लेखक परिचय

डॉ0 आशीष वशिष्ठ

डॉ0 आशीष वशिष्ठ

लेखक स्‍वतंत्र पत्रकार हैं।

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डॉ0 आशीष वशिष्ठ

दर्दनाक हादसों से सबक लेने की बजाए शायद हम हादसों को न्योता देने के आदी हो चुके हैं. पिछले एक दशक में देशभर में भगदड़ और सार्वजनिक समारोहों में आग लगने और भगदड़ में जान गंवाने और घायलों का लेखा-जोखा जोड़ा जाए तो आंकड़ा हजारों में बैठेगा. हरिद्वार में शांतिकुंज परिवार द्वारा आयोजित विशाल समारोह में मची भगदड़ में मारे गए श्रद्वालुओं की चिता की आग अभी ठण्डी भी नहीं हुई थी कि पूर्वी दिल्ली के नंद नगरी में आयोजित किन्नर सम्मेलन के दौरान टेंट में लगी आग से मची भगदड़ ने तकरीबन 16 लोगों की अनमोल जिंदगियां उनसे छीन ली और दर्जनों बुरी तरह जख्मी हो गए.

हर बार हादसे के बाद शासन, प्रशासन और आयोजकों का एक ही टेप बजता है. हादसों के लिए जिम्मेदार और कसूरवार व्यक्ति, संस्थाएं और तमाम सरकारी एजेंसियां अपनी जिम्मेदारियां एक दूसरे पर डालने की कवायद में जुट जाती है. . सरकारी मशीनरी जाँच, मुआवजे, कानून-नियम के दायरे तक सिमटी है और आयोजक एवं कर्ताधर्ता सारे किये-धरे का ठीकरा पुलिस-प्रशासन पर फोड़कर किनारे हो जाते हैं. लंबी और पेचीदी कानूनी कार्रवाई कसूरवारों को उचित दण्ड दे पाने अक्षम साबित होती है. दो-चार दिन के हो-हल्ले, बयानबाजी, निंदा, सहानुभूति और मुआवजे की रस्म अदायगी के बाद दुबारा जिंदगी पुराने ट्रेक पर दौड़ने लगती है. और इन सबके बीच आम आदमी किसी और की लाहपरवाही और अव्यवस्था के चलते अपनी कीमती जान गंवाने को विवश है.

ताजा मामले में पूर्वी दिल्ली के नंद नगरी के ई-ब्लॉक में एमसीडी के पार्क में टेंट लगाकर किन्नर सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा था. राजधानी और यूपी से भारी संख्या में किन्नर इसमें हिस्सा लेने आए हुए थे. कम्यूनिटी सेंटर में इस प्रोग्राम के लिए टेंट लगाया गया था. अचानक टेंट में आग लग गयी. आग इतनी तेज थी कि 15 मिनट के अंदर सारा टेंट भभक उठा और कई लोगों को भागने तक का मौका नहीं मिला. टेंट से 60-70 फुट दूरी तक आग की लपटें पहुंच गई थी. आग से बचने के लिए दौड़कर टेंट से बाहर निकलने की कोशिश में काफीं लोग नीचे जमीन पर गिरकर दब गए, जिनके ऊपर से लोग दौड़ते रहे. फायर ब्रिगेड की 12 गाडि़यों को इस पर काबू पाने में डेढ़ घंटा लगा. रिवायत के अनुसार दिल्ली सरकार ने हादसे की जांच के आदेश और मृतकों एवं घायलों को मुआवजे का एलान कर अपने कर्तव्य से मुक्त पा ली.

सार्वजनिक हादसों और दुर्घटनाओं का इतिहास खंगाला जाए तो फरवरी 1981 में बंगलुरू में वीनस सर्कस के पंडाल में हाई टेंशन तार से टेंट में आग लगने से 85 लोगों की जिंदगी स्वाहा हो गई थी. 23 दिसंबर 1995 को हरियाण के सिरसा जिले के डबवाली में डीएवी पब्लिक स्कूल का वार्षिक समारोह राजीव मैरिज पैलेस में चल रहा था कि शार्ट सर्किट से पैलेस में फैली आग ने 446 लोगों की बलि ले ली. 15 जुलाई 1996 को सोमवती अमावस्या के अवसर पर हरिद्वार और उज्जैन में मची भगदड़ के कारण 64 तीर्थ यात्री मारे गए थे. दक्षिणी दिल्ली के उपहार सिनेमा हॉल में 13 जून 1997 में ‘बॉर्डर’ फिल्म के प्रदर्शन के दौरान आग लग गई थी, जिसमें 59 लोग मारे गए थे. ये तो बानगी भर है अगर देखा जाए तो सार्वजनिक कार्यक्रमों और समारोहों में दुर्घटनाएं अक्सर घटित होती रहती हैं.

