लेखक परिचय

डॉ नीलम महेन्द्रा

डॉ नीलम महेन्द्रा

समाज में घटित होने वाली घटनाएँ मुझे लिखने के लिए प्रेरित करती हैं।भारतीय समाज में उसकी संस्कृति के प्रति खोते आकर्षण को पुनः स्थापित करने में अपना योगदान देना चाहती हूँ।

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bharat mataभारत का आम आदमी आज जिस दौर से गुजर रहा है, वह अचम्भित है  कि इतनी विविध प्रकार की जो घटनाएँ घटित हो रही हैं उन्हें वह किस रूप में देखे क्योंकि  अचानक आज देश में  विवादों की बाढ़ सी आ गई है ।एक ओर विश्व में भारत एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में दिखाई देने लगा  ,हमारे प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं में न केवल एन आर आई बल्कि उस देश के नागरिक भी”मोदी मोदी” के नारे लगाने पर विवश हो गए,भारत निवेश के लिए विश्व को एक फायदेमंद जगह दिखने लगी,स्वच्छता अभियान के द्वारा देश की स्वच्छता में आम आदमी को अपने योगदान का एहसास होने लगा,शौचालयों के निर्माण से गावों में आम आदमी के जीवन स्तर में सुधार होता दिखा,देश के हर नागरिक का बैंक खाता खुलवाकर भ्रष्टाचार पर नकेल कसने की दिशा में एक ठोस कदम दिखने लगा,मेक इन  इंडिया के द्वारा देश में रोजगार के अवसर उपलब्ध होते दिखने लगे , देश के बुनियादी ढांचे में सुधार के द्वारा भारत को एक सुनहरे भविष्य की ओर बढ़ते देख रहा था कि अचानक कई विवादों के बादलों ने उसकी दृष्टि धूमिल कर दी।
उत्तर प्रदेश में दादरी कांड,अवार्ड वापसी अभियान,हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या का राजनीतिकरण ,जे एन यू परिसर में देश विरोधी नारों का लगना ,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर तर्क हीन मुद्दों को उछालना, भारत माता के जयघोष को ही विवाद बना देना आदि आदि।
आश्चर्य इस बात का है कि ये सभी मुद्दे बुद्धि जीवी वर्ग द्वारा उठाए जाने के बावजूद तर्कहीन हैं क्योंकि इनका राष्ट्रीय अथवा अन्तराष्ट्रीय स्तर पर देश के विकास या उसकी मूलभूत समस्याओं मसलन गरीबी,बेरोजगारी,राष्ट्रीय सुरक्षा आदि से कोई लेना देना नहीं है बल्कि यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इन सभी मुद्दों ने भारतीय समाज को न सिर्फ भीतर से तोड़ कर बाँटने का काम किया है अपितु अन्तराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि धूमिल भी की है।
लेकिन कहते हैं न कि बुराई में भी अच्छाई छिपी होती है तो यह अच्छा हुआ कि इन घटनाओं ने देश में राष्ट्रवाद और देश भक्ति पर एक ऐसी बहस को जन्म दिया जिसमें केवल बुद्धि जीवी ही नहीं बल्कि आम आदमी भी शामिल हो गया है ।देश के इस बुद्धिजीवी वर्ग ने जो तर्कहीन मुद्दे उठाए,अनजाने में मधुमक्खी के छत्ते को छेड़ दिया।दरअसल पिछले दो सालों में विपक्ष और मीडिया को सरकार के खिलाफ कोई भ्रष्टाचार का मामला अथवा घोटाला नहीं मिला तो इन तर्कहीन मुद्दों को ही परोस दिया।भूल यह हुई कि चूँकि यह मुद्दे आम आदमी से जुड़े थे इसलिए जनमानस आहत हुआ।आज वह जानना चाहता है कि हमारे देश में आखिर कितने प्रतिशत लोग हैं जो गोमांस का सेवन करते हैं (मात्र  20%)–!अवार्ड वापसी अभियान जो देश के बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा चलाया गया घोषणा तो बहुत हुई लेकिन कितनों ने लौटाए (मात्र 33) और क्यों यह खोज का विषय है।
