लेखक परिचय

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

‘नेटजाल.कॉम‘ के संपादकीय निदेशक, लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन तथा भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष।

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bansalकिसी रिश्वतखोर नेता या अफसर के घरवालों ने आत्महत्या कर ली हो, ऐसा कभी सुना नहीं लेकिन दिल्ली में ऐसा ही हुआ है। यह अभी सिद्ध नही हुआ है कि कारपोरेट अफेयर्स मंत्रालय के महानिदेशक बी.के. बंसल ने रिश्वत ली है लेकिन उन्हें ठोस प्रमाणों के आधार पर गिरफ्तार किया गया है। उन पर जांच चल रही है। आसार यही हैं कि वे अपराधी सिद्ध होंगे।

अपराध सिद्ध हो, उसके पहले ही उनकी पत्नी और बेटी ने आत्महत्या कर ली। उनके घर पर छापा पड़ा था। उन्हें रंगे हाथ तो गिरफ्तार किया ही गया था, घंटों चली जांच से पता चला कि उनके घर में नकद लाखों रु., कई किलो सोना और कई मकानों की मिल्कियत के दस्तावेज भी मिले हैं। याने रिश्वत का यह सिलसिला पुराना है और घर के लोगों को सब पता था। अभी बंसल ने एक ऐसे मामले की जांच रुकवाने के लिए रिश्वत मांगी थी, जिसमें एक धूर्त ने हजारों लोगों को ठग लिया था।

बंसल की पत्नी और बेटी की मौत की खबर दर्दनाक थी लेकिन असली सवाल यह है कि जब बंसल रिश्वतें लेता रहा था, तब उन्होंने उसका विरोध क्यों नहीं किया? उन्होंने उससे क्यों नहीं पूछा कि इतना पैसा तुम कहां से लाते हो? इसका अर्थ यह हुआ कि उन्होंने आत्महत्या रिश्वत के विरोध में नहीं की बल्कि बदनामी के डर से की! यह भी बड़ी बात है। हम तो ऐसे सैकड़ों नेताओं और अफसरों को जानते हैं, जो रिश्वत खाते हैं और मूंछ पर ताव दिए घूमते हैं। उन पर आरोप सिद्ध हो जाते हैं, तब भी वे बेशर्मी से जिए जाते हैं।

इसका इलाज मैं कई बार अपने लेखों और भाषणों में सुझा चुका हूं। रिश्वतखोर नेताओं और अफसरों की सारी संपत्ति जब्त की जानी चाहिए, उनकी नौकरी और पेंशन खत्म करनी चाहिए, उनके समस्त आश्रितों और निकट संबंधियों की भी कड़ी जांच होनी चाहिए। उनके साथ-साथ इनको भी सजा मिलनी चाहिए। जिस-जिस ने उस रिश्वत से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष फायदा लिया हो, उन सबको कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। मुझे खुशी है कि इसी आशय का एक एतिहासिक फैसला जबलपुर के एक अफसर के बारे में इधर हुआ है। रक्षा-विभाग के एक मुनीम के बेटे-बहू और पत्नी को भी पांच-पांच साल की जेल हुई है। रिश्वत की रकम उनके खाते में भी पकड़ी गई थी। इस सजा का देश में जितना प्रचार होना चाहिए था, नहीं हुआ। देश में सरकारें आती और जाती रहती हैं लेकिन रिश्वतखोरी में कोई फर्क नहीं पड़ता है, क्योंकि रिश्वतखोर नेताओं और अफसरों से बड़े बेईमान हम खुद हैं। हम अपने गलत काम करवाने के लिए रिश्वत देते हैं। यदि भारत के मध्यम और उच्च वर्ग के लोग यह प्रतिज्ञा करें कि वे रिश्वत नहीं देंगे तो रिश्वत का बाजार एकदम ठंडा पड़ जाएगा।

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