लेखक परिचय

शिखा श्रीवास्‍तव

शिखा श्रीवास्‍तव

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अरे! सुनती हो निक्को की मम्मी, लड़के वालों ने अपनी निक्को को पसंद कर लिया है। कितना

परेशान से थे दो साल से। चलो भगवान ने हमारी सुन ली।’ घर के बड़े दरवाजे से दीनानाथ तेज

कदमों और चेहरे पर ढेर सारी खुशियों को समेटे बाहर से ही यह खुशखबरी सुनाते हुए आए।

क्या बात है निक्को के पापा इतना काहे खुश हो, इतने खुश तो पहले कभी न देखा था। पता नहीं

क्या आप बाहर से बोलते हुए आए, नाराज न हो तो दोबारा बताइए क्या बता रहे थे आप? हैरान

होते हुए निक्को यानी निकिता की मां उमा ने पूछा।

अरे उमा! तुम मुझे पागल समझती हो…इस बात पर क्यों नाराज होऊंगा, एक नहीं दस बार पूछो,

आज मैं बहुत खुश हंू। अच्छा ऐसे घूर-घूर के न देखो।…दरअसल अपनी निक्को को बिजनौर

वालों ने पसंद कर लिया है। क्या बात कर रहे हो निक्को के पापा, बड़ी अच्छी खबर सुनाई

आपने। अपनी निक्को वहां बहुत खुश रहेगी, है कि नहीं। हामी भराते हुए निक्को की मां ने पूछा।

दीनानाथ ने भी कहा, ‘हां वो तो है।’ तभी निक्को आॅफिस से आ गई, उसे देखते ही दीनानाथ ने

उसे गले से लगा लिया और उनकी आंखों से अश्रुधारा बह निकली। निक्को ने परेशान होते हुए

पूछा, ‘क्या हुआ पापा, आप रो क्यों रहे हैं?’

अपनी भावनाओं को छिपाते हुए उन्होंने कहा, ‘कुछ नहीं, तुम्हारा रिश्ता तय हो गया है। तैयारी

करनी है, तुम ऊपर जाओ।’

निक्को और उसकी मां में इतना साहस नहीं था कि कोई बात दीनानाथ से दोबारा पूछ सकें। सभी

अपने-अपने काम में लग गए। उनकी आवाज से पूरा घर जो कांप जाता था। शादी के तीस सालों

बाद उमा ने अपने पति को खुश होते हुए देखा था।

खैर दीनानाथ ने यह खबर फोन से अपने सभी रिश्तेदारों को देना शुरू कर दी, कि अगले हफ्ते

निक्को की सगाई है। आना जरूर है आप सबको। घर में निक्को की सगाई की तैयारियां चलने

लगीं। हर तरफ हंसी-ठिठोली, गीत-संगीत का माहौल।

निक्को की मां किचन में सभी मेहमानों के लिए पूड़ियां तल

रही थीं। निक्को के बारे में सोच-सोच कर

उनकी आंखों से अश्रु की धारा बह रही थी। निक्को की

ताई जी को इधर आते हुए निगाह उमा पर पड़ी तो उसने

पूछा, ‘क्या बात है उमा, तुम रो क्यों रही

हो?’

‘कुछ नहीं दीदी।’ अपने

आंसुओं को पोंछते हुए उमा

ने कहा।

‘अरे उमा, तुम

बेकार में परेशान हो

रही हो, अपनी

निक्को बहुत

समझदार है,

सब संभाल

लेगी।…वैसे भी

उसका ससुराल भी तो पास में ही है,

जब भी मन करे बेटी से मिलने चली जाया

करना।’

