लेखक परिचय

प्रवीण दुबे

प्रवीण दुबे

विगत 22 वर्षाे से पत्रकारिता में सर्किय हैं। आपके राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय विषयों पर 500 से अधिक आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। राष्ट्रवादी सोच और विचार से प्रेरित श्री प्रवीण दुबे की पत्रकारिता का शुभांरम दैनिक स्वदेश ग्वालियर से 1994 में हुआ। वर्तमान में आप स्वदेश ग्वालियर के कार्यकारी संपादक है, आपके द्वारा अमृत-अटल, श्रीकांत जोशी पर आधारित संग्रह - एक ध्येय निष्ठ जीवन, ग्वालियर की बलिदान गाथा, उत्तिष्ठ जाग्रत सहित एक दर्जन के लगभग पत्र- पत्रिकाओं का संपादन किया है।

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लोकतंत्र का महाकुंभ कहे जाने वाले लोकसभा चुनाव निकट हैं। चुनाव शांतिपूर्ण, व्यवस्थित ढंग से पूर्ण हों यह जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है। लेकिन इसके साथ सम्पूर्ण देशवासियों की भी यह जिम्मेदारी है कि लोकतंत्र के इस महाकुंभ की सफलता के लिए वह हर संभव प्रयास करें। इस दृष्टि से विश्व के सबसे विशाल स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की जितनी सराहना की जाए कम है। संघ ने सौ प्रतिशत मतदान के लिए व्यापक अभियान शुरू करके राष्ट्रहित में अपने अभूतपूर्व योगदान को एक बार पुन: सत्यापित किया है। संघ के स्वयंसेवकों द्वारा मोहल्ले-मोहल्ले घर-घर जाकर मतदाताओं से मतदान करने की अपील की जा रही है। सच पूछा जाए तो भारत जैसे विशाल लोकतंत्र की सफलता इसी में है कि देशवासी सौ प्रतिशत मतदान करें। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी सौ प्रतिशत मतदान की बात अतिश्योक्ति पूर्ण लगती है। बहुत कम चुनाव क्षेत्र ऐसे रहे हैं जहां मतदान का प्रतिशत 90 या इससे ऊपर रहा है। देश के मतदान औसत की बात की जाए तो मुश्किल से यह 55 से 70 प्रतिशत के बीच ही रहा है। कई चुनाव क्षेत्रों में तो 40 और 50 प्रतिशत के बीच ही मतदान औसत सामने आया है। स्पष्ट है कि मतदाता पूरी तरह से अपने मताधिकार का उपयोग नहीं करते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि जब हम अपने मताधिकार का ही ठीक प्रकार से इस्तेमाल नहीं करते हैं तो क्या हमें देश में व्याप्त विसंगतियों, परेशानियों के बारे में चर्चा करने या उनके लिए दोषारोपण करने का अधिकार है? उत्तर साफ है नहीं, क्योंकि लोकतंत्र में सरकार यदि ठीक प्रकार से काम नहीं कर रही, देश की जनता की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर रही है तो एक ही समाधान है, चुनाव के समय जनता जनादेश के माध्यम से अपना मत व्यक्त करे। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो अपने मताधिकार से व्यवस्था परिवर्तन करे। भले ही हम रोजाना सरकार की नीतियों को कोसते रहें, उसके दुष्परिणाम भुगतते रहें लेकिन मतदान वाले दिन यदि वोट डालने के प्रति जागरुक नहीं हैं, उसकी अनदेखी कर रहे हैं तो व्यवस्था परिवर्तन कैसे होगा? कैसे सरकार बदलेगी? अत: इसके लिए यह बेहद आवश्यक है कि हम स्वयं मतदान करें और सभी को मतदान के लिए प्रेरित करें। जब समस्त राष्ट्रवादी शक्तियां एक होकर शत-प्रतिशत मतदान करेंगी तब राष्ट्रहित में विचार करने वाले लोगों का मतदान प्रतिशत अधिक होगा तब स्वत: ही ऐसी सरकार बनेगी जैसी कि हम चाहते हैं। वर्तमान की बात की जाए तो केन्द्र में सत्तासीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के खिलाफ पूरे देश में हवा चल रही है। सारे चुनाव सर्वेक्षण सरकार के विदाई के संकेत दे रहे हैं। यह संकेत मतदाताओं की मन:स्थिति और बातचीत पर आधारित हैं। लेकिन यह सच तभी होंगे जब वे लोग जो ऐसा चाहते हैं घरों से बाहर आएं मतदान करके अपना मत व्यक्त करें। यदि वे इसमें कोई चूक करते हैं तो जैसा वे चाहते हैं वैसा परिणाम सामने नहीं आएगा। इस दृष्टि से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सौ  प्रतिशत मतदान के लिए जो अभियान छेड़ा है उसमें राष्ट्रहित निहित है, इसमें सभी को सहयोग देना चाहिए।

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