लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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भूमंडलीकरण एक विश्वव्यापी संवृत्ति है। इसका साम्राज्यवाद से गहरा सम्बन्ध है। यह नव- औपनिवेशिक शोषण और प्रभुत्व का प्रभावी अस्त्र है। इसके प्रचारक-प्रसारक हैं भूमंडलीय जनमाध्यम और बहुराष्ट्रीय शस्त्र निर्माता कम्पनियां एवं बहुराष्ट्रीय वित्तीय कम्पनियां। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद समूची दुनिया पर साम्राज्यवाद की पकड ढ़ीली पड़ी थी। अधिकांश गुलाम देश आजाद हुए।

साम्राज्यवाद के शोषण एवं उत्पीडन का दायरा सिकुड़ा। समाजवादी शिविर का जन्म हुआ। सोवियत संघ के नेतृत्व में उभरे समाजवादी शिविर ने नवोदित राष्ट्रों को आत्मनिर्भर विकास का रास्ता अख्तियार करने, बुनियादी उद्योग-धंधों का निर्माण करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इस सबका विरोध और समाजवादी सत्ता का विरोध करने के लिए शीतयुध्द की राजनीति शुरु की गयी और शस्त्रास्त्रों की अंधी प्रतिस्पर्धा शुरु की गयी। ‘समाजवाद के खतरे’ और ‘मार्क्‍सवाद के भूत’ के जरिये सारी दुनिया में, खासकर तीसरी दुनिया और पूर्वी यूरोप में वैचारिक हमला बोला गया। इसी संदर्भ में माध्यम साम्राज्यवाद का विकास हुआ।

साम्राज्यवादी हितों के विस्तार के लिए हथियारों के उत्पादन, सूचना तकनीकी के उत्पादन एवं माध्यम कार्यक्रमों के उत्पादन पर विशेष जोर दिया गया। इन तीन क्षेत्रों के जरिये अमरीकी साम्राज्यवाद ने विश्व भर में अपनी प्रभुता स्थापित की और अपनी शक्ति का विस्तार किया। विगत पचास वर्षों में इन क्षेत्रों में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की परिसंपत्तियों में बेशुमार वृद्धि हुई। वहीं दूसरी ओर समाजवादी व्यवस्था को गहरा आघात लगा।तीसरी दुनिया के देशों को नए सिरे से नव औपनिवेशिक शोषण की चक्की में पिसना पड़ रहा है। गरीबी, भुखमरी, बेकारी, सामाजिक विखण्डन और कर्जों के दबाव से गुजरना पड़ रहा है।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों की समस्या थी कि संपत्ति,सत्ता और ताकत का कैसे विस्तार किया जाय? जाहिरा तौर पर यह विस्तार शांतिपूर्ण विकास कार्यों से संभव नहीं था। सिर्फ युद्धों का माहौल बनाए रखकर ही साम्राज्यवादी हितों का विकास संभव था। युध्दों के लिए शस्त्रों की जरुरत थी और यही एकमात्र क्षेत्र था जो साम्राज्यवाद के विकास की गारंटी कर सकता था। यही वजह है कि शस्त्र उद्योग का बड़े पैमाने पर विकास किया गया।यही एकमात्र उद्योग था जहां बेशुमार मुनाफा था।

