लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

Posted On by &filed under जन-जागरण, विविधा.


1सूखे से देश के लोगों की स्थिति बड़ी ही दयनीय बन चुकी है। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश के सर्वोच्च न्यायालय को सक्रिय होकर सरकार को उसका कत्र्तव्य बोध कराया गया है। देश के नौ राज्य इस समय भयंकर सूखे की चपेट में हैं। लोगों के लिए इस सबके बीच यह एक अच्छी खबर है कि इस बार मानसून अच्छा रहने की भविष्यवाणी मौसम विभाग कर रहा है। परंतु जब तक मानसून आएगा तब तक तो बहुत से लोग अपने प्राणों से ही हाथ धो बैठेंगे। हमारी यह प्रवृत्ति बन गयी है कि यदि कोई अचानक प्राकृतिक आपदा आती है या कहीं कोई आतंकी घटना होती है तो उसके प्रति तो हम अपनी कुछ संवेदनाएं दिखाते हैं, पर जहां प्रकृति का मौन कहर टूट रहा हो, उस ओर से हम सब और हमारी सरकारें पूर्णत: संवेदनशून्य रहती हैं। कलकत्ता में एक पुल टूटता है कई अनमोल जानें उसमें चली जाती हैं तो यह समाचार हमें थोड़ा सा हिलाता है, परंतु देश के नौ राज्यों में सूखा पड़े, हमारे अपने लोग कई-कई किलोमीटर दूर से पानी लेने के लिए पैदल यात्रा करें और वहां पानी को लेकर झगड़ें, सिर फुटौवल करें ये सब चीजें हमें हिला नही पाती हैं। प्रधानमंत्री मोदी की इस बात की प्रशंसाा करनी होगी कि उन्होंने लातूर के लिए विशेष ट्रेन के माध्यम से पानी पहुंचवाया है और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी दिल्ली से सूखाग्रस्त क्षेत्रों के लिए पानी भेजने की पेशकश की है तो उनका यह कदम भी प्रशंसनीय है। शेष देश में बड़े आराम से देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, चुनावी सभाएं हो रही हैं मंत्रीजी और हमारे जनप्रतिनिधियों की दिनचर्या वही है जो पहले से चली आ रही थी।

हमारे विचार से देश में लोकसभा के 543 सांसदों की संख्या निरर्थक है। हमें नही लगता कि इनमें से 25 प्रतिशत लोगों का भी राष्ट्रीय दृष्टिकोण हो। ये अपने वातानुकूलित भव्य भवनों में से अपने कार्य के लिए भी बाहर नही निकलते हैं तो देश के कार्यों के लिए तो इन्हें क्या निकलना है? संभवत: ऐसा एक भी सांसद न हो जो कि सांसद रहते हुए अपने पड़ोसी प्रदेश या पड़ोसी संसदीय क्षेत्र में आयी प्राकृतिक आपदा के समय वहां लोगों का दुखदर्द बांटने कभी उनके साथ खड़ा दिखाई दिया हो। जनप्रतिनिधि का कार्य यह तो है नही। उसे जनप्रतिनिधि कहा ही इसलिए जाता है कि वह सारी जनता का प्रतिनिधि है। इसलिए लोकतंत्र में उससे अपेक्षा की जाती है कि वह सबका और पूरे देश का बनकर रहे।

यदि हमारे सांसदों का राष्ट्रीय दृष्टिकोण होता तो जैसे अब नौ राज्य भयंकर सूखे की मार झेल रहे हैं, ऐसे में इन राज्यों के जनप्रतिनिधियों को एक सामूहिक शिष्टमंडल बनाना चाहिए था और उसके सौजन्य से इन्हें क्षेत्र में उतरना चाहिए। इन्हें कई स्थानों पर स्वयं सक्रिय होकर ऐसे उपाय खोजने चाहिए जो सरकार के लिए उपयोगी हों, अधिकारियों के साथ तथा जनता के लोगों के साथ बैठकर उन संभावनाओं पर विचार करना चाहिए जिनसे इस प्रकार की प्राकृतिक विपदाओं से पार पाया जा सके। देश में विचार गोष्ठियों का आयोजन हो और उन विचार गोष्ठियों के निष्कर्षों को लोगों की राय के रूप में विशेषज्ञों और सरकार के सामने रखना चाहिए। पर दुर्भाग्य की बात है कि ये सारे के सारे  सांसद महोदय अपने-अपने घरों में लू से बचे पड़े रहते हैं। जिससे इनके भीतर निकम्मेपन का भाव जागता है। चुनाव को जीतने के लिए ये सदा तिकड़में भिड़ाते हैं और तिकड़म ही खोजते रहते हैं। इनकी डिनर पार्टियों में या अंतरंग लोगों के साथ होने वाली बैठकों में ‘तिकड़म’ और ‘जुगाड़’ इन दो बातों पर ही अधिक चर्चा होती है। देश के लिए प्रधानमंत्री की ‘कौशल विकास’ योजना चाहे जो हो पर हमारे मान्यवरों के लिए तो कौशल विकास का अर्थ केवल ‘तिकड़म’ और ‘जुगाड़’ ही हैं। ‘तिकड़म’ और ‘जुगाड़’ ने इन लोगों को इतना आलसी और प्रमादी बना दिया है कि इनके चलते ही देश में क्षेत्रवाद, भाषावाद, प्रांतवाद, जातिवाद और सम्प्रदायवाद जैसी बीमारियां फैली हैं। क्योंकि हमारे मान्यवरों के ‘कौशल विकास’ में इन्हीं वादों का पाठ्यक्रम निश्चित किया जाता है। इनके ऐसे कार्यों और मानसिकता को देखकर तो यही लगता है कि इनके पास दिमाग लगाने के लिए कहीं कुछ नही है। केवल विनाश में ही ये अपना दिमाग लगा सकते हैं। ऐसा लोकतंत्र किस काम का और ऐसे जनप्रतिनिधि किस काम के जिनका अपना स्तर भी केवल ‘तिकड़म’ और ‘जुगाड़’ तक ही सीमित हो?