24 जुलाई 2003 को मध्य प्रदेश के भिंड जिले के एक थियेटर में आग लगने से 8 लोग मर गए थे और अनेक घायल हुए थे. इसी साल 27 अगस्त 2003 को नासिक कुंभ में भगदड़ मच जाने से 31 श्रद्वालु मारे गए और सैंकड़ों घायल हुए. जनवरी 2004 को तमिलनाडु के श्रीरंगम के ईवीएस स्ट्रीट क्षेत्र में स्थित एक मैरिज हाल में आम लगने से दूल्हे समेत 52 दूसरे लोग मारे गए थे. 12 अप्रैल 2004 को तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार में विपक्ष के नेता लालजी टण्डन के जन्मदिन पर आयोजित कार्यक्रम में गरीब महिलाओं को साडि़यां बांटने के दौरान भगदड़ मच जाने से 21 लोग अपनी जान से हाथ गवां बैठे. 15 जुलाई 2004 में तमिलनाडु के कुभकोणम जिले के श्री कृष्णा गल्र्स हाई स्कूल के रसोईघर से फैली आग में झुलस कर 83 छात्रों की मौत हो गई थी. नवबंर 2004 को नई दिल्ली रेलवे स्टे’ान पर मची भगदड़ में 5 महिलाओं की मौत हो गई थी.

अप्रैल 2006 में उत्तर प्रदेश के मेरठ जनपद में कंज्मूयर इलैक्ट्रिक फेअर के दौरान मेला स्थल विक्टोरिया पार्क में आग फैलने से 60 लोगों की मौत और सैंकड़ों बुरी तरह घायल हुए थे. वर्ष 2008 को हिमाचल प्रदेश के नैना देवी मंदिर में 3 अगस्त को हुई भगदड़ से 145 लोगों की मृत्यु हो गई हादसे की वजह भूस्खलन होने की अफवाह थी. इसी साल राजस्थान के ऐतिहासिक मेहरानगढ़ दुर्ग स्थित चामुंडा माता मंदिर में 30 सितंबर को हुई भगदड़ में लगभग 224 लोगों की जान चली गई थी. वर्ष 2010 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में आध्यात्मिक गुरू कृपालु महाराज आश्रम में भोजन पाने के लिए मची भगदड़ में तकरीबन 60 लोग काल कलवित हो गए.

असल में देश का आम आदमी किसी भी हालात में बड़ी आसानी से जीने का आदी हो जाता है. हमारी इसी ‘यूज्ड टू’ प्रवृत्ति का लाभ व्यवस्था और जिम्मेदार लोग उठाते हैं. घटना घट जाने के बाद सरकारी अमला सख्ती दिखाने और डंडा पटकने का नाटक और अभिनय केवल जनता के गुस्से को शांत करने के लिए करता है, लेकिन अहम् सवाल यह है कि जब पुलिस-प्रशासन की अनुमति और अनापत्ति प्रमाण-पत्र के सार्वजनिक कार्यक्रमों की तैयारियां हो रही होती हैं, तो आखिरकार उस समय पुलिस-प्रशासन आंखें बंद किए क्यों बैठे रहता है.

हाल ही में गुड़गांव में एक निजी कंपनी द्वारा म्यूजिक नाइट का आयोजन किया जाना था, लेकिन ऐन मौके पर कार्यक्रम रद्द होने की वजह से भड़के दर्शकों ने आयोजन स्थल पर खूब बवाल काटा और जमकर तोड़-फोड़ की. असल में फ्री के इंट्री पास और टिकट के जुगाड़ में दिन-रात एक करने वाले सरकारी अमले को सुरक्षा और संरक्षा की जांच करने की फुर्सत ही कहां होती है. आयोजक अपनी ऊंची पहुंच, रसूख और सुविधा शुल्क की बदौलत नियम-कानूनों को ताक पर रखकर आम आदमी की जान को आसानी से खतरे में डाल देते हैं.

गौरतलब है कि हर साल देशभर में भगदड़, आग लगने, रेल, सड़क दुर्घटना की घटनाएं घटित होती रहती हैं. लेकिन बडे से बड़े हादसे और दुर्घटना के बाद भी सरकारी मशीनरी के रवैये और कार्यप्रणाली में मामूली-सा बदलाव भी देखने को नहीं मिलता है. ऐसे मौकों पर पुलिस-प्रशासन और जिम्मेदार लोगों का अमानवीय व्यहार और असंवदेनशील व्यक्तित्व उभरकर सामने आता है. दिल्ली में हुए हादसें के दौरान किन्नरों को इस बात की जानकारी देने वाला कोई नहीं था कि घायल और जख्मी किन्नरों का इलाज के लिए किस अस्पताल में ले जाया गया है. कुछ किन्नरों ने तो पुलिस के जवानों पर आरोप लगाया है कि जिन शवों को अस्पताल में लाया गया था, उनके गहने आदि भी पुलिसवालों ने निकाल लिए.

पुलिस-प्रशासन का उदासीन रवैया, कानूनी पेचीदगी और हाई कनेक्शन की बदौलत हादसों और दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदार व्यक्ति और संस्थाएं से कानून के चंगुल से बच निकलते हैं. कानून की लंबी, थकाऊ और टेढ़ी कार्रवाई के कारण ऐसे मामलों में अदालत से निर्णय आने में ही दस-बीस साल लग जाते हैं. उपहार सिनेमा कांड का फैसला घटना के ग्यारह साल बाद और डबवाली अग्निकांड का निर्णय हादसे के 14 साल बाद आया. ऐसे मामलों में जो अदालती निर्णय आए भी उन्होंने पीडि़तों के जख्मों पर मरहम लगाने की बजाए नमक छिड़कने का काम ही किया है.

सरकार क

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