लेखक परिचय

एस.के. चौधरी

एस.के. चौधरी

पेशे से पत्रकार हैं।

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मेरा भारत महान…… ! हर ट्रक के पीछे लिखने का जारी हुआ फरमान, एक ट्रक ड्राईवर ने फरमान निभाते हुआ लिखा अपने ट्रक के पीछे, छोटे अक्षर में पहले, “ सौ में नब्बे बेईमान” और बड़े बड़े अक्षर में लिखा, उसके ही नीचे, “ मेरा भारत महान.” । पुलीस ने जब ये देखा, तो ड्राईवर को उसने रोका, और जेल की धमकी देकर, गुस्से में बहुत सुनाया. ड्राईवर ने शांत और मधुर स्वरों में बोला, “ साहेब क्यों गुसा हो तुम, तुम तो हो मेरे दस में, पुलिस भी समझ गया , ड्राईवर को उसने छोड़ दिया ।

“मेरा भारत महान”, इसकी कोई परिभाषा नहीं हो सकती। न ही इसका कोई विस्तार किया जा सकता है। यह तो अपने आप में पूर्ण वाक्य है। इस बात की चुभन भी होती है कि हम देशप्रेमी हैं तो भ्रष्टाचार, निरन्तर बढ़ती महंगाई, विदेशों में जमा काला धन, आदर्श भूमि घोटाला, आम आदमी का शोषण और महिलाओं की दुर्दशा क्यों सहन कर रहे हैं? क्या ये सारे मामले भारत की शान बढ़ाएंगे? एक आम भारतीय होने के नाते ये सवाल कचोटते हैं। राष्ट्र के प्रतीक नामों पर गौर करें- गांधी, लोकमान्य तिलक, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अश्फाक उल्ला, जयप्रकाश नारायण, सावरकर आदि-आदि। सभी आजादी से पहले जन्मे थे, स्वतंत्र होने के बाद देश का वातावरण ऐसा नहीं रहा कि इस तरह के एक भी प्रतीक चरित्र यह राष्ट्र पैदा कर पाता। परिणाम कि गुलाम भारत के युवाओं के प्रतीक सुभाष, आजाद होते थे तो आज शाहरुख, सलमान और सचिन हैं। आज देश का युवा अब महात्मा गांधी, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस जैसा नहीं बनना चाहता। क्योकिं वह जान चुका है कि राष्ट्र के लिए खून देने वाले लोग इस राष्ट्र के अधिनायकवादी तंत्र द्वारा भुला दिए जाते हैं और याद किए जाते हैं वह लोग जिनके बाप- दादे अंग्रेजों के समय चाटुकारिता कर रायबहादुर, राय साहब बने थे और आज भी आनंद में ओत-प्रोत हैं। रानी लक्ष्मीबाई के किसी वंशज का कहीं कोई पता है? वह भारत की स्वतंत्रता सेनानी थी इसीलिए। लेकिन ‘सिंधिया’ को सभी जानते हैं, जबकि इस खानदान द्वारा अंग्रेजों की तरफदारी करके रानी झांसी लक्ष्मीबाई को मरवा दी थीं। मेरा भारत महान……. एक ऐसा वाक्य जिसे हम भारतीय अक्सर कहते रहते है, क्योकि ये हमारे अहं को तृप्त करने का एक तरीका है, भारत महान है तो इसका अर्थ ये हुआ की हर भारतीय महान है, ये वो देश है जहा माँ- बाप के लिए उसका बेटा सबसे अच्छा होता है, मगर कई बार बाकि लोग उनसे सहमत नहीं होते ठिक
ऐसा ही हाल कुछ भारत का है हम अपने अन्दर इसको महान कहते कहते मर जाते है पर ऐसा कुछ नहीं करते की अन्य देश कहे की भारत महान है । मेरा भारत महान हर हिन्दुस्तानी ये शब्द कहते हुए एक अजीब सी गर्वानुभूति करता है, उसके अन्दर कही ये भावना रहती है की भारत महान है क्योंकी वो यहाँ पैदा हुआ है । यह नारा सिर्फ मन कि भावनाओ मे यथार्थ धुंधला और बदसूरत है ये समाज भी जानता है और समाजवादी भी जो समाज की रोटी कि चिँता पर अपनी अपने चुल्हे की आग की तेज करने मे लगे रहते हैं ।

