लेखक परिचय

डा. अरविन्द कुमार सिंह

डा. अरविन्द कुमार सिंह

उदय प्रताप कालेज, वाराणसी में , 1991 से भूगोल प्रवक्ता के पद पर अद्यतन कार्यरत। 1995 में नेशनल कैडेट कोर में कमीशन। मेजर रैंक से 2012 में अवकाशप्राप्त। 2002 एवं 2003 में एनसीसी के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित। 2006 में उत्तर प्रदेश के सर्वश्रेष्ठ एनसीसी अधिकारी के रूप में पुरस्कृत। विभिन्न प्रत्रपत्रिकाओं में समसामयिक लेखन। आकाशवाणी वाराणसी में रेडियोवार्ताकार।

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-डॉ. अरविन्द कुमार सिंह- life1
क्या आपने कभी ख्याल किया है कि आप कहते हैं – हम दिन में जागते हैं और रात में सोते हैं। क्या वास्तव में ऐसा ही होता है ? आपने कभी ख्याल किया, आप घर से ऑफिस के लिये निकलते हैं, ऑफिस पहुंच भी जाते हैं पर मन तो सारे रास्ते अतीत और भविष्य में विचरण कर रहा था और ऐसे में किसी दिन हमारी टक्कर किसी से होती है। हम थोड़ी देर के लिये वर्तमान में आते हैं – पुन हमारे अहंकार का विस्तार होता है। हम सामने वाले से कहते हैं,  देख के नहीं चलते हो ? सच तो ये है कि यदि वो नहीं देख रहा था तो हम कहां देख रहे थे ? वास्तविकता तो ये है कि हम अतीत और भविष्य में थे। टक्कर लगा तो वर्तमान में आये पर अहंकारी मन इसे स्वीकार नहीं करता, अब आप ही बताइये क्या आप जाग रहे थे ? या सो रहे थे ?
प्रश्न महात्मा बुद्ध से किया गया था। जीवन क्या है ? जिज्ञासापूर्ण प्रश्न था। महात्मा बुद्ध ने कहा – जीवन वाध यन्त्र सितार का एक तार है जिसे ज्यादा कस दिया जाय तो उस पर संगीत की स्वर लहरी नहीं फूटेगी। तार टूट जायेगा। यदि ढीला छोड़ दिया जाय तब भी उस पे संगीत की स्वर लहरिया नहीं फूटेंगी। तार की एक मध्यम अवस्था है जहां तार न ज्यादा कसा जायेगा और न ज्यादा ढीला छोड़ा जायेगा। उसी बिन्दु पर सितार से संगीत की स्वर लहरी फूटेगी। मैं जीवन को उसी मध्यम अवस्था पर देखता हूं।
आइये इसे थोड़ा जीवन के क्षितिज पर देखने का प्रयास किया जाय । व्यकित जीवन को तीन स्तरो पर जीने का प्रयास करता है । वर्तमान , अतीत और भविष्य । दिलचस्प बात तो यह है कि वो अपनी जिन्दगी का सर्वाधिक वक्त अतीत और भविष्य में गुजारता है । इसी अतीत और भविष्य के बीच उसका वर्तमान गुजर जाता है । जीवन की यह विसंगति ही  अतीत और भविष्य में जीवन यापन  उसके समस्त दुखों का कारण है। विसंगति जीवन की यह है कि जहां सुख है, वर्तमान में  वहा हम होते नहीं और जहां दुख है अतीत और भविष्य वहां से हम हट नहीं पाते। ध्यान की उपलब्धता हमें इस स्थिति से बाहर निकालती है।
हमारा चौबीस का चौबीस घंटा अतीत और भविष्य में बीत रहा है । दिन में हम मन के माध्यम से अतीत और भविष्य में है और रात सोते वक्त सपने के माध्यम से अतीत और भविष्य में होते हैं, तो कहीं ऐसा तो नहीं जीवन का कुछ क्रम उलटा हो गया है जो हमें आनन्द के करीब नहीं ले जा रहा है। ज्यों ही यह क्रम ठीक होगा, हम दुख के दायरे से निकलकर सुख के दायरे में प्रवेश कर जायेंगे।
क्या आपने कभी ख्याल किया है कि आप कहते हैं- हम दिन में जागते हैं और रात में सोते हैं। क्या वास्तव में ऐसा ही होता है ? आपने कभी ख्याल किया, आप घर से ऑफिस के लिये निकलते हैं, ऑफिस पहुंच भी जाते हैं पर मन तो सारे रास्ते अतीत और भविष्य में विचरण कर रहा था और ऐसे में किसी दिन हमारी टक्कर किसी से होती है। हम थोड़ी देर के लिये वर्तमान में आते हैं- पुनः हमारे अहंकार का विस्तार होता है। हम सामने वाले से कहते हैं-  देख के नहीं चलते हो ?  सच तो ये है यदि वो नहीं देख रहा था तो हम कहां देख रहे थे ? वास्तविकता तो ये है कि हम अतीत और भविष्य में थे। टक्कर लगा तो वर्तमान में आये पर अहंकारी मन इसे स्वीकार नहीं करता, अब आप ही बताइये क्या आप जाग रहे थे ? या सो रहे थे ?
रात आप सोये, सुबह उठे और पड़ोसी से आपने सपने देखने की बात कही। दोनों बात कैसे सही हो सकती है ? यदि आप सो गये तो सपना किसने देखा ? यदि आप सोये थे तो आप जाग कैसे सकते हैं ? यह तो सारा क्रम ही उलटा चल रहा है। जागने की बात कह के आप दिन में सोते है वरना टक्कर न होती और रात में सोने की बात कहके जागने की प्रक्रिया पर है आप। दरअसल जीवन की विसंगति यही है और इस विसंगति को दूर करने के लिये हमे यह बात समझनी होगी कि हम अतीत और भविष्य में जाते कैसे है ? और वर्तमान में रहने का औचित्य क्या है ।
