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आनंद प्रकाश मिश्र
परमाणु बम से हजारों गुना अधिक विनाशकारी हाइड्रोजन बम का परीक्षण करने के उत्तरी कोरियाई दावे के साथ ही सारी दुनिया में खलबली मच गई है। यद्यपि इसकी सत्यता पर अनेक वैज्ञानिकों को संदेह है, तो भी इस दावे ने पूंजीवादी साम्राज्यवादी देशों के परमाणु निरस्त्रीकरण के खोखलेपन को उजागर कर दिया है। इसी के साथ-साथ उस शिथिलीकरण नीति की विफलता को भी सामने ला दिया है, जिसे बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में अपनाकर विश्व पूंजीवादी साम्राज्यवादी शक्तियों ने तृतीय साम्राज्यवादी विश्व महायुद्ध शुरू करने से अपने पांव पीछे हटा लिए थे क्योंकि उन्हें भय था कि तीसरा महायुद्ध विश्व पूंजीवादी वर्ग व्यवस्था के अस्तित्व को भी संकट में डाल देगा। ऐसा अकारण था भी नहीं! तमाम देशों में संचालित युद्धात्मक अर्थव्यवस्था ने उनकी आर्थिक स्थिति को तबाह कर दिया था। इसलिए विश्व पूंजीवादी वर्ग शक्तियों ने राष्ट्रीय पूंजीवादी आर्थिक व्यावसायिक हितों के टकरावों को सुलह-समझौतों द्वारा हल करने के लिए शिथिलीकरण की नीति ग्रहण की थी, ताकि टकराव उग्र होकर नियंत्रण से बाहर न निकल सके। किंतु प्राकृतिक परिघटनाओं की ही भांति सामाजिक परिघटनाओं के भी वस्तुगत नियम होते हैं। उनके वस्तुगत कारण और परिणाम होते हैं। वाह्य प्रभाव से उनकी गति सीमित काल के लिए तेज या मद्धिम की जा सकती है, किंतु उसे खत्म नहीं किया जा सकता है। इसीलिए मुनाफाखोर पूंजीवादी विश्व व्यवस्था के कायम रहते उत्पादन कार्य प्रणाली क्षेत्र में न तो श्रम और पूंजी का संघर्ष समाप्त हो सकता है, जिसका अंतिम परिणाम सर्वहारा क्रांति होता है और न पूंजीवादी आर्थिक व्यावसायिक हितों का टकराव समाप्त हो सकता है जिसका परिणाम साम्राज्यवादी विश्व महायुद्ध होता है।
क्रांतियां और साम्राज्यवादी युद्ध किसी व्यक्ति की अच्छी या बुरी इच्छाओं का परिणाम नहीं होते, बल्कि उसके कारण आर्थिक ढांचे में निहित होते हैं, बाकी सब वाहक या कारक होते हैं। तो क्या उत्तरी कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन को इस परीक्षण के लिए अकेले दोषी ठहराया जा सकता है? यदि हां, तो क्या दक्षिण कोरिया और उत्तरी कोरिया के बीच युद्धात्मक स्थिति किम जोंग उन के दिमाग की सनक मात्र है? इसकी शुरुआत तो दूसरे विश्व महायुद्ध की समाप्ति के बाद ही साम्राज्यवादी अमेरिका और राज इजारेदार पूंजीवादी सोवियत रूस के कूटनीतिक चालों-बंदरबांटों के साथ ही हुई थी जिसका यह स्वाभाविक परिणाम है।
उत्तरी कोरिया के इस कथित बम परीक्षण के दावे ने शिथिलीकरण नीति की विफलता को पूरी तरह नंगा कर दिया है। वास्तव में बीसवीं सदी के अंतिम दौर में अपनाई गई शिथिलीकरण की नीति दस-पंद्रह सालों में ही अपनी विफलता की कहानी कहने लगी थी और दुनिया पुन: एक ध्रुवीय से दो या बहुध्रुवीय होती दिखाई देने लगी थी। इसका अर्थ था कि पूंजीवादी आर्थिक-व्यावसायिक हितों का टकराव नियंत्रण से पुन: बाहर निकलने लगा था। तभी तो एक तरफ निरस्त्रीकरण का नारा भी उछलता रहा और दूसरी ओर सारी दुनिया में घातक हथियारों का निर्माण और आयात-निर्यात पुन: तेज होता गया। पिछले दस-पंद्रह वर्षों में अंतरराष्ट्रीय मंच पर घटने वाली तमाम घटनाएं, वे चाहे यूक्रेन, क्रीमिया, सीरिया की हों या ईरान आदि खाड़ी के तेल क्षेत्रों की या दक्षिण चीन सागर से लेकर नेपाल के आंतरिक कलह तक के पीछे पूंजीवादी जगत के उग्र होते अंतर्विरोधों और युद्धगुटीय कतारबंदियों की बनती रेखाओं को ही उजागर करती हैं। उत्तरी कोरिया का वर्तमान दावा भी इसी नियंत्रण के बाहर निकलते अंतर्विरोधों की ही एक कड़ी मात्र है।
जो भी हो, इस बम परीक्षण के साथ ही सारी दुनिया में हड़कंप मच गया है। सुरक्षा परिषद ने अपनी आपातकालीन बैठक बुलाई है। नाटो की गतिविधियां अचानक बढ़ गई हैं। आरोपों-प्रत्यारोपों का बाजार गरम हो उठा है, लेकिन इस घटना के साथ हथियारों के बाजार के भी गरम हो जाने की प्रबल आशंका है। इस बात की भी प्रबल आशंका है कि गोपनीय ढंग से चलने वाली युद्धगुटीय कतारबंदी, सतह से ऊपर आ जाए और बहु या दो ध्रुवीय दुनिया अपना आकार ग्रहण करने लगे। जाहिर है, यदि ऐसा होता है, तो इसकी कीमत विश्व की जनता को अपना रक्त देकर चुकाना पड़ेगा। चूंकि भौतिक सत्ता का मुकाबला भौतिक शक्ति द्वारा ही किया जा सकता है, इसलिए विश्व आधार पर श्रमिक शोषित जनों की वर्गीय एकता ही इससे बचाव का एकमात्र विकल्प है।

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