लेखक परिचय

संदीप ठाकुर

संदीप ठाकुर

बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर केंद्रीय विश्व विद्यालय,लखनऊ में पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से परास्नातक से पढाई, पत्र-पत्रिकाओं एवं अखबारों के लिए स्वतंत्र लेखन, विगत दो वर्षों से सामजिक कार्यों में त्वरित सहभागिता, पर्यावरणीय मुद्दों को लेकर विशेष अभिरुचि, नदियों के संरक्षण को लेकर कई छोटे-बड़े आंदोलनों से जुडाव. 'एहसास मंच' नाम से एक सांस्कृतिक समूह का संचालन. स्वतत्र वामपंथी विचारधारा से लगाव, छात्र जीवन से ही समाज के सच्चे मूल्यों को स्थापित करने के लिए कटिबद्ध व समाज सेवा एवं राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पित.

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क्या जयपुर लिटेरी फेस्टिवल की पटकथा में राजनीति का छायांकन जरुरी था या फिर सोच-समझ कर यह विवादस्पद रचना गढ़ी गयी थी. या फिर कार्पोरेटी मैनेजमेंट की माया में उलझ कर ब्रांड प्रमोशन का जरिया बनकर उभरा. जिसको कैश कराने के लिए कई तरह की दुकाने खुली. जिसको जो बेचकर निकलना था वो निकल गया.जिस बात की बात का बतंगड़ बनाया गया वो वही पर मोर्चा संभाले हुए खड़ा है इसी इंतज़ार में! की अगली बार युद्ध में जीत किसकी होगी. लेकिन एक बात जो देर में समझ आयी कि इस फेस्टिवल की अंतिम परणीति क्या हुई.इसके कई पहलुओं पर ढेरों नजरिये हो सकते है. लेकिन एक बात जो ख़ास रही वो ये कि यह फेस्टिवल इतिहास के पन्नो में अपनी मजबूती दर्ज कराने में सफल रहा.

इस फेस्टिवल में चर्चा के केंद्रबिंदु रहे सलमान रुश्दी, भारत में वैसे बहुत ज्यादा आते नही.लेकिन तकरीबन पांच वर्ष पहले 2007 में जयपुर में उनका तीन दिन का प्रवास रहा था और तब शायद उसी साल इस फेस्टिवल की शुरुआत हुई थी तब किसी धार्मिक संगठन या कट्टर पंथियों की नजर उन पर नही पड़ी.

अचानक कौन सी ऐसी स्तिथि- परिस्तिथी आ बन पड़ी कि उनके आने को लेकर धार्मिक कट्टर पंथियों ने आपत्ति दर्ज कराना शुरू कर दिया. दरअसल बात ये नही थी कि रुश्दी इस फेस्टिवल में आये, या नही आये ! बल्कि उसके पीछे सोची-समझी साजिश के तहत, फांसीवादी मानसिकता के लोगों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा, जो उन सियासतदानो को अपनी सियासी अहमियत दर्ज कराना चाहते थे. जो सिर्फ दबी जुबान से तो इन फांसिवादियों का समर्थन तो करते थे लेकिन खुल कर सामने नही आते थे. लेकिन इस फेस्टिवल पर वोट की राजनीति इतनी भारी पड़ी कि इस देश के संवैधानिक लोकतंत्र के उसूलों को हाशिये पर पहुंचा दिया गया.

खैर रुश्दी के बारे यही कहा जाता है कि ये एक ऐसे सेलिब्रिटी लेखक है जो सिर्फ किन्ही गलत कारणों को लेकर वैश्विक मीडिया में चर्चा के विषय बनते रहे है. कभी किसी अपने से, आधे उम्र की मॉडल के साथ अफेयर को लेकर या फिर किसी विवादस्पद बयान को लेकर. विवादों से तो इनका चोली -दामन का रिश्ता है उनकी बुक ‘द सटानिक वर्सेस ‘ जो १९८८ में पब्लिस्ड हुई थी जिसका सबसे विदास्पद हिस्सा’ जिसमे चार महिला वेश्याओं ने अपने प्रेमी का नाम पैगम्बर मुहम्मद साहब के नाम पर रखा था’ यही वजह थी कि उस समय मुस्लिम समाज के लोगों की धार्मिक भावनाए आहत हुई.और उनके उस कृत्य को वैश्विक समाज के एक तबके ने हिंसात्मक करार दिया लेकिन विश्व के इतिहास में यह पहली बार नही हो रहा था.

