लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

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डॉ. दीपक आचार्य

जीवन के निर्माण में संस्कारों और आदर्शों का जितना महत्त्व है उतना और किसी का नहीं। अपनी आनुवंशिक परंपरा और पूर्वजों से प्राप्त संस्कारों के साथ ही हमारे शैशव में प्राप्त एवं स्थापित होने वाले संस्कारों के माध्यम से ही हमारे व्यक्तित्व की नींव का निर्माण होता है।

इस नींव में जितने अधिक संस्कार होंगे उतना ही अधिक मजबूत, टिकाऊ और सुनहरा होगा हमारा व्यक्तित्व। संस्कारों के माध्यम से ही हमारा जीवन महकता है और औरों को महकाता है।संस्कारवान लोग जहां कहीं होते हैं वहां प्रसन्नता, सुकून और आनंद अपने आप पसर जाता है और ऎसे लोगों की मौजूदगी मात्र ही हर किसी के साथ ही वहां के परिवेश को भी उल्लास तथा महा आनंद से भर दिया करती है। संस्कारों की स्थापना का कार्य परिवार का भी है, अपने गुरुओं, सगे-संबंधियों का, और उन सभी परिवेशीय घटनाओं का भी है जो हमारे शैशव से लेकर समझदार होने तक घटती रहती हैं और उसके बाद भी हमें किसी न किसी रूप में आन्दोलित, प्रभावित करती रहती हैं।

किसी भी व्यक्ति के भूत, वर्तमान और भविष्य की थाह पानी हो तो उसके लिए उसका चाल-चलन, चरित्र और संस्कार ही हैं जो यह बताते हैं कि वह व्यक्ति कितना सुशील, विनम्र, संस्कारवान औन मानवीय गुणों तथा मूल्यों से युक्त है और समाज के लिए किस सीमा तक उत्तरदायी या उपयोगी हो सकता है।संस्कार ही वह धुरी है जिसके इर्द-गिर्द व्यक्ति का पूरा जीवन चक्कर काटता नज़र आता है। फिर चाहे वह बचपन हो या पचपन या इससे भी कहीं ज्यादा।व्यक्ति का पैमाना ही हुआ करते हैं ये संस्कार। संस्कारों के बीज एक बार बो दिए जाने के बाद पल्लवित और पुष्पित होने तक आगे ही आगे श्रृंखलाबद्ध रूप में दूर्वा की तरह चलते रहते हैं।इसलिए संस्कारों को जीवन में सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है। सोलह संस्कारों से व्यक्ति आत्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है वहीं लोकाचार और चरित्र तथा आदर्शों के संस्कार उसे प्राणी से मनुष्य और मनुष्य से दैवत्व की ओर जाने वाले पथिकों की राह दिखाते हैं।

 

इसलिए शैशव से ही बच्चों में इस प्रकार के संस्कारों की स्थापना की जानी चाहिए तो खुद के लिए, परिवार के लिए, समाज के लिए और राष्ट्र भर के लिए कल्याणकारी सिद्ध हों तथा इस रूप में व्यक्ति को युगों तक लोग याद भी रखें।आदर्श जीवन और नैतिक मूल्यों के साथ जीवन जीने वाले लोग युगपुरुष की श्रेणी में आते हैं। इस किस्म के लोगों की संख्या यद्यपि काफी कम हुआ करती है लेकिन ये लोग भारी भीड़ के मुकाबले नगण्य होते हुए भी ऎसे-ऎसे काम कर जाते हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ इनका गुणगान करते नहीं अघाती।आज व्यक्ति से लेकर घर-परिवार, समाज और क्षेत्र भर की तमाम समस्याओं का मूल कारण संस्कारहीनता है और इसी वजह से समाज में विभिन्न रूपों में प्रदूषण फैल रहा है।मन-तन से लेकर परिवेश तक में संस्कारहीनता के बैक्टीरिया और स्वेच्छाचारिता के वायरसों का बोलबाला है। संस्कारहीन लोगों की जमात बढ़ती जा रही है और परिवेश में छाए जा रही है।

 

