लेखक परिचय

डॉ. मुनीश रायजादा

डॉ. मुनीश रायजादा

लेखक शिकागो स्थित शिशुरोग विशेषज्ञ हैं और एक सामाजिक-राजनीति विश्लेषक हैं।

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डॉ. मुनीश कुमार रायजादा

ब्रिटिश लेखक रूडयार्ड किपलिंग ने लगभग 125 साल पहले ‘द बैलेड ओफ़ ईस्ट एंड वेस्ट’ नामक गाथागीत लिखा था। इस की प्रथम दो पंक्तियां ‘पूर्व पूर्व है, व पश्चिम पश्चिम/ इन दोनों का मिलन कभी संभव नहीं है’,को आज तक सन्दर्भ में लिया जाता है । पश्चिमी देशों के मशीनों व तकनीक से भरे अत्याधुनिक जीवन स्तर को देखते हुए यह प्रश्न आपके मन में आ सकता है कि आखिर पूर्व पश्चिमी को दे भी क्या सकता था? लेकिन जिस प्रकार से योग धीरे धीरे अमेरिकी जीवन का अभिन्न अंग बनता जा रहा है उससे यह पता चलता है कि यह पूर्व द्वारा पश्चिमी को दिया गया एक महत्वपूर्ण उपहार है। फ़िलिप गोल्डबर्ग अपनी पुस्तक ‘अमेरिकन वेद’ में कहते हैं कि पूर्व से पश्चिमी की ओर विचारों के प्रवाह में “वेदांत-योग” का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उनका अभिप्राय यह नहीं है कि वेद व वेदांत यहां धर्मग्रंथों के रूप में लोकप्रिय हो चुके हैं, परन्तु ॠगवेद से उपज़ा यह सार “एकम सत विप्रहा बहुधा वेदांती (सत्य एक ही है, विद्वानो लोग इसे अलग अलग नामों से जानतें हैं) आज पश्चिमी जनजीवन में भी स्वीकार्य हो चुका है।

मार्क ट्वेन ने भारत को ‘मानव जाति के पालने (क्रेडल)’ की संज्ञा दी थी। आध्यात्मिकता, दैवीयता, व रहस्यवाद (मिस्टीसिज्म) के क्षेत्र में इस देश का लंबा व गौरवशाली इतिहास रहा है। भारत के जीवंत आध्यात्मिक वातावरण का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि विश्व के चार प्रमुख धर्मों हिन्दू, बौद्ध, जैन व सिख, का उदय इस धरती से हुआ है। कुछ लोगों का मानना है कि पारसी धर्म की जड़ें भी कहीं ना कहीं भारत से जुड़ी हुई हैं। विद्वान यह मानते हैं कि सनातन धर्म के सिद्धान्त विविध विचारों, विश्वासों और संप्रदायों के उद्भव के लिए अनुकूल हैं।

इस पृष्ठभूमि के बाद, आइये वर्तमान में लोटें! यह मात्र एक संयोग ही है कि पिछले दिनों दुनिया के दो देशों में रिलीज हुई दो फ़िल्मों को अलग अलग प्रतिसाद मिल रहा है। हिन्दी फ़िल्म ‘पीके’ ने भारत में काफ़ी हलचल मचा रखी है। शुरू से ही हिन्दू दक्षिणपंथी संगठनों के निशाने पर रही इस फ़िल्म को काफ़ी विरोध प्रदर्शनों का सामना करना पड़ रहा है। धार्मिक अल्पसंख्यक कार्ड खेलने के लिये जाने जाने वाली समाजवादी पार्टी के नेता तथा उतरप्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव  ने आनन फ़ानन में इस फ़िल्म को टैक्स फ़्री घोषित कर दियाI बिहार के जनता दल (यू) ने भी समाजवादी पार्टी के कदमों का अनुसरण किया। दूसरी ओर इसी समय “अवेक : द लाईफ़ ऑफ़ योगानंद” नामक फ़िल्म अमेरिका में रिलीज हुई हैI यह फ़िल्म आध्यात्मिक ओज से भरपूर हैI दोनों फ़िल्मों का ताना बाना धर्म व आध्यात्म के चारों ओर बुना गया था। अब इसे दुर्भाग्य कह लीजिये या नियति का खेल, पर फ़िलहाल यह फ़िल्म ‘अवेक’ भारत में नहीं दिखायी जा रही है।