मेरा भारत महान का नारा किसने दिया ये मुझे भी पता नहीं था मैने कई लोगों से पुछा लेकिन मुझे कहीं से जवाब नहीं मिला, बाद मे गुगल बाबा की मदद से जान पाया कि राजीव गांधी इस नारे के जन्मदाता हैं । राजीव गांधी को ये पता था कि भारत महान हो ना हो लेकिन भारत की जनता जरुर महान हैं, बड़ी आसानी से उसे भावनात्मक रुप से बहकाया जा सकता हैं जो आज तक हो रहा हैं..घोटालों का सिलसीला तो नेहरु काल से चला आ रहा हैं जिसे राजीव गांधी ने भी बखुबी निभाते हुए भारत की महानता का परिचय दिया था ।भोपाल गैस कांड को उस समय एक ट्रक हादसा बताकर आरोपी को छोड़ दिया जाता हैं औऱ मामले की सुनवाई करने वाले जज साहब रिटायरमेंट के बाद आरोपी कंपनी के चेयमैन बन जाते हैं । बाद मे जब मामले से पर्दा उठता हैं तो राजीव गांधी सहीत भोपाल के तत्कालीन अधिकारियों की भी मिलीभगत की पुष्टी वही अदालत करती हैं जो एक बार कंपनी को निर्दोष साबित कर चुकी थी ।महान भारत की गाथा यहीं खत्म नहीं होती। एक मंत्री हैं जयराम रमेश। भोपाल जाते हैं। वहां की मिट्टïी को हाथ में उठाकर प्रमाणपत्र देते हैं कि मिट्टी तो स्वच्छ है, विषाक्त नहीं। भोपाल गैस त्रासदी के पीडि़तों की आत्माओं को चिढ़ाते हुए रमेश परोक्ष में यूनियन कार्बाइड को आरोपमुक्त करते हैं। 25 वर्षों बाद जयराम रमेश का यह प्रमाणपत्र पूरे देश की समझ को मुंह चिढ़ा रहा है। काश कि जयराम रमेश 2-3 दिसंबर 1984 की रात भोपाल में रात्रि व्यतीत कर रहे होते! घोटाले के खेल तभी से निरंतर चले आ रहे है., आज भी लाखों कड़ोंरों के घोटाले के बावजुद कलमाडी जेल से छुटने के बावजुद तथाकथीत लोकतंत्र के उसी पवीत्र मंदिर मे नजर आते हैं, जिसके अपमान के नाम पर हमारे नेता भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने वालों को धमकाते रहते हैं, और महान जनता भी इसे सिस्टम का हिस्सा मानकर बड़े आराम से कलमाडीयों को लुटते रहने का लाइसेंस देती रहती हैं..ये मेरा महान भारत हैं, जहां लोकतंत्र का जना सपूत है, कपूतता पर उतर आया हैं, और कानून प्रशासन को घर की रखैल बना कर रख लिये, सीधे शब्दो मे बेटा बाप को बेटा कहने लगा और बाप आंदोलन की लाठी से धमकाने की कोशिश मे खुद, पिटने लगा ये मेरा भारत है जहाँ गरीब कानून के जूते से डरता है लेकिन यही कानून सफेदपोश नेताजी के जूते भी साफ करता है । जंहा डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है.बसेरा वह भारत देश है मेरा !
ये गीत इस देश की संम्पन्नता का अहसास कराती है ! तुम मुझे खून दो मै तुझे आजादी दूंगा के नारे नेता जी सुभाष चंद बोस की याद दिलाते है ! जो बूढ़े थे और लाठी के सहारे चलते थे पर देश को सही राह दिखाते थे वो बापू सिर्फ 2 अक्टुबरको याद आते है!
वो कल था !
पर आज इस देश की महानता में दाग लगाने के लिए मंत्री से लेकर संतरी, साधु-संत से लेकर चमचे तक सब तैयार है !कोई देश के संचार साधन को खा रहा है ! तो कोई कोयला खा रहा है !
जिसे कुछ न मिला वो पशुओं का चारा ही खा जा रहा है !
अफसर घर पर लेता है तो बाबु टेबुल के नीचे से लेता है ! फिर भी रोता है !
पर जब सीबीआई का छापा पड़ता है तो पटवारी के यहाँ ढाई करोड़ मिलता है !
कोई आईपीएस ईमानदार होता है तो वह ट्रेक्टर से कुचल कर मार दिया जाता है !
