लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

निदेशक, विश्व संवाद केन्द्र सुदर्शन कुंज, सुमन नगर, धर्मपुर देहरादून - २४८००१

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चुनाव के दिन जैसे-जैसे पास आ रहे हैं, हर कोई उसके रंग में रंगा दिख रहा है। किसी ने छत पर अपनी मनपंसद पार्टी का झंडा लगाया है, तो किसी ने सीने पर उसका बिल्ला। कुछ लोगों ने साइकिल, स्कूटर और कार पर ही अपने प्रिय प्रत्याशी को चिपका लिया है। पान की दुकान हो या बस की लाइन, कॉलिज हो या दफ्तर, बूढ़े हों या जवान, कामकाजी हों या निकम्मे। सब जगह एक ही चर्चा। इस बार कौन जीतेगा; सरकार किसकी बनेगी; मुख्यमंत्री कौन बनेगा.. ?

हमारे प्रिय शर्मा जी भी घोर राजनीतिक प्राणी हैं। इस बार उनकी इच्छा खुद चुनाव लड़ने की थी; पर किसी ढंग की पार्टी ने उन्हें टिकट ही नहीं दिया। इसलिए वे चुपचाप बैठे हैं। उन्हें शांत देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मैं उनके घर गया, तो वे मंुह फुलाए बैठे थे।

– क्या बात है शर्मा जी, चुनाव का माहौल गरम है और आप बिल्कुल ठंडे पड़े हैं ?

– हां, मैं इस चुनाव से दूर हूं।

– ये तो ठीक नहीं है। आखिर आपकी पंसद का कोई प्रत्याशी तो होगा।

– जी नहीं। मैं इस बार किसी को वोट ही नहीं दूंगा।

– ऐसा न कहें शर्मा जी। लोकतंत्र के पर्व में सबको भाग लेना चाहिए। देखिये, इस प्रत्याशी नंबर एक को तो आप अच्छी तरह जानते हैं ?

– अच्छी नहीं, बहुत अच्छी तरह जानता हूं। पैर कबर में लटक रहे हैं, पर चुनाव लड़ने की इच्छा नहीं गयी। पता नहीं कब भगवान को प्यारे हो जाएं। इसलिए मैं इसे वोट नहीं दूंगा।

– तो प्रत्याशी नंबर दो को चुन लें। ये तो 25 साल का खरा जवान है।

– जवान है तो क्या हुआ ? न घर-गृहस्थी का अनुभव है, न खेती, नौकरी या कारोबार का। ऐसे अनुभवहीन बेरोजगार युवक को मैं नेता नहीं मान सकता।

– इस प्रत्याशी नंबर तीन के बारे में आपका क्या विचार है ?

– ये भी बिल्कुल बेकार है। जो भी पार्टी जीते, उसी में शामिल हो जाता है। तीन बार तो पार्टी बदल चुका है ये। चुनाव के बाद चौथी बार भी बदल ले, तो कोई हैरानी नहीं।

– और प्रत्याशी नंबर चार ?

– ये आदमी तो ठीक है। शुरू से एक ही पार्टी में है; पर इस बार इसकी पार्टी की हार निश्चित है। तो इसे समर्थन देकर मैं अपना वोट खराब क्यों करूं ?

– तो फिर पांच नंबर को चुन लें।

– जी नहीं। ये तो महाभ्रष्ट है। पिछली बार चुनाव जीतते ही इसने सबसे पहले अपना घर भरा। पहले ये साइकिल पर चलता था; पर अब कार से नीचे पैर नहीं रखता। हर सरकारी काम में इसका हिस्सा है। अपने परिवार के हर सदस्य को कहीं न कहीं राजनीति में फिट करा दिया है। यानि पांचों उंगलियां घी में और सिर कढ़ाई में। ऐसे आदमी को मैं वोट क्योें दूं ?

– तो इस गरीब को दे दो।

– इसे तो बिल्कुल ही नहीं। ये भी एक बार चुनाव जीत चुका है। लेकिन इसने अपनी गरीबी ही नहीं मिटाई, तो अपने वोटरों की क्या खाक मिटायेगा।

– और ये पंडित जी महाराज ?

– ये पंडित नहीं, पोंगा पंडित है। दिन में छह घंटे तो पूजा ही करता है। जनता की सेवा क्या करेगा ?

– तो इन मौलाना जी को चुन लें ?

– जी नहीं, ये तो घोर मजहबी आदमी है। हर समय कुरान और शरीयत की बात करता है। दंगे और गोकशी के कई मुकदमे इस पर चल रहे हैं।

– तो ये घोर नास्तिक प्रत्याशी ठीक रहेगा।

– कैसी बात करते हो वर्मा ? जो भगवान को नहीं मानता, वह  इन्सान को भला क्या मानेगा ?

– और ये दस नंबर वाला कैसा है ?

– ये तो पड़ोस के क्षेत्र से टिकट मांग रहा था; पर वहां मुख्यमंत्री जी की बेटी आ टपकी। इसलिए इसे यहां भेज दिया। इस बाहरी आदमी को मैं समर्थन नहीं दे सकता।

– ये दसों पसंद नहीं हैं, तो तो फिर जेल से चुनाव लड़ने वाले इस ‘दस नंबरी’ को चुन लें। इसका कहना है कि चुनाव जीतते ही सब गुंडों को बाहर भगा दूंगा।

शर्मा जी ने बड़ी गंभीरता से मेरी ओर देखा और बोले, ‘‘चलो तुम कह रहे हो, तो मैं इसके नाम पर विचार करूंगा।’’

शर्मा जी वोट देंगे या नहीं; और देंगे तो किसे देंगे, ये तो वही जानें। पर इतना तय है कि यदि उन जैसे लोग हर प्रत्याशी में खोट ही देखते रहे, तो वे ‘दस नंबरी’ हमारे सिर पर बैठ जाएंगे, जो गुंडे भी हैं और भ्रष्ट भी। जातिवादी भी हैं और परिवारवादी भी। दलबदलू भी हैं और दिलबदलू भी। जिनके लिए सिद्धांत नहीं, सत्ता की मलाई का महत्व है। इसलिए ‘मैं वोट नहीं दूंगा’ का विचार छोड़कर ‘मैं वोट जरूर दूंगा’ का झंडा अपने घर की छत पर लगाइये, इसी में सबका भला है।

– विजय कुमार,

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