदरसों के धार्मिक शिक्षा से आगे नहीं बढ़ सका है.इसका जिम्मेवार कौन है?ऐसे मुसलमानों के प्रति कुछ भेद भाव के किस्से गैर सरकारी नौकरियों के बारे में सुने जाते हैं,पर उनको इतना महत्त्व नहीं… Read more »
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