कोई खा खा के मरता है तो कोई खाए बिना मरता है । इस देश की संस्कृति, सभ्यता विश्व की श्रेष्ठ सभ्यताओं मे से एक थी, हमारी भाषा वेश भूषा सबकुछ अनेक हैं फिर भी अनेकता मे एकता हमारी विशेषता थी । आज संवेदनाओं को इस देश ने धुंए मे उडाना सीख लीया हैं, किसानों की आत्म हत्याओं पर मुस्कुराना सीख लीया हैं, बहू-बेटीयों को जलाना, शोषण की सेज पर नारियों को लिटाना, और संस्कारों के क्षेत्र मे महानता की पराकाष्ठा पार कर चुके हैं । बूढे मा-बाप अब बोझ लगने लगे हैं इसलिए उन्हे घर से बाहर आश्रमों मे आसरा मिलता हैं । मनोरंजन के नाम पर कैमरे ने समाज मे जो अश्लिलता फैलाई हैं उसका असर हम रोज देख रहे हैं, कहीं किसी लड़की के साथ बिच सड़क पर बदसलुकी होती हैं और समाज मुकदर्शक बना रहता हैं वो समाज कैसे अपने आप को भारतीय कहने पर गर्व महसुस कर सकता हैं ? टेलीवीजन के शुरुआत मे रामायण- महाभारत ने घर-घर मे जो शिक्षा फैलाई उसे आज बिग-बॉस और यूथ चैनल के यूवा आधारित कार्यक्रम पिछे छोड़ चुके हैं..लोगों के बेडरुम तक पोर्न स्टार सन्नी लेओन टीवी के जरिये पहुंच चुकी हैं वहीं फिल्मो मे अब लीड रोल निभा रहीं हैं साथ ही मिडीया के जाने माने पत्रकार भी उनकी पब्लीसीटी मे उसका इटरब्यू दिखाने से नहीं चुकते । जिस भाषा ने भारत में अपना बचपन बिताया वह अब अपना यौवन विदेशों में बिता रही है। भारतीयों की बेरूखी की शिकार देववाणी संस्कृत को विदेशों में भरपूर दुलार व सम्मान मिल रहा है। भ्रष्टाचार के नाम पर आंदोलन करने वाले नेता खुद को स्टार समझने लगते हैं और भूल जाते हैं कि यह दौड़ इंदिरा गांधी का नहीं मनमोहन सिंह और सोनीया गांधी का हैं जिनके खिलाफ आंदोलन जेपी की सफलता से भी कठिन हैं । एक आम आदमी के साथ जुड़ने वाली जनता स्टार का साथ छोड़ देती हैं और फिर यह मान बैठती हैं कि यह देश ऐसे हीं महान रहेगा । संतो और बाबाओं की दौलत का कोई शानी नहीं हैं, कोई सेक्स स्कैंडल मे फंसता हैं तो कोई फर्जीवारे के चक्कर मे पिट रहा हैं, 40 साल पहले कौन से साधु, सन्यासी, अवधूत, महात्मा या महंत के पास इतना धन दौलत था जितना आज हैं ? लूट के इस खेल मे भगवान को भी नहीं बक्शा जाता, खुद को सबसे बड़ा पूजारी साबीत करने की राजनीती मे महंतो की जान चली जाती हैं, क्योकी देश की तरक्की के साथ हीं भगवानों की भी तरक्की हुई हैं. बालाजी से लेकर शिरडी साई के दरबार तक के चढावे पर नजर दौराने पर विकसीत भारत की तस्वीर नजर आती हैं । यह देश वाकई इतना महान हो गया हैं जहाँ जिसका विरोध करना है उसी से अनुमति लेनी है, जो है तो धर्मनिरपेक्ष लेकिन यहाँ जनगणना जाति के आधार पर की जाती है. जिसका संविधान कथित तौर पर जनता के लिए है, वास्तव में चंद लोगो का जनता के लिए है. जहाँ कहा जाता है की न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए दिखना भी चाहिए. लेकिन न्याय होता तो है दीखता कहीं नहीं है. जहाँ एक आम आदमी इतना आतंकित है की वो देश के ऊपर हो रहे अत्याचार के विरोध में इसलिए नहीं बोल पा रहा क्योंकि वो अत्याचार उसके ऊपर होने का खतरा है. भ्रष्टाचार के मामले में आत्मा यहाँ तक मर गयी है की बरसों तक साथ काम करने वाला व्यक्ति जब रिटायर होता है, तो उसी से हम पेंशन के निपटारे के लिए रिश्वत ले लेते है. लोकतंत्र के नाम पर षड्यंत्र करते हुए जो खलनायक ‘अधिनायक’ बन बैठे उन पर हमने कभी गौर किया? सत्ता के सभी अंग- न्यायपालिका, व्यवस्थापिका, कार्यपालिका अपनी-अपनी सुविधाओं की तानाशाही पर आमादा होकर ‘अधिनायक जय हो’ कर रहे हैं. जिस देश की आधी आबादी गरीबी रेखा के निचे हो उसे दुनीया को अपनी ताकत और विकाश के नाम पर ऐसे खेल का आयोजन करना पड़ता हैं जिसमे लाखों कड़ोर गटक कर कलमाडीयों औऱ राजाओं की चांदी हो जाती हैं । ये वही सोने कि चिड़िया है जहाँ दिन भर कंधे पर मिट्टी ढोने के बाद सिर्फ रोटी ही मिलती है बच्चो का भविष्य नही । मिलेगा भी कैसे फामूर्ला वन रेस जैसे पूँजीपतीयो की जी हूजूरी आयोजन करने वालो को इनसे क्या वास्ता मूलभूत सुविधाये टेढी खीर है ये आम आदमी समझ चुका है ओर चुप चाप सहन कर तमाशा देख रहा है फिर चुनाव आयेगा और मत डाल आयेगा और सो जायेगा यही नियति है मेरे भारत महान की ।

