लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

rajyapal

गरिमा खोते राज्यपाल और उनकी जरूरत पर एक बार फिर से सवाल उठे हैं। संसद के चालू सत्र में गृह राज्य मंत्री आरपीएन सिंह की ओर से राज्यपाल संशोधन विधेयक 2012 का प्रारूप संसद में चर्चा के लिए रखा गया। चर्चा के दौरान विभिन्न दलों के नेताओं ने इस पद को औपनिवेषिक काल से चली आ रही गुलामी की विरासत और सफेद हाथी बताते हुए इसे खत्म करने की मांग की,वहीं दूसरी ओर विडंबना यह रही कि डेढ़ घंटे चली बहस के बाद इसे ध्वनिमत से पारित भी कर दिया गया। अब पूर्व राज्यपालों को आजीवन पेंशन, भत्ते, सरकारी आवास, संचार और निजी सहायकों की सुविधाएं हासिल हों जाएंगीं। मसलन सेवानिवृति के बाद भी राज्यपाल कार्यालयों का एक ऐसा संस्थागत ढ़ाचा खड़ा करने के संवैधानिक उपाय कर दिए गए, जो आर्थिक संकट झेल रही गरीब जनता के लिए बेजा बोझ साबित होंगे ?

राज्यों में राज्यपालों की नियुक्ति और उनेक पूर्वग्रहों से प्रभावित कार्यप्रणाली के चलते इस संवैधानिक पद की गरिमा और औचित्य पर सवाल उठते रहे हैं। पिछले दिनों बिहार के पूर्व राज्यपाल पर विश्वविधालयों में कुलपतियों की रिश्वत लेकर नियुक्तियां किए जाने संबंधी मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा था। इस सिलसिले में न्यायालय ने पाया कि राज्यपाल ने अपने अधिकारों का दुरूपयोग करते हुए पक्षपात किया है। यह बेहद गंभीर स्थिति है, क्योंकि कुलपतियों की नियुक्ति का राज्यपालों को सीधा अधिकार है। ऐसे ही अधिकार लोकायुक्तों की नियुक्ति के परिप्रेक्ष्य में मिले हुए हैं। गुजरात में राज्यपाल डा कमला बेनीवाल द्वारा न्यायमूर्ति आर ए मेहता की लोकायुक्त पद पर की गर्इ नियुक्ति चर्चा और विवाद का विषय रही। आखिर में मेहता को इस्तीफा देना पड़ा। अब तो गुजरात सरकार में कानून में संशोधन कर राज्यपाल से लोकायुक्त की नियुक्ति के अधिकार ही छीन लिए है। जाहिर है, यह पद निर्विवाद कभी नहीं रहा।

दरअसल संविधान में पंरपरा को आधार मानें जाने के विकल्पों के चलते ही राज्यपाल का पद असितत्व में है। अंग्रेजी राज में वाइसराय की जो भूमिका थी, कमोवेश उसे ही राज्यपाल के पद में रूपांतरित किया गया है। वाइसराय जिन राजभवनों में रहते थे, उन्हीं आलीशान भवनों में हमारे लोकतंत्र के राज्यपाल रह रहे हैं। इनके राजसी वैभव और ठाठबाट को बनाए रखने  पर करोड़ों – अरबों का खर्च रोटी को तरसती वह 67 फीसदी आबादी भोग रही है, जिसके लिए केंद्र सरकार खाध सुरक्षा विधेयक ला रही है।