सन्1978 में संयुक्त राष्ट्रसंघ के विशेषज्ञों की ”हथियारों की होड़ और सैन्य खर्च के आर्थिक-सामाजिक परिणाम, महासचिव की अधुनातन रिपोर्ट ” में बताया गया कि ”लड़ाईयां दूसरे विश्व युध्द के बाद के दौर का एक स्थायी लक्षण रही हैं। हथियारों का प्रयोग काफी बडे पैमाने पर वास्तव में निरन्तर, अक्सर एक ही समय अनेक स्थानों पर किया जा रहा है। हताहतों की संख्या बढ़ती रही है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद कई करोड़ तक पहुँच गयी है। बडी हद तक ये लड़ाई-झगड़े दुनिया के मुख्य औद्योगिक क्षेत्रों के बाहर हुए हैं, यद्यपि कुछ स्थितियों में कुछ मुख्य शक्तियाँ इनमें प्रत्यक्ष रुप से शामिल रही हैं, और युद्ध का साजो-सामान तो बिना अपवाद इन्हीं शक्तियों ने मुहैया किया है। इन लडाईयों के हिंसात्मक स्वरुप, उनकी व्यापकता तथा अत्यन्त विनाशकारिता का कारण यह है कि अंतर्राष्ट्रीय शक्तियां दो हिस्सों में बंटी हुई हैं तथा आधुनिक शस्त्रास्त्र तत्काल सुलभ हैं। और ये दोनों बातें अस्त्रों की होड़ का मुख्य लक्षण हैं। ”सैन्य-औद्योगिक क्षेत्र में छह प्रमुख देश आते हैं जिनके खाते में संसार भर के सैन्य व्यय, सैनिक शोध एवं विकास व्यय का बहुत बड़ा हिस्सा आता है। ये देश हैं-अमरीका, सोवियत संघ, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन, और जर्मनी। विश्व में शस्त्रों का 90 फीसदी निर्यात यही देश करते हैं। अन्य देशों को जाने वाले मुख्य प्रकार के हथियारों की कुल मात्रा का 95 फीसदी इन्हीं देशों से जाता है। आज शस्त्रास्त्र प्रतिस्पर्धा से कोई देश बचा नहीं है। हथियारों के सौदागर अपने माल की बिक्री बढाने के लिए यह प्रचार करते रहते हैं कि यदि इन हथियारों को प्राप्त कर लिया तो उनके देश की प्रतिष्ठा बढ़ेगी , बडी-बडी शक्तियों के दबाव और आदेश का मुकाबला करने की क्षमता बढेग़ी। लेकिन हथियार किसे बेचे जाएं यह एक राजनीतिक फैसला होता है। सैनिक सलाहकारों एवं प्रशिक्षकों को कहां भेजा जाये, किसे गोला -बारुद की सप्लाई की जाये,इत्यादि फैसले राजनीतिक हितों को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं। इस संदर्भ में साम्राज्यवादी मुल्कों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है और छोटे-अविकसित देशों के हितों की अनदेखी की जाती है।

संयुक्त राष्ट्र संघ के विशेषज्ञों की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि” हथियारों की होड़ दिनों दिन विश्वव्यापी परिघटना बनती जा रही है। यद्यपि इसकी तीव्रता विभिन्न क्षेत्रों में घटती बढ़ती रहती है; मगर शायद ही कोई देश और बड़ा क्षेत्र इससे बचा हो।” विशेषज्ञों ने इसके आर्थिक दुष्परिणामों की ओर ध्यान खींचते हुए लिखा कि ”यह मामला अत्यन्त असमान विनिमय का होता है जिससे गरीब और धनी देशों के बीच दूरी को पाटने के प्रयासों पर विशेष चोट पड़ती है।शस्त्रों के आयार्तकत्ता के लिए यह अपव्यय मात्र है जिसे लाभप्रद ढंग़ से उपयोग में लाया जा सकता है। शस्त्र यदि दान में मिलें तब भी देखरेख,संचालन तथा अवसंरचना का खर्च घाटे के मद में ही जोड़ना पडेगा। स्टाकहोम अंतर्राष्ट्रीय शान्ति शोध संस्थान एक विश्लेषण के आधार पर इस ठोस निष्कर्ष पर पहुंचा कि ”आखिरकार हथियारों का इस्तेमाल यदि युद्ध में नहीं किया जाता तो भी वे संतुलित आहार, स्वास्थ्य सेवा, आवास, और शिक्षा जैसी बुनियादी विकास आवश्यकताओं से आर्थिक संसाधन दूसरी ओर खींचकर अप्रत्यक्ष रुप से ‘हत्या’करते हैं।” वस्तुत:शस्त्रों की दौड में शामिल होकर कोई भी देश ताकतवर नहीं बनता अपितु कमजोर बनता है।

आन्द्रेई कोजीरेव ने ”शस्त्र व्यापार नये-नये खतरे” कृति में लिखा है कि ”शिकार और खेल को अलग कर दीजिए तो किसी अस्त्र का एकमात्र प्रयोग एवं एकमात्र सामाजिक आवश्यकता उत्पीड़कों की संस्थाबद्ध हिंसा है-जो अन्यायपूर्ण इस्तेमाल है। इसके विपरीत उत्पीड़ितों की हिंसा -जो जबावी इस्तेमाल है और न्यायपूर्ण होती है। कुछ पूँजीवादी समाजशास्त्रियों का कहना है कि हिंसा मनुष्य की एक स्वाभाविक, मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति है, उसके अस्तित्व का एक अनिवार्य पक्ष है। यह एक निराशावादी , मानवविरोधी निष्कर्ष है।” फ्रेडरिक एंगेल्स के शब्दों में ”बल केवल साधन है; उद्देश्य आर्थिक लाभ है।”