ऎसे में अच्छे और संस्कारों पर जीने वाले लोगों में कहीं न कहीं यह बात भी धूंए की तरह मण्डरा रही है कि आखिर भारतीय परिवेश में संस्कारहीन लोगों के लिए ही समृद्धि के द्वार क्यों खुलते दिख रहे हैं।जिन लोगों का मानवीय मूल्यों से दूर का रिश्ता नहीं होता वे मानवता और समाज के नाम पर क्या-क्या नहीं कर गुजर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर संस्कारहीन लोगों की प्रतिष्ठा सिर्फ इसलिए बढ़ती जा रही है कि वे लोग संगठित होकर हमारे सामने हैं।समाज की वर्तमान स्थितियों को देखा जाए तो तकरीबन आज भी वैसे ही हालात हमारे सामने हैं जैसे महाभारतकाल में थे या रावण के राज में। हमारे आस-पास वे सारे पात्र और कथानक भिनभिनाते हुए नज़र आते हैं जहां मानवता खामोश है और आसुरी वृत्तियां और संस्कारहीनता सर उठा रही हैं।

 

आजकल सभी अच्छे लोगों के सामने यही प्रश्न है कि इस स्थिति में हमारे अिंस्तत्व की रक्षा और विकास के लिए आखिर क्या किया जाए? मौजूदा सामाजिक एवं परिवेशीय हालातों को देखते हुए संस्कारवान लोगों को चाहिए कि वे इन सांसारिक सुखों और क्षणिक आनंद को देखें तथा यह जानें कि जो लोग संस्कारहीन हैं, कुटिल, खल और कामी हैं, वे चाहे कितने प्रतिष्ठित, लोकप्रिय और वैभवशाली हों, लेकिन आत्मिक आनंद से वे दिनों दिन कोसों दूर होते जा रहे हैं और उनकी स्थिति ऎसी हो गई है कि वे न घर के रहे हैं, न घाट के।इनके जीवन मेंं भोग-विलास का जितना अधिक प्रवेश होता जा रहा है, उतना ही मन की शांति और आत्मिक आनंद दूर होता जा रहा हैे। इन लोगों का जो स्वरूप दिखाई देने लगा है वह ज्यादा उमर वाला नहीं है और इन लोगों का भविष्य न सुरक्षित है न रौशन।जबकि संस्कारों और आदर्शों के साथ जीने वाले लोगों को भले ही बाहरी समृद्धि और चकाचौंध का मिथ्या आनंद न मिले, पर उनके भीतर का आनंद हिलोरें लेने लगता है और इस भीतरी आनंद के आगे बाहरी चकाचौंध और बनावटी मुस्कान, पग-पग पर कुटिलताएं और दोहरा-तिहरा चरित्र भरा व्यवहार आदि सब बेकार लगने लगता है।

 

जीवन में जहां कहीं रहें, जो कुछ करें, अपने संस्कारों को न छोड़े न कमी लाएं और न ही इन्हें हीन समझें। पक्का यकीन रखें कि ये संस्कार और आदर्श ही हैं जो व्यक्तित्व को शाश्वत और स्थायी ऊँचाइयां प्रदान करते हैं और साथ ही साथ आनंद की अभिव्यक्ति भी करते हैं।जिन संस्कारहीन लोगों को हम सफल मानते हैं उनके सभी के जीवन के उत्तरार्ध की ओर नज़र डालें और फिर देखें कि संस्कारहीनता व्यक्ति को अपने अंतिम पड़ाव में कहां तक ले जाती है। आजकल हर क्षेत्र की तरह अपने इलाके में भी ऎसे ढेरों लोग हैं जो संस्कारहीन तो हैं ही, अभद्र और अहंकारी भी। ऎसे लोगों की किसी भी हरकत या प्रभाव में न आएं। और न ही स्वार्थों से वशीभूत होकर कोई समझौते करें।

 

सामने वाले लोग कितने ही नीचे गिर जाएं, कितने ही अभद्र हो जाएं, ऎसे लोगों से काम निकलवाने अथवा ऎसे लोगों के किसी काम आने के लिए अपने संस्कारों से कभी नीचे नहीं उतरें।वे लोग तो गिरने वाले हैं और जमाने भर में कई गड्ढ़े और पोखर उन्हीं के लिए बने हैं। हमारे लिए तो मानवीय मूल्यों के पर्वत शिखर बने हुए हैं जिन्हें अपनी प्रतीक्षा युगों-युगों से है।दूसरों की निगाह पाने या अपने स्वार्थों के लिए जो लोग संस्कारों और मूल्यों को त्याग देते हैं वे न अपने होते हैं न परायों के। ऎसे लोगों को आने वाली कई जन्मों तक मनुष्य योनि तक प्राप्त नहीं होती।

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