लेखक परिचय

सारदा बनर्जी

सारदा बनर्जी

लेखिका कलकत्ता विश्वविद्यालय में शोध-छात्रा हैं।

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सारदा बनर्जी

हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ नामक अपने निबंध में नाखून से जुड़े तमाम मुद्दों और पहलुओं को उठाया हैं। इस निबंध को पढ़ते हुए पाठक का मन नाखून के प्रति स्वभावतः गहरे विद्वेष भाव से भर जाता है और नाखून की अनेकों त्रुटियां ऊजागर होकर सामने आती हैं।द्विवेदी जी ने लम्बे नाखून के प्रति गंभीर शिकायत का रुख अपनाते हुए उसे मनुष्य की ‘भयंकर पाशविक वृत्ति एवं बर्बरता’ का जीवंत प्रतीक माना है।फलतः उनके अनुसार नाखून काटना बेहद ज़रुरी है चूंकि नाखून काटना प्रतीकात्मक तौर पर मानवीय होना है। किंतु दिलचस्प बात यह है कि आज इक्कीसवीं सदी में स्त्रियों के लिए लम्बे नाखून रखना बर्बरता एवं पशु-सुलभ आचरण नहीं बल्कि सभ्यता एवं सौंदर्य का जीवंत प्रतीक है।नाखून स्त्रियों के हाथों एवं पैरों के सौंदर्य को बढ़ाने और उसे सुसज्जित करने का एक बहुत बड़ा साधन है।इसी नाखून को बढ़ाने एवं उसे सुंदर शक्ल देकर सजाने के ख्वाब लड़कियां छोटे से बुनती हैं। परिवारवालों या स्कूल की बाधा के कारण वे असफल रहतीं हैं किंतु बाधा-रहित होने या बड़े होने पर इस इच्छा को कार्य में तब्दील करतीं हैं।अंगुली की शक्ल के अनुसार नाखून को लम्बा करके अनेक रुप दे दिया जाता है। फिर तरह-तरह के रंगलेप(नेलपेंट) के द्वारा उसे सुसज्जित करने की अपार कोशिश जारी रहती है।इस परंपरा को शक्ति-प्रदान करने के लिए स्त्री-सौंदर्य परक पत्रिकाओं की बाढ़ लगी है जिसमें बाकायदा टिप्स आतें हैं कि क्या-क्या खाने और पीने से नाखून स्वस्थ रहेंगे।स्त्रियां इन मैगज़ीनों को खूब खरीदतीं ,पढ़तीं एवं इनमें दिए गए नुस्खों को प्रयोग में लातीं हैं। मसलन् ताज़े गाजर का रस पीना नाखूनों के लिए फायदेमंद है,खासकर नाखूनों की मज़बूती के लिए।उसमें कैल्शीयम और फ़ॉसफ़ोरस प्रचुर मात्रा में है।साथ ही नींबू और (किसी निश्चित ब्रांड का) तेल नाखून पर मालिश की जाए तो वे चमकते रहेंगे आदि-आदि।

द्विवेदी जी के अनुसार नाखून एक समय वनमानुषों के लिए अस्त्र का काम करता था और इसलिए वह ज़रुरी था।किंतु आज चूंकि विकसित अस्त्र-शस्त्र उपलब्ध हैं सो नाखूनों की ज़रुरत मिट चुकी है। अत: द्विवेदी जी नाखून को निर्लज्ज, बेहया और अपराधी कहते नज़र आतें हैं चूंकि वह काटने पर भी असभ्य तरीके से बढ़ता ही जा रहा है। किंतु द्विवेदी जी यह लिखते समय भूल रहे थे कि नाखून की ज़रुरत अस्त्र के अलावा भी सौंदर्यवर्धन के लिए हो सकती है। यह भी गौरतलब है कि यदि ये निर्लज्ज, बेहया और अपराधी नाखून(द्विवेदी जी के अनुसार) नहीं निकलते तो स्त्रियों की खूब क्षति होती।उनके सौंदर्य-सज्जा में बड़ा विघ्न पड़ जाता।जिस वस्तु को लेकर सजने-संवरने की इतनी धूम मची हैं, उसके अस्तिस्व का नष्ट होना काफ़ी दुखद होता।वस्तुत: द्विवेदी जी नाखून को पूर्णत: पुंसवादी नज़रिए से देखते हैं,ना कि स्त्रीवादी नज़रिए से।आज नाखून के प्रति स्त्रीवादी नज़रिया बेहद ज़रुरी है,खासकर आज के ज़माने में जब लम्बे नाखून को ट्रीम करना, फाइल करना और रंग-लेपन कर सुंदर शक्ल देना स्त्रियों के जीवन-व्यापार का एक अंतरंग हिस्सा है।आज बाज़ार में तरह-तरह के रंगलेप उपलब्ध हैं और इसका एक अच्छा–खासा बाज़ार भी चल निकला है।विभिन्न तरह की क्वालिटियों(गुणों), रंगों और दामों के नेल-पॉलिश आज उपलब्ध है।केवल नेल-पॉलिश ही नहीं,नेल-पॉलिश रीमूवर तथा विभिन्न नेल-शेपिंग टूल्स भी धड़ल्ले से प्रयोग में आ रहे हैं।उसके भी अनेकों ब्रांडस बाज़ार में उपलब्ध है।यहां तक कि नकली नाखूनों का भी खूब प्रयोग हो रहा है जिसमें अनेक स्त्रियों की विशेष रुचि है।