रहस्यवाद (मिस्टीसिज्म) क्या है? शब्द्कोष के अनुसार यह वह विश्वास है जो हमें बताता है कि आध्यात्मिक सत्य, या परमात्मा का प्रत्यक्ष ज्ञान व्यक्तिपरक अनुभव के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है (अंतर्ज्ञान या अंतर्दृष्टि के रूप में)। दैवीयता की गूढ़ता की प्राप्ति की चाहत सभी मानव आबादी व संस्कृतियों में फ़ैली हुई हैI कहा जाता है कि एक साधक आध्यात्मिकता के माध्यम से परम सत्य का एहसास कर सकता है। लेकिन कुछ चीजें हैं जो देवत्व की आम (बाह्य) अभिव्यक्ति का गठन करती हैं। विभिन्न प्रकार के धर्म, संप्रदाय, अनुष्ठान, प्रथाएं व सिद्धांत इसके अन्तर्गत आतें हैं। श्री चिन्मय ने ठीक ही कहा है : “रहस्यवाद, बेचारा रहस्यवाद! जब इसे कम करके आंका जाता है और इसका सरलीकरण किया जाता है  तो यह अपने मूल क्षेत्र से नीचे आ जाता  है और धर्म के साथ खड़ा हो जाता हैI” संक्षेप में यह कहावत हम मनुष्यों के उस व्यवहार की व्याख्या करती है जिसके तहत हम 8000 मील की दूरी पर बसे दो अलग अलग देशों भारत व अमेरिका में चल रही दो अलग अलग फ़िल्मों पर प्रतिक्रिया दे रहें हैं।

हाल ही में, मुझे शिकागो में “अवेक : द लाईफ़ ओफ़ योगानंद” के प्रीमियर शो में जाने का मौका मिला। पाओला डी फ़्लेरिओ व लीसा लीमान द्वारा निर्देशित यह फ़िल्म स्वामी योगानंद के जीवनवृत पर बनी है व उनके जीवन व शिक्षाओं को दिखाती है।

परमहंस योगानंद (1893-1952) को ‘योग’ को पश्चिमी दुनिया तक पहुंचानें का श्रेय दिया जाता है। सन 1920 में मात्र 27 साल की उम्र में अपने गुरू श्री युक्तेश्वर के निर्देश पर योगानंद एक आध्यात्मिक मिशन पर अमेरिका आये। इन्होनें योग को माध्यम बनाते हुए अमेरिकियों को दैवीयता व आध्यात्मिकता की अनुभूति करवाईI उन्होनें सत्य ही कहा था कि ‘हम मात्र एक शरीर नहीं हैं, बल्कि चेतना के सागर हैं। परमहंस आगे कहतें है कि “ भारत के योगियों व संतों तथा जीसस द्वारा सदियों पहले जाने व सीखे गये इस ध्यान योग के विज्ञान के द्वारा कोई भी साधक अपने चेतना के दायरे को सर्वज्ञता तक विस्तृत कर सकता है व अपने हृदय में ईश्वरीय सार्वभौमत्व जगा सकता है।”

आज ध्यान, योग, कर्म, गुरू यहां तक कि मोक्ष जैसे शब्द अमेरीकी शब्दकोश का हिस्सा बन चुके हैं। पुस्तक ‘ट्रांससेन्डेंट इन अमेरिका : हिन्दू इन्स्पायर्ड मेडिटेशन मूवमेंट एज न्यू रिलिजन’ की लेखिका लोला विलियमसन के अनुसार अमेरिका में हिन्दुत्व से प्रेरित ध्यान योग को प्रारंभ करने का श्रेय स्वामी विवेकानंद को दिया जाना चाहिये। अपने पक्ष में तर्क देते हुए लेखिका अमेरिका के इतिहास में हुए तीन प्रमुख धार्मिक आंदोलनों का हवाला देती हैं, जिन्हे उन्होनें ‘नये धर्म (न्यू रिलिजन) की संज्ञा दी है- योगानंद का सेल्फ़ रियलाइज़ेशन फ़ाउंडेशन (एसआरएफ़),  महर्षि महेश योगी का ट्रांससेंडेंटल मेडिटेशन (टीएम) व स्वामी मुक्तानंद का सिद्ध योगा। 1893 से लेकर अगले कुछ वर्षों में स्वामी विवेकानंद ने पश्चिमी दुनिया को पहली बार सनातन धर्म का परिचय कराया था, इसके बाद सन 1920 में जब योगानंद ने अमेरिका के तट पर कदम रखा तो इन्होनें इस परंपरा को बखूबी आगे बढाया। इन्होनें अपनी जिन्दगी के अगले 30 वर्ष अमेरिका में गुज़ारे व पूर्व के ज्ञान व दर्शन को पश्चिम तक पहुंचानें में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