सत्ताधिशों के बनाए गए कानुन को देश की गौरव के नाम पर चुपचाप झेलते हुए हम अपने महानता पर गर्व महसुस करते हैं और राजाओं से लेकर अंबानीयों तक बड़े आराम से इस देश को लुटते हैं क्योकी कानुन उनके दायरे मे आता हैं । हमारे रहनुमा लोकतंत्र के मंदिर मे मोबाइल और आईपैड पर पोर्न मुवी देखते हैं लेकिन उनके उपर कार्यवाई इसलिए नहीं हो पाती क्योकी महान भारत के महान लोगों ने चुनकर उन्हे भेजा हैं । हम पश्चिम की जीवन शैली को विकास के नाम पर अपना तो लेते हैं लेकिन पश्चिम जैसी कानुन ब्यवस्था बनाने की बात पर चुप रहते हैं क्योकी हम महान हैं..फैशन के नाम पर अपनी संस्क़ति को तार-तार कर चुके हैं पहनावे पर बहस नहीं होनी चाहिए लेकिन महान सभ्यता ने ऐसा विकाश किया जिसे देखकर महिलाएं हीं शर्मा जाए, पुरुषों की तो बात हीं अलग हैं । यह कौन सा विकाश हैं जहां पिज्जा एंबूलेंस और पुलीस से पहले पहुंच जाता हैं, जहां कार लोन शिक्षा लोन से सस्ता हैं, जहां आटा चावल की तुलना मे सिम कार्ड फ्रि मे उपलब्ध हैं, जहां अरबपति गरिबों के जीवन मे सुधार लाने के बजाय क्रिकेट की टीमें खरिदते हैं…क्या कपिलदेव के जमाने मे क्रिकेट इस देश मे मशहुर नहीं था या आईपीएल से पहले क्रिकेट की खुमारी नहीं थी, जो क्रिकेट के नाम पर कई कड़ोरो के ब्लैक मनी को सफेद पैसा बनाया जा रहा हैं और नंगा नाच दिखाया जा रहा हैं । जहां किसान आत्महत्या कर रहे हैं वहीं खेल के नाम उनकी उपजाऊ जमीन को जबरदस्ती छिनकर उद्योगपतियों को रेसिंग ट्रैक बनाने के लिए दे दिए जाते हैं क्योंकि वे सतासीनों को मोटे चढावे-चढाते हैं । जिस महान भारत को आजाद करने वालों को उसी के देश मे उन्हे आतंकवादी बताया जाता हैं वहीं अफजल गुरु और कसाब पर कड़ोरों रुपये खर्च किए जा रहे हैं । जिस शिवाजी के नाम पर वोट मांगा जाता हैं उनको आतंकवादी कहने पर ठाकरे परिवार चुपी साध लेता हैं..जिस गंगा को हम अपना गौरव मानकर भारत के महान होने का दंभ भरते हैं आज वही गंगा दम तोड़ रही हैं और इसे जीवीत करने के नाम पर हर साल उन्ही गंगा भक्तों की मेहनत की कमाई लुट ली जाती हैं । वह देश जहां गीता का महाज्ञान यूद्ध के मैदान मे दिया गया था और अधर्म का नाश करने की शिक्षा दी गई थी, वो अपने संसद और मुंबई जैसे हमलों के बाद भी अपनी महानता की आड़ मे चुपी साध लेता हैं..ये हमारी महानता हैं या कायरता ? क्योकी कायरता कभी महान नही हो सकती । विश्व को जिसने प्रथम विश्वविद्यालय तक्षशिला और नालंदा जैसे आधुनिक विश्वविद्यालय दिए आज उस महान देश की शिक्षा का स्तर क्या हैं ? आज इस देश मे कड़ोरो लोग ऐसे हैं जो प्राइमरी स्कुल से आगे नहीं पढं पाते क्योकी कहीं स्कूल नहीं तो कहीं शिक्षक नहीं । जहां शिक्षा उपलब्ध हैं वहां हमने इतनी प्रगति कर ली हैं कि नैतिकता का पाठ पढाने वाले स्कुल भी अब बच्चो को असांनमेंट के नाम पर नेट शिक्षा देने लगे हैं, यह गलत नहीं हैं लेकिन इंटरनेट ने जो अश्लिलता फैलाई हैं उसका असर बच्चो पर तो पडेगा हीं । मूल शिक्षा, रहन-सहन, बड़ो का आदर सत्कार जैसी बाते अब स्कुल मे नहीं सिखाई जाती क्योकी पहले से हीं इतने विषय हैं कि बच्चें उसके बोझ के तले दब चुके हैं…आज स्टुडेंट अपने टीचर को चाकु घोंपने से नहीं भी नहीं डरता यह तो उस महान भारत के इतिहास मे नहीं होता था । संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है, सभी यूरोपीय भाषायें संस्कृत पर आधारित मानी जाती हैं, फोर्ब्स पत्रिका के अनुसार कम्प्यूटर से लिए सबसे उपयुक्त भाषा भी संस्कृत ही है ।आज भारत में कितने लोग ऐसे है जो इस भाषा को जानते है. जिस भाषा पर हम गर्व करने की बात कर रहे है । दूनिया मे वैज्ञानिको और इंजीनियरों की संख्या के मामले मे भारत दूसरा सबसे बडा देश है । तो विश्व के सबसे आधुनिकतम देशो में भारत का नाम क्यों नहीं है ? क्यों अन्य देशो की तुलना में यहाँ नयी खोज कम हो रही है. क्यों ये देश अभी भी बिजली पानी सड़क जैसे मुलभुत सुविधाओं से दूर है ? जिस धर्मनिरपेक्षता को हम अपनी महानता से जोड़कर देखते हैं वहां मंदिरों औऱ मस्जिदों को तोड़ने पर दंगे शुरु हो जाते हैं, हमारे रहनुमा प्रोत्साहित करते हैं और अपना काम बना लेते हैं..