दूसरे प्रश्न को पहले उठाते है । वर्तमान में रहने का औचित्य क्या है ? पुन: महात्मा बुद्ध का एक दृष्टान्त याद आ रहा है । किसी व्यकित ने महात्मा बुद्ध के पास आकर कहा –  मैं ध्यान करना चाहता हूं। बुद्ध ने कहा – ध्यान किया नहीं जा सकता , ध्यान में हुआ जा सकता है  इस स्थिति को समझने से पहले मैं आप से यह जानना चाहूंगा कि क्या यह शरीर आपका है ? व्यक्ति बुद्ध के प्रश्न पर हैरान हुआ। यकीनन यह शरीर मेरा है – उस व्यक्ति ने जबाब दिया। बुद्ध ने शांत स्वर में कहा, यदि शरीर आपका है तो मैं देख रहा हूं जब से आप यहा बैठे हैं, आपके दाहिने पैर का अंगूठा लगातार हिल रहा है। इसकी तो खबर आपको होगी ही ? यदि खबर नहीं है तो आप ये दावा कैसे कर सकते हैं कि यह शरीर आपका ही है ?
बात छोटी सी है पर बहुत गहरे अर्थ को अपने अन्दर समेटे हुये हैं। मन जिसे हमारा नौकर होना चाहिये वो हमारा मालिक बन के बैठा हुआ है । उसकी खासियत है, वो चौबीस के चौबीस घंटा या तो रहेगा अतीत में या फिर भविष्य में। ध्यान का एक सूत्र है- जब हम वर्तमान में होगे तो मन की मृत्यु हो जायेगी । अतीत और भविष्य मन की खुराक है । यही कारण है एक छोटा बच्चा सर्वाधिक खुशी के करीब होता है । क्योकि वो हमेशा वर्तमान में होता है । वो अतीत और भविष्य में जा ही नहीं सकता। क्यों ? यही दूसरा प्रश्न है , जिसकी परतें हम आगे खेालेंगे। यहां यह संज्ञान में लेने जैसा है, यदि शरीर हमारा है तो हमें यह अधिकार होना चाहिये कि जब हम जाना चाहे तब भविष्य में जाये और जितना वक्त रूकना चाहे वर्तमान में, उतना वर्तमान में रूके। जीवन की संपूर्ण खुशिया वर्तमान में है और हम वर्तमान में होते नहीं। जीवन का अभिष्ठ शांति, सुख और समृद्धि है तथा यह वर्तमान की विषयवस्तु है। यही हमारे वर्तमान में रहने का औचित्य है ।
आइये दूसरे प्रश्न की तरफ चलते हैं। अतीत और भविष्य में हम कैसे जाते हैं ? विचार के माध्यम से। हम विचार कैसे करते हैं ? शब्द के माध्यम से। अब जरा सोचिये यदि हमारे पास शब्द ही न हो। तो विचार नहीं होगा। यदि विचार नहीं होगा तो हम अतीत और भविष्य में भी नहीं जा पायेंगे। यही कारण है चूंकि छोटे बच्चे के पास भाषा नहीं होती, अत: वो विचार नहीं कर पाता और वह वर्तमान में होते हुये खुशियों के करीब होता है। यहां यह समझ लेने जैसा है कि यह कतई नहीं कहा जा रहा है कि हम अतीत और भविष्य में न जाये लेकिन यह जाना आवश्यकतानुसार होना चाहिये न कि अनावश्यक और यही साधना हमारे ध्यान की विषय वस्तु है।
कैसे र्निविचार हो ? र्निविचार होने के लिये हमे वर्तमान में होना होगा। यही तो ध्यान है। ध्यान की एक सौ बीस विधियों में ज्यादातर विधिया स्वास पर आधारित है । वजह स्पष्ट है स्वास जब भी होगी वर्तमान में होगी । स्वास अतीत या  भविष्य में  नहीं हो सकती। अत: साधक स्वास पर ध्यान केंद्रित करता है। स्वांस का बाहर जाना मृत्यु का परिचायक है और भीतर जाना जीवन का परिचायक है। जीवन के किसी क्षण विशेष में यह किया घटित होगी। शायद हम ध्यान में होकर उससे गुजर जायें और तब मृत्यु भयावह नहीं, ध्यान की एक अवस्था बन जायेगी। यह ध्यान हमारे जीवन में कैसे सधे, यही तो हमारे जीवन का लक्ष्य है । सुख शांति और समृद्धि क्या हम प्राप्त कर सकते हैं ? जी हां, प्राप्त कर सकते हैं। कैसे ? इस पर चर्चा फिर कभी। आज तो सिर्फ इतना ही आपके अन्दर मौजूद चेतन सत्ता को प्रणाम।

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2 Comments on "होशपूर्ण जीवन ही ध्यान है"

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डॉ. मधुसूदन
Guest

डॉ. अरविंद कुमार जी….
सुंदर, संक्षेप में ध्यान को द्योतित करता, संग्रहणीय आलेख!
आज, प्रवक्ता खोलते ही, सब से पहले आपका आलेख ही सामने आया!
बहुत सुंदर।
“एकं सत्‌ विप्राः बहुधा वदन्ति।”
धन्यवाद।

mahendra gupta
Guest

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.धयान का सही मायने में आशय ये ही है.सुन्दर विचारों को प्रस्तुत करने हेतु आभार.भविष्य में उत्सुकता से और इंतजार रहेगा.

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