लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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पहचानें और दूरी बनाए रखें

अपनी बिरादरी के कैंकड़ों से

डॉ. दीपक आचार्य

मनुष्य, पशु-पक्षियों, प्रकृति और परिवेशीय हलचलों का पारस्परिक गहन संबंध तभी से रहा है जब से पंचतत्वों से सृष्टि का आविर्भाव हुआ है। इन सभी के जीवन से जुड़े व्यवहारों में भी न्यूनाधिक रूप से प्रभाव सभी में परिलक्षित होता है।

कभी अच्छा तो कभी बुरा स्वभाव इन सभी को भीतर तक प्रभावित करता है और इसी आधार पर इनमें गुण-दोषों की रचना हो जाती है जो जींस में आकर पीढ़ियों तक चलती है।

कुछ गुणावगुण आनुवंशिक होते हैं जबकि काफी सारे समाज और परिवेश तथा मित्रों-सम्पर्कितों से आयात किए हुए होते हैं। पशुओं ने अपने जींस को युगों बाद भी परिशुद्ध रखा है लेकिन आदमी ने जिज्ञासाओं का निरन्तर शमन करते हुए ज्ञान और अनुभवों से अपने को ऎसे मिश्रित साँचे में ढाल दिया है जहाँ वह न परिशुद्ध आदमी ही रह गया है और न ही कुछ और। वो जैसा भी है वैसा स्वीकार करना पड़ता है क्योंकि सृष्टि का सबसे बुद्धिमान जीव माना गया है।

पहले आदमी जिन साँचों में ढाला जाता था उनसे मनुष्यता की भीनी-भीनी गंध आती थी जिसे दूसरे लोग और परिवेश तक महसूस किया करते थे।

आज आमतौर पर वह मानवीय गंध गायब हो चली है और उसकी जगह जो गंध आ रही है उससे आदमी की आहट का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

प्रकृति और जमाने से ढेर सारा पाने और खा जाने के लोभ में आदमी का सब कुछ बदलता जा रहा है जिससे आदमी की पहचान हुआ करती थी। कुछ बिरले लोगों को छोड़ दिया जाए तो स्वार्थ की अंधी दौड़ में आदमी का मन-मस्तिष्क और हृदय तक मलीन होता जा रहा है।

मन की मलीनता ही स्वेद और लोक व्यवहार के रूप में शरीर से बाहर निकला करती है और इसी से शरीरस्थ और मानसिक मलीनता का आभास होने लगता है।

आजकल आदमियों की भीड़ में कितने ऎसे हैं जिन्हें सही मायने में आदमीयत के ढाँचे में ढाल कर देखा जा सकता है? आदमियों की जात में कहीं समानधु्रवा आकर्षण और कहीं समानध्रुवा विकर्षण के अजीब नज़ारे देखे जा सकते हैं।

 

आदमियों में सर्वाधिक मनोवृत्ति दूसरे को दुखी कर खुद को सुख का अनुभव कराने की रही है और यही कारण है कि अधिकतर लोग रोजाना इसी उधेड़बुन में लगे रहते हैं कि किस तरह इस प्रकार के सुख पाने के रास्तों को ईजाद किया जाए।

अधिकांश लोग तो इन रोजाना के षड़यंत्रों और हथकण्डों को अपनाते-अपनाते अपनी मुस्कान तक कहीं भूल चुके हैं या गिरवी रख बैठे हैं। ऎसे लोगों की सबसे बड़ी खासियत ये होती है कि ये ऎसी गंभीरता का लबादा हर समय ओढ़े रहते हैं जैसे दुनिया भर में इनसे बड़ा संजीदा व्यक्तित्व कोई और हो ही नहीं।

ऎसे षड़यंत्रकारी और विघ्नसंतोषी लोग किसी के नहीं हो सकते। यहां तक कि जन्म देने वाली माँ या पालने वाले पिता, ज्ञान देने वाले गुरु या कि सात फेरे लेकर बनी पत्नी के भी नहीं हो सकते। सच पूछा जाए तो ये अपने खुद के भी नहीं हुआ करते।

इनकी पूरी जिन्दगी नापाक षड़यंत्रों, दूसरों को उन्नीस साबित करने के लिए निरन्तर गिराने के हथकण्डों और नकारात्मक प्रयासों से अर्जित क्षणिक सुख में ही लगी रहती है।

खासकर अपनी बिरादरी के लोग इनके सीधे निशाने पर होते हैं। यों भी ऎसे लोग भस्मासुर की तरह उन्हीं को खा जाते हैं जो उन्हें आगे लाते हैं, प्रोत्साहन और संबल प्रदान करते हैं और स्थापित करते हैं। ये बिरादरी अपने कुटुम्ब, समाज और आजीविका के माध्यमों से लेकर रुचि और आदतों या और कारकों से संबंधित भी हो सकती है।

