लेखक परिचय

सुप्रिया सिंह

सुप्रिया सिंह

स्वतंत लेखिका

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“हम काले हैं तो क्या हुआ, दिलवाले हैं ” मोहम्मद रफ़ी का ये गाना सुनने मे तो हमें बहुत अच्छा लगता हैं लेकिन जब यही गाना हमारे समाज की सच्चाई से हमें रुबरु कराता हैं तो हम इसे सुनकर भी अनसुना कर देते हैं । समाज की तमाम कुरीतियों और भेद-भाव पर तो चर्चा हो जाती हैं परन्तु रंग- भेद पर चर्चा…? रंग – भेद के समस्या सिर्फ हमारे देश की समस्या नहीं हैं ये एक वैश्विक समस्या हैं और हमारे समाज की तो यही खासियत हैं कि हम उन मामलों मे जरूर हस्तक्षेप करते हैं जो वैश्विक होती हैं लेकिन जाने क्यों यह (रंग-भेद) समस्या वैश्विक होकर भी समाधान की मंजिल तक अब तक नहीं पहुँच पाया हैं ।

 

कहने को बड़ी आसानी से कह दिया जाता हैं कि हम गोरे – काले रंगों मे विश्वास नही करते हैं। फिर क्यों आज का युवा समाज शादी के लिए लड़के या लड़की का रंग ही पहले देखता हैं । अगर हम रंगों मे विश्वास नही करते हैं तो क्यों आज भी बाजार मे चंद दिनों मे गोरे करने की क्रीम और पाउडर अबतक टिके हुए हैं ? और दिन-प्रतिदिन अपना बाजार बढ़ा रहे हैं । हमारे मन मे काले रंग के प्रति कितनी दुर्भावना हैं इसके उदाहरण हमें आएदिन राह चलते दिख जाते हैं । हमने अपने इस भेदभाव से भगवान को भी अपनी ब्खक्षा ।हम से अधिकांश लोगों ने बचपन मे अपनी दादी-नानी की तमाम कहानियों मे सुना ही होगा कि भगवान कृष्ण का रंग सांवला था परन्तु एक बात जो सोचने वाली हैं, वह यह कि अब तक जितने भी सीरियल बने हैं उनमें कृष्ण जी के बचपन के अवतार को सांवला क्यों नही दिखाया गया ? अधिकांशतः सभी सीरियल मे कृष्ण भगवान का बचपन अवतार गोरा ही होता हैं । ऐसा नही ये रंग विभेद सिर्फ एक ही धर्म मे हैं , दुनिया के तमाम धर्मों मे कहीं न कहीं इसका प्रभाव दिख ही जाता हैं लेकिन जरूरत अभी दुनिया सुधारने की नही हैं जरूरत हैं अभी अपने घर को संवारने की।

 

हम अगर रंग विभेद मे विश्वास नही करते हैं तो क्यों नही हमारे सिनेमा और सीरियल (जिसे समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग देखता हैं ) के नायक और नायिका सिर्फ गोरें रंगों के होते हैं ? गोरे रंग के लिए हम इतने संवेदनशील हैं कि हम जन्म लिए बच्चें को भी अपनी मानसिकता का शिकार बना लेते हैं । जो बच्चा अभी अपने परिवारों को ठीक से नही पहचानता हैं वे भी थोड़ा बड़े होने पर पाउडर लगाकर ही घर से बाहर जाने की जिद्द करता हैं । रिसर्च के मामले मे शायद ही ऐसा कोई क्षेत्र छुटा होंगा जहाँ हमारे देश मे रिसर्च न हुई हैं लेकिन अबतक रंगों के भेदभाव के मामले मे किसी बड़ी रिसर्च एंजेंसी का रिसर्च सामने नहीं आया हैं । समाज का जो युवा तमाम गलत बात पर क्रांतिकारी बनने को तैयार हो जाता हैं , उनमें से ही अधिकांश युवा कॉलेज कैम्पस मे काले – गोरें रंगों के बीच दूरी बढ़ाने का काम करते हैं ।

 

हमने फैशन एक्सपर्ट से यह तो खूब सुना हैं कि अगर आप काले तो ऐसे रंग के कपड़े न पहनें लेकिन कभी यह क्यों नही सुना कि आप गोरें हैं तो यह रंग के कपड़े न पहने । रंगों के इस भेद का शिकार न केवल लड़कियों को होना पड़ता हैं बल्कि लड़के भी इस समस्या से जूझ रहे हैं । यहाँ एकबात यह भी गौर करने वाली हैं कि इस समस्या का समाधान समस्या मे ही छुपा हैं । अगर सांवले रंग के लोंग अपने रंग के कारण मन मे बैठे डर को निकाल दे तो आधी समस्या का समाधान हो जायेंगा । हमें अपने रंग पर नही अपने काम पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए और रही बात समाज की तो उसकी स्थिति ऐसी होगी हैं उसको पड़ोसी का घर गंदा दिखता हैं लेकिन अपने घर पर लगें शीशे की धूल नहीं दिखती

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