तय है, देश की आर्थिक बदहाली के मददेनजर राज्यपाल का पद आर्थिक ढांचे पर बड़ा बोझ पहले से ही था,अब इसे नर्इ सुविधाएं व कर्मचारी देकर और बढ़ा दिया जा रहा है। जबकि बदलते परिदृष्य में इस पद की व्यावहारिकता की समीक्षा नए सिरे से किए जाने की जरूरत थी ? इस परिप्रेक्ष्य में यदि जनता दल, तृणमूल कांग्रेस, सपा, राजद ओर बीजू जनता दल इसे सफेद हाथी करार दे रहे हैं तो उनकी बात में कुछ तो दम है। इसी चर्चा के दौरान राजनीतिक दलों के सदस्यों ने यह सलाह भी दी कि यदि संस्थाएं हमारे पूर्वजों और संविधान निर्माताओं ने बनार्इ हैं और इस परिपाटी को जारी रखना जरूरी है तो राज्यपाल की नियुक्ति के क्रम में 1988 में गठित सरकारिया आयोग की उन सिफारिषों को अमल में लाया जाए, जिनमें मुख्यमंत्री की सलाह से राज्यपाल की नियुक्ति का प्रावधान है। इस आयोग का गठन नियुक्ति में पारदर्षिता लाने की दृष्टि से राजीव गांधी सरकार ने किया था। इसी परिप्रेक्ष्य में 2001 में अंतराज्यीय परिषद द्वारा बुलार्इ गर्इ बैठक में सहमति बनी थी कि यह पद संवैधानिक गरिमा के अनुकूल बना रहने के साथ राजनीति दुराग्रह से भी निष्प्रभावी रहे, इस हेतु राज्यपाल की नियुक्ति अनिवार्य रूप से प्रदेश के मुख्यमंत्री से जरूरी और पर्याप्त सलाह मशविरे के बाद ही किया जाए ? परिषद ने यह सलाह भी दी थी कि एक तो राजनीति से जुड़े व्यक्तियों को राज्यपाल न बनाया जाए, दूसरे जो राज्यपाल सेवा मुक्त हो जाएं उन्हें राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के निर्वाचन में हिस्सा लेने के आलावा अन्य कोर्इ चुनाव लड़ने अथवा प्रत्यक्ष राजनीतिक गतिविधि में भागीदारी से प्रतिबंधित किया जाए। किंतु बैठक में राजनीतिक गतिविधि की व्याख्या स्पष्ट नहीं जा की सकी और इस बहाने परिषद की सिफारिषें को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

दरअसल, धर्मनिरपेक्ष देश होने के कारण हमारे यहां धर्म आधारित अनेक संगठन प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष तौर से राजनीति, धर्म और सार्वजनिक जीवन में समान रूप क्रियाशील है। अर्थात कर्इ संगठन ऐसे हैं,जो ‘राजनीति मे हैं भी और नहीं भी कि स्थिति में हैं। जैसे भाजपा से जुड़े संगठन राश्ट्र्रीयराष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ,बंजराग दल और विश्व हिंदु परिषद। इसी तर्ज पर मुस्लिम लीग से जुड़े सिमी और जमात ए इस्लामी हैं। सपा भी अपना राजनीतिक वजूद और मुस्लिम वोट बैंक पुख्ता बनाए रखने के नजरीए से इस्लामिक संस्थाओं का सहयोग ले रही है। ये तमाम संगठन ऐसे हैं, जो खुद को राजनीतिक संगठन तो नहीं मानते, किंतु अप्रत्यक्ष तौर से राजनीतिक गतिविधियों में लगातार सक्रिय रहते हैं। मौजूदा परिदृष्य में इस स्थिति के साक्षात दर्षन उत्तरप्रदेश में विहिप द्वारा असमय आयोजित चौरासी कोसी परिक्रमा में कर सकते हैं, जो सांप्रदायिक धु्रवीकरण की दृष्टि से भाजपा को लाभ पहुंचाने के लिए प्रायोजित की गयी। ऐसे में अब इसे राजनीतिक गतिविधि माना जाए अथवा धार्मिक ? इसे विभाजित करके देखने की कोर्इ स्पष्ट परिभाषा अंतराज्यीय परिषद नहीं सुझा पार्इ ?

