लेखक परिचय

विपिन किशोर सिन्हा

विपिन किशोर सिन्हा

जन्मस्थान - ग्राम-बाल बंगरा, पो.-महाराज गंज, जिला-सिवान,बिहार. वर्तमान पता - लेन नं. ८सी, प्लाट नं. ७८, महामनापुरी, वाराणसी. शिक्षा - बी.टेक इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय. व्यवसाय - अधिशासी अभियन्ता, उ.प्र.पावर कारपोरेशन लि., वाराणसी. साहित्यिक कृतियां - कहो कौन्तेय, शेष कथित रामकथा, स्मृति, क्या खोया क्या पाया (सभी उपन्यास), फ़ैसला (कहानी संग्रह), राम ने सीता परित्याग कभी किया ही नहीं (शोध पत्र), संदर्भ, अमराई एवं अभिव्यक्ति (कविता संग्रह)

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७, मार्च, २०१२ का दिन था। सुबह के सात बजे थे। १४००६ डाउन लिच्छवी एक्स्प्रेस वाराणसी के प्लेटफार्म नंबर-एक पर खड़ी हुई। मुझे इसी ट्रेन से अपने गांव के निकततम स्टेशन दुरौन्धा जाना था। यह स्टेशन सिवान और छपरा के बीच में स्थित है। मेरे पास द्वितीय श्रेणी के वातानुकूलित शयनयान का टिकट था। मैं गाड़ी में सवार हो गया। अपने बर्थ के पास पहुंचा, तो देखा, उसपर एक लड़की सो रही थी। सहयात्रियों से मैंने कहा कि यह लोवर बर्थ मेरा है। जिसकी भी यह लड़की हो, वे कृपया इसे जगा दें और बैठने के लिए कहें। किसी सज्जन ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। साइड बर्थ पर बैठे एक सज्जन ने बताया कि कोच में बैठे किसी भी व्यक्ति का उस लड़की से कोई संबंध नहीं है। इसका अता-पता भी किसी को ज्ञात नहीं है। यह स्वयं अपने बारे में भी कुछ बता नहीं पा रही है। कानपुर में एक टीटीई ने इसे लाकर इस बर्थ पर लेटा दिया। यह लड़की तब से सो ही रही है। मैंने उस लड़की को जगाने के लिए आवाज़ दी लेकिन वह दीवार की ओर मुंह किए लेटी ही रही। इतने में काला कोट पहने टीटीई महोदय आए। मैंने उनसे बर्थ दिलाने की गुजारिश की। उन्होंने लड़की को कंधा पकड़कर जगाया। वह जग गई और सहमकर खिड़की के पास सिकुड़कर बैठ गई। मैं अपने बर्थ पर बैठ गया। टिकट-परीक्षक भी मेरे पास ही बैठ गए। उन्होंने बताया कि अपनों से बिछुड़ी यह लड़की उन्हें कानपुर स्टेशन पर मिली। इसे अपने साथ ले जाने के लिए दो आदमी आपस में झगड़ा कर रहे थे। दोनों नशे में चूर थे। समझने में देर नहीं लगी – दोनों ही असामाजिक तत्त्व थे और लड़की पर कब्जा पाने के लिए लड़ रहे थे। एक पुलिस वाले की मदद से उन्होंने लड़की को मुक्त कराया और सकुशल उसे घर पहुंचाने के लिए रेलवे पुलिस को सौंप दिया। पुलिस को सौंप वे निश्चिन्त हो गए। ट्रेन आधा घंटा लेट थी। वे अपने मित्रों के साथ कहीं विश्राम के लिए चले गए। लिच्छवी जब कानपुर पहुंची, तो एक व्यक्ति उस लड़की के साथ द्वितीय श्रेणी के वातानुकूलित कोच के प्रवेश द्वार पर खड़ा था। टिकट परीक्षक उस लड़की को पहचान गए। उन्होंने उस आदमी से पूछा –

“यह लड़की आपके पास कैसे पहुंच गई? मैंने तो इसे पुलिस को सौंपा था।”

