लेखक परिचय

जगमोहन फुटेला

जगमोहन फुटेला

लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।

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 जगमोहन फुटेला

पहले भी भारत, अमेरिका या इंग्लैण्ड की तरह इमानदार नहीं दिखती रही पाकिस्तानी न्यापालिका ने फिर अपनी प्रतिष्ठा दांव पे लगा दी है. राष्ट्रपति ज़रदारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों वाली दस साल पुरानी वो फ़ाइल खोल के जिस के बहाने ‘टांगा’ प्रधानमंत्री गिलानी को जा रहा है.

ऊपर से देखने पर लगता तो ये है कि प्रधानमंत्री के सुप्रीम कोर्ट के आगे नतमस्तक होने से वहां न्यायपालिका की सर्वोच्चता या कहें कि लोकतंत्र की जड़ें मज़बूत होती दिख रही हैं. लेकिन अंदरूनी सच्चाई इसके उलट है. कानूनी तौर से सही दिखते हुए भी सुप्रीम कोर्ट का व्यवहार व्यावहारिक नहीं है. यूं भी कि राष्ट्रपति को वहां के संविधान की धारा 248 के तहद मिली किसी भी फौजदारी कारवाई से छूट को बदले या सस्पेंड किये बिना आप प्रधानमंत्री को राष्ट्रपति के खिलाफ किसी जांच या कारवाई की चिट्ठी लिखने के लिए मजबूर नहीं कर सकते. और यूं भी कि ज़रदारी के खिलाफ स्विस बैंकों में करोड़ों रूपये जमा होने की शिकायत दर्ज करने वाले तब के प्रधानमन्त्री नवाज़ शरीफ खुद मान चुके हैं कि उनका वो फैसला राजनीतिक दबाव में लिया गया था.

दूसरों को छोड़िये आज पाकिस्तान के लोग और वहां का आम तौर पर भारत जितना खुल के न बोल पाने वाला मीडिया भी कह रहा है कि प्रधानमंत्री को कठघरे में खड़ा कर देना दिखाने वाला सुप्रीम कोर्ट आई.एस.आई. और फौज के उन अफसरों को भी तलब क्यों नहीं कर रहा जिन पे इतने ही संगीन आरोप हैं. तो क्या पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट आई.एस.आई. और फौज के हाथों में खेल रहा है? समझ लीजिये. राजनीति में अक्सर तस्वीर वैसी होती नहीं है, जैसी वो दिखती है. मामला दरअसल इसके उलट है. ज्यादा मुमकिन तो ये लगता है कि पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट गिलानी को हीरो बना कर एक तरह से ज़रदारी की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी मदद कर रही है. और मदद तो वो हो ही रही है. सुप्रीम कोर्ट चाहे, या न चाहे. कम से कम पाकिस्तान की जनता ये मान के चल रही है कि ज़रदारी के खिलाफ आरोप सरासर बेबुनियाद हैं और अगर वो सही भी हैं तो उसके लिए प्रधानमंत्री को नहीं टांगा जा सकता. जनता को ये भी लगता है कि उसमे से कुछ और निकले, न निकले बदनामी तो कब्र में समा चुकी बेनजीर भुट्टो की भी होगी. कहने को लोग कह तो ये भी रहे हैं कि ज़रदारी अगर इतने ही भ्रष्ट थे तो पाकिस्तान के हुक्मरानों ने इन दस सालों में क्यों उनके खिलाफ स्विस सरकार को चिट्ठियाँ न लिखीं? तब तो ज़रदारी राष्ट्रपति नहीं थे, न उन्हें धारा 248 के तहद कोई छूट? पीपीपी इसे एक भावनात्मक मुद्दा बना कर जनता में जा रही है. जनता जितनी ही इस दलील से सहमत होगी, पाकिस्तानी न्यायपालिका के प्रति जनादर उतना ही कम होगा. और ये बहुत खतरनाक स्थिति होगी.

मार्च के पहले हफ्ते में पाकिस्तानी संसद के ऊपरी सदन के चुनाव हैं. ज़ाहिर है गिलानी को संवैधानिक माफ़ी वाले राष्ट्रपति के खिलाफ जांच बिठाने के लिए अगर सजा हुई तो वो हीरो बन के उभरेंगे और फिर उनके बाद इसी आधार पर कोई अगला प्रधानमंत्री. और जब संवैधानिक रूप से कोई प्रधानमंत्री अपने राष्ट्रपति के खिलाफ जांच के लिए स्विस सरकार को चिट्ठी लिख ही नहीं सकता तो सुप्रीम कोर्ट की प्रधानमंत्रियों को टांगते रहने की इस प्रक्रिया का अंत क्या है? ऐसा तो नहीं है कि पाकिस्तान किसी प्रधानमंत्री के बिना चलेगा. न ऐसा कि दस बीस प्रधानमंत्री टांग चुकने के बाद सुप्रीम कोर्ट सीधे राष्ट्रपति को नोटिस जारी कर दे! राष्ट्रपति को हटा सकती है तो सिर्फ संसद और उसके भीतर बहुमत तय करेगी जनता. वो भी जाहिर तौर पर तो आज पीपीपी के साथ ही लगती है. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट अगर आज इस और इसके बाद के हर प्रधानमंत्री को टांग देने पे आमादा है तो ये पाकिस्तान में सिर्फ अराजकता ही पैदा कर सकती है.

