लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

मध्यप्रदेश बढ़ रहा है, रोज अपने को गढ़ रहा है, यह बात देश के हर राज्य के लिए और खुद देश के लिए बिल्कुल सच हो सकती है, लेकिन ऐसा बहुत कम होता है कि आगे विकास के पायदान पार करने के बाद यकायक कोई देश या राज्य एकदम पिछले सिरे से शुरू होने वाली गिनती में शुमार हो जाए। आज यह बात यदि मध्यप्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर कही जाए तो वह बिल्कुल सच साबित हो रही है। सरकार के लाख दावे हैं कि प्रतिदिन मध्यप्रदेश शिक्षा में एक कदम आगे शिखर की ओर बढ़ रहा है, पर वास्तविकता कुछ और कह रही है।

शिक्षा के विकास के लिए किया जा रहा सरकारी कार्य और आंकड़े देखकर यकायक यही लगता है कि कि इस वक्त मध्यप्रदेश में शिक्षा की बयार आई हुई है। लेकिन जब देश के अन्य राज्यों के साथ मध्यप्रदेश की तुलना करते हैं तो सच्ची और खरी जानकारी मिलती है। मालुम होता है कि शिक्षा को लेकर सरकार की ओर से किए गए विकास के दावे पूरी तरह सच नहीं हैं। मध्यप्रदेश लगातार शिक्षा व्यवस्था में अन्य राज्यों के मुकाबले पिछड़ रहा है। हालात यदि इसी तरह रहे तो वह दिन भी दूर नहीं होगा, जब बड़े राज्यों में शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर आज देश के  सबसे निचले पायदान पर मौजूद बिहार हमसे आगे निकल जाए। हाल ही में देशभर में हुआ एक सर्वे बताता है कि मध्यप्रदेश में पिछले 3 सालों के दौरान लगातार हमारे यहां शिक्षा की गुणवत्ता के स्तर में लगातार गिरावट आ रही है।

basic educationशिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी देश के केरल और गोवा जैसे राज्य आज जहाँ शिक्षा की क्वालिटी में सुधार की बातें कर रहे हैं, वहीं मध्यप्रदेश में अभी इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में काफी कुछ किया जाना अभी बाकी है। सर्वे के मुताबिक राष्ट्रीय रैंकिंग में मध्यप्रदेश लगातार पिछड़ रहा है। वर्ष 2013 में मध्यप्रदेश 8 वें स्थान पर था, जो 2014 में पिछड़कर 13वें स्थान पर आ गया। वर्ष 2015 में यह तीन पायदान और लुढ़ककर 16 वें स्थान पर पहँुच गया। यानि कि देश के बड़े राज्यों में शिक्षा के विकास के स्तर पर आज बढ़ते क्रम में मध्यप्रदेश से आगे ओडिसा, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, कर्नाटक, असम, जम्मू-कश्मीर, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, गुजरात और सबसे आगे केरल राज्य है।

राज्य का शिक्षा बजट

अब जरा शिक्षा में बजट के स्तर पर मध्यप्रदेश की बात हो जाए । यहां वर्ष 2014-15 की तुलना में वर्ष 2015-16 में शिक्षा के बजट में महज 896.12 करोड़ रुपए की वृद्धि की गई है। वर्ष 2014-15 में यह 14853.37 करोड़ रुपए था, जो वर्ष 2015-16 में बढ़कर 15749.49 करोड़ रुपए हो गया। बजट में की गई यह संक्षिप्त बढ़ोत्तरी से स्थिति में कुछ ज्यादा सुधार नहीं आ सका है। जितना बड़ा राज्य है और जिस हिसाब से यहां शिक्षा बजट राज्य सरकार को रखना चाहिए, ऐसा कभी नहीं हुआ कि वह राज्य सरकार ने तय किया हो। मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और इस पार्टी के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के साथ की नजदीकियां किसी से छुपी नहीं है। आज भाजपा में काम करने वाले संगठन स्तर पर और सरकार चला रहे कई मंत्री, यहां तक कि स्वयं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी इसी छात्र संगठन की पाठशाला से निकलकर आए हैं। यहां याद दिला दें कि यह संगठन हमेशा से यह मांग करता रहा है कि शिक्षा का बजट कुल बजट का 5 से 10 प्रतिशत तक होना चाहिए, जिससे कि शिक्षित जन से शिक्षित और उन्नत समाज का निर्माण संभव हो सके। यही उन्नत समाज ही भारत के भविष्य का निर्धारण करता है।