परमहंस योगानंद ने ‘क्रिया योग’ को पुन:जीवित किया व दुनिया भर में (मुख्यत: पश्चिम में) प्रचलित किया। भारत से आये इस भूरे सन्यासी ने पश्चिमी दुनिया को मन व आत्मा का विज्ञान सिखाने हेतु योग का सहारा लिया। अब आधुनिक विज्ञान भी यह मानता है कि हालांकि योग शरीर से किया जाता है परन्तु इसका वास्तविक संबंध तो मन व मस्तिष्क से है। आज अमेरिका में योगा सेंटर खोजना, काफ़ी शोप खोजने जैसा आसान है, और इसका पूरा श्रेय योगानंद के दशकों पहले किये कठिन परिश्रम को जाता है।

हालांकि परमहंस योगानंद ने अमेरिका में सफलता व सम्मान अर्जित किया परन्तु फ़िर भी उन्हें कुछ चुनौतियों व मुश्किलों का सामना करना पड़ा। 1946 तक भारतीय अमेरिका में नागरिकता के पात्र नहीं थे तथा सन 1965 तक भारतीयों का अमेरिका में कोई उल्लेखनीय आगमन नहीं हुआ था। योगानंद के समय में भारत ब्रिटेन का उपनिवेश था तथा अमेरिका में नस्लवाद का बोलबाला था। इस पृष्ठभूमि व विद्वेश को देखते हुए यह स्वाभाविक ही था कि योगानंद को अमेरिका के दक्षिणी भागों में कट्टर नस्लवाद का सामना करना पड़ा। (यह अमेरिका का वह हिस्सा है जिसने रास्ट्रपति अब्राहम लिंकन के समय समय चलाये गये दासता उन्मूलन अभियान के प्रति गहन तिरस्कार जताया था)। भारत की ब्रिटिश सरकार के कहने पर योगानंद को अमेरीकी सरकार द्वारा गहन निगरानी में भी रखा गया। जब इन्हें पता चला कि वाशिंगटन डीसी में हो रही उनकी सभाओं में अश्वेतों को आने की अनुमति नहीं हैं, तो इन्होनें इस नस्लीय दुर्भाव के मसले को अवसर में बदल दिया। योगानंद ने अपने अश्वेत अनुयायियों के लिये अफ़्रीकन- अमेरिकन केंद्र की स्थापना की घोषणा की। इसी प्रकार उन्होनें एक भारतीय व अमेरिकन के बीच हो रही शादी को अपना आशीर्वाद देकर जातीय बंधनों को तोड़ने का आव्हान किया । योगानंद महात्मा गांधी के समर्थक थे व उनका मानना था कि अगर कोई व्यक्ति खुद को सुधार सकता है तो फ़िर वह पूरी दुनिया को सुधार सकता है। योगानंद गांधीजी के सेवाग्राम, वर्धा स्थित आश्रम भी गये थे। ऐसा कहा जाता है कि उन्होनें गांधीजी को क्रिया योग का एक पाठ भी दिया तथा उन्हें अवोकाडो नामक फ़ल के बारे में बताया जो प्रोटीन का एक उतम शाकाहारी स्त्रोत है। मुझे पूरा विश्वास है कि अगर योगानंद जीवित होते तो मार्टिन लूथर किंग को अपने नागरिक अधिकार आंदोलन में इनका पूरा सहयोग मिलता। यह एक संयोग ही है कि इन दो महान आत्माओं की आवाज़ में भी समानता है।

सन 1946 में उनकी पुस्तक “एक योगी की आत्मकथा” प्रकाशित हुयीI पूरी दुनिया में यह पुस्तक एक दर्जन से अधिक भाषायों में छप चुकी है तथा इसकी लाखों प्रतियाँ बिक चुकी हैं I 1952 में योगानंद ने अमेरिका में समाधि को प्राप्त किया I आज 175 देशों में सेल्फ़ रियलाइज़ेशन फ़ाउंडेशन (एसआरएफ़) के मंदिर तथा केंद्र हैंI भारत में इनका कार्य “योगोदा सत्संग सोसाइटी” के नाम से प्रचारित हैI

परमहंस योगानंद की शिक्षाऐं आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। विज्ञान ने चाहे कितनी भी प्रगति कर ली हो, लेकिन आज भी दुनिया में असमानता, हिंसा व टकराव व्याप्त हैं। स्पष्ट है की विश्व में आध्यात्मिकता की भी उतनी ही जरूरत है।

 

 

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