लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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viewpic15 वीं लोकसभा के भी सौ से ज्यादे दिन पूरे हो चुके हैं। निर्वाचित सांसदो के शपथ ग्रहण के साथ ही देश को चलाने के काम की शुरूआत हो चुकी है। अब जब चुनावों का कोलाहल शांत है तो आइये थोड़ा चुनाव सुधार पर चर्चा करें। छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, दिल्ली,राजस्थान जैसे राज्यों में जहां कुछ माह पूर्व ही विधानसभा के चुनाव हुए थे, उसके बाद यह लोकसभा का चुनाव सरकारी कामकाजों पर गंभीर असर डालने वाला रहा। जब इस चुनाव से निबटे तो छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में दिसंबर में होने वाले निगम चुनाव की सुगबुगाहट शुरू, उसके बाद पंचायत, मंडी, सहकारिता चुनाव। मतलब सारी सरकारी मशीनरी का कुंद हो जाना, विकास के सारे कार्य रूक जाना, चुनाव यानी आचार संहिता का भूत। तो ऐसे राज्यों में जहां तीव्र विकास कार्य किये जाने की जरूरत है, वहॉं पर सरकारों को ढेर सारे आचार संहिताओं के बीच में से कुछ समय चुराकर अपने योजनाओं को अंजाम देना होता है। इस आचार संहिता के भूत के कारण तो एक बार छत्तीसगढ़ शासन की सबसे महत्वपूर्ण सस्ती चावल योजना ही खटाई में पड़ती दिख रही थी। तो क्या आखिर लोकतंत्र का मतलब केवल चुनाव ही चुनाव होता है। ऐसा लग रहा है कि लोकतंत्र के लिए चुनाव अब एक साधन नहीं साध्य बनता जा रहा है। वह उत्सव नहीं सिरदर्द होता जा रहा है। तो आखिर इस चुनावी भूत से कैसे पीछा छुड़ाये लोकतंत्र? ऐसा क्या किया जाय जिससे चुनाव केवल पांच-साला कुंभ बनकर ही रह जाय। तमाम विश्लेषकों, चिंतकों एवं कर्णधारों को अब अपना सारा ध्यान इस पहेली को सुलझाने, इस चुनौती से निपटने पर ही लगाना चाहिए।

इस मसले पर सबसे उचित विचार यही आया है कि लोकसभा और राज्यों के विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराया जाना चाहिए। सबसे पहले लालकृष्ण आडवानी द्वारा प्रतिपादित यह विचार उचित ही है। थोड़ा सा और कहा जाय तो ना केवल विधायिकाओं के बल्कि दलीय आधार पर होने वाले सभी चुनाव एक साथ कराना उचित होगा। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि दल के आधार पर कराये जाने वाले चुनावों के अलावा और किसी भी चुनाव में सरकारों पर किसी आचार संहिता का बंधन न हो। लेकिन आखिरकर यह संभव कैसे होगा? जाहिर सी बात है कि ऐसा चुनाव कराने के लिए किसी एक बड़े चुनाव को आधार मानना होगा और उसका चुनाव कराते वक्त तमाम राज्यों की विधानसभाओं को भंग कर देना होगा। चीजों को समझने के लिए हम 2009 के आम चुनाव को ही आधार मान लेते हैं। अगर उसी समय लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ होते तो क्या करना होता? सबसे पहले तो छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान, एवं दिल्ली की विधानसभा को 6 महिने से भी कम में भंग करना पड़ता। उसके अलावा आधे दर्जन से अधिक राज्यों का कार्यकाल साल भर में ही समाप्त कर देना होता। निश्चय ही कुछ पार्टी को इसमें अपना भारी नुकसान होता दिखता। तो उन प्रभावित दलों को ऐसे प्रयोग के लिए तैयार करना कैसे संभव होगा? क्या ऐसी सर्वानुमाति आज के हालात में बनाना संभव होगा? 2009 के चुनाव ही क्यों, जब भी, जिस आम चुनाव में ऐसा करने का प्रयास किया जायेगा तो तस्वीर कमोवेश ऐसी ही दिखेगी। तो एक साथ चुनाव कराने में यह सबसे बड़ी समस्या है जिसे दूर करने का सर्वमान्य फार्मूला मुश्किल ही दिखता है। साथ ही इस प्रयोग को सफल बनाने में जो दूसरा बड़ा काम करना होगा वो यह कि लोकसभा और विधानसभाओं का कार्यकाल निश्चित करना होगा। यानि 5 साल से पहले किसी भी सूरत में कोई भी सदन भंग नहीं होगा। यदि आज लोहिया होते तो उन्हें यह आह्वान करना पड़ता कि लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए कौम को पांच साल इंतजार करना ही पड़ेगा। अन्यथा ऐसा हो जायेगा कि मान लिया आपने कड़ी मशक्कत के बाद सभी विधानसभाओं या स्थानीय सदनों को भंग करके एक साथ चुनाव करवा ही लिया और अगले ही साल या छ: महीने में किसी बूटासिंह ने बिहार की विधानसभा भंग कर दी तो ? किसी सिब्ते रजी को झारखंड का जनादेश पसंद नहीं आये या कोई राज्यपाल गोवा में अपना जमीर बेच दे, तो आप क्या करेगें? तो हमें यह तय करना होगा कि राष्ट्रपति शासन की स्थिति में भी विधानसभाओं को अस्तित्व में रखा जाय, चूंकि विधायकों का काम केवल सरकार बनाना ही नही, बल्कि सरकार के कामों की निगरानी करना भी है, तो राज्यपाल शासन में भी वह “वाच डॉग” की भूमिका निभाने के लिए जिंदा रहें, अपने वेतन भत्ते के साथ। और जब विधानसभा या लोकसभा भंग नहीं हो सकता तब तो अल्पमत की लेकिन सरकार बन जाना कम से कम संभव होगा, शायद तब यह भी तय करना होगा कि बिना वैकल्पिक सरकार की रूपरेखा सामने रखे कोई सरकार अविश्वासमत का शिकार नहीं हो। इसके अलावा और कई छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखना होगा,मसलन उपचुनाव हो कि नहीं, किसी सदस्य ने इस्तीफा दे दिया, कैमरे के सामने घूस ले लिया, उसकी बर्खास्तगी या मृत्यू की दशा में, लोकसभा या विधानसभा सीटों से एक साथ चुने जाने पर, सांसद-विधायक महापौर एक साथ चुन लिये जाने पर, ऐसे-ऐसे हालात में क्या किया जाय? तो अव्वल तो यह कि यह भी तय करना होगा कि कोई भी व्यक्ति दो सीटों के लिए या दो सदनों के लिए एक साथ खड़ा ना हो सके, इस्तीफा देने के बाद एक नियत समय तक दूसरा चुनाव ना लड़ सके, इसके बावजूद भी चूकि मृत्यू या भ्रष्टाचार को रोका नहीं जा सकता, इस कारण खाली सीटों पर क्या किया जाय क्या वहाँ पर संबद्ध दलों को यह अधिकार दिया जाय कि वो किसी अपने सदस्य को मनोनीत कर सके? और अगर ऐसा भी कर दिया गया तो निर्दलीय सदस्य की खाली सीटों पर क्या किया जायेगा? उससे भी आगे यह कि अगर किसी पार्टी ने किसी सदन से विरोध स्वरूप सामूहिक इस्तीफा दे दिया तब क्या किया जाय?