इन सभी क्षेत्रों में लोग एक-दूसरे की टाँग खींचने में दिन-रात इसी टोह में लगे रहते हैं कि कौन आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है। ऎसे में टाँग खिंचने में इन्हें इतना अनिर्वचनीय आनंद आता है जो उन्हें और किसी अच्छे कर्म तक में नहीं आ पाता।

आदमियों की टाँग खिंचाई वाली प्रजाति ने यह आदत कैंकड़ों से ली होती है। जब भी कोई थोड़ा ऊपर चढ़ने की कोशिश करने लगता है खूब सारे कैंकड़ा छाप आदमी उसकी टाँगें खींच कर नीचे ले आते हैं।

आजकल हर तरफ ऎसे अनगिनत कैंकड़ों का साम्राज्य है जो अपने जीवन के सारे उद्देश्यों को भुल भुलाकर सिर्फ इसी काम में रमे हुए जी भर कर आनंद पा रहे हैं।

यह जरूरी नहीं कि कैंकड़े उन्हीं लोगों से दुश्मनी निकालें जो उनके काम में आड़े आते हैं। ये कैंकड़े किसी के भी पीछे पड़ सकते हैं। फिर इन कैंकड़ों की आदत वाले ढेरों कैंकड़े हर जगह आसानी से मिल ही जाते हैं।

इन कैंकड़ों में भी कई श्रेणियां विद्यमान हैं। बड़े कैंकड़े खुद कुछ नहीं करते ये सिर्फ छोटे और भौंदू कैंकड़ों का मार्गदर्शन ही करते हैं। इन कैंकड़ों को सामग्री देने वाले कैंकड़े और हुआ करते हैं। पर बहुसंख्य कैंकड़े खुद टाँग खिंचाई का काम करते हैं।

कई बार बराबर की आदत वाले दो-चार कैंकड़े मिल जाने पर ये मिलकर किसी भारी भरकर आदमी की टाँग खींचते रहते हैं। हर किस्म के कैंकड़े अपने क्षेत्र में भी खूब वॉकिंग करते नज़र आते हैं।

कई जगह तो बरसों से जमे हुए स्थायी कैंकड़ों की सत्ता इतनी प्रभावी है कि बाहरी कैंकड़े भी इनकी अधीनता स्वीकार कर इनकी बनायी लकीरों पर चलने और दौड़ने लगते हैं और बाद में किसी ऊँचाई से धड़ाम से गिर जाते हैं तब पता चलता है इन्हें अपने जीवन की सबसे बड़ी गलती का।

कैंकड़ों की एक और किस्म होती है जो कैंकड़ा जूँ के आकार में अन्तःपुर में घुसपैठ कर दिन-रात हलचल करती रहती है। सामान्यतया अदृश्य रहकर ये कैंकड़ा जूंए वो सारे काम कर डालती हैं जिनसे आदमी को कभी-कभी ईश्वर तक पर गुस्सा आने लगता है।

कैंकड़ों की परेड़ हर कहीं जारी है और वे लोग भी हैं जो कैंकड़ों की सलामी पाने को उतावले रहते हैं। जहाँ कहीं कैंकड़े हैं वहाँ कैंकड़ों को पहचान कर उनसे दूरी बनाए रखें और अपने लक्ष्यों को पाने के लिए निरन्तर बढ़ते रहें।

कैंकड़े यदि मार्ग में बाधा बनकर सामने आएं तो उन्हें ही भ्रमित करते हुए आगे बढ़ चलें। जहाँ कहीं कैंकड़ों का आवागमन हो वहाँ उपेक्षा का पॉवडर बिखेरते हुए चलते रहें।

कैंकड़ों का ईलाज फिसलन ही है और यों भी ये कैंकड़े कहीं हराम की कमाई, झूठन और मुफतिया पेय मिल जाने पर आसानी से फिसल पड़ते हैं। इसीलिए समझदार लोग कैंकड़ों के लिए सभी प्रकार की जरूरी फिसलपट्टियों का पहले इंतजाम कर लेते हैं और उसके बाद ही अपनी आगे बढ़ने की यात्रा शुरू करते हैं। कैंकड़ों से चाहे जिस किसी भी तरह अपने आपको बचाकर चलते हुए ही मुकाम पाया जा सकता है। यह भी ध्यान में रखना होगा कि कैंकड़ों की ज्यादा आयु भी नहीं हुआ करती।

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