ये देखिये पाकिस्तान के संविधान की वो धारा 248 जो राष्ट्रपति के खिलाफ किसी भी तरह की फौजदारी कारवाई की मनाही करती है….

 

248. Protection to President, Governor, Minister, etc.-(1) The President, a Governor, the Prime Minister, a Federal Minister, a Minister of State, the Chief Minister and a Provincial Minister shall not be answerable to any Court for the exercise of powers and performance of functions of their respective offices or for any act done or purported to be done in the exercise of those powers and performance of those functions:

 

Provided that nothing in this clause shall be construed as restricting the right of any person to bring appropriate proceedings against the Federations or a Province.

 

(2) No criminal proceedings whatsoever shall be instituted or continued against the President or a Governor in any Court during his term of office.

 

(3) No process for the arrest or imprisonment of the President or a Governor shall issue from any Court during his term of office.

 

(4) No civil proceedings in which relief is claimed against the President or a Governor shall be instituted during his term of office in respect of any thing done or not done by him in his personal capacity whether before or after he enters upon his office unless, at least sixty days before the proceedings are instituted, notice in writing has been delivered to him, or sent to him in the manner prescribed by law, stating the nature of the proceedings, the cause of action, the name, description and place of residence of the party by whom the proceedings are to be instituted and the relief which the party claims.

प्रधानमंत्री इसके खिलाफ जाते तो भी सुप्रीम कोर्ट के गुनहगार होते. सुप्रीम कोर्ट के पास संवैधानिक रूप से एक विकल्प ये हो सकता था कि वो नेशनल असेम्बली यानी संसद को एक रिफरेन्स भेजता. कहता कि राष्ट्रपति के खिलाफ एक गंभीर आरोप है, इस नज़रिए से इस पे विचार किया जाए. लेकिन उस से भी पहले भी चूंकि राष्ट्रपति के खिलाफ सरसरी नज़र में ( prima facie) दोष साबित हो चूकना ज़रूरी था सो सुप्रीम कोर्ट ने वो नहीं किया. ऐसा शायद वो राष्ट्रपति के खिलाफ सरसरी नज़र में दोष साबित होने के बावजूद न करे. उसे पता है कि संसद में बहुमत उनका है और उनके खिलाफ इम्पीच्मेंट हो नहीं सकेगी. तो कानूनी प्रक्रिया को अगर देखें तो सुप्रीम कोर्ट सिर्फ प्रधानमंत्री का ही गिरेबान पकड़ सकती थी. उसी क़ानून के मुताबिक़ वे सीधे सीधे इसके लिए जिम्मेवार हों या न हों. और ये बात बहुत बेतुकी है. मिसाल के तौर पे भारत या इंग्लैण्ड की कोई अदालत कैसे कह सकती है किसी पुलिस या जेलर को कि फलां आदमी को फांसी चुराहे पे दी जाए कि जब भारतीय संविधान में ऐसा कोई प्रावधान ही नहीं है. पाकिस्तान के संविधान में भी नहीं है कि कोई प्रधानमन्त्री किसी राष्ट्रपति के खिलाफ कोई जांच बिठा सकता है. या कि वो चिट्ठी लिख के ही पूछे किसी विदेशी सरकार से कि बताओ क्या मेरा राष्ट्रपति बेईमान है!

ऐसे में दो ही बातें हो सकती हैं. या तो पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट किसी नवाज़ या सैनिक अधिकारी के दबाव में ज़रदारी, उनके प्रधानमन्त्री या उनकी पार्टी का चरित्रहनन कर रहा है. या ये कि अपने फैसलों से सहानुभूति बटोर लेने देकर वो उनकी दरअसल लोकप्रियता में इजाफा कर रहा है. ये बाद वाली बात में भी दम लगता है. ज़रा सोचो न, प्रधानमंत्री को अभी तो सबूत पेश करने के लिए हफ्ते भर का टाइम मिला है. फिर बहस होगी 28 फरवरी से. वो चल ही रही होगी कि ऊपरी सदन के चुनावों में पीपीपी का बहुमत बेहतर हो गया होगा जो बाद में किसी भी आम चुनाव में उसके काम आ सकता है. सो, राष्ट्रपति के बारे में संविधान की धारा 248 से बखूबी वाकिफ होते हुए भी पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट अगर प्रधानमंत्री को मुजरिम बनाए हुए है तो मान के चलिए कि सुप्रीम कोर्ट की दाल में कुछ काला तो है!

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