“जी हां, महोदय! आपने इसे जिस पुलिस कांसटेबुल को सौंपा था, वह व्यभिचारी था। प्लेटफ़ार्म के अन्तिम छोर पर इसे ले जाकर उसने इसके साथ छेड़-छाड़ शुरु की। यह चिल्लाती हुई वहां से भागी और मेरे पैरों में लिपटकर रोने लगी। दहशत से यह कांप रही थी और मुंह से कोई स्पष्ट आवाज़ भी नहीं निकल रही थी। मेरे बार-बार पूछने पर सिर्फ़ हाज़ीपुर-हाज़ीपुर ही कह रही थी। न नाम बता रही थी, न पता। यह ट्रेन हाज़ीपुर को जाती है, इसलिए इसे लेकर मैं यहां खड़ा हूं। एसी २ टायर में शरीफ़ लोग यात्रा करते हैं। मुझे उम्मीद है कि आपके सहयोग से इसे इसके घर पहुंचाया जा सकता है। मुझे चेन्नई जाना है, इसलिए मैं इसे अपने साथ नहीं ले जा सकता। कृपा कर इसे पुलिस को मत सौंपिएगा।”

टिकट परीक्षक सहृदय था। उसने लड़की को शरण दी और मेरे खाली बर्थ पर बैठा दिया। उसकी ड्युटी भी हाज़ीपुर में समाप्त हो रही थी। उसने लड़की को हाज़ीपुर पहुंचाने का दायित्व लिया। उसने मुझसे आग्रह किया कि लड़की को अपने बर्थ पर बैठने दें और उसका खयाल रखें। दिन की यात्रा थी। मैंने कोई आपत्ति नहीं की। टिकट परीक्षक महोदय ज्यादा देर तक बैठ नहीं सकते थे। वे अपनी ड्युटी निभाने दूसरे कोच में चले गए।

मैंने लड़की को ध्यान से देखा। वह बेहद चमकीला कुर्ता और इसी से मिलता-जुलता सलवार पहने थी। उम्र रही होगी ग्यारह-बारह साल। मैंने उसे इस आश्वासन के साथ कि सुरक्षित उसे घर पहुंचा दिया जाएगा, बात आरंभ की। लेकिन उसने मेरे किसी प्रश्न का उत्तर नहीं दिया। उसका मुंह सूख रहा था और होंठ चटचटा रहे थे। कई बार उसने बोलने की कोशिश की लेकिन बोल नहीं पाई। मुझे समझने में देर नहीं लगी – वह कई दिनों से भूखी-प्यासी थी। मैंने उससे पूछा –

“भूख लगी है?”

उसने स्वीकृति में सिर हिलाया। मैं बाहर का खाना नहीं खाता। यात्रा में अपने साथ चार पराठें और भुजिया लेकर चलता हूं। अपने झोले से मैंने पराठे निकाले और उसके सामने रख दिया। स्नेह के साथ मैंने कहा –

“बेटा! तुम कई दिनों की भूखी लग रही हो। कुछ खा लो। चिन्ता बिल्कुल न करो। हमलोग तुम्हें तुम्हारे घर तक पहुंचाएंगे”

लड़की ने पराठों को छूआ तक नहीं। समीप बैठे सभी यात्रियों ने उससे पराठें खाने का अनुरोध किया लेकिन वह पत्थर की मूर्ति बनी बैठी रही। सभी परेशान थे लेकिन वह न तो खा रही थी और न कुछ बोल रही थी। बस दहशत के कारण कुछ समय के अन्तराल पर लगातार कांप रही थी। अन्त में साइड बर्थ पर बैठे एक यात्री, जिसने अपना नाम मुहम्मद हुसेन बताया, लड़की के पास आकर बैठ गया। वह दुबई से आ रहा था। उम्र ५०-५५ की रही होगी। उसने अत्यन्त स्नेह के साथ उसके सिर पर हाथ फेरा। उसकी आंखों में आंखें डालकर बड़े प्रेम से बोला –