अपने हीं देश मे अपना तिरंगा लहराना एक चुनौति बना दिया गया हैं, राजनेता इसे धार्मिक उन्मानद का नाम देकर धर्म कि राजनीति करने से बाज नहीं आते, फिर कैसे हम महान धर्मनिरपेक्ष हुए ? जिस लोकतंत्र का दंभ भरते हुए हम अपने आपको गौरवान्वीत महसुस करते हैं वहां का मुखिया हीं जब लोकतंत्र के प्रयोग का परखनली शिशु हो फिर कैसा महान लोकतंत्र । क्यों हो खामोश ? जब यह महान देश गोरों के चुंगल से आजाद हुआ तब इस धरती ने शायद सुकुन से सांस लिया था, लेकिन आजादी के बाद से नेहरु काल से हीं सत्ताधिशों ने ऐसे कानुन बनावाएं जिसका फायदा अभी तक राजनैतिक जमात को मिल रहा हैं..। भावनाओं के सागर मे डूबे इस महान देश के महान जनता को कोई निकाल हीं नहीं सकता ये बात नेहरु भी जानते थे और सोनीया- राहुल, गडकरी सरिखे नेता भी हैं । लूट का सिलसिला तब भी जारी था अब भी हैं. उन्हे भी पता हैं कि जितना लूटना हैं लूटों चुनाव आने पर हम इस लोगों को अपने पक्ष मे कर हीं लेंगे, चुनाव के समय ऐसा ताना-बाना बूना जाता हैं कि एक आम आदमी सब कुछ भूल जाता हैं या यूं कहें की याद रखते हुए भी कुछ नहीं कर पात क्योकी उसके पास विकल्प नहीं होता । जितनी मेहनत गोरों को हिन्दुस्तानीयों को बांटने मे करनी पड़ी थी उतनी हीं आसानी से ये हिन्दुस्तानी गोरें पुरे देश को बांट चुके हैं. कोई मुसलमानों का रहनुमा हैं तो हिन्दुओं का कोई दलीतों का तो यादवों का तो कोई सवर्णों का, लेकिन ये सब सिर्फ नाम के रहनुमा हैं..केंद्र सरकार के लूट के बावजुद राज्य की सरकारें बड़े आराम से हमे धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढाकर उनसे अपना हिस्सा भी ले लेती हैं और हमे मैनेज भी कर लेती हैं…दलीत की बेटी होने का दावा करने वाली दलीतों की सबसे बड़ी रहनुमा दौलत की बेटी बन गई फिर भी दलीतों के नाम पर गरिब पिछड़ों को भावनात्मक रुप से इस तरह अपने से बांध कर रखती हैं कि वे उनको अपना मसिहा मान लेते हैं । इसी तरह बिहार मे यादवों और पिछड़ों की राजनीति कर लालू यादव 15 सालों तक प्रदेश को लुटते रहे लेकिन वहां की महान जनता उन्हे अपना भगवान मानती रही । धर्म जाति और समुदाय के नाम पर इस देश के इतने टुकड़े इन सफेदपोशों ने किए की आजतक वह उस मायाजाल से नहीं निकल पाया । राजनेता कल भी बेवकूफ बनाते थे और आज भी, अगर यही शब्द कोई उनसे कह दे तो उसी जनता के अपमान की दुहाई देकर उसकी सहानुभूति बटोरने से पिछे नहीं रहते । जानबूझकर शहरों गांवों और कस्बो मे धर्म-जाती और समुदाय से जो उपर उठकर सोंचनेवालों को सड़क, बिजली, पानी, स्कूल जैसी मुलभूत सुविधाओं से वंचित कर दिया जाता हैं, चुनाव आते हीं वहां के लोकल छुटभैये अपना जनाधार बनाने लगते हैं और इनही मामुली सुविधाओं के नाम पर वोट ले जाते हैं । 21 वीं सदी के इस महान भारत मे जब दुनीया चांद पर पहूंच गया हैं, हम बिजली पानी के लिए मोहताज हैं क्योंकि हम भी यही चाहते हैं..हम अपनी जाती धर्म और बिरादरी मे हीं अपना नेता क्यो ढुढते हैं । अगर चंद पैसों के लिए अपना वोट किसी अपराधी, भ्रष्ट या दागी छवी के नेता को देते हैं फिर हम उनको दोष कैसे दे सकते हैं । कहते हैं जैसी प्रजा वैसा राजा, अगर हमारा नेता अपराधी हैं तो हम भी अपराधी हुए, अगर कलमाडी, राजा, येदुरप्पा, लालु और मायावती भ्रष्ट हैं तो वहां के लोग भी भ्रष्ट हैं । हम पश्चिम के खुलेपन को अपना कर खुद को विकसीत होने का अहसास भर करके महान नहीं बन सकते । विकाश का झुठा आडंबर रचने वाली सरकारों से कभी जवाब मांगा गया होता तो कलमाडी सिना ठोककर जेल के बाद संसद मे नहीं दिखते । अगर विकाश देखना हैं तो दुबई को देखो, जितना पैसा दिल्ली को सुंदर बनाने के लिए खर्च किया गया लगभग उतना हीं पैसा दुबी को सुंदर बनाने मे खर्च हुआ लेकिन दिल्ली उसके आगे कहीं नही टीकती, हिन्दुस्तान के बाहर जिस विकाश के मॉडल को हम अपने निजी जिंदगी मे अपना बैठे हैं वहां के जनता की समाज के प्रति सोंच को भी अपनाएं, न्यूयार्क, लंदन, दुबई, मलेशिया जैसे महानगरों मे छेड़खानी, बलात्कार, और हत्या की घटनाएं दिल्ली और मुंबई की अपेक्षा इसलिए कम हैं क्योकी वहां सख्त कानुन हैं, जिसका सख्ती से पालन भी होता हैं, इसलिए वहां कि महिलाएं आधुनिक कपड़ों मे बाहर निकलती हैं । मैं खुद पूर्व पतन-काल, या परम्पाराओं के नाम पर किसी भी कुरीति और ढकोसले को ढोने का समर्थन नहीं करता, निश्चीत रुप से पर्दा प्रथा, या धार्मिक बंधनों को आज अज्ञानता हीं मानना चाहिए, लेकिन ये कैसा ज्ञान जहां बड़ो की इज्जत ही ना हो । आज खुलेआम, मॉल, रेस्टुरेंट और पार्कों मे लड़के-लड़कियों सबके सामने जो ओछी हड़कते करते दिखते हैं वे कहीं से भी इस महान भारत का गौरव नहीं बढाते ।

