लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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batukeshwar dutt

सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी बटुकेश्वर दत्त का जन्म १८ नवम्बर, १९१० को बंगाली कायस्थ परिवार में ग्राम-औरी, जिला नानी बेदवान (बंगाल) में हुआ था; परंतु पिता गोष्ठ बिहारी दत्तकानपुर में नौकरी करते थे। बटुकेश्वर ने १९२५ में मैट्रिक की परीक्षा पास की। उन्हीं दिनों उनके माता एवं पिता दोनों का देहांत हो गया। इसी समय वे सरदार भगतसिंह और चंद्रशेखर आजाद के संपर्क में आए और क्रान्तिकारी संगठन हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशनके सदस्य बन गए। सुखदेव और राजगुरु के साथ भी उन्होंने विभिन्न स्थानों पर काम किया । इसी क्रममें बम बनाना भी सीखा। 

८ अप्रैल, १९२९ को दिल्ली स्थित केंद्रीय असेंबली में (वर्तमान का संसद भवन) भगत सिंह के साथ बम विस्फोट कर ब्रिटिश राज्य के आधिपत्य का विरोध किया। बम विस्फोट, बिना किसी को हानि पहुंचाए असेंबली में पर्चे फेंककर उनके माध्यम से अपनी बात को लोगों तक पहुँचाने के लिए किया गया था। उस दिन भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों को दबाने के लिए ब्रिटिश शासन की ओर से पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट बिल लाया गया था, जो इन लोगों के विरोध के कारण एक वोट से पारित नहीं हो पाया। इस घटना के पश्चात् बटुकेश्वर दत्त और भगत सिंह को बंदी बनाया गया ।

१२ जून, १९२९ को इन दोनों को आजीवन कारावास का दंड सुनाया गया । दंड सुनाने के उपरांत इनको लाहौर फोर्ट कारागृह में भेजा गया । यहां पर भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त पर लाहौर षडयंत्र अभियोग चलाया गया। उल्लेखनीय है कि साइमन कमीशनका विरोध- प्रदर्शन करते हुए लाहौरमें लाला लाजपत रायको अंग्रेजोंके आदेशपर अंग्रेजी राजके सिपाहियों द्वारा इतना पीटा गया कि उनकी मृत्यु हो गई । अंग्रेजी राज के उत्तरदायी पुलिस अधिकारी को मारकर इस मृत्यु का प्रतिशोध चुकाने का निर्णय क्रांतिकारियों द्वारा लिया गया था। इस कार्यवाही के परिणामस्वरूप लाहौर षडयंत्र अभियोग चला, जिसमें भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई थी। बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास काटने के लिए काला पानी भेज दिया गया। कारागृह में ही उन्होंने १९३३ और १९३७ में ऐतिहासिक भूख हडताल की। सेल्यूलर कारागृह से १९३७ में बांकीपुर केंद्रीय कारागृह, पटना में लाए गए और १९३८ में मुक्त कर दिए गए । काला पानीसे गंभीर बीमारी लेकर लौटे दत्त पुनः बंदी बनाए गए और चार वर्षोंके पश्चात् १९४५ में मुक्त किए गए। देशकी स्वतंत्रताके लिए अनंत दुःख झेलने वाले क्रांतिकारी एवं स्वतंत्रता सेनानी बटुकेश्वर दत्त का जीवन भारत की स्वतंत्रताके उपरांत भी दंश, यातनाओं, और संघर्षों की गाथा बना रहा और उन्हें वह सम्मान नहीं मिल पाया जिसके वह अधिकारी थे। उन्होंने बिस्कुट और डबलरोटी का एक छोटा सा कारखाना खोला; परंतु उसमें बहुत हानि उठानी पडी और वह बंद करना पडा।