प्रदेश को चाहिए अभी तुरंत 37 हजार शिक्षक

मध्यप्रदेश में एक लाख 14 हजार 323 स्कूल हैं। इनमें से लगभग 40 हजार स्कूल सरकार के लाख दावों के बाद भी शौचालय विहीन हंै। इस बजट में सरकार ने सभी स्कूलों में शौचालय बनाने का संकल्प लिया है, लेकिन शिक्षक विहीन स्कूलों में टीचरों की भर्ती के बारे में बजट में कोई लक्ष्य नजर नहीं आता। राज्य के प्राइमरी स्कूलों में 17365 और माध्यमिक स्कूलों में 19,581 शिक्षकों की जरूरत है। इस प्रकार कुल करीब 37 हजार शिक्षकों की नियुक्ति अत्यंत आवश्यक है। अनिवार्य शिक्षा के अधिकार कानून का पालन करने में मध्यप्रदेश अभी भी लक्ष्य से काफी पीछे है और इसका असर शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ा है। 2012-13 से 2013-14 के दौरान प्राथमिक स्कूलों में करीब 4.5 लाख बच्चे कम हुए, जबकि माध्यमिक स्कूलों में 93 हजार बच्चे कम हुए। कक्षा एक से पांच और कक्षा पांच से कक्षा 8 में शालात्यागी बच्चों की दर तो घटी है, लेकिन बेटियों के पढ़ाई छोड़ने का प्रतिशत अभी भी ऊंचा है।

इसी तरह दलित और आदिवासी समुदाय में भी शालात्यागी बच्चों का प्रतिशत 25 से 35 प्रतिशत के बीच बना हुआ है। हालाँकि स्कूल न जाने वाले बच्चों की सं या 7.74 लाख से घटकर .43 लाख तक आ गई है। मिडिल स्कूल में एडमिशन लेने वाली लड़कियों की संख्या 2004-05 में जहाँ 73 प्रतिशत थी, वह बढ़कर 99.39 प्रतिशत हो गई। माध्यमिक स्तर पर स्कूल छोड़ने वाले छात्र-छात्राओं की सं या 14.7 से घटकर 10 प्रतिशत पर आ गई और इस स्तर पर एडमिशन लेने वाले छात्र-छात्राओं की संख्या 89.9 प्रतिशत से बढ़कर 99.2 प्रतिशत पर पहँुच गई। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी की रिपोर्ट के मुताबिक मध्यप्रदेश में शिक्षा पर प्रति व्यक्ति 731 रुपए खर्च किए जा रहे हैं। शिक्षा पर प्रदेश के 14 जिलों में तो औसत से भी कम पैसा खर्च किया गया, वहीं 16 जिलों में औसत से अधिक पैसा खर्च किया जा रहा है। यह माना जा रहा था कि शिक्षा के अधिकार कानून को लागू करने के लिए इस बार बजट में खासी बढ़ोतरी होगी। लेकिन इस वर्ष भी राज्य स्कूल शिक्षा विभाग के बजट में कोई खास बदलाव नहीं आया है। ऐसे में कुशल और नए शिक्षकों की नियुक्ति, पुराने स्कूल भवनों की मर मत, नए स्कूल भवनों का निर्माण, ग्रामीण स्कूल भवनों तक पहुंच मार्ग जैसे शिक्षा से जुड़ी तमाम ज्वलंत समस्याओं का समाधान इस साल के बजट में भी नजर नहीं आ रहा है। शिक्षा के सुधार को लेकर स्पष्टतौर पर नजर आता है कि मध्यप्रदेश को बड़े राज्यों में केरल से और यदि छोटे राज्यों की बात करें तो गोवा से आज बहुत कुछ सीखने की जरूरत है।