“बेटी! मैं तीन साल के बाद दुबई से अपने घर को लौट रहा हूं। मेरी एक बेटी है। तब वह आठ साल की थी, जब मैं नौकरी की तलाश में दुबई जा रहा था। अब बड़ी हो गई होगी। बिल्कुल तुम्हारी तरह ही है। तुम्हें देखकर पता नहीं क्यों, मुझे ऐसा लग रहा है, जैसे तुम मेरी अपनी बेटी हो। तुम ये पराठें खा लो और पानी पी लो, फिर तुम्हारी कहानी भी सुनेंगे, अपनी भी सुनाएंगे।”

मुहम्मद हुसेन की बातों का लड़की पर जादुई प्रभाव पड़ा। वह धीरे-धीरे पराठें खाने लगी। हुसेन उठकर अपने बर्थ पर चला गया। सारे पराठें खाने के बाद मैंने उसे अपना पानी वाला बोतल दिया। उसके गले से गटगट कि आवाज़ आई और पूरा बोतल खाली हो गया। एक सहयात्री ने उसे दो सन्तरे दिए। उसने लेने से मना कर दिया। मैंने सन्तरा लेने और खाने के लिए उसे आग्रह किया। इस बार वह आग्रह टाल नहीं सकी। दोनों सन्तरे उसने प्रेम पूर्वक खाए। उसके चेहरे पर विश्वास और सन्तुष्टि के भाव मैंने स्पष्ट देखे। मैंने उसके पूर्णतः सामान्य होने की प्रतीक्षा की। १०-१५ मिनट के बाद वह बर्थ के नीचे पैर लटकाकर आराम से बैठ गई। एक दृष्टि उसने सहयात्रियों पर डाली। दो व्यक्तियों को उसने सिर से पांव तक देखा – मुहम्मद हुसेन और मुझे। हुसेन अपनी बर्थ से उठकर एक बार फिर मेरी बर्थ पर आया। उसने उससे कुछ प्रश्न पू्छे –

“कहां से आ रही हो, कानपुर कैसे पहुंची? तुम्हारे मां-बाप कौन हैं?”:

अब वह कुछ बोल रही थी, पर बहुत धीरे-धीरे। हुसेन उसकी भाषा नहीं समझ पा रहा था। वह निराश होकर पुनः अपनी बर्थ पर चला गया।

मैंने एक प्रयास और किया। उसका नाम पूछा। ‘आशा’ उसने अपना नाम बताया। उसे उसके घर पहुंचाने के लिए उसके गांव का नाम, थाना या पोस्ट आफिस, पिता का नाम पता करना आवश्यक था। मैंने उससे ये समस्त विवरण बताने का आग्रह किया। उसने मैथिली में बात शुरु की।

‘आशा,’ नाम था उसका। वह एक अनाथ लड़की थी। हाज़ीपुर के पास उसका पैतृक निवास है। जब वह बहुत छोटी थी, उसकी मां का देहान्त हो गया। पिता मज़दूरी करके अपना और उसका पेट पालता था। रहने के लिए एक झोंपड़ी थी। जाति की पासी थी। एक रात पता नहीं, कैसे घर में आग लग गई। उस समय पिता-पुत्री, दोनों घर में सो रहे थे। जबतक कुछ समझ पाते, आग घर के अन्दर पहुंच चुकी थी। पिता ने जो पहला काम किया, वह यह कि आशा को गोद में उठाकर झोंपड़ी के बाहर फेंक दिया। स्वयं झोंपड़ी में रखे कुछ सामान समेटने लगा। यह करना उसे बहुत महंगा पड़ा। अत्यधिक गर्मी और हवा की कमी से वह बेहोश होकर गिर पड़ा। गांव वाले जबतक आकर आग बुझाते, वह दम तोड़ चुका था। उसके पड़ोसियों की झोंपड़ियां भी आग की भेंट चढ़ चुकी थीं। लगभग दस आदमी अग्नि देवता के शिकार हो चुके थे। वह रोते हुए अपने पिता को पुकार रही थी लेकिन आग बुझाने के बाद, उसकी झोंपड़ी से जो शव बरामद हुआ, उसकी ओर देखने का साहस भी बहुत कम लोग जुटा पा रहे थे। लेकिन आशा ने उस शव को देखा। एक दारुण चीख के साथ वह बेहोश हो गई।

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