लेखक परिचय

जीतेन्द्र कुमार नामदेव

जीतेन्द्र कुमार नामदेव

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स्वतंत्रता के बाद हमारे देश ने हर क्षेत्र में तरक्की की है। स्वतंत्र भारत के स्वतंत्र नागरिकों ने अपने कीर्तिमान हर क्षेत्र में रचे हैं। हमारे कीर्तिमान और हमारी उपलब्ध्यिां राजनीति, विज्ञान, आर्थिकी, सामाजिक क्षेत्रों से लेकर खेलों और प्रतिस्पर्धाओं तक हर जगह कायम रही हैं। हमने अपने पड़ोसी देशों को भी प्रत्येक क्षेत्र में मात दी है। अगर पड़ोसी देशों की बात की जाए तो चीन व पाकिस्तान को मात देने के लिए अभी हम थोड़े पीछे है। लेकिन डरने की बात नहीं है हम जल्द ही उन्हें भी पीछे छोड़ देंगे।

अब आप के जहन में एक सवाल आ रहा होगा कि आखिर हम किस बात में अपने पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान से पीछे हैं। तो जानिएं ! जनाब पहले तो हम जनसंख्या के मामले में चीन से पीछे है और भ्रष्टाचार के मामले में पाकिस्तान से भी पीछे हैं। जहां हमारा देश सबसे बड़ा लोकतांत्रिक है वहीं अब इसकी गिनती सबसे बड़े भ्रष्टतंत्र में शामिल होती जा रही है। आये दिन हो हरे घोटालों से हमारा देश भ्रष्टाचार के क्षेत्र में बहुत तरक्की कर रहा है जिसे देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि भ्रष्टाचार के मामले में हम अन्य मुल्कों को जल्द ही पीछे छोड़ने वाले हैं।

दुनिया भर के 110 देशों भ्रष्ट देशों में हमने अपनी स्थिति 87 वें स्थान पर कायम कर ली है। जबकि कुछ समय पहले हम 85 वें स्थान पर थे। पूरी दुनिया के भ्रष्ट देशों में अचानक दो पदक ऊपर बढ़ जाने के पीछे का कारण भी साफ है। पिछले दिनों दिल्ली में आयोजित काॅमनवेल्थ गेम्स में हमने करोड़ों रूपये के घोटले किए। अभी काॅमनवेल्थ गेम्स में फैलाई हुई गंदगी साफ करने के लिए भ्रष्टाचार निरोधक कामगार लगाये ही गये थे कि एक और बढ़ा घोटाला सामने आता है जिसने भारत सरकार की नींव हिला कर रख दी। हाल ही में चल रहे गर्मा गर्म 2जी घोटाले ने भारतीय नेताओं की पोल पट्टी खोलकर रख दी है। इतना ही नहीं कारगिल के शहीदों के परिजनों को ‘आदर्श हाऊसिंग सोसायटी’ नामक जो आशयाना बनाकर तैयार किये गये थे वो भी इन मोटी धोन्ध वाले नेताओं ने हजम कर लिए। उन्होंने तो इसकी डकार भी नहीं मारी।

अगर मामले यहीं खत्म हो जाते तो भी कोई बात थी। लेकिन मामला यहां खत्म नहीं होता। इसके बाद एक और बड़ा मामला उभरकर सामने आता है जिसमें भारतीय मुद्रा को भारी मात्र में विदेशी बैंकों में जमा करके रखा हुआ है। अभी हाल में ही एक गोपनीय रिपोर्ट के अनुसार स्विटजलैंडों की भारतीयों ने पूरे 280 लाख करोड़ रूपये जमा कर रखे हैं।

जहां हमारी सरकार बिदेशी बैंकों से हर नये काम के लिए कर्जा ले-लेकर हम भारतीयों को यह एहसास करा रही है कि हम आर्थिक स्तर पर बहुत कमजोर है। तो दूसरी ओर स्विटज बैंकों में जमा भारतीयों का यह पैसा बता रहा है कि हमारे नेतागण देश की भोली भाली जनता को सिबाह बेवकूफ बनाने के और कुछ भी नहीं कर रही है। स्विटज बैंकों में भारतीयों का जितना पैसा जमा है अगर उस पैसों को भारतवर्ष की बैंकों में जमा कर दिया जाए तो ये मान कर चलिए कि हमारी आधी से भी ज्यादा समस्याएं खत्म हो जाएंगी।

बिदेशी बैंकों में जमा पैसे को अगर भारत में वापस ला दिया गया तो अशिक्षा, बेरोजगारी, आर्थिक तंगी, भुखमरी और गरीबी जैसी तमाम समस्याओं पर काबू पाया जा सकता है। लेकिन ऐसा होगा नहीं क्योंकि ये बातें लिखने पढ़ने में ही अच्छी लगती हैं। हम लिखने के सिबाह कुछ कर नहीं सकते और जो कर सकते हैं वो कभी इस तरह की भावुक बातें सोचते नहीं।

देश की सबसे बड़ी पंचायत उच्च न्यायालय के न्यायधीश खुद इस बात की गवाही दे की देश भ्रष्टाचार की स्थिति गंभीर होती जा रही है। उनका कहना था कि ‘यहां एक भ्रष्ट अफसर रिश्वत लेते हुए पकड़ा जाता है तो दूसरी ओर वह रिश्वत देकर छुट भी जाता है।’ बात एक दम सच्ची है। जहां भ्रष्टाचार से सरकार चल रही हो वहां आप किस पर भरोसा कर सकते हैं। देश में सरकार चलाने वाले भी वही लोग है जिनके पूर्वजों ने भ्रष्टाचार की नींव रखी थी। अगर उनके बंसज आज भ्रष्ट होते जा रहे हैं तो उसमें कौन सी नई बात है।

आजादी के बाद बने पहले प्रधान मंत्री द्वारा सन् 1948 में पंचवर्षीय योजनाओं का शुभारंभ किया गया था जिसके अंतर्गत देश का विकास किया जाना था। लेकिन आज कितने लोग हैं जो जानना चाहते है कि पंचवर्षीय योजना के तहत क्या कार्य किये गये हैं ? प्रत्येक वर्ष कितना पैसा पंचवर्षीय योजनाओं के नाम पर खर्चा जाता है यह जानने वाला कोई नहीं ? इसके अलावा अभी हाल ही में भ्रष्टाचार को कम करने और सरकारी विभागों से आम जनता को सूचाना का अधिकार दिलाने के लिए 2005 में सूचना का अधिकार लागू किया गया, उसका भी कोई कारगर उद्देश्य पूरा होता नजर नहीं आया।

अधिकारी सूचना के नाम पर एक फाईल बनाकर रखते है। जो कि जनता को देने के काम आती है। वहीं दूसरी ओर उनके व्यक्तिगत रिकोर्ड भी तैयार किये जाते हैं जिसमें उनके द्वारा किये गये हेर-फेर की काली करतूतें लिखी होती हैं। अब वो भी करे तो क्या करें ? आखिर पूरा सरकारी तंत्र ही भ्रष्ट अफसरों से भरा पड़ा है। उन्हें भी तो बेईमानी की कमई का हिस्सा अपने आलाधिकारियों को पहुंचाना पड़ता है।

खोजकर्ताओं ने तो यहां तक खोज निकाला है कि भ्रष्टाचार क्या है और उसकी परिभाषा व उसके प्रकार क्या हैं ? हम अगर अपने देश की बात करें तो यहां भ्रष्टाचार की परिभाषा उपहार से लगाई जाती है जिसके अन्तर्गत भ्रष्टाचार को भी तीन भागों में बांटा गया है। पहला नजराना, जो किसी अधिकारी या कर्मचारी से काम करने के लिए दिया जाए। दूसरा जबराना, जब कोई अधिकारी या कर्मचारी आपका काम करने के लिए कुछ मांगे, या जबरदस्ती पैसे की मांग रखे, उसे जबराना कहा गया। उसके बाद तीसरा होता है शुक्राना, जो अधिकारी द्वारा बिना मांगे ही अपना काम होने पर हम उनकी टेबिल तक पहंुचाते है।

इस देश की अजीव ही बिडम्बना है। एक भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए दूसरी भ्रष्टाचार निरोधी टीम खड़ी कर दी जाती है। फिर भ्रष्टाचार निरोधी जांच के नाम पर देश गरीब जनता का लाखों-करोड़ों रूपये उन पर न्यौछावर कर दिये जाते है। यह सिलसिला खत्म होने का नाम नहीं लेता। एक के बाद एक भ्रष्टाचार और फिर उस भ्रष्टाचार की जांच के लिए एक और भ्रष्टाचार निरोधक दस्ता तैयार कर दिया जाता है।

देश के लिए भ्रष्टाचार एक बहुत बड़ी समस्या बनता जा रहा है। जहां देश के प्रथम प्रधान मंत्री ने भी इस बात का समर्थन किया था कि ‘देश में चलाई जा रही विकास योजनाओं का दसवां हिस्सा जरूरतमंदों तक पहुंचता है।’ और अब आजादी के 63 साल के बाद भी हमारे देश के (वर्तमान) प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह का भी यही मानना है कि ‘केन्द्र से भेजे गये पैसों का 20 प्रतिशत ही जरूरतमंदों को मिल पाता है।’ तो इस स्थिति में हम किस पर यकीन कर सकते हैं। जब देश की सबसे बड़ी पंचायत उच्च न्यायलय और देश की सरकार चलाने वाला मुखीया भी यही माने कि देश में भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है। तो फिर स्थिति को साफ करने के लिए रह क्या जाता है ?

सरकारों को तीजोडियां भरने से और जनता को अपना पेट भरने के लिए दो जून की रोटी कमाने से फुरसत नहीं इस स्थिति में कौन इन भ्रष्ट नेताओं की खबर लेगा। मेहगाई अपना मुंह फैलती जा रही है और गरीब उसके आगोश में सिमटा जा रहा है। जहां देश के भावी नेता और मंत्री मण्डल घोटालों में लगे हैं वहीं यहां की जनता उनके तमाशे को खुली आँखों से तमाशाई होकर देख रही है। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर देश भक्ति के दो-चार गीत गाकर, तीरंगे को सलामी देकर हमारे सारे कर्तव्य खत्म हो जाते है। अब इस माहौल में तो अभिनेता नाना पाटेकर का डायलाॅग याद आता है…‘‘सौ में से अस्सी बेईमान…फिर भी मेरा देश महान।’’

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