हैदराबाद विश्वविद्यालय के एक छात्र द्वारा आत्महत्या का राजनीतिकरण करके उसको दलित उत्पीड़न का मामला बनाकर क्यों प्रस्तुत किया गया जबकि वह छात्र दलित था ही नहीं!जे एन यू में जब राष्ट्र विरोधी नारे लगे तो पूरा देश एकजुट क्यों नहीं था क्यों राष्ट्रवाद पर एक बहस शुरू कर दी गई क्यों देश बँटा हुआ नज़र आने लगा?यह बात भी आश्चर्य जनक है कि 9 तारीख को जो जे एन यू में हुआ वह पहली बार नहीं हुआ था इस प्रकार की घटनाएँ वहाँ आम बात थी तो देश के सामने पहली बार क्यों आईं?क्यों देश की राजधानी में स्थित एक अन्तराष्ट्रीय विश्वविद्यालय की बातें इतने सालों तक देश से छिपी रहीं?इन सभी बातों को संविधान का सहारा लेकर सही ठहराने की कोशिश और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर प्रस्तुत किए गए तर्कहीन बातों ने आम आदमी को झकझोर दिया। अभी देश का आम आदमी इन बातों को समझने की कोशिश में लगा था कि ओवेसी ने संविधान का हवाला देते हुए कहा कि मैं भारत माता की जय नहीं बोलूँगा ?इस प्रकार के तर्कहीन मुद्दों का औचित्य क्या है? क्या आप से किसी ने जबरदस्ती की कि कहना  पड़ेगा ? आप से कोई नहीं पूछ रहा कि आप अपनी माँ अपनी जन्मभूमी का जयघोष कैसे करते हैं ! अगर आप उसका सम्मान करते हैं तो निश्चित ही उसके सम्मान में कुछ शब्दों का प्रयोग करेंगे उन शब्दों पर राजनीति कहाँ तक उचित है?आप अपने घर में अपनी मातृभाषा का प्रयोग करते हैं किन्तु राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उस भाषा का प्रयोग करते हैं जो सभी के द्वारा स्वीकार्य हो  ।आप अपने क्षेत्र में अपनी क्षेत्रिय भाषा का प्रयोग कर सकते हैं और करना भी चाहिए लेकिन अगर राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय स्तर पर भी अपना अलग राग अलापेंगे तो स्वयं को ही हँसीं का पात्र बनाएँगे ।
आज देश में असहिष्णुता  जैसे नए शब्दों की उत्पत्ति ही नहीं हो रही अपितु राष्ट्रवाद और देशप्रेम की नई नई परिभाषाएँ भी गढ़ी जा रही हैं।आज जितने लोग हैं उतनी ही परिभाषाएँ हैं!इन सभी को पढ़ने व सुनने के बाद यदि समझ शेष बचे,तो अपने अन्तरमन में आप भी अपने लिए एक नई परिभाषा को जन्म दीजिए नहीं तो इनमें से एक का चयन कर लीजिए।
आम आदमी बेहद सरल होता है उसे कानून की ज्यादा समझ नहीं होती लेकिन सही और गलत का ज्ञान अवश्य होता है उसे पता है कि राष्ट्र का हित क्या है और राष्ट्र विरोध क्या है।आज आचार्य चाणक्य की कही बात का उल्लेख उचित होगा जिसमें वह स्पष्ट करते हैं कि देश  के प्रति निष्ठा और देश के प्रमुख के प्रति निष्ठा दो अलग अलग बातें हैं।आज यही बात हमें समझनी होगी कि  देश पहले आता है –नेशन कमस् फर्सट ।आज अगर राष्ट्रवाद  मुद्दा  बना है तो इस पर बहस होनी ही चाहिए  न कि विवाद और साजिश!