‘नहीं दीदी, जब निक्को दो दिन के

लिए चली जाती है, तब ये घर

काटने को दौड़ता है और अब

तो…।’ यह कह वह फिर से सुबकते

हुए पूड़ियां तलने लगीं। तभी उमा ने

देखा कि सामने से दीनानाथ आ रहे हैं।

उन्हें देखते ही घबराते हुए उमा ने जल्दी

से अपनी साड़ी के पल्लू से अपने आंसू

पोंछे कि कहीं वह देख न लें।

दीनानाथ ने उमा को पहले ही

हिदायत दे दी थी कि रोना-

धोना नहीं होना चाहिए।

दीनानाथ किचन की

तरफ देखते हुए

बाकी तैयारियों

का मुआयना

लेने

लगे। उमा को राहत हुई कि निक्को के पापा ने उन्हें रोते हुए नहीं देखा।

कुछ ही देर बाद लड़के वाले आए। निक्को की सगाई की रस्म शाम तक चली। इसके बाद सभी

मेहमान एक-एक कर जाने लगे। धीरे-धीरे पूरा घर खाली हो गया। जिस घर में सुबह से

कोलाहल, लजीज व्यंजनों की खूशबू, गीत-गाने, बच्चों का हुड़दंग मचा था, वह घर अब सुन-

सान सा लग रहा था।

उमा को याद आया कि दीनानाथ ने आज तो अपनी दवा ही नहीं ली। पूरे घर में उन्होंने निक्को के

पापा को ढूंढ़ा, लेकिन वह नहीं मिले। निक्को दादी के कमरे में अपनी सहेलियों के साथ बिजी थी।

उसे भी नहीं पता था कि पापा कहां हैं। उमा की घबराहट तेज हो गई। आखिर प्रोग्राम के बाद वह

कहां चले गए बिना बताए। उन्हें ढूंढ़ते हुए उमा निक्को के कमरे में पहुंच गई, जहां दीनानाथ

निक्को की बचपन के गुड्डे-गुड़ियां को अपने सीने से लगाए, रोए जा रहे थे। यह देख निक्को की

मां परेशान हो गई। उन्होंने हिम्मत करते हुए पूछा, ‘क्या हुआ आप निक्को के कमरे में रो क्यों रहे

हैं? निक्को के ससुराल वालों ने कुछ कह दिया क्या?…आप तो ऐसे नहीं हैं। जरूर कोई बात है।

मां जी को भेजूं क्यां?’ डरते हुए उमा ने दीनानाथ से कहा।

बड़ी-बड़ी मूंछें, लंबा कद, हमेशा तनी रहने वाली भृकुटी और माथे पर लाल टीके के साथ शेर

ेकी सी दहाड़ वाली आवाज। यही थी दीननाथ की पूरे गांव में पहचान। उनकी मां के अलावा

किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि वह दीनानाथ से कुछ पूछ या बता सकें। इन तीस सालों में उमा

को भी जो कहना होता था वह अपनी सास से ही कहलवाती थीं। कभी-कभी ही बात होती

उनकी।

उमा का हाथ पकड़कर रोकते हुए दीनानाथ ने कहा, ‘नहीं निक्को की मां। किसी को बुलाने की

जरूरत नहीं, बस तुम बैठ जाओ कुछ कहना है निक्को के बारे में।’ अपने आंसुओं को पोंछते हुए

दीनानाथ ने कहा, ‘उमा, लड़कियां पराई क्यों होती हैं। उनको भी तो मां-बाप ही जन्म देते हैं,

पालन-पोषण करते हैं फिर क्यों?’

‘निक्को के पापा, आप कैसी बात कर रहे हैं।…आप तो हमेशा से यही कहते आ रहे हैं कि यह

दुनिया का दस्तूर है कि बेटियां पराई होती हैं। फिर आज ऐसी बात क्यों?’

