लेखक परिचय

राजीव गुप्ता

राजीव गुप्ता

बी. ए. ( इतिहास ) दिल्ली विश्वविद्यालय एवं एम. बी. ए. की डिग्रियां हासिल की। राजीव जी की इच्छा है विकसित भारत देखने की, ना केवल देखने की अपितु खुद के सहयोग से उसका हिस्सा बनने की। गलत उनसे बर्दाश्‍त नहीं होता। वो जब भी कुछ गलत देखते हैं तो बिना कुछ परवाह किए बगैर विरोध के स्‍वर मुखरित करते हैं।

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राजीव गुप्ता

विश्व गुरु बनने का सपना संजोने वाली अधिकांश भारतीय संततियों का ध्येय जब अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए राष्ट्र हितों के मानक मूल्यों से समझौता करने तक की तरफ अग्रसर होने लगे तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या हमने अब अपने पुरखों की दी हुए विरासत को नीलाम करना शुरू कर दिया ? हमारी संस्कृति हमारी विरासत का उदघोष करने वाली भारतीयता क्या अब दम तोड़ने लगी ? जब देश के राजनेताओं में राजनैतिक इच्छा शक्ति दम तोड़ रही हो एवं उनके लिए राष्ट्र – चरित्र की बात बेईमानी हो , चंद दौलत की लालच में भाई – भाई का दुश्मन बन रहा हो , कोर्पोरेट जगत में जीविका के चलते क्रेच में पलता बचपन, एकल परिवार की आड में वृद्धाश्रम में ठूंसे जाते बूढ़े माता-पिता , दम तोडती विवाह जैसी संस्था और तलाक की संख्या में वृद्धि, कुपोषण के शिकार बच्चे, सड़ते आनाज और भूख से मरते नागरिक , गरीबी से परेशान होकर खुदखुशी करते किसान, भ्रष्टाचार, बलात्कार और व्यभिचार की बढ़ती घटनाओं से शर्मसार होती मानवता को उबारने के लिए भारत में राम की प्रासांगिकता एक बार पुनः अपरिहार्य हो गयी है !

 

यह सर्वविदित है कि राजा दशरथ को बहुत समय तक कोई संतान न थी फलस्वरूप राजा दशरथ बहुत चिंतित रहते थे ! गुरु वशिष्ठ के आश्वासन के बाद नियत समय पर राजा दशरथ के चार पुत्र हुए जिनमे राम सबसे बड़े थे और उनका चैत्र-शुक्ल-नवमी को अभिजित नक्षत्र में दोपहर के समय हुआ ! राम सबसे पहले सुबह उठकर अपने माता-पिता को अपना सीस नवाते थे ! सीस नवाना अर्थात झुककर प्रणाम करना ! भारतीय संस्कृति में झुककर प्रणाम करने की प्रथा में “विनम्रता और संस्कार” छुपा है जो कि वर्तमान समय की नितांत आवश्यकता है ! कारण साफ है कि आजकल हम विनम्र होना भूल गए है इसलिए हमारे बच्चे भे वैसा ही आचरण कर रहे है जिससे कि जीवन में अथाह परेशानियाँ उत्पन्न हो रही हैं ! मसलन अमेरिका जैसा विकसित देश में बच्चे अपने माता-पिता से विद्रोह कर रहे है ! अभी हाल ही में एक खबर मीडिया पर छाई रही कि ‘पॉकेट मनी’ अर्थ जेब खर्च न मिलने के कारण एक बच्चे ने अपने पिता की गोली मरकर हत्या कर दी ! पिता ने अपने पुत्र की किसी बात पर पिटाई कर दी और मामला पुलिस तक जा पंहुचा ! जब पिता द्वारा अपने पुत्र से माफी मांग ली गयी तब जाकर मामला शांत हुआ ! अगर माता-पिता द्वारा बच्चे को किसी बात पर डांट दिया जाता है तो आजकल के बच्चे आत्महत्या तक कर लेते है ! इन सब वाकयों से लगता है तुलसीदास ने अपने महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ में कितनी ख़ूबसूरती ने राम के बचपन के संस्कार को उकेरते हुए हमें हमेशा के लिए सीख दे दी कि बचपन में जैसा संस्कार मिलता है बच्चा ताउम्र वैसा ही आचरण करता है ! जीवन का आधार कभी ‘अहंकार’ नहीं बन सकता और अहंकार को विनम्रता से ही जीता जा सकता है इसलिए भारतीय संस्कृति में बच्चे को झुककर प्रणाम करना सिखाया जाता है ! राम भी अपने माता-पिता और गुरु को सुबह उठकर झुककर प्रणाम करते थे ! मनोवैज्ञानिक भले ही यह तर्क देते रहे कि माता-पिता को अपने विचार बच्चो पर नहीं थोपना चाहिए परन्तु बचपन में बच्चे का मस्तिष्क तो एक कोरे कागज के समान होता है कोई न कोई तो आकर उस कोरे कागज पर लिखेगा ही ! पहले अच्छे संस्कार बच्चे को अपने माता-पिता-गुरुजनों से मिलता था परन्तु तथाकथित प्रगतिशील मनुष्य अपने जीविका उपार्जन हेतु पति-पत्नी दोनों अपनी – अपनी निजी ज़िंदगी में इतने मशगूल हो चुके है कि उनके पास अपने बच्चो के लिए समय ही नहीं है ! परिणामतः बच्चो को क्रेच में भेज दिया जाता है और जब वही बच्चा उन्हें वृद्धाश्रम में डाल देता है तो संस्कारों की दुहाई देते हुए अनर्गल अलाप करते है ! याद रखने योग्य है कि बचपन में जैसे संस्कार बच्चो को मिलते है उसका असर दीर्घकालीन रहता है ! इसलिए बच्चो को अच्छी संगति देनी चाहिए ! हमें यह जरूर ध्यान रखना चाहिए अच्छे संस्कार देने से हमारा बच्चा राम तो नहीं बन जायेगा परन्तु यह सौ फीसदी सच है कि हमारा बच्चा रावण बनने से बच जायेगा ! अतः बच्चो को कैसी परवरिश करनी चाहिए साथ ही एक आदर्श पुत्र के क्या कर्तव्य होते है इसका उल्लेख तुलसीदास ने अपनी कृति में बखूबी से किया है !