नहीं रही अब वो आन, बान और शान, कहां हैं वो गौरव कहां हैं वो मान, जिसके खातिर कितने हो गए कुर्बान, बिखर गया हैं समाज और लज्जीत हैं ज्ञान, अब कहां गुंजती हैं वो तान, चोरी अच्छी, मेहनत हैं हराम, क्योकी मेहनत से दो वक्त की रोटी भी हैं मुहाल, बिक रही, पिट रही हैं बेटीयां सरेआम, पूरब मे दिखने लगी हैं शाम, फिर कैसे कह दूं की मेरा भारत हैं महान ।

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6 Comments on "कैसे कहूं ‘मेरा भारत’ “महान” !"

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इंसान
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निबंध पढ़ तत्काल ही गूगल पर “कैसे कहूं ‘मेरा भारत’ “महान” शीर्षक/विषय पर अन्य लेखों की खोज की और पाया कि इसे कविता और गद्य, दोनों में पहले भी कई बार पिरो दिया जा चूका है। लेखक के अतिरिक्त हाल ही में ऋचा अग्रवाल, मेहरीन जाफरी, भुवेंद्र त्यागी, और तो और बीबीसी की संवाददाता रूपा झ ने भी इस विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए हैं। सोनू सिंह ने तो “मेरा भारत महान – क्यों ये नहीं पता, बस है तो है” कहते हुए प्रश्न ही पूछ डाला है कि “अगर आपके पास थोड़ा समय हो और आपको इस सवाल… Read more »
इक़बाल हिंदुस्तानी
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बहुत ही शानदार लिखा है हार्दिक बधाई