देश में जल संकट की जो विषम स्थिति उत्पन्न हो गयी है वह हमारे भविष्य के लिए एक चुनौती बनती जा रही है और साथ ही एक चेतावनी भी कि यदि अभी नही चेते तो भयंकर परिणामों के लिए तैयार रहो। हमारे वेदों में वर्षा कराने के मंत्र हैं, वृष्टि यज्ञ कराने का विधान है। मोदी सरकार क्योंकि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रचारिका है, और उसमें उसका विश्वास भी है, तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वह वृष्टि यज्ञ की भारत की प्राचीन परंपरा को पुन: जीवित और विकसित करें। दूसरे-राजस्थान की ओर से समुद्र से पाइपों के माध्यम से पानी को देश की नदियों तक लाया जाकर उनके जल का शोधन कराके उसे नदियों में डाला जाए। जिससे नदियों का अस्तित्व बचेगा, हरियाली बचेगी, सूखी धरती और प्यासे लोगों की प्यास बुझेगी। यह कार्य थोड़ा जोखिम भरा तो है पर जब हम इतनी दूर से गैस पाइप लाइन ला सकते हैं तो पानी को लाना भी हमारे लिए असंभव नही है। हम संकल्प लेने से बचते हैं यदि हम संकल्प ले लें तो सब कुछ संभव है। तीसरे-वर्षा जल को हमें संचित करने की प्रक्रिया पर गंभीरता से विचार करना होगा। ‘गांव का जल गांव के लिए’ की योजना बनाकर सारे पानी को गांव के तालाबों में ही रखने पर बल दिया जाए। गांवों में लोगों ने पानी की मोटरें नलकों पर लगा ली हैं जो कि भूगर्भीय जल के दोहन का सबसे अधिक घातक साधन सिद्घ हो रही है। गांवों में ऐसी व्यवस्था की जाए कि पानी के मीटर लगाकर उन लोगों की रोजाना की आवश्यकता का अंदाजा लगाकर वहां तक बिजली न्यूनतम दर पर दी जाए, परंतु उससे अधिक पानी खर्च करने पर बिजली की दरों में ऐसी वृद्घि की जाए जो कि उन्हें दण्डात्मक दिखायी दे। प्रकृति के प्रति अपने कत्र्तव्यों को न समझने की मूर्खता की सारा देश सजा भुगत रहा है और सरकारें लोकप्रिय निर्णय लेने के चक्कर में प्रकृति के साथ हो रहे अन्याय को सहन करती जा रही हैं। जिससे हम सब विनाश की ओर बढ़ते जा रहे हैं। उस विनाश से बचने का अब समय आ गया है।

शहरों में वर्षाती जल को रोकने के लिए उसे छत आदि से सीधे नीचे धरती उतारने की व्यवस्था की गयी है, पर उसे कड़ाई से लागू नही किया गया है। जबकि उसे भी कड़ाई से लागू करने की आवश्यकता है। शहरों के सीवर लाइन के पीनी को भी पुन: शुद्घ करके उसे खेती के योग्य और जहां तक संभव हो सके, पीने योग्य बनाने की ओर ध्यान दिया जाए। विशेषत: लोगों को इन सभी उपायों को समझाने के लिए देश के शहरों-कस्बों व गांवों में उतारना होगा। कहने का अभिप्राय है कि जल की एक बूंद भी नष्ट न हो, ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए। हर व्यक्ति को अपने घर में भी पानी को इस प्रकार व्यय करना चाहिए जैसे कि वह स्वयं भी अपने अन्य देशवासियों की भांति जल संकट  का सामना कर रहा है। यदि ऐसा भी किया जाता है तो यह भी एक प्रकार की देश सेवा ही होगी।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz