लेखक परिचय

अब्दुल रशीद

अब्दुल रशीद

सिंगरौली मध्य प्रदेश। सच को कलमबंद कर पेश करना ही मेरे पत्रकारिता का मकसद है। मुझे भारतीय होने का गुमान है और यही मेरी पहचान है।

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-अब्दुल रशीद-

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लाल किले के प्राचीर से दिया गया भाषण बिना लिखे दिया गया, यानी यह भाषण कागजों पर शब्दों से कुरेदा गया कोई लेख नहीं था, बल्कि एक प्रधानमंत्री द्वारा भावनाओं को समेट कर कही गई वह बाते थी, जिसे आम जनता वर्षों से सुनना चाहती थी और यही वजह है के उनके शब्द आम जनता के दिलों को जीतने में कामयाब रहे। यह भाषण इसलिए भी ऐतिहासिक रहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर भाई मोदी देश के पहले प्रधान मंत्री हैं, जिन्होंने सत्ता चलाने कि जगह देश को बनाने, देश को विकास मार्ग पर चलाने, देश से भ्रष्टाचार मिटाने और सांप्रदायिक खून खराबे को मिटाने की बात कही।

सबका साथ

प्रधानमंत्री नाम से योजनाओं में प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर भाई मोदी ने अपना भी नाम जोड़ने के बजाय सांसदों कि गरिमा बढ़ाते हुए सांसद आदर्श ग्राम योजना का ऐलान किया और कहा के सभी सांसद अगले स्वतंत्रता दिवस तक कम से कम एक गांव का अवश्य विकास करें। अपने कार्यकाल में ज्यादा नहीं तो कम से कम पांच गांव का विकास तो अवश्य करें। यह कार्य सांसद निधी से बख़ूबी पूरा किया जा सकता है, यानी यह बात हवा हवाई नहीं। सांसद आदर्श ग्राम योजना का एलान इस बात कि भी तस्दीक करता है के  प्रधान मंत्री सबका साथ चाहते हैं क्योंकि यह घोषणा करते समय उन्होंने “सांसद आदर्श ग्राम योजना” कहा न की भाजापा सांसद आदर्श ग्राम योजना।

अपना कर्तव्य भी निभाए

नक्सलवाद और आतंकवाद को मिटाने के लिए सरकार अपना काम करेगी, कानून कठोरता से काम करेगा और मां-बाप को भी अपना कर्तव्य निभाना होगा के उनका बच्चा गलत रास्ते पर न जाए। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में पिता पुत्र और देश के रिश्तों को जोड़ने का जो प्रयास किया वह अपने आप में यह बयां करता है कि महज़ हर काम के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराने से देश का विकास नहीं होगा आपको भी अपना कर्तव्य निभाना चाहिए क्योंकि देश सिर्फ नेताओं का नहीं है- आपका है, सबका है।

धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता

बहुत लड़ लिया,बहुत काट दिया,बहुत लोगों को मार दिया.भाईयों और बहनों किसी ने कुछ नहीं पाया सिवाय  भारत देश के दामन पर दाग़ लगाने के। बहुत लोगों के ज़ेहन में यह बात कौतूहल मचा रहा होगा के प्रधानमंत्री ने ऐसा क्यों कहा? क्या उन्हें दंगों में मारे गए लोग (गुजरात के २००२) के लिए अफ़सोस है? यह तो उनके हृदय कि बात है लेकिन एक सच तो उन्होंने दुनिया और देश के सामने स्वीकार्य किया के दंगा देश के दामन पर दाग़ है। अपने संबोधन में उन्होंने कहा के सदियों से किसी न किसी कारण से हम सांप्रदायिक तनाव से गुजरे हैं। देश के विभाजन तक हम पहुंच गए, आज़ादी के बाद भी हम कभी सांप्रदायिकता तो कभी जातिवाद के जहर का दंश झेलते रहें। प्रधानमंत्री ने कहा कि इसलिए मैं देशवासियों का आहवान करता हूं कि चाहे जातिवाद का जहर हो, सांप्रदायिकता का जहर हो, प्रांतवाद का जहर हो, ऊंच-नीच का भाव हो, सब मिल कर तय करें कि कम से कम 10 साल तक इस पर मोरोटोरियम (रोक) लगाएं और प्रण करें कि हम सारे तनावों से मुक्ति की ओर जाना चाहते हैं।

कुछ लोग कह सकते हैं, तो क्या दस साल बाद दंगे फिर शुरू हो जाएंगे? काल्पनिक बातों का कोई जवाब नहीं दिया जा सकता- हां इतिहास नरेंद्र दामोदर भाई मोदी को केवल २०१४ के राजतिलक को ही नहीं लिखेगा बल्कि २००२ को भी उतनी ही निष्पक्षता से लिखेगा। बहरहाल, बिना फैसले के न तो किसी को दोषी माना जा सकता है और नहीं बरी किया जा सकता है। तो इंतज़ार कीजिए उस वक्त का जो बताएगा सच क्या है, झूठ क्या है? सरकार के गलत नीतियों का जरूर विरोध करें लेकिन सकारात्मक बातों पर समर्थन करने से भी न चुके।

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