लेखक परिचय

डा.राज सक्सेना

डा.राज सक्सेना

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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तपतीधरती,तपताअम्बर,मैं तिल-तिल सह सकता हूं |
इन दोनों के बीच में तप कर,मैं जिंदा रह सकता हूं |
जिन से मेरे दिल के रिश्ते, देस गए तो भूल गए,
गैरों को परदेस में कैसे, मैं अपना कह सकता हूं |
खुशियां बांटीं गैरों को भी, रख कर दोनों हाथ खुले,
मैं तो गम के साथ खुशी से,बरसों तक रह सकता हूं |
औरों को लुटता देखा पर , परदेसी से प्यार किया ,
मरने तक का रोग लगा कर,मैं हंसता रह सकता हूं |alone-man
मुझे डरा कर,पास से मेरे,कई बार गुज़री है मौत,
हर दिन उसके पांव की चापें,मैं सुनता रह सकता हूं |
एक बुलबुला-जीवन पल का,है जीवन का सार यही,
पड़ी वक्त के हाथ मैं किस्मत,मैं तकता रह सकता हूं |
घटाटोप अंधियारों में भी, राह बना कर जिन्दा हूं,
’राज’तुम्हारी याद से सदियों,मैं ज़िन्दा रह सकता हूं |

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