 

माता कैकेयी ने अपने पुत्र भारत को राजा बनाने के उद्देश्य से भाइयों के बीच के आपसी स्नेह को खत्म करने में कोई कोताही नहीं छोडी परन्तु भरत ने अपने त्याग और लक्ष्मण ने अपने समर्पण से एक नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया ! वनवास जाने की इच्छा जब लक्ष्मण ने भी की राम ने उन्हें समझाने हेतु पिता – प्रजा का वास्ता तक दे दिया परन्तु लक्ष्मण की अडिग श्रद्धा, आस्था, समर्पण और भक्ति के सामने विह्वल होकर अपनी सहोदर-भावना का परिचय दिया ! उनकी सहोदर-भावना की प्रमाणिकता तब सिद्ध हो गयी जब मेघनाद द्वारा लक्ष्मण को अचेत कर दिए जाने पर राम ने यहाँ तक कह दिया कि ‘अब मै अयोध्या किस मुह से जाऊंगा लोग कहेंगे कि पत्नी के लिए लड़ाई लड़कर मैंने अपने भाई को गवां दिया’ इन पक्तियों से हमें सहज ही पता चलता है कि राम इतने विह्वल उस समय भी नहीं हुए थे जब उनकी पत्नी सीता का अपहरण हुआ था ! इतना ही नहीं भरत की तरक्की में राम सदैव प्रसन्न होते थे तुलसीदास की कृति से इसका पता हमें चलता है जिसमे तुलसीदास जी उल्लेख करते है कि ‘हे माता मेरे प्राण से प्यारे भरत को राज्य मिलेगा इससे बढ़कर मेरे लिए सुख की बात और क्या होगी, लगता है विधाता सब तरह से मेरे अनुकूल है’, आगे राम चित्रकूट में भरत की वेदना को समझते हुए कहते है कि ‘मेरी विपत्ती को तो सबलोगों ने बाँट लिया परन्तु चौदह वर्ष की तुम्हारी कठिनाई का तो कोई अंत ही नहीं है !’ जब भाई भाई की तरक्की से दुखी होकर उसे गोली तक मार देता हो तो ऐसे विकट समय में राम की ये बाते और भी अनुकरणीय और प्रासांगिक हो जाती है !