कुछ समय तक यात्री (टूरिस्ट) प्रतिनिधि एवं बस परिवहन का काम भी किया; परंतु एक के पश्चात् एक कामों में असफलता ही उनके हाथ लगी। बटुकेश्वर दत्त के १९६४ में अचानक व्याधिग्रस्त होने के पश्चात् उन्हें गंभीर स्थिति में पटना के शासकीय चिकित्सालय में भर्ती कराया गया । इस पर उनके मित्र चमनलाल आजाद ने एक लेख में लिखा, ‘क्या दत्त जैसे कांतिकारी को भारत में जन्म लेना चाहिए, परमात्मा ने इतने महान शूरवीर को हमारे देश में जन्म देकर भारी भूल की है। खेद की बात है कि जिस व्यक्ति ने देश को स्वतंत्र कराने के लिए प्राणों की चिंता नहीं की और जो फांसी से बाल-बाल बच गया, वह आज नितांत दयनीय स्थिति में चिकित्सालय में पडा एडियां रगड रहा है और उसे कोई पूछनेवाला तक नहीं है।इसके पश्चात सत्ता के गलियारों में हडकंप मच गया और चमनलाल आजाद, तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा और पंजाबके मंत्री भीमलाल सच्चर से मिले । पंजाब शासन ने एक हजार रुपए का धनादेश बिहार शासन को भेजकर वहां के मुख्यमंत्री के. बी. सहाय को लिखा कि यदि वे उनका वैद्यकीय उपचार कराने में सक्षम नहीं हैं तो वह उनका दिल्ली अथवा चंडीगढ में वैद्यकीय उपचारका व्यय वहन करने को तत्पर हैं। बिहार शासन की उदासीनता और उपेक्षा के कारण क्रांतिकारी बैकुंठनाथ शुक्ला पटना के शासकीय चिकित्सालय में असमय ही प्राण छोड चुके थे । अत: बिहार शासन सक्रिय हो गया और पटना मेडिकल कॉलेज में  डॉ. मुखोपाध्याय ने दत्त का उपचार चालू किया; परंतु उनकी स्थिति बिगडती गयी; क्योंकि उन्हें सही उपचार नहीं मिल पाया था। २२ नवंबर १९६४ को उन्हें दिल्ली लाया गया।

दिल्ली पहुंचने पर उन्होंने पत्रकारों से कहा था, मैने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि, मैं उस दिल्ली में जहां मैने बम डाला था, एक अपाहिज बनकर स्ट्रेचर पर लाया जाऊंगा। उन्हें सफदरजंग चिकित्सालय में भर्ती  किया गया। पीठ में असहनीय पीडा के उपचार के लिए किए जाने वाले कोबाल्ट ट्रीटमेंट की व्यवस्था केवल एम्स में थी; परंतु वहां भी कमरा मिलने में विलंब हुआ। २३ नवंबर को पहली बार उन्हें कोबाल्ट ट्रीटमेंट दिया गया और ११ दिसंबर को उन्हें एम्स में भर्ती किया गया। तदनंतर पता चला कि, दत्त बाबू को कैंसर है और उनके जीवन के चंद दिन ही शेष बचे हैं। भीषण पीड़ा झेल रहे दत्त अपने मुखपर वह पीड़ा कभी भी न आने देते थे। पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री रामकिशन जब दत्त से मिलने पहुंचे और उन्होंने पूछ लिया, हम आपको कुछ देना चाहते हैं, जो भी आपकी इच्छा हो मांग लीजिए। छलछलाए नेत्र और मंदस्मित के साथ उन्होंने कहा, हमें कुछ नहीं चाहिए। बस मेरी यही अंतिम इच्छा है कि, मेरा दाह संस्कार मेरे मित्र भगत सिंह की समाधि के पास में किया जाए। लाहौर षडयंत्र अभियोग के किशोरीलाल अंतिम व्यक्ति थे, जिन्हें उन्होंने पहचाना था। उनकी बिगड़ती स्थिति देखकर भगत सिंह की मां विद्यावती को पंजाब से कार से बुलाया गया। १७ जुलाई को वह कोमा में चले गये और २० जुलाई १९६५ की रात एक बजकर ५० मिनट पर बटुकेश्वर दत्त इस संसार से विदा हो गये। उनका अंतिम संस्कार उनकी इच्छा के अनुसार, भारत-पाक सीमा के पास हुसैनीवाला में भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की समाधि के निकट किया गया।

शैलेन्द्र चौहान

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