लेखक परिचय

डॉ. मनोज चतुर्वेदी

डॉ. मनोज चतुर्वेदी

'स्‍वतंत्रता संग्राम और संघ' विषय पर डी.लिट्. कर रहे लेखक पत्रकार, फिल्म समीक्षक, समाजसेवी तथा हिन्दुस्थान समाचार में कार्यकारी फीचर संपादक हैं।

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डॉ मनोज चतुर्वेदी

मैं गांधी विचार धारा का पाक्षिक मुख-पत्र ‘सर्वोदय जगत‘ प़ढ रहा था। लेख का शीर्षक था- ‘गांधी होते तो क्या करते‘? मेरे मन में विचार आया कि उसके स्थान पर यदि यह कहा जाय कि भारतीय चिंतन परंपरा के विषयों में गर्ग, गौतम, शांडिल्य, अत्रि, भारद्वाज, पराशर, वेदव्यास से चलते हुए वर्धमान महावीर, महात्मा बुद्ध होते तो क्या करते? गुरु नानक देव, कबीरदास, चैतन्य महाप्रभु, स्वामी रामानंदाचार्य, स्वामी बल्लभाचार्य, स्वामी निंबकाचार्य, संत तुकाराम, संत तुलसीदास, मीराबाई, संत रविदास, संत कुंनदास, स्वामी रामतीर्थ, स्वामी दयानंद सरस्वती से चलते हुए महात्मा गांधी, जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेन्द्रदेव, डॉ राममनोहर लोहिया, डॉ गवानदास, आचार्य कृपलानी, डॉ केशव बलीराम हेडगेवार, श्री गृरुजी उपाख्य माधव सदाशिवराव गोलवलकर, विनायक दामोदर सावरकर होते तो क्या करते? यह प्रश्न मेरे मन में इस लेख को प़ढते समय उम़डने-घुम़डने लगा। प्रश्न ने कहा बेटा बार-बार गांधी-गांधी का रट क्यों लगाते हो? गांधी एक व्यक्ति नहीं विचार थे। उनका विचार कोई वाद एवं संप्रदाय नहीं था। मेरे मन में विचार आया कि उनका विचार यदि वाद या संप्रदाय नहीं था तो भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के जितने भी स्त्रोत हैं वे व्यक्ति को किसी भी प्रकार के वाद तथा संप्रदाय तक सीमित नहीं करना चाहते। भारतीय चिंतन परंपरा एक सतत् एवं प्रवाहमान चिंतन धारा है जिसे हम मृत्युंजयी संस्कृति कहते हैं। उन्होंने लिखा है कि जब मैंने गांधी दर्शन के हास्यकार तथा मेरे पिता दादा धर्मांधिकारी से पूछा, आज गांधी होते तो क्या करते? तो उन्होने कहा, लेकिन तुम होते तो क्या करते? आज प्रायः हर जगह चर्चा है कि दीनदयाल उपाध्याय, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जयप्रकाश नारायण तथा अन्याय होते तो क्या करते? वे होते क्या करते के स्थान पर यदि हम यह कहें कि हम हैं तो क्या कर रहे हैं? क्या हमारा इस देश, समाज, राष्ट्र के लिए कोई उत्तरदायित्व नहीं है? या इस राष्ट्र के लिए क्या दिया है या इस राष्ट्र जीवन के लिए क्या दे रहे हैं? यह प्रश्न हर भारतीय के पास रखा जा सकता है। क्या इस देश में कुछ गिने-चुने बुद्धिजीवी या संत पैदा हुए जिन्होंने भारत माता के श्री चरणों में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। क्या हमें अपना सब कुछ न्योछावर नहीं करना चाहिए। इस देश, समाज और राष्ट्र के लिए सर्वस्व न्योछावर करने का ठेका उन्होंने ही लिया था या हमें भी लेना होगा। यदि हम उन महापुरुषों से अपना संबंध जो़डते हैं। उनका गोत्र बताते है तो हम जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद, गोत्रवाद, नस्लवाद, संप्रदायवाद में क्यूँ जक़डे हैं। हम उपरोक्त संकीर्ण वादों को लेकर क्यों एक दूसरे का लहू बहाते हैं। हमारे अंदर क्षेत्रीयता के स्थान पर राष्ट्रीयता क्यूँ नहीं हावी होती। गांधी विचार कोई विचार न होकर सतत् प्रवाह का नाम है। श्री गृरुजी का विचार मात्र आरएसएस और हिन्दुओं के लिए न होकर संपूर्ण भारत के लिए था और रहेगा।

प्रायः हर जगह यह सुनने को मिल जाता है कि गांधी, विनोबा भावे, महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी तथा गुरुनानक देव के विचार कालबाह्य हो गये हैं, अप्रासंगिक हो गये हैं। हमें प्रायः यह विचार सुनने को मिलता है कि महापुरुषों के विचारों की हत्या हो रही है तथा हुई है। उन-उन स्थानों पर चिंतन प्रवाह, वैचारिक विश्लेषण तथा मंथन करने की जरुरत है।

वर्तमान सभ्यता, आधुनिक सभ्यता और पाश्चात्य सभ्यता इत्यादि पर ब़डी चर्चा हो रही है। यह सभ्यता बुरी है। यह शैतानी सभ्यता है। इसमें भोग की परंपरा एवं प्रकृति है। यह पश्चिमी सभ्यता है। यह निशाचरी सभ्यता है। इसमें सह अस्तित्व का स्थान नहीं है। भारतीय सभ्यता प्राचीन तथा सर्वश्रेष्ठ सभ्यता है। इसमें समस्त समस्याओं का समाधान ढूंढा जा सकता है लेकिन क्या सभ्यता-विमर्श के उन मानदंडों पर हम खरे उतर रहे हैं क्या? श्रेष्ठ सभ्यता के बावजूद भी भारत भ्रस्टतम देशों की सूची में पिछले 20 वर्षों से बढता जा रहा है। कभी वह 120 वें तो कभी 100, 90, तथा 126 पर पहुंच जाता है। कहां गयी हमारी सभ्यता-संस्कृति? क्या यह केवल प्रवचनों तक ही सीमित रहेगा कि हम श्रेष्ठ थे? यह भी ठीक है कि हम श्रेष्ठ थे तो कहां चली गयी हमारी श्रेष्ठता?

भूमंडलीकरण और नीजिकरण की दुनिया में नए वर्ग का अभ्युदय हुआ है। जिसे प्रख्यात प्रशासनिक अधिकारी तथा लेखक पवन कुमार वर्मा के शब्दों में मध्यम वर्ग कहा गया है। पिछले 20 वर्षों के उदारीकृत अर्थव्यवस्था में उन वर्गों की आय में लगभग 100 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। क्रमांक-1 पर चलने वाले रिलायंस गु्र्रप के अंबानी बंधुओं को देखा जा सकता है। भूमंडलीकरण के इस युग में ब़डी मात्रा में बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने छोटे तथा मझोले उद्योगों को ग्रस लिया है। इन्हीं समस्यायों को लेकर सर्वसेवा संघ ने भारत बचाओ आन्दोलन तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने स्वदेशी जागरण मंच की स्थापना की। बाजारवादी शक्तियों की दृष्टि में चीन के बाद भारत ही सबसे बडा बाजार है। हमारे माननीय पूर्व वित्त मंत्री पी.चिदम्बरम जी ने कभी कहा था कि आपलोगों ने भारत पर लंबे अरसे तक शासन किया है। अतः आप सभी यहां आएं तथा फैक्ट्रियां लगाएं। वस्तुयों कोबेचें कैसे? तो उन्होंने सौन्दर्य प्रतिस्पर्धाओं के द्वारा वस्तुओं का प्रचार-प्रसार करने का बीडा उठाया। जिस देश में अपने उत्पादों को बेचना हो उस देश में सौन्दर्य प्रतियोगिताओं का आयोजन तथा स्त्री को वस्तु बनाकर परोसो ताकि गरीब से गरीब भी उन उत्पादों का क्रय कर सकें। उपभोक्तावादी संस्कृति ने स्त्री को भोग्या के रुप में परोसा। धन की अनंत जिज्ञासा ने विपासा वसुओं, मल्लिका शेरावतों, ऐश्वर्या रायों को पैदा किया जिसके कारण स्त्री माता, बहन, पुत्री न होकर कामवासना की साक्षात देवी दिखायी देने लगी। यदि आज वे सभी महापुरुष होते तो क्या करते?

हम भारतवासियों को संपूर्ण विचारधारायों के सार तत्वों को ग्रहण करते हुए अन्याय, अत्याचार तथा शोषण के विरुद्ध विशाल और विराट संग्राम करना होगा। क्योंकि महापुरुषों के विचार को किसी एक मत पंथ से मत बांधों। महात्मा गांधी को बनिया, लाल बहादुर शास्त्री तथा स्वामी विवेकानंद को लाला (श्रीवास्तव), मदन मोहन मालवीय, श्री गुरुजी, बाला साहब देवरस तथा सावरकर को (बा्रहमण), स्वामी सहजानंद को भूमिहार तथा बाबा साहेब अंबेडकर, संत रविदास और संत कबीरदास को हरिजन इत्यादि जातियों के घरौंदे में मत बांधों। वे किसी एक जाति के लिए नहीं थे बल्कि संपूर्ण भारत के थे। उन्होंने नर-नारी में भेद ही नहीं किया।