इससे पहले इतिहास के पन्नों में खोजा-बीनी करे तो पता चलेगा कि कला-संस्कृति व आचार-विचार के विस्तार को लेकर अभिव्यक्ति की आजादी पर कभी इस तरह से अंकुश नही लगाया गया.और इसका अंदाजा आप अजंता-एलोरा की गुफाओं में बने कलाकृतियों से लगा सकते है. और जब भी इस पर रोक लगायी गयी या राजनीति से प्रेरित होकर या सियासी नफे-नुकसान के समीकरण को ध्यान में रखते हुए. उस समय के देश के वर्तमान प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने जब इस पुस्तक पर बैन लगायी तो वो भी इसी अवधारणा के शिकार हुए थे. बाद में इसको लेकर, सलमान रुश्दी ने उन्हें पत्र लिखा था.जिसके बाद उन्हें भी अपने कदमों की पीछे की तरफ खीचना पड़ा था खैर यह मसला भारत के संसदीय लोकतान्त्रिक व्यस्था के संविधान के मूलभूत अधिकारों के अंतर्गत अनुच्छेद 19 (1) क के अंतर्गत आता है जिसमे देश के प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है इसमें इस बात का भी विवरण दिया गया है कब, किसको, कितना, किस हद तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी जाय लेकिन जब इस पहलु को ध्यान पूर्वक देखे तो यह पता चलता है.

किस को किस हद तक छुट दे दी गयी या किस को किस हद तक बोलने दिया गया ! तब क्या नही लगता यह समानता की स्वतंत्रता का अधिकार नही बल्कि चंद लोगों को इस बात अधिकार दिया गया है वो जब चाहे इस देश के लोकतान्त्रिक मर्यादाओं को आहत करते रहे.इस तरह का यह कृत्य पहली बार नही हो रहा था. इससे पहले हिन्दू कट्टरपंथी संगठनों ने भी एम. एफ. हुसैन की पेंटिंग्स को लेकर किया.जिन्हें देश छोड़ने पे मजबूर होना पड़ा. अगर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की रिपोर्ट देखे तो पता चलता है एम. एफ. हुसैन ने कुछ नया नही किया था. लेकिन इन संगठनो को तब कोई ख्याल नही आता, जब धर्म की आस्था कसौटी पर रखकर टी वी में रियल्टी शो,कामेडी शो व कार्टून एनिमेटेड फ़िल्में बनती है तो क्या इनकी धार्मिक आस्था का परिहास नही उड़ाया जाता या फिर इनकी भावनाए आहत नही होती.खैर देश के लोकतंत्र की संवैधानिक व्यस्था कहती है इन अधिकारों का दुरुपयोग करना एक तरह के अपराध के दायरे में आता है और ये बात कई देशों के संविधान में भी लागू है.

अगर देश की राजनीति के परिपेक्ष्य में देखें तो चाहे वो इस्लामी कट्टरपंथी हो या हिन्दू चरम पंथी संगठन या फिर कोई और संगठन, सदैव देश की चुनावी राजनीति में इनका हस्तक्षेप रहा है. शुरूआती दौर में तो एक तरह की काली छाया के समान, ये लोग धर्म के नाम पर मानवीय भावनाओं को भड़काकर राजनीति की रोटी सेकते रहे और अब जब आम जनता इनके करतूतों को समझ चुकी है तो ये हताशा और निराशा की स्तिथि के दौर से गुजर रहे है. धर्म सत्ता के घोड़े पर सवार होकर राजनीतिक सत्ता में अपनी हनक कायम करने के लिए अनाप-शनाप बयानबाजी व फतवा जारी कर रहे है.और यही वजह जितने भी धार्मिक गुरु है चुनाव आते -आते किसी न किसी पार्टी की सियासी चुनरी ओढने में कोई गुरेज नही करते.और सत्ता का अप्रत्यक्ष रूप से सुख भोगते है और वही इस देश की राजनीतिक पार्टियाँ भी धर्म जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अतिसंवेदनशील है. कब क्या उल्टा-सीधा हो जाय इससे बचने के लिए झूठी रिपोर्ट में रुश्दी की सुरक्षा व्यस्था का हवाला देने में भी कोई चूक नही करते.

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1 Comment on "विचारों की आचार-संहिता पर चरमपंथ की राजनीतिक छाया"

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इक़बाल हिंदुस्तानी
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समस्या ये है की सर्कार कट्टर पंथियों के साथ है क्योंकि उनके वोट ज्यादा हैं.

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