ध्यान देने की बात है कि द्विवेदी जी अपने लेख में वात्स्यायन के कामसूत्र का ज़िक्र तो करतें हैं जिसके अनुसार दो हज़ार वर्ष पूर्व के भारतवासी जमकर नाखूनों को संवारता थे और वर्तुलाकार, चंद्राकार, त्रिकोणाकार , दंतुलाकार आदि विभिन्न तरह से नाखूनों को आकृति देते थे ।गौड़ देश के लोग बड़े नाखून और दाक्षिणात्य के लोग छोटे पसंद करते थे। किंतु इन विवरणों का द्विवेदी जी पर कोई असर नहीं होता और इन प्राचीन लोगों के प्रति गंभीर विद्वेष भाव व्यक्त करते हुए वे कहते हैं — “समस्त अधोगामिनी वृत्तियों को और नीचे खींचने वाली वस्तुओं को भारतवर्ष ने मनुष्योचित बनाया है, यह बात चाहूँ भी तो नहीं भूल सकता।”

वस्तुतः द्विवेदी जी नाखूनों के प्रति अपने रुढ़िवादी और पुंसवादी नजरिए से ऊबर नहीं पाते हैं और नाखूनों के प्रति अपने सख्त रुख को बरकरार रखते हुए नाखून का संबंध अधोगामिनी वृत्ति या पशु-वृत्ति से जोड़ देतें हैं।वे नाखून के बढ़ने को सहजात वृत्ति तो मानतें हैं साथ ही पशुत्व का लक्षण भी।इस पशुत्व को वे मनुष्य के भीतर बढ़ते हुए पशुत्व से जोड़तें हैं।यानि मनुष्य के बढ़ते नाखूनों के समान मनुष्य के हृदय में भी पाशविकता का संसार दिनोंदिन फैलता जा रहा है।यानी मनुष्य अनुभूति-शून्य और संवेदना-शून्य होता जा रहा है। यह सही है कि द्विवेदी जी ने मनुष्य के हृदय की पाशविकताओं की ओर हमारा ध्यान खींचा है,किंतु नाखूनों के साथ पाशविकता का संबंध बैठाना बड़ा ही बेमेल और अटपटा है।बेचारे नाखूनों का इसमें क्या दोष ? आगे द्विवेदी जी यह भविष्यवाणी भी करते हैं कि नाखून चूंकि उपयोगी नहीं है,अत: उसके बढ़ने का यह सिलसिला एक दिन बंद हो जाएगा। ठीक जैसे हमारी पूंछ झड़ चुकी है, वैसे ही नाखून स्वतः लुप्त हो जाएगा।लेकिन दिलचस्प बात यह है कि द्विवेदी जी का यह पूवार्नुमान सही नहीं हुआ।नाखून बढ़ने का यह सिलसिला अभी तक बंद नहीं हुआ है और खासकर स्त्रियों के द्वारा इसकी प्रगति और विकास के नए रास्ते खोले जा रहे हैं।इसकी तरक्की के नए-नए उपाए सुझाए जा रहे हैं।

अभी बाज़ार में नाखूनों की फैशनपरस्ती की होड़ को देखते हुए विभिन्न स्त्री-पत्रिकाएं नाखून से जुड़े अनेक सुझाव देने की प्रतियोगिता में लगे हैं।इसमें मैनिक्योर-पेडीक्योर पर विशेष ज़ोर होता है।ऐसा प्रचार किया जाता है कि इन प्रणालियों से नाखूनों की साफ़-सफ़ाई तो बेहतर होगी ही साथ ही नाखूनों की मजबूती में इसकी गहरी भूमिका होगी।फलतः विभिन्न उम्र की स्त्रियां और मूलतः युवा-वर्ग इसे एक ज़बरदस्त सुझाव मानते हुए धड़ल्ले से ब्यूटीपीर्लरों में समय बिताती नज़र आतीं हैं।कभी-कभी तो ऐसा भी देखा गया है कि नाखूनों को आकृति देने के क्रम में भूलवश यदि आकृति ठीक न हो या फिर नाखून ही कट जाएं तो स्त्रियां एक हफ्ते या उससे ज़्यादा समय तक दुखी एवं परेशान रहती हैं।इसकी सीधा अर्थ यह है कि नाखून हालांकि द्विवेदी जी के लिए भयानक झंझट और मुसीबत है किंतु यह आधुनिक स्त्री-हृदय में अपना स्थायी वास बना चुकी है।

अत: नाखून के प्रति जो रुढ़िवादी और पुंसवादी मानसिकता हमारे दिमाग में अब तक हावी था उस मानसिकता को निकाल बाहर फेंकना है। हमें नाखून के मामले में स्त्रीवादी नज़रिया अपनाने की बेहद ज़रुरत है।साथ ही यह भी समझने की ज़रुरत है कि आज इक्कीसवीं सदी में आधुनिक नाखून ‘पाशविक-प्रवृति संपन्न’ नहीं बल्कि सौंदर्यात्मक गुण-संपन्न है।नाखून रखना ‘बर्बरता’ नहीं वरन् स्त्री-फ़ैशन है।नाखून ‘बेहया,निर्लज्ज और अपराधी’ नहीं सभ्यता का प्रतीक है और बड़े यत्न की चीज़ है और इसे संवारना स्त्री-सौंदर्य के अनुकूल है। आज लम्बे नाखून आधुनिक स्त्री-जीवन का एक ज़रुरी हिस्सा है।वह स्त्री-व्यक्तित्व से ज़ुड़ा है और वह वस्तुतः स्त्री-धरोहर है।

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