लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

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bharat abhiyanडॉ. मयंक चतुर्वेदी

राजनीति में रहकर राजनीतिक पार्टी से ऊपर उठकर देशहित में विचार करते हुए राजनीति के जरिए केंद्र में मोदी सरकार की देश को स्वच्छ बनाने और सभी घरों में आवश्यक रूप से शौचालयों के निर्माण को हकीकत में बदलने के लिए जिस प्रकार का अनोखा प्रयोग करने का निर्णय उत्तराखण्ड की हरीश रावत सरकार ने किया है, वास्तव में आज ऐसे प्रयोग देश के अन्य राज्यों को भी प्रभावी रूप से करने की जरूरत है। पिछले साल महात्मा गांधी की जन्म तिथि के दिन स्वच्छ भारत का निर्माण करने का नारा और स्वप्न प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के लोगों को दिखाया था। बीते एक साल के बाद इस दिशा में जो स्थिति बनी है, वह भले ही एकदम बहुत अच्छी नजर न आती होगी, किंतु सच तो यही है कि सामाजिक और राजनैतिक दोनों स्तरों पर स्वच्छता को लेकर आमजन के नजरिए में बहुत बड़ा परिवर्तन तेजी से आ रहा है।

पहले हम बात करते हैं उत्तराखंड में स्वच्छता को लेकर प्रदेश सरकार द्वारा करने जा रहे नए प्रयोग की। वस्तुत: उत्तराखण्ड की सरकार सिर्फ सड़क या घरों के बाहर ही नहीं, राजनीति के जरिए स्वच्छता की शुरुआत ‘गांव की सरकार’ यानी पंचायतों से करने जा रही है। मुख्यमंत्री हरीश रावत ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया है कि आगामी पंचायत चुनाव लड़ने वालों के लिए घर में शौचालय की अनिवार्यता का प्रावधान किया जा रहा है। कुल मिलाकर यह कि जिसके घर में शौचालय की सुविधा नहीं होगी, वह चुनाव नहीं लड़ पाएगा। बात एकदम छोटी लग सकती है, निर्णय के स्तर पर कहा जा सकता है कि यह कोई बड़ा काम नहीं है, जिसका कि गुणगान किया जाना चाहिए, किंतु जब आप इसकी गहराई में जाकर देखें तो यह आने वाले समय में एक बड़े परिवर्तन की ओर इशारा अवश्य करता है। यहां स्वच्छता की शुरुआत के लिए सरकार ने राज्य की 7 हजार 657 ग्राम पंचायतों के 15 हजार 761 आबाद ग्रामों को चुना है।

इस तरह के नए-नए प्रयोग और प्रयास इसलिए भी लाजमी हैं, क्योंकि स्वच्छता व शौचालयों के अभाव में देश में क्या स्थिति बनती है, इसकी छोटी सच्चाई भी हमें झकझोर कर रख देती है। 2011 की जनगणना के अनुसार देश के 53.1 प्रतिशत घरों में शौचालय नहीं है। ग्रामीण इलाकों में यह संख्या 69.3 प्रतिशत है। 2011 की जनगणना यह भी बताती है कि ज्यादातर राज्यों में ग्राम स्तर पर ना के बराबर शौचालय हैं। झारखंड के 92 प्रतिशत, ओडिशा के 85.9 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ में 85.5 प्रतिशत, बिहार के 82.4, राजस्थान के 80.4 और उत्तरप्रदेश के 78.2 प्रतिशत घरों में शौचालय नहीं हैं। 2011 की जनगणना के बाद भारत सरकार और तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने स्लोगन दिया था- शौचालय नहीं तो वधू नहीं। उन्होंने माता-पिताओं से भी आग्रह किया कि वे ऐसे परिवार में बेटी न दें, जिस घर में शौचालय न हो।

यूनाइटेड नेशंस (यूएन) आंकड़ों के अनुसार, भारत में 59 करोड़ 40 लाख लोग शौच के लिए खुले में जाते हैं, जिसके कारण पानी में सूक्ष्म जीवाणु संक्रमण होता है और इसी वजह से डायरिया जैसी बीमारियों से लोग ग्रसित होते हैं। यह रपट बताती है कि भारत में लोग शौचालय से ज्यादा मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं। देश में 36 करोड़ 60 लाख लोग (आबादी का 31 प्रतिशत) शौचालयों का उपयोग करते हैं, जबकि मोबाइल फोन का इस्तेमाल करने वालों की संख्या 54 करोड़ 50 लाख से भी अधिक है। वहीं विश्व बैंक के डीन स्पीयर्स के अध्ययन में भी यह बात उभरकर सामने आई है कि खुले में शौच का बुरा असर बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य पर सबसे अधिक पड़ता है। खुले में शौच करने वालों के ऊपर वर्म का प्रकोप एक बड़ा खतरा है, ऐसे बच्चे और महिलाएं जो सार्वजनिक शौचालयों अथवा खुले में शौच करते हैं, उन्हें यूरिनल एवं अन्य प्रकार के इन्फेक्शन जल्दी होते हैं।

देश की राजधानी की बात करें तो दिल्ली में रेलवे लाइन से सटी झोपड़ पट्टियों में रहने वाले लोगों के घरों में टीवी, फ्रिज और कूलर हैं, लेकिन अधिकांश झोपड़ पट्टियों में शौचालय नहीं है। यहां मर्द, औरत और बच्चे सभी शौच के लिए रेलवे लाइन के किनारे जाते हैं। कम-ज्यादा देश में जहां-जहां से रेलवे लाइनें गुजरी हैं, उन सभी शहरों में ये हालात हैं। इसके कारण ट्रेन की चपेट में आ जाने से प्रतिवर्ष शौच के दौरान हादसे के शिकार भी हजारों लोग हो रहे हैं। इतना ही नहीं तो देश में खुले में शौच के कारण रेप का खतरा सबसे ज्यादा देखा गया है। 2012 में भोपाल में इसे लेकर हुआ सर्वे बताता है कि खुले में शौच के लिए जाने वाली 10 में से 9 लड़कियों का यौन उत्पीड़न हुआ। उत्तर प्रदेश का आंकड़ा है कि यहां हुए रेप के 60 फीसदी मामले तब हुए, जब पीड़िता खुले में शौच के लिए बाहर गई थी। इसी प्रकार के मिलते-जुलते आंकड़े बिहार समेत तमाम राज्यों के हैं।

वस्तुत: इस परिस्थिित से मुक्ति के लिए मोदी सरकार का 2015 के अंत तक 2 करोड़ शौचालय बनाने का लक्ष्य अपने सामने रखा है। सफाई अभियान और शौचालयों पर सरकार अगले 5 साल में 1 लाख 90 हजार करोड़ रुपये खर्च करने जा रही है। सरकार 2022 तक हर हाल में खुले में शौच की समस्या को खत्म करना चाहती है। सच मायनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छता से जुड़े सभी प्रयासों को हकीकत में तभी पंख लगेंगे, जब उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री हरीश रावत की तरह अन्य राज्य भी राजनीति से ऊपर उठकर इसी प्रकार नवाचार के अधिक से अधिक प्रयोग करने के लिए आगे आएंगे। निश्चित ही स्वच्छ भारत आज की आवश्यकता इसीलिए भी है कि हमारा देश विश्व में विकास के पायदान दिनों दिन चढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर हमारी आंखें स्वच्छता के अभाव में राष्ट्रीय शर्म से झुक जाती हैं।

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