राष्ट्रवाद अथवा राष्ट्रीयता अर्थात् उस देश के नागरिकों का अपने देश के प्रति पायी जाने वाली स्वाभाविक सामूहिक भावना।जब बात देश की होती है तो वह केवल एक अन्तराष्ट्रीय भौगोलिक नक्शे पर बना जमीन का एक टुकड़ा नहीं होता।देश बनता है वहाँ वास करने वाले नागरिकों से।भारत केवल भूमि का टुकड़ा नहीं है,वह एक ऐसी संस्कृति है जो अनेक संस्कृतियों का मिलन है,सम्पूर्ण विश्व में शायद भारत ही एक ऐसा देश है जिसमें इतनी विविधता है -धर्म,संस्कृति,भाषा,परम्परा ,सभ्यता में इतनी अनेकता के बावजूद एकता!भारत में रहने वाला हर नागरिक भारतीय हैं हिन्दू धर्म को ही लें तो इसमें अनगिनत सम्प्रदाय है,देवी देवता हैं,जातियाँ हैं,सबकी अपनी अपनी संस्कृति अपना अपना रहन सहन है और यही हिन्दू धर्म की विशालता  है कि आप चाहें किसी भी भगवान को मानें,आप मन्दिर में या गुरुद्वारे में जाएं किसी भी जाति या सम्प्रदाय से जुड़े हों (जैन,कृष्ण,आर्यसमाज आदि)अन्त में आप हिन्दू ही है।यह धर्म से जुड़ी बात न होकर जन्म से जुड़ी बात है।भारत में जन्म लेने वाला हर व्यक्ति हिन्दू हैं,हिन्दुस्तान का हर नागरिक हिन्दू हैऔर  हिन्दू धर्म में इतनी विविधता को स्वीकार करना उसके मूलभूत संस्कारों में शामिल है और यही राष्ट्रवाद है।

अंग्रेजी के लेखक कैरी ब्राउन ने अपनी पुस्तक”द असेन्शियल टीचिंगस् आफ हिन्दुइज्म ” में लिखा है –“आज हम जिस संस्कृति को हिन्दू संस्कृति के रूप में जानते हैं और जिसे भारतीय सनातन धर्म या शाश्वत नियम कहते है वह उस मजहब से बढ़ा सिद्धांत है जिस मजहब को पश्चिम के लोग समझते हैं।कोई किसी भगवान में विश्वास करे या ना करे फिर भी हिन्दू है,यह जीवन की एक पद्धति है।” 1996 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जे एस वर्मा ने हिन्दुत्व की व्याख्या करते हुए कहा कि हिन्दुत्व पूजा पद्धति नहीं जीवन दर्शन है ।
देश के प्रति प्रेम और भक्ति की कोई सीमाएँ नहीं होती और जहाँ सीमाएं होती हैं वहाँ प्रेम और भक्ति नहीं हो सकते।प्रेम और भक्ति में समर्पण होता है, कर्तव्यबोध होता है न कि अधिकार बोध! प्रेम वह होता है जो भगत सिंह ने किया था,इस मिट्टी से जिसकी गोद में वह खेला था भक्ति वह होती है जो सीमाओं पर की जाती है हनुमनथप्पा जैसे सैनिकों द्वारा  ।दोनों देशभक्त शहीदों का देश व काल भिन्न हैं लेकिन भावना एक ही है राष्ट्रवाद ।यही भावना आज देश की जरुरत है ।यह तभी संभव है जब सभी धर्मों के  लोग आपस में मिलकर प्रेम से रहें और
,यह तब  संभव जब वे एक दूसरे के धर्म को सम्मान दें सिर्फ मेरा धर्म महान है यह कहने कि बजाय मेरा धर्म भी महान है और तुम्हारा धर्म भी महान है ऐसा कहें।एक दूसरे को स्वीकार करना ही राष्ट्रवाद है! मैं भी हूँ, तुम भी हो, यह राष्ट्रवाद है।मशहूर शायर सरशार  कहते हैं ना —
“हमीं हम हैं तो क्या हम हैं
तुम्हीं तुम हो तो क्या तुम हो”
मैं से हम होकर पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधना राष्ट्रवाद है।राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को समझना राष्ट्रवाद है।देश की एकता और अखन्डता की रक्षा राष्ट्रवाद है।

डॉ नीलम महेंद्रा

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