लेखक परिचय

प्रतिमा शुक्ला

प्रतिमा शुक्ला

मूलत: लखनऊ से हूं। पत्रकारिता जगत में कार्यरत हूं। कविताएं, जनसरोकार के विषयों पर महिला और बाल कल्याण पर स्वतंत्र लेखन कार्य पिछले कई वर्षों से कर रही हूं। वर्तमान कार्यक्षेत्र नई दिल्ली हैं।

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प्रतिमा  शुक्ला

10 दिसम्बर पूरी दुनिया में मानव अधिकार दिवस के रूप में मनाया जाता है। हिन्दोस्तानए जो 1948 को इस दिन जारी किये गये ऐलाननामे का हस्ताक्षरकर्ता है, मानव अधिकारों के खुल्लम.खुल्ला उल्लंघनों का एक गढ़ है।
आज हमारे देश में करोड़ों लोग बहुत गरीबी में रहते हैं जो साफ.सफाई, बिजली, स्वास्थ्य व शिक्षा सुविधाओं को तो छोड़ो, रोटी, कपड़ा, मकान और साफ पानी जैसी जीवन की आवश्यक वस्तुओं से भी वंचित हैं। आज के युग में यह बुनियादी मानव अधिकारों का एक घिनौना उल्लंघन है।

मानव अधिकार की शुरुआत

जब से पृथ्वी पर मानव है तब से ही उसके जीने के लिए अधिकार भी हैं लेकिन आधुनिक समय में देखें तो मानवाधिकार शब्द की भी मूल संकल्पना कुछ ऐसी ही हैए जिसमें 1215 का मैग्नाकार्टाए 1628 का पैटिशन ऑफ राइटए 1689 का बिल ऑफ राइट्सए 1776 का अमेरिकी घोषणा पत्रए 1789 का फ्रांसीसी मानव और नागरिक अधिकार पत्रए 1920 में राष्ट्र संघ की स्थापनाए अक्टूबर 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ का जन्मए मानव अधिकारों की रक्षा एवं शान्ति की स्थापना के लिए हुआ था। विश्व राज्य व्यवस्था के उद्देश्यों के अनुरूप संयुक्त राष्ट्र संघ ने मानवाधिकारों के ध्येय को प्राप्त करने के लिए अपने एक निकाय.आर्थिक व सामाजिक परिषद् को मानवाधिकारों के रक्षार्थ कोई ठोस योजना बनाने का दायित्व सौंपा। इस परिषद् ने संयुक्त राष्ट्रसंघ चार्टर की धारा 68 के तहत 1946 में श्रीमती एलोनोर रूजवेल्ट की अध्यक्षता में एक मानवाधिकार आयोग का गठन कियाए इस आयोग ने मानवाधिकारों की विश्वव्यापी घोषणा जून 1948 में की। इस घोषणा को संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने हथियारों की बर्बरता के विरुद्ध शान्ति की भावना का विकास करने वाले वैज्ञानिक अल्फ्रेड नोबल के जन्मदिवस 10 दिसम्बर को स्वीकार कर लिया तथा इस दिवस ;10 दिसम्बरhuman rights को मानवाधिकार दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया। समय के साथ विश्व के लगभग सभी देशों में मानव अधिकारों को अपने.अपने संविधानों में एक आधारभूत उद्देश्यों के रूप में लिया।

10 दिसम्बर को विश्व मानवाधिकार दिवस के रूप में जाना जाता है। इस दिवस की नींव विश्वयुद्ध की विभीषिका से झुलस रहे लोगों के दर्द को समझ कर और उसको महसूस कर संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने 10 दिसंबर 1948 को सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा.पत्र को अधिकारिक मान्यता प्रदान की।

आज करोड़ों लोग ऐसी अवस्था में रहते हैं जहां व्यक्तिगत और आने.जाने की आजादी भी नहीं है। वे हर दिन राज्य के पुलिस और सैनिकों के मनमाने उपद्रवी हमलों के शिकार होते हैं। ऐसा कश्मीर और उत्तरपूर्वी राज्यों में हो रहा है और ऐसा ही हिन्दोस्तान के बहुत से उन इलाकों में हो रहा है जहां आदिवासी लोग रहते हैं। गरीबों और बेघरों को तो हमेशा ही ऐसा बर्बर व्यवहार सहना पड़ता है।
करोड़ों लोगों को अपने जीवन के विभिन्न पहलुओं में बार.बार राष्ट्रीयताए धर्मए लिंग और जाति के आधार पर भेदभाव सहना पड़ता है। महिलायें मध्ययुगी और बर्बरतापूर्ण रूप के शोषण और दमन की शिकार बनती हैं। दलितों के साथ पाश्विक भेदभाव होता है और यातनायें दी जाती हैं। राज्य के अधिकारी उनकी रक्षा नहीं करते बल्किए अधिकतर हादसों मेंए अत्याचारियों का साथ देते हैं।

जो लोग इन ज्यादतियों के खिलाफ आवाज उठाते हैंए उनके लिये विवेक का अधिकार नहीं है। इस तथाकथित दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में अपने दिल की बात बोलने और अपनी आस्थाओं को बरकरार रखने पर लोगों को राष्ट्रविरोधी बताया जाता हैए उन्हें तड़पाया जाता हैए उन पर हमले किये जाते हैं और उन्हें कैद में रखा जाता है।
मानव होने के नाते हर व्यक्ति के अधिकार होते हैं। यह एक आधुनिक समाज की पहचान है। दुनियाभर में मान्यता प्राप्तए एक सर्वव्यापी राजपत्र में इन अधिकारों को प्रतिष्ठापित करने का यही मतलब होता है। हिन्दोस्तान की मौजूदा सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था इसको नहीं मानती है। संविधान में दिये गये तथाकथित बुनियादी अधिकारों का उल्लंघनए सबसे अधिक तौर परए राज्य द्वारा ही किये जाते हैं। अपने ही अधिकारों के अनुपालन के लिये लोगों के हाथ में कोई यंत्र नहीं है।

बहुत से मानव अधिकारों को मान्यता ही नहीं दी गयी है, याए ज्यादा से ज्यादाए उन्हें राज्य द्वारा कुछ लोगों को दिये गये विशेषाधिकार के रूप में देखा जाता है जो दूसरों के लिये नहीं है। जबकि मानव अधिकारए सैध्दांतिक तौर परए अनुल्लंघनीय और सर्वव्यापी होते हैं।

देश भर में करोड़ों लोग अपने बुनियादी मानव अधिकारों की रक्षा के संघर्ष में जुटे हैं। इस बढ़ती धारा के दबाव में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने दिखावे के बड़े अभियान चलाये हैं, जैसे कि वे शिक्षा के अधिकारए भोजन के अधिकारए रोजगार के अधिकारए आदि देने के इच्छुक हों। इतने वर्षों से जो अमीरों और ताकतवरों के हित मेंए नीतियों और कार्य के जरियेए आम लोगों के रोजगार और अपने संसाधनों पर नियंत्रण के अधिकारों को छीनते रहे हैंए वे लोगों के अधिकारों के रक्षक कैसे बन सकते हैं

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