असल में हमारे देश में जिस तरह की राजनीतिक संस्कृति बनाम विकृति पिछले ढार्इ-तीन दशक में पनपी है, उसमें संविधान में दर्ज स्वायत्ता का परंपरा के बहाने दुरूपयोग ही ज्यादा हुआ है। न्यायालय और कैग जैसी लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भी जान-बूझकर आक्रामक प्रहार किए गए। ऐसे में राज्पाल तो सीधे राजनीतिक हित साधन के लिए केंन्द्रीय सत्ता द्वारा की गर्इ नियुक्ति है, इसलिए राज्यपाल को प्रतिपक्ष संदेह की दृष्टि से देखता है। अक्सर इस पद को हाषिए पर पड़े उम्रदराज नेताओं अथवा सेवानिवृत नौकरशाहों से नवाजा जाता है। इन उपकृत राज्यपालों को जहां केंद्र अपना चाकर मानकर चलता है, वहीं ऐसे राज्यपाल भी स्वंय को नियोक्ता सरकार का नुमाइंदा समझने लग जाते हैं। लिहाजा पद की गरीमा के उलंघ्घन में वे न तो शर्म का अनुभव करते हैं और न ही उन्हें संविधान की मूल भावना के आहात होने की अनुभूति होती है।  हकीकत में वे केंद्र के अहसान का बदला चुका रहे होते हैं। पद की अवमानना और इसके औचित्य पर ऐसे ही कारण सवाल खड़े करते रहे हैं ?

राज्यपाल की हैसियत और संवैधानिक दायित्व की व्याख्या करते हुए उच्चतम न्यायालय के पांच न्यायमूर्तियों की खंडपीठ ने 4 मर्इ 1979 को दिए फैसले में कहा था कि ‘यह ठीक है कि राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति करते हैं। जिसका अर्थ हुआ कि उपरोक्त नियुक्ति वास्तव में भारत सरकार द्वारा की गर्इ है। लेकिन नियुक्ति एक प्रक्रिया है,इसलिए इसका यह अर्थ नहीं लगाना चाहिए कि राज्यपाल भारत सरकार का कर्मचारी या नौकर है। राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त हर व्यक्ति भारत सरकार का कर्मचारी नहीं होता। यही स्थिति राज्यपाल के पद पर लागू होती हैं।

इसके बावजूद ज्यादातर राज्यपाल संविधान की बजाए नियोक्ता सरकार के प्रति ही उत्तरदायी बने दिखार्इ देते हैं। यही वजह है कि गाहे-बगाहे वे राज्य-सरकारों के लिए परेशानी का सबब भी बन जाते हैं। इसलिए इस संस्था को गैर जरूरी करार दे दिया जाता है और इसके स्थान पर उच्च न्यायालों अथवा प्रमुख सचिवों को राज्यपाल के जो गिने-चुने दायित्व हैं,उन्हें सौंपने की बात राज्यपाल संशोधन विधेयक को पारित करने के दौरान उठार्इ गर्इ। दरअसल राज्यपाल का प्रमुख कत्र्तव्य केंद्र सरकार को आधिकारिक सूचनाएं देना है।  लेकिन राज्यपाल तार्किक सूचनाएं देने की बजाए, केंदीय सत्ता की मंशा के अनुरूप राज्य की व्यवस्था में दखल देने लग गए हैं। इस वजह से राज्यपाल और मुख्यमंत्रियों के बीच टकराव के हालात पैदा हो रहें हैं। दरअसल संविधान की मूल भावना में निहित है कि संघ और केंद्र के बीच एकात्मता बनी रहे। किंतु राज्यपाल इस भावना के अनुपालन में खरे नही उतरे। वे केंद्र के हित साधक की भूमिका में आ जाते है। इस वजह से राज्यपाल के पद के औचित्य पर सवाल उठते है और इस व्यवस्था को आर्थिक बोझ व गैर जरुरी  माना जाने लगा है। इसलिए इस पद की जरुरत के औचित्य की तलाश वर्तमान राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में खोजने की जरुरत है।

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