उपरोक्त तमाम स्थितियॉं काल्पनिक नहीं है, ऐसी स्थिति एकाधिक बार आ चुकी है। लेकिन किसी भी तरह की नयी व्यवस्था करते समय आपको इतना कल्पनाशील बनना होगा कि आप पचास बरस आगे की सोच सके। अपने संविधान का निर्माण करने वाले लोगों ने एक अच्छा संविधान बनाते हुए भी कुछ अवांछित स्थितियों की कल्पना भी नही की थी, लेकिन वर्तमान स्वार्थ के इस दौर में तो आपको कोई भी नया व्यवस्था कई तरह की अप्रत्याशित चीजों को ध्यान में रखकर ही करना होगा। सभी चुनाव एक साथ कराने का श्री आडवाणी का सुझाव निस्संदेह प्रशंसनीय है। इस एक व्यवस्था से ही ढेर सारी चीजें पटरी पर आ जायेगी। देश का श्रम, ऊर्जा, पैसा बचेगा। अनवरत चुनावों से लोगों में लोगों में पनपा निरूत्साह खत्म होगा। सरकारें अनावश्यक आचार संहिता से मुक्त होकर कार्य करेगी। लेकिन इसके लिए आवश्यक यह होगा कि पहले उपरोक्त तमाम स्थितियों को मद्देनजर रखते हुए एक राष्ट्रीय बहस चलायी जाय फिर सर्वानुमति बनाया जाय। उसके बाद उपरोक्त तमाम सवालों के साथ-साथ काल्पनिक स्थितियों को भी ध्यान में रखते हुए समाधान तलाशा जाय और उसके बाद संविधान में आवश्यक संसोधन करके नयी व्यवस्था कायम की जाय। वास्तव में चुनाव में इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन ने जैसी क्रांति ला दी है, वैसा ही चुनाव सुधार के क्षेत्र में यह कदम मील का पत्थर हो सकता है। लेकिन उपरोक्त रूकावटों, समस्याओं को दूर करने के बाद। परंतु इन सबसे भी बड़ी बात यह है कि व्यवस्था आप कितनी भी अच्छी बना लें, कानून कितना भी अच्छा हो जाय, कर्णधार गण के सच्चरित्र पर ही सभी इंतजामों का दारोमदार है। आखिरकार संविधान चाहे वह कितनी भी अच्छी हो, लोगों को नैतिक बनाने का ठेका तो नहीं ही ले सकती है।

– जयराम दास

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