हिंसा की जरुरत उसी समाज को पडती है जहां इसका इस्तेमाल निजी संपत्ति की रक्षा के लिए किया जाता है जो मानव द्वारा मानव के उत्पीड़न का स्रोत है। पूंजीवादी जगत का लगभग सारा अनुसंधान और विकास कार्य औद्योगिक राष्ट्रों में संकेन्द्रित है।इस पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का एकाधिकार है। तकनीकी डिजायनों का 80 फीसदी अंश उन्हीं के नियंत्रण में है। ये कम्पनियां संपत्ति का संचय उपभोग बढाने के लिए नहीं करतीं। अपितु संपदा का ज्यादा से ज्यादा संचय ही इनकी मूल प्रकृति है। संचय को विनिवेश में लगाने की कोशिश की जाती है और उससे हुई प्राप्तियों को बचत खातों में डाल दिया जाता है। साम्राज्यवादी भूमंडलीकरण के कारण विषमता, असमानता एवं अलोकतान्त्रिक मानसिकता का तेजी से विकास हुआ है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में घुसपैठ बढ़ी है। विश्व की200 सबसे बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का1960 में विश्व के सकल घरेलू उत्पादन के 17 प्रतिशत हिस्से पर कब्जा था जो 1982 में बढकर 24 फीसदी हो गया और 1995 में 32 प्रतिशत हो गया।

अ. ग्राचोव और नि.येर्मोश्किन ने”नयी सूचना व्यवस्था अथवा मनोवैज्ञानिक युध्द?”कृति में सैन्य, सूचना, और संचार के अंतस्संबंधों को विश्लेषित करते हुए लिखा कि ”राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन में निरंतर चढ़ाव आने और पूंजीवादी व्यवस्था में गंभीर संकटों के आने के साथ-साथ संघर्ष विचारधारा के क्षेत्र में भी अंतरित होता जा रहा है। आधुनिक साम्राज्यवाद अपनी विचारधारात्मक सेवाओं के संकेन्द्रण की तरफ विशेष ध्यान दे रहा है। ताकि एक ऐसे सशक्त हरावल का निर्माण किया जा सके;जो स्थानीय और विश्व के पैमाने पर सामाजिक परिवर्तनों का प्रतिरोध करने की क्षमता रखता हो। आर्थिक, सैनिक और विचारधारात्मक प्रसार एकाकार हो गया है।”

पचास और साठ के दशक में उपजे पूंजीवादी संकट के कारण शस्त्र उद्योग में पूंजी निवेश ज्यादा हुआ। सन् 1947 से 1970 के दौरान 1,100 विलियन डॉलर का सैन्य उद्देश्यों पर निवेश किया गया। अमरीकी सैन्य उद्योग पर किए गए शोध कार्यों से इस तथ्य की पुष्टि होती है कि जब-जब युद्ध की शुरुआत हुई है तब-तब अमरीकी उद्योगों में हल्की सी विकास दर दर्ज की गयी है। आम तौर पर विकसित राष्ट्रों में सूचना तकनीकी के विकास की बढ़-चढ़कर प्रशंसा की जाती है। किन्तु हकीकत यह है कि उन समाजों में असमानता बढ़ीहै। ”मानव विकास रिपोर्ट 1996” के अनुसार ‘ओईसीडी’ देशों में 100 मिलियन से ज्यादा लोग गरीबी की रेखा के नीचे जिन्दगी बिता रहे थे।पांच मिलियन लोग गृहहीन थे।आस्ट्रेलिया और ब्रिटेन में 20 फीसदी समृध्दों ने इन देशों के 20फीसदी सबसे गरीब लोगों की तुलना में दस गुना ज्यादा कमाई की।इसी तरह अमरीका की कुल आबादी के एक फीसदी समृध्दों की संपत्ति में 20से 36प्रतिशत तक की वृद्धि हुई। दूसरी ओर बेकारों की संख्या में बेशुमार वृद्धि हुई। विश्वस्तर पर भूमंडलीकरण के नियमों एवं मांगों को लागू करने का यह दुष्परिणाम निकला है कि बडे पैमाने पर दरिद्रता, बेकारी, एवं असमानता का विकास हुआ है। आज दुनिया में 1.3 विलियन लोगों के पास साफ पीने का पानी नहीं है। प्राइमरी स्कूल जाने योग्य सात बच्चों में से एक बच्चा स्कूल के बाहर ही रह जाता है। 840 मिलियन लोग कुपोषण के शिकार हैं। तकरीबन 1.3 विलियन लोग ऐसे हैं जिनकी प्रतिदिन एक डॉलर से भी कम आय है। इन आंकड़ों में हो रही वृद्धि की ओर कायदे से भूमंडलीकरण समर्थकों को ध्यान देना चाहिए कि आखिरकार ऐसा क्यों हो रहा है।

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

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