 

रामचरितमानस में तुलसीदास ने राम के जीवन में तीन मित्रों निषादराज,सुग्रीव और विभीषण का उल्लेख किया है ! इन तीनो के साथ राम का व्यवहार अनुकरणीय है ! राम उस समय के छत्रिय थे परन्तु बिना किसी भेदभाव के निषादराज को गले लगाया और उन्हें अपना मित्र बनाने में तनिक भी संकोच नहीं किया ! यह भी सर्वविदित है कि सुग्रीव वानर जाति के थे परन्तु राम ने उन्हें भी अपने मित्र बनाकर सुग्रीव को दिए हुए वचन को पूरा भी किया ! विभीषण अपनी ईश-भक्ति के कारण रावण का कोपभागी बने थे ! परन्तु जब राम की शरण में विभीषण आये तो राम ने उन्हें दुश्मन का भाई दुश्मन नहीं माना अपितु उन्हें भी सखा-भाव से ही न केवल स्वीकार किया अपितु उनसे किया हुआ वादा भी पूरा किया ! न केवल राम ने अपितु इन तीनो राम के सखाओं ने भी राम के प्रति मित्रता का भाव रखते हुए राम के सुख-दुःख में साथ दिया ! भला यह कैसे भुलाया जा सकता है कि चित्रकूट में निषादराज अज्ञानतावश ही सही परन्तु भरत से भी युद्ध के लिए तैयार थे !

 

राम – राजनीति से आजकल के राजनीतिज्ञों को यह सीख जरूर लेनी चाहिए कि राजनीति का उद्देश्य येन-केन-प्रकारेण सत्ता पाना नहीं होता अपितु राजनीति मूल्यों, आदर्शो और मान्यताओं से अविभाज्य है ! राम ने कभी भी अपने स्वार्थ की खातिर अवसर का लाभ नहीं उठाया ! अगर विश्वामित्र राम को राजमहल से निकाल कर अपने आश्रम में न लाये होते शयद राम को कभी भी व्यवहारिक राजनीति की शिक्षा नहीं मिलती ! माता कैकेयी द्वारा व्यक्तिगत स्वार्थ पर की गयी चोट को बिना किसी को दुःख पहुचाये किस प्रकार राम ने सहकर घर,परिवार और राज्य को बिखरने से बचा लिया यह सभी के लिए अनुकरणीय होने के साथ – साथ वर्तमान समय की नितांत आवश्यकता भी है ! अगर राम चाहते तो अपने व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि हेतु माता कैकेयी को कारागार में डलवा सकते थे क्योंकि उस भरत और शत्रुघ्न ननिहाल में थे और लक्ष्मण राम के अनुसार ही चलते थे ! इतने पर भी राम ने माता कैकेयी के प्रति अपने मन घृणा नहीं पनपने दी इसका प्रमाण हमें चित्रकूट में मिलता है जब राम ने सबसे पहली कैकेयी के पैर छुए ! इतना ही राम की व्यवहारकुशलता तो आज भी अनुकरणीय है कि किस प्रकार राम ने वनवासियों को संगठित कर रावण जैसे योद्धा को परास्त किया ! राम ने हर बंधन को तोड़ दिया चाहे वह बंधन भेदभाव का हो ऊँच-नीच का हो अथवा कोई और समाज के सभी तिरिस्कृत जनों को समाज मे सम्मान की जगह दिलवाई अहिल्या का उदाहरण हम सबके सामने है ! राम के राज्य में भुखमरी, असाध्य रोग, इत्यादि तो बिलकुल भी नहीं थी शायद इसीलिए तुलसीदास ने कही इन सब चीजो का उल्लेख भी नहीं किया है ! राम – राज्य ‘जनता सर्वोपरि’ थी उसकी हर बात को न केवल सुना जाता था अपितु उसकी बातो पर ‘तत्काल’ कार्यवाही भी होती थी इसका पता धोबी के उस कटु वाक्य से पता चलता है जिसके मात्र ताने से ही माता सीता को वनवास दे दिया गया ! राम के राजतिलक के उपलक्ष्य में विभीषण ने अयोध्या में धन सम्पदा लुटाने का निवेदन किया तो राम ने विभीषण को यह आग्रह किया कि ‘सखा विभीषण तुम पुष्पक विमान पर चढ़कर वस्त्रों एवं गहनों की वर्षा कर दो !’ इससे एक बात साफ हो जाती है कि राम छोटी से छोटी बातो में भी श्रेय दूसरों को ही देते है यही राम का खूबी और व्यवहारकुशलता है और राम के इसी चरित्र की वर्तमान समय के स्वार्थी समाज में प्रासंगिकता बढ़ जाती है !

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2 Comments on "वर्तमान समय में राम की प्रासांगिकता"

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डॉ. मधुसूदन
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सुन्दर.
लिखते रहिए|
भविष्य आपकी राह देख रहा है|

Nem Singh
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vastvikta main lekhak ne hriday vidarak evam satya katu lekh likha hai lekin aaj ese lekhon ko kon padhata hai or kon vichar karta hai. Hamare sanskaron main hi hamari mahanta basti hai

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