वैचारिक स्वतंत्रता भारत की सर्वश्रेष्ठ विशेषता रही है। लेकिन आज राजनीति में मतभेद को मनभेद के रुप में देखा जा सकता है। अतः इसके कारण समाज में कलह एवं संघर्ष की स्थिति पैदा हो गयी है। विचारों का विचार से मुकाबला होना चाहिए न कि संघर्ष, युद्ध एवं हिंसा द्वारा। प्रायः सांप्रदायिक दंगों में धर्मान्धता को देखा जा सकता है। हम किसी की हत्या या अंग-अंग करके उसको तो मिटा सकते हैं पर विचारों को नहीं मिटाया जा सकता है। श्रीराम, श्रीकृष्ण, महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी, अब्राहम लिंकन, ईसा मसीह, पैगंबर मुहम्मद , स्वामी दयानंद सरस्वती इत्यादि महापुरुषों के साथ गलत बर्ताव, अंत बलिदान तथा शहादत से हुआ है।

महापुरुषों ने कहां सभ्यता का अर्थ-मन की शुद्धि, तन की शुद्धि और पर्यावरण की शुद्धि। इसलिए उन्होंने भोग की सीमाओं का निर्धारण किया। वासनायों पर विजय पाने के लिए देश के सुदूरवर्ती भागों का दौरा किया। अमीर भारतवासी तथा चांडाल भारतवासी को एक करने का प्रयास किया। उनके अंदर राष्ट्रीय चेतना रने का रसक प्रयास किया। उन्होने कहा कि भारत गांवों का देश है। गांवों की तरफ चलो। आगे बढो। तुम्हारे अंदर सोते, जागते, उठते, बैठते हर समय भारत ही दिखायी देना चाहिए। तुम्ही भारत हो तथा भारत ही तुम हो। यह विचार मन में लाओ। तोड डालो उन संकीर्ण और पाखंडी मतवादों को। जो व्यक्ति के विकास में बाधक है, राज्य के विकास में बाधक है अतः यदि महापुरुष होते तो यही करते तथा कहते।

यह भी कहा जा सकता है कि महापुरुषों ने तीन ‘ध‘ को समाप्त किया धर्म, धंधा और धन। इसके बदले में उन्होंने तीन ‘झ‘ दिया-झंडा, झाडू और झोली। कुछ लोगों को इस पर आश्चर्य हो सकता है। महापुरुषों ने हमेशा धर्मांधता, धनक्ति तथा अति धन शक्ति को नष्ट कर समाव, धन का समन्वय तथा वसुधैव कुटुम्बकम का नारा दिया। जो किसी एक राज्य तथा एक राष्ट्र के न होकर संपूर्ण भूमंडल के लिए था। सर्वोदय, सत्याग्रह, अपरिग्रह, उपवास, अंत्योदय और अनशन इत्यादि सारी बातें उनके जीवन में चरितार्थ होती थी। समय-समय पर उन्होंने उसका प्रयोग किया तथा आज भी अन्ना हजारे जैसे लोग छत्रपति शिवाजी तथा महाराणा प्रताप से प्रेरणा लेकर राष्ट्रीय स्वाभिमान को बचाने में लगे हैं। समस्याओं से जुझने की क्षमता को समाप्त किया जा रहा है। अतः युवा पीढी में तनाव, असंतोष, हिंसा, आत्महत्या जैसी प्रवित्तियाँ प्रविष्ट हो रही हैं। ऐसे समय में महापुरुषों के विचारों की डोरी को पकडकर पार किया जा सकता है।

 

 

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1 Comment on "महापुरुष होते तो क्या करते?"

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डॉ. मधुसूदन
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’अ’कर्मण्येवाधिकारस्ते। पर– सर्व फलेषु ’स’दाचन॥ अकर्मण्य ही नहीं, भ्रष्ट जीवन व्यतीत करना है; पर सारे फल मिल जाएं, यह आकांक्षा है। मनोज जी, बहुत सुन्दर। (१)ऐसे, चौखट के बाहर निकल कर सोचने को ही “निरपेक्ष चिन्तन” कहा जाता है। (२)चौखट से बाहर वे नहीं निकल पाते, जो किसी एक पक्ष को जीताना चाहते हैं। वे विचारधारा को लेबल लगा देते हैं। फिर उस लेबल को प्रमाणित किए बिना, प्रमाण मान लेते हैं। (३)और फिर निन्दात्मक विचारों को दोहरा, दोहरा कर अपने झूठ को “सच”में परिवर्तित मान लेते हैं। (४)वकालत ऐसे की जा सकती है। पर सच्चाई से योजनों दूर चले… Read more »
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