‘पता नहीं क्यों उमा? आज जब निक्को की सगाई हो रही थी, उसके ससुराल वाले उसे आशीष

दे रहे थे। तबसे उसके लिए बहुत तड़प हो रही है। ऐसा लग रहा है   जैसे कोई मेरी आत्मा को

छीनने वाला है। मेरी छाती फट-सी रही है, मेरा बिल्कुल मन नहीं कर रहा है कि उसे ससुराल

भेजूं। बहुत घुटन सी हो रही है, वह यहां भी तो रह सकती है।’ यह कहते-कहते उनका गला फिर

से रुंध गया।

कुछ पल के लिए वह खामोश होकर शून्य में देखने लगे। थोड़ी देर बाद खुद से ही बड़बड़ाने

लगे, ‘जिसे नाजों से पाला अपने हाथों से खिलाया, उसे किसी दूसरे के हाथों कैसे सौंप दूं? पता

नहीं बेटियों को विदा करने की रीति किसने बनाई है।’

‘कैसी बात करते हैं आप? आप तो कभी नहीं रोते…फिर आज क्यों?’ उमा ने फिर कहा, ‘मुझे

नहीं पता था कि जिस इंसान को मैं पत्थर दिल और कड़क मिजाज वाला समझती थी, वह अपनी

बेटी के लिए इस कदर भावुक हैं।…मैं तो हमेशा रो लेती थी निक्को की शादी की बात होने पर,

पर आज पता चला कि आपको भी तकलीफ होती है, बस आपने कभी जाहिर नहीं किया।’

अपने आपको संभालते और आंसुओं को पोंछते हुए दीनानाथ ने कहा, ‘मैं भी इंसान हूं। कभी

हंसता नहीं हूं, इसका मतलब यह थोड़े ही है कि अपनी निक्को को प्यार नहीं करता या मेरे सीने

में दिल नहीं है।’ अचानक से उमा का हाथ तेजी से पकड़ते हुए दीनानाथ ने कहा, ‘पता है तुम्हें

उमा! यह गुड्डे-गुड़ियों को मैं अपने सीने से क्यूं लगाए हूं?’

‘नहीं आप ही बताएं।’

‘अपनी निक्को जब छोटी थी तो मैं डांटकर उससे कह देता था कि पढ़ो जाकर। फिर जब मैं

यह देखने आता कि वह पढ़ रही है या नहीं तो खिड़की से देखता था कि निक्को इन

गुड्डे-गुड़ियों से ही हमेशा बात करती थी। उनसे बातें करती और कहती थी कि जब मेरी

और तुम्हारी शादी होगी तब पापा निश्चित ही बहुत रोएंगे। क्योंकि दादी कहती हैं कि

जो ज्यादा डांटता है, वही सबसे ज्यादा प्यार करता है। कितनी समझदार थी न अपनी

निक्को। मैं अपनी निक्को को कहीं नहीं भेजूंगा, यहीं रहेगी वह मेरे पास।’ यह कहतेकहते दीनानाथ फिर से रोने लगे। जैसे बीस वर्ष का सारा प्यार जो उन्होंने अपने कड़क

मिजाज के कारण दबा रखा था, आज आंसुओं के रूप में निकल आया हो। इतने ही में

निक्को आ गई और देखते ही पूछने लगी, पापा! आप रो रहे हैं, निक्को की आवाज

सुनते ही दीनानाथ ने तुरंत उसके गुड्डे-गुड़ियों को अपने सीने से हटा दिया और

अपने आंसुओं को छिपाते हुए कहा, ‘नहीं। बेटा ऐसा कुछ भी नहीं, तुम

आराम करो।’

यह कह जैसे ही वह निक्को के कमरे से जाने लगे, निक्को ने दीनानाथ

का हाथ पकड़ लिया और कहा, ‘पापा! मैंने आपकी और मां की सारी

बात सुन ली हैं। आपकी निक्को कैसे पराई हो सकती है। मैं पराई नहीं

हूं, मैं तो अपने पापा की हूं और हमेशा रहूंगी। मैं भी आपके पास ही

रहना चाहती हूं, भले ही आपने कभी अपने प्यार को नहीं जताया,

लेकिन आपकी आंखों में हमेशा अपने लिए प्यार देखा है।’ यह कहते

ही निक्को की आंखों में भी आंसू आ गए।

बेटी की बात सुन दीनानाथ और भावुक हो उठे और उसे अपने सीने से

लगाते हुए फिर से अश्रुधारा में डूब गए।

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