क्यों नहीं, केरल से मध्यप्रदेश कुछ सीखता

मध्यप्रदेश को यहाँ केरल से खीखना होगा कि हम अपने राज्य की शिक्षा व्यवस्था को किस तरह विश्व स्तर की बना सकते हैं। केरल वर्तमान में देश का ऐसा राज्य बनकर उ ारा है जोकि साक्षरता दर, प्राथमिक शिक्षा पूरी करने वाले 10-14 वर्ष के बच्चों का समानुपात, एडमिशन लेने वाले लड़कों और लड़कियों के बीच का अनुपात, छात्र-शिक्षक अनुपात, 6-23 वर्ष आयु वर्ग के प्रति बच्चे के हिसाब से शिक्षा पर खर्च, 15-23 वर्ष आयु वर्ग की आबादी पर कॉलेजों की सं या तथा 6-15 वर्ष आयु वर्ग की आबादी के हिसाब से स्कूल, कॉलेजों की सं या में देशभर में अव्वल पाया गया है। छोटे से तटवर्ती राज्य केरल ने न सिर्फ इन सभी बिंदुओं पर बेहतरीन प्रदर्शन किया, बल्कि स्कूलों की कायाकल्प करने वाली कई पहल भी की हैं। पहले एलडीएफ और फिर कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ सरकार, दोनों ने ही राज्य में शिक्षा के विकास में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसके तहत शिक्षा और शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता तो सुधारी ही गई, राज्य में हजारों नए स्कूल भी खोले गए।

ऐसे हैं, यहां के स्थानीय विधायक

राज्य में एलडीएफ सरकार के कार्यकाल में शुरू किए गए प्रिज्म (प्रमोटिंग रीजनल स्कूल्स टू द इंटरनेशनल स्टेंडर्ड्स थ्रू मल्टीपल इंटरवेंशंस) यानी बहुआयामी पहल के माध्यम से राज्य के स्कूलों को अंतरराष्ट्रीय मापदंडों का बनाने के अभियान ने राज्य में शिक्षा के क्षेत्र में एक क्रांति ला दी है। इस क्रांति का अग्रदूत बना कोझिकोड के नडाक्काबु में स्थित लड़कियों का शासकीय वोकेशनल हायर सेकंडरी स्कूल।

स्थानीय विधायक प्रदीप कुमार ने इस स्कूल के विकास के लिए व्यक्तिगत प्रयासों से करीब 14 करोड़ रुपए जुटाए और सरकार से स्कूल के विकास में निजी ाागीदारी की अनुमति ली। उसके बाद शुरू हुआ स्कूल के कायाकल्प का दौर। अब इस स्कूल में अत्याधुनिक विज्ञान प्रयोगशालाएँ, कांफ्रेंस हॉल, पुस्तकों से ारपूर लायब्रेरी, आधुनिक किचन और केंटीन जैसी तमाम सुविधाएँ उपलब्ध हैं। स्कूल की खासियत है यहाँ की पढ़ाई का स्तर, जो इसे अच्छे से अच्छे निजी स्कूल से भी आगे रखता है। धीरे-धीरे करके केरल के सभी सरकारी स्कूल ऐसे ही दौर से गुजर रहे हैं। अब केरल सरकार ने 2016 तक राज्य को पूर्ण प्राथमिक शिक्षा अर्जित करने वाला देश का पहला राज्य बनाने का लक्ष्य तय किया है। सिर्फ स्कूल शिक्षा नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा के स्तर पर भी केरल सरकार ने कई नई पहल की हैं। इनमें पसंद आधारित क्रेडिट और सेमेस्टर सिस्टम, स्वायत्त कॉलेज, ऑनर्स डिग्री पाठ्यक्रम, उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यानन परिषद तथा नेशनल बोर्ड ऑफ एक्रेडिटेशन पर जोर देना शामिल है।

