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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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11 अक्टूबर-बालिका दिवस पर विशेष

सरिता सामरथ

दूसरी बार अंतरिक्ष में पहुंचने वाली भारतीय मूल की सुनिता विलियम्स पर पूरा देश गौरवान्वित हो रहा है। हर तरफ भारत की इस बेटी की ही चर्चा हो रही है। यह कोई पहला अवसर नहीं है जब किसी भारतीय महिला ने देश की शान बढ़ाई है। इससे पहले ब्रह्मांड की खोज में लगे वैज्ञानिकों की टीम में भी भारत बाला अपनी क्षमता का लोहा मनवा चुकी है। बात केवल विज्ञान की नहीं है आप कला, संस्कृति, खेल या फिर कोई भी क्षेत्र देख लें देश की बेटियों ने हमेशा नाम रौशन ही किया है। लेकिन इसके बाद भी विडंबना यही है कि उसे जीने के लिए या फिर यूं कहें कि दुनिया में आने के लिए भी संघर्श करना पड़ रहा है। गर्भ में ही उसे मारने की कोशिश की जाती है। एक प्रकार से उसे बोझ समझा जाता है। पराया धन मानकर उसे मौलिक अधिकारों से भी वंचित किया जाता है। कदम कदम पर संस्कृति और परंपरा की दुहाई देकर उसके पैरों में बेडि़यां लगाई जाती हैं। उसे सम्मान देने की बजाए उसका तिरस्कार किया जाता है। नारी को केवल भोग का सामान माना जाता है। वंश को आगे बढ़ाने का महज माध्यम भर समझा जाता है। समाज में फैली प्रत्येक बुराई का उसे ही जड़ करार दिया जाता है। कई मामलों में पुरूशों से अधिक सहनशक्ति की क्षमता होने के बावजूद उसे अबला ही समझा जाता है। समाज में बढ़ती हिंसा के पीछे जिम्मेदार करार दिया जाता है। उसे कमजोर माना जाता है और शोषण भी उसी का किया जाता है।

भारत विश्‍व का तेजी से उभरता अर्थव्यवस्था वाला देश बनता जा रहा है। विज्ञान हो या फिर कला हर क्षेत्र में इसने अपने झंडे गाड़े हैं। विकास के सभी चरणों में यह खरा उतरता रहा है। विश्‍व मंच पर विकासषील और पिछड़े देश इसे अपना लीडर मानते हैं। भारत को यह मुकाम दिलाने में जितनी मेहनत पुरूषों ने की है उतनी ही महिलाओं ने भी अपना योगदान दिया है। स्वाधीनता आंदोलन में भी महात्मा गांधी ने नारियों को समान रूप से शामिल किया था। संविधान में भी महिलाओं को सभी क्षेत्रों में बराबरी का दर्जा दिया गया। पुरूषों की तरह प्रत्येक खतरे का बखूबी सामना करने के बावजूद सच्चाई यह है कि आज भी उसे पुरुषों जैसा सम्मान प्राप्त नही है। आज के इस प्रगतिशील और विकासवादी दौड़ में समय के साथ कदम मिलाने के बावजूद बेटे और बेटियों में फर्क किया जाता है। अब भी उसके जन्म पर मातम नहीं तो खुशियां भी नहीं मनाई जाती है। एक बलात्कारी पुरूष की गलती की सजा उसके घर की बहन या बेटी रूपी नारी को ही चुकाना होता है। ये सब इसलिए होता हैं क्योंकि आज भी कहीं न कहीं नारी को पुरुषों से हीन समझा जाता है। हमारे देश में शिक्षा का काफी प्रसार हुआ है विशेषकर स्त्री षिक्षा में काफी प्रगति हुई हैं। परंतु अब भी वही संकीर्ण मानसिकता के कुछ छाप बरकरार हैं।

प्रगतिशील समाज का दुहाई देने के बावजूद कन्या भ्रूण हत्या का दौर बदस्तूर जारी है। आज भी हजारों लड़कियों को या तो जन्म पूर्व ही मार दिया जाता है या फिर जन्म लेते ही उसे लावारिस छोड़ दिया जाता है। आश्‍चर्य की बात है कि बालक और बालिका में अंतर करने की मानसिकता सबसे अधिक देश के शिक्षित वर्गों में ही देखी जाती है। अपराध ब्यूरो के आंकड़ों पर गौर करें तो सबसे अधिक कन्या भ्रूण हत्या जैसे घिनौने कार्य पंजाब और दिल्ली जैसे समृद्ध शहरों में ही नजर आते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार देश के छोटे शहरों अथवा पिछड़े राज्यों की तुलना में बड़े शहरों में लड़के और लड़कियों के अनुपात में काफी असमानता है। आज भी समाज में कई ऐसे घर हैं जहां बेटियों का दर्जा बेटों की तुलना में निम्न है। चाहे बात खानपान की हो या फिर शिक्षा और स्वास्थ्य की। उनके खिलाफ किसी भी प्रकार की हिंसा में भी कुछ ऐसा ही अंतर है। लड़कियों को पराया धन समझकर उनका कम उम्र में ही ब्याह कर देना जैसे अपराध की श्रेणी में तो गिना ही नहीं जाता है। आंकड़े बताते हैं कि देश में 44 फीसदी औरतों की शादी 18 वर्ष से कम उम्र में ही कर दी जाती है। जिनसे जन्म लेने वाले बच्चे कुपोशण का शिकार होते हैं।

2001 से 2011 की जनगणना के दौरान भी बच्चों के लिंगानुपात में चिंताजनक गिरावट आई है। यह 927 से घटकर 914 पर पहुंच गया है। जो स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे निचले स्तर का है। उनके स्वास्थ्य और जीवन स्तर में भी गिरावट दर्ज की गई है। नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्‍शन ऑफ चिल्डंस राइटस यानि एनसीपीसीआर की रिपोर्ट के अनुसार देश में 6 से 14 वर्श की अधिकतर लड़कियों की दिनचर्या में पढ़ाई के साथ साथ घर के छोटे भाई बहनों की देखभाल भी होती है। जो आगे चलकर उनके स्कूल छूटने का कारण बनता है। उनके साथ यह भेदभाव किसी बाहरी हस्तक्षेप का परिणाम नहीं है बल्कि घर के अंदर से ही शुरू होता है। यह अंतर भयावह भविष्‍य की ओर इशारा करता है। जिसे समय रहते नहीं समझा गया तो दुष्‍परिणाम के लिए हमें तैयार रहना चाहिए। वास्तव में लैंगिक भेदभाव को खत्म करने के लिए किसी भी कठोर कानून से ज्यादा जागरूकता सशक्त माध्यम साबित होगा। (चरखा फीचर्स)

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1 Comment on "बेटी कब से पराया धन हो गई"

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Ram Krishan Rastohi
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राम क्रिशन रस्तोगी मेने “बेटी कब से पराया धन माने जाने लगा” लेख पढ़ा मेरे मन में भी कुछ विचार आये उनको व्यक्त कर रहा हूँ “क्यों समझते है, लडकी है पराया धन ,और लड़का है हमारा धन ,कैसी विडम्ना है कैसा है नियम ,जबकि लेते है एक कोख से जन्म .दोनों की एक धरती ,दोनों का एक गगन ,दोनों की एक भाषा ,दोनों का एक वतन ,दोनों की एक जाति दोनों का एक धर्म ,फिर क्यों समझते है लडकी है पराया धन और लड़का है अपना धन

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