लेखक परिचय

कन्हैया कुमार झा

कन्हैया कुमार झा

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timthumbकाश…! दादी ने शहर की कहानी सुनाई होती
लोग कहते हैं फिल्में समाज का दर्पण होती हैं मतलब समाज मे जो कुछ घटित होता है, समाज की जो भी असलियत है, जितनी संवेदना है , जैसी भी अवधारना है, फिल्में ठीक वैसी ही परोसती हैं । कभी-कभी तो हर आदमी की कहानी ही फिल्मी लगती है और लगता है ये “फिलम” वाले हमारे घरों से ही कहानियाँ चुराकर हमें परदे पर दिखाते हैं, हमे इस बात का अहसास कराते हैं कि देखो जिंदगी तुम्हारी ही है, हमने बस अपने जीने का तरीका तुम्हारी जिंदगी से सिखा है । हालांकि हम और आप यह भी नही कह सकते कि फलाना फिल्म हमारी जिंदगी पर बनी है क्योंकि ऐसे लाखो लोग हैं जो इस तरह की जिंदगी जी रहे हैं, । भारत की जितनी आबादी है और जितने लोग यहाँ रहते हैं इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस तरह लोग यहाँ जीवन-यापन करते हैं,कैसे रहते हैं, ख्वाब देखना तो दूर अपने बच्चों के पेट कैसे पालते हैं ? स्वाभाविक है गाँव में रहने वाले लोग शहर इसलिए आते हैं ताकि वे अपनी जिंदगी सुधार सके, अपने बच्चों को भले कीमती खिलौने न दे पाएं पर उतनी शिक्षा और संस्कार अवश्य देकर जाए जितने मे उसका बच्चा इस शहर की असली सूरत पहचान ले और शहर मे रहना सिख जाए। जो लोग गाँव से आते हैं और अपने आप को संपन्न समझते हैं उनके लिए भी शहर मे गुजारा करना किसी परिकथा से कम नही । बेकार में हमारी दादी-नानी परियों की कहानी सुनाती थी, काश..! किसी शहर की कहानी सुनाई होतीं कमबख्त हम जीना सीख लेते ।
कहने को तो हर सरकार हमारे लिए ही नीति बनाती है और शायद हम शहर भी इसलिए आते हैं क्योंकि सरकार की नीति यहीं जागती है, गाँव के लोग तो गंवार और निहायत ही सीधे होते हैं जो कि न तो उनके हित मे है और न ही हमारे लोकतंत्र के इसलिए गाँव मे नीति लागू कर सरकार खूलेआम लोकतंत्र का मजाक नहीं उड़ाती। वैसे भी अब ज्यादातर लोग तो शहर को ही पलायन कर रहे हैं ऐसे में सरकार खतरा क्यों उठाए और फिर सरकार के पास केवल देश के लिए ही नीति बनाने का काम है क्या..? विदेश नीति भी तो है सिर्फ देश की ही नीति बनाने लगे तो विदेश नीति कौन देखेगा..? सच तो ये है कि आज विदेश नीति ज्यादा अहम है क्योंकि देश रहेगा तभी तो देश के लिए नीति बनेगी और जब देश बचेगा ही नही तो फिर क्या गाँव और क्या शहर..और क्या देश की नीति। समझने वाली बात ये है कि देश तभी बचेगा जब कोई विदेशी आक्रमण न करे और हमारे देश मे पर्याप्त निवेश करे, इसके लिए जरूरी है हमारी विदेश नीति बेहद सशक्त हो अपने प्रधानमंत्री तो इसी विदेश नीति को मजबूत बना रहे हैं ताकि देश मजबूत बना रहे। देश के अंदर जो संकट है वो तो अपना है इसका समाधान तो कभी भी किया जा सकता है । किसान गुस्से मे है, गुर्जर पटरी पर है, लाखों लोग फुटपाथ पर हैं लेकिन सब ठीक हो जाएगा, इन्हें भारत की संस्कृति पता है और भारत की संस्कृति कहती है कि ज्यादा दिन तक कोई भी अपनों से नाराज नहीं रह सकता और फिर ये तो इनकी चूनी हुई सरकार है, अपने प्रधानमंत्री हैं, फिर कैसी नाराजगी।
जब हम देहात के लोग शहर आते हैं तो बड़ा अच्छा लगता है जो कार हम अखबारों मे देखकर खुश होते थे वही जब सामने से सॉय कर के गुजरती है तो लगता है एक सपना तो पूरा हो गया हम बस बीएमडबल्यू देखना चाहते हैं, चढ़ने के तो सपने भी नही आते दरअसल हमारे सपनें भी हमारी औकात देखकर आती हैं । यहाँ जिंदगी जीना लोग जब शुरू करते हैं तब मालूम होता है यहाँ भी बस नाम की नीति बनती है, जो बनती है उसका भी एक अलग राज है जिसको कुछ चंद लोग खुद मे समेटे रहते हैं। यहाँ भी लाखो लोग मजदूर की तरह ही काम करते हैं फर्क इतना है कि ये मजदूर सूट-बूट और टॉय लगाकर काम करने जाते हैं, एसी मे बैठकर काम करते हैं, शाम को थके-हारे वापस किसी ठेले वाले के यहाँ कुछ खाकर अपने सपनों के साथ सो जाते हैं फिर वही सुबह…! इस शहर ने हमें भी जकड़ लिया है लाखों युवा पलायन कर इस जिंदगी को जीने आ रहे हैं या यूँ कह लीजिए ऐसी जिंदगी जीने को विवश हैं, ये जिंदगी न तो बड़ी है न ही लंबी धक्के मारकर आपको कभी भी निकाला जा सकता है, सरकार की कोई भी नीति उस समय आपके लिए गीत नही गाएगी वापस आप फुटपाथ पर या अपने गाँव जाएंगे । नीति किसके लिए बन रही है ये मत सोचिए आपके प्रधानमंत्री बहुत मेहनत कर रहे हैं बस भरोसा रखिए….!
दादी ने परियों की कहानी सुनाई, कभी किसी राजा की कहानी तो कभी भूतों की, जिसे सुनकर हम दूध बड़ी जल्दी पी लेते थे, शायद उसने शहर देखा ही नही अच्छा हुआ नहीं देखा..! काश आज वो होती फिर मैं “शहर” की कहानी सुनाकर उसे डराता..।

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