यहां स्कूलों में एडमिशन लेने वाली लड़कियों की में 10 प्रतिशत वृद्धि, जो देश में सबसे ज्यादा है। वहीं यह भी जाना जाए कि राज्य में पिछले एक साल में 8 हजार नए स्कूल खोले गए, जो वहाँ के कुल स्कूलों का 16 प्रतिशत हैं।

छोटे राज्यों में गोवा से भी बहुत कुछ जाना जा सकता है

देश के छोटे राज्यों में गोवा शिक्षा के क्षेत्र में लगातार तीसरे वर्ष नं.1 पर बना हुआ है। राज्य की इस उपलब्धि की वजह मु यमंत्री लक्ष्मीकांत पर्सेकर के इस कथन से झलकती है। उनका कहना है कि -‘हमने शिक्षा पर खर्च को कभी खर्च की तरह नहीं देखा, बल्कि निवेश के तौर पर देखा है।’ वास्तव में गोवा सरकार को अब इस निवेश का परिणाम भी मिलने लगा है। राज्य ने वर्ष 2013-14 में 6 से 23 वर्ष आयु समूह पर प्रति व्यक्ति 6,16000 रुपए खर्च किए। पिछले 2 सालों में सरकार ने शिक्षा पर औसत घरेलू खर्च में 3578 रु. की वृद्धि की है। वर्ष 2011-12 में 5278 रुपए था, जो 2013-14 में बढ़कर 8796 रुपए हो गया। 2012 में राज्य में बीजेपी के सत्ता संभालने के बाद से राज्य में शिक्षा पर खर्च 64 फीसदी बढ़ा दिया गया है। राज्य में स्कूलों की सं या के बारे में मु यमंत्री पर्सेकर जो खुद एक स्कूल में प्रधानाध्यापक रहे हैं, का कहना है-‘हमें स्कूलों की गिनती बढ़ाने की जरूरत नहीं है। खासकर तब, जब आबादी की दर घटकर 1.6 पर आ गई है। हमें भविष्य के लिए क्षमता बढ़ाने की जरूरत नहीं है, इसलिए हम शिक्षा की क्वालिटी पर पूरा जोर दे रहे हैं।’

हमारे मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री भी चाहें तो केरल एवं गोवा राज्यों से सीखकर अपने यहां सरकारी स्तर पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए प्रतिबद्ध हो सकते हैं, बशर्ते, आवश्यकता बस, इतनी होगी कि वे भी गोवा के मु यमंत्री  लक्ष्मीकांत पर्सेकर  की तरह अपना नजरिया पहले बदल लें, तभी मध्यप्रदेश में शिक्षा का स्तर सुधरेगा और अमीरों के साथ परस्पर गरीब बच्चों को भी श्रेयस्कर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एक छत के नीचे नसीब हो पाएगी। बात यहां भविष्य की है, और उज्जवल भविष्य का सपना हर कोई देखता है। आने वाली पीढ़ी न केवल राज्य की बल्कि देश की प्रगति तय करेगी, इसलिए उसके साथ किसी तरह की खिलवाड़ या समझौता किसी भी सूरत में हितकर नहीं माना जा सकता है। ऐसे में अब मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से इस बात की उ मीद तो की ही जा सकती है कि नए साल में वे स्वयं राज्य के भविष्य को गढ़ने में रुचि लेंगे और विद्यालयीन शिक्षा को श्रेष्ठ बनाने के लिए अपने अन्य चुनिंदा विभागों में शिक्षा विभाग को शामिल कर उस पर भी अपना सीधा ध्यान केन्द्रित करेंग

 

 

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