एस.के. चौधरी
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इस लेख के बाद कई लोगों ने प्रतिक्रीया दी की मैं निगेटीव लेखन करता हूं..लेकिन किसी ने ऐसे एक भी उदाहरण आज के संदर्भ मे नही दिए जिससे की मैं मान लूं की मैं नीगेटीव लेखन करता हूं या नीगेटीव सोंच रखता हूं…मैं बता दूं की अपनी पोजीटीव सोंच की बदौलत मैं इतनी दूर तक आया हूं…

सन्तलाल बॆरङ मम्बङ खेङा सिरसा हरियाणा
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सन्तलाल बॆरङ मम्बङ खेङा सिरसा हरियाणा

सर जी
मॆ आपके विचारो से सहमत हूँ।आपने जो लिखा हॆ सच लिखा हॆ।लिखने की ताकत हर किसी के पास नही होती। इस लेख मे मुझे कोई कमी नजर नही आई।इस मे कमी वो ही निकालते हॆ जो कभी ठीक से “my best friend ” ना लिख सके हो।

gajraj
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निश्चित रूप से प्रशंसनीय लेख जिसमे वर्तमान भारत की वास्तविक तस्वीर खिंची है. नेताओ की मोती चमड़ी पर इसका कुछ असर शायद हो लेकिन देश की जनता जग जाये तो देश का सौभाग्य.

binu bhatnagar
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बहुत सच्चई है इस लेख मे,सच्चाई जो हर